Tuesday, March 19, 2019

चुनावी बतकही 2019 - 2

चुनाव के वक़्त चाय दुकान में केतली में केवल गरम चाय ही नहीं उबलती है बल्कि
उसके संग बेबाक़ राजनीतिक टिप्पणियाँ भी उबाल मारती रहती है।

ग्रामीण इलाक़ों में सड़क-बिजली की स्थिति में सकारात्मक परिवर्तन देखने को मिलता है, ऐसे में सड़क किनारे नए-नए दुकान दिख जाते हैं।

पूर्णिया से चम्पानगर जाने के रास्ते में कोसी की धारा कारी कोसी को हम पार करते हैं। आगे केनगर चौक पर सियाराम जी की चाय दूकान पर कुछ लोग जमा थे। सभी चुनाव पर ही बात नहीं कर रहे थे बल्कि कुछ खेती बाड़ी और दुकानदारी पर भी बतिया रहे रहे थे।

हमने सियाराम भाई से पूछा कि दिन भर एक तरह की ही बात सुनकर बोर हो जाते होंगे? इस पर उन्होंने कहा - “काहे होंगे, यहां हम सब मोदी से लेकर पूर्णिया के सांसद तक का बही खाता रखते हैं। काश सांसद चाह दुकान की बैठकी में आते तो गाँव की सड़कों का आमने-सामने हिसाब लेते। “

चुनाव में ग्राउंड के मुद्दे गायब होने की बात जब हर कोई कर रहा है तब दूरदराज के इलाकों में लोगबाग विकास की बात कर रहे हैं, यह लोकतंत्र की निशानी है। ‘हैशटैग चौकीदार’ की बात चाहे आप जितना करिये लेकिन जमीनी स्तर पर लोगबाग स्तरीय बात कर रहे हैं। लेकिन इन सबके बावजूद जाति पर सबसे अधिक बात हो रही है।

चम्पानगर बाज़ार में एक किसान सरफ़राज बताते हैं कि जाति एक सच्चाई है। उन्होंने बताया - “ गाम-घर के समाज में पिछड़ी जातियां हैं और अगड़ी जातियां हैं। मैं यह नहीं मानता की जाति ही सब कुछ है। विकास ज्यादा बड़ा मुद्दा है। बिहार में जिस पार्टी ने जो काम किया है उसके आधार पर वोटिंग होगी। हालाँकि इस बार भी नारे और नेता सबके विडियो के चक्कर में किसान की मूल समस्या सामने नहीं आ सकेगी। “

रामपुर में लकड़ी के व्यापारी रमेश बताते हैं कि “यह तय होना बाकी है कि जिताऊ मुद्दा क्या है, लेकिन इतना जरूर तय है कि जो भी होगा, जातिवाद के  सहारे ही हो पाएगा  या फिर भारत-पाकिस्तान का ही सहारा नेताजी लेंगे। “

जनता दल युनाइटेड और भाजपा के बीच टिकट बँटवारे के बाद लोगबाग की प्रतिक्रिया पर भी ग़ौर करना चाहिए। सबकुछ सोशल इंजीनियरिंग यानी जाति के आधार पर ही हो रहा है और खुलेआम हो रहा है। सबका एक ही फॉर्मूला है, उसी जाति के उम्मीदवार को टिकट, जिसके वोट की गारंटी हो। जाति की काट में जाति।

सीमांचल के इलाक़े में मुसलिमों और यादवों का बड़ा प्रभाव है। इस इलाक़े में भाजपा ने सिर्फ़ एक सीट - अररिया पर अपना उम्मीदवार दिया है, जबकि 2014 में उसने सभी सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए थे। मोदी की लहर के उस दौर में भी पूर्णिया-अररिया, किशनगंज, कटिहार में उम्मीदवार पराजित हो गए थे।

गाँव और शहर के मतदाताओं की बातचीत में अंतर साफ़ दिखने लगा है। पूर्णिया शहर में फल दुकानदार राजीव ने बताया कि अस्पताल जैसे मुद्दे को कोई नहीं उठा रहा है। हमें बेहतर स्वास्थ्य सेवा चाहिए और इस पर कोई नहीं बोल रहा है। राजीव ने कहा कि अब नेता हमें अलग अलग मुद्दों पर गुमराह कर रहे हैं लेकिन असली मुद्दा विकास ही है और यही रहेगा।

सीमांचल के इन इलाक़ों में पलायन बड़ी समस्या है। स्थानीय स्तर पर रोजगार नहीं मिलता है ऐसे में बड़ी संख्या में लोग बाहर चले जाते हैं। यह समस्या कोई आज की नहीं है बल्कि बहुत पुरानी है। हर पाँच साल में यह समस्या बढ़ती ही है।

बुज़ुर्ग रामनरेश जी कहते हैं- “ इंदिरा से मोदी तक का राज देख लिए लेकिन इस इलाक़े में उद्योग का विस्तार नहीं देख सके। उद्योग जब आएगा तब ही पलायन रुक पाएगा। वैसे यह भी सच है कि चुनाव स्थानीय मुद्दों पर कहाँ लड़ा जाता है ! “

चुनावी बतकही-2
#Election2019

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