Friday, September 30, 2011

'सर को समझाओ कि सिनेमा अच्छा है, बुझ रहे हो' *


अमीर खुसरो मेरे प्रिय हैं, फेसबुक पर तस्वीरों के कैप्शन के लिए मैं उनके शब्दों का खूब इस्तेमाल करता हूं, सर्वाधिकार-अ-सुरक्षित की तरह। उन्हीं की एक पंक्ति है- ‘खुसरो दरिया प्रेम का, उल्टी वाकी धार/जो उबरा सो डूब गया है, जो डूबा सो पार’।

तो साहेबान, बात ये है कि इसी लाइन पर सिल्वर स्क्रीन पर एक गो सिलेमा दौड़ने वाला है 14 अक्टूबर को। जी हां, ‘जो डूबा सो पार, इट्स लव इन बिहार’ नाम की एक फिल्म रिलीज होने जा रही है। खुसरो का दोहा हो और उसके अनुरुप कहानी न हो तो बात जमती नहीं है सो, फिल्म में बात जमाने की कोशिश की गई है। हालांकि, आपके कथावाचक को यूट्यूब के जरिए ही फिल्म की झांकी देखने को मिली है और उसे भी सबलोगों की तरह 14 अक्टूबर का इंतजार है। ( ऊपर यट्यूब का लिंक है, चटका लगाइए)

यूट्यूब की झांकी बताती है कि इसमें प्रेम भी है और हंसी-ठिठोली भी और सबसे बड़ी बात यह है कि फिल्म की कहानी बिहार में और बिहार के चूल्हे पर ही पकती है तो अपराध का फिल्मी कोण तो होना लाजमी है।फिल्म में आपको विनय पाठक और रजत कपूर की जुगलबंदी फिर से देखने को मिलेगी, हालंकि दोनों नायक नहीं है लेकिन उनकी उपस्थिति हमें गुददाती जरुर है (यूट्यूब पर देखने के बाद )। दोनों ने पुलिसवालों की भूमिका अदा की है। वैसे, फिल्म का नायक आनंद हैं। बॉलीवुड में नायकों के आगे मशहूर या स्टार लगाने की चली आ रही परंपराओं के बीच आपको आनंद नहीं मिलेंगे लेकिन इसके बावजूद उनके अभिनय-कला को सलाम करने का जी जरुर करेगा। फिल्म में उनका नाम केसू है।

केसू जिज्ञासु लेकिन शरारती है। स्कूल से निकाल बाहर किया गया है और बाप ने अपने ट्रक पर खलासीगिरी करने के लिए बुला लिया है। अब देखिए, कहानी में केसू की छवि कैसे बनती है। घर आने पर मज़ा उसे अपने साथियों के साथ मटरगश्ती करने में ही आता है। साथी भी कौन - एक मेकैनिक, दो सिनेमा का प्रचार करनेवाले ढिंढोरची, एक टोकन हवलदार जो अपनी माशूक़ा के विरह में मजनूँ बन जाता है और एक उसका अपना छोटा भाई, जो उसका परम भक्त भी है।

केसू की ज़िंदगी ऐसे ही बेचैन मगर मस्ती में चल रही थी कि एक फ़िरंगन उस क़स्बे में दाख़िल होती है। तो दोस्तों, वह आती क्यूं है? आप पूछिएगा। दरअसल फिरंगन मिथिलांचल की कला - ख़ासकर मधुबनी पेंटिग के सामाजिक दर्शन पर शोध करने के लिए वहां आती है। केसू जल्द ही उसका ‘फ़्रेण्ड, फ़िलॉसफ़र और गाइड’ बन जाता है, और चुपके-चुपके इश्क़ भी करने लगता है। (पता नहीं इ इश्क एकतरफा है कि दोतरफा, इ त फिल्म देखने के बाद ही पता चलेगा)  लेकिन इसी बीच कहानी में क्राइम-एलीमेंट ठक-ठक करने लगता है।

फिरंगन को लंबी-चौड़ी फिरौती वसूलने के चक्कर में कोई ताक़तवर  गैंग अगवा कर लेता है। फिल्म की कहानी इसी के आसापास अपना तानाबाना जोड़ती है। यूट्यूब पर टेलर देखने के बाद यही कहा जा सकता है कि फिल्म में हास्य और व्यंग्य की भरपूर खुराक है।

फिल्म के संवाद हमें खूब मजेदार लगते हैं। एक डेमो लें- हो गया बहूनी...मजनू के औलाद..। दिल हमार बैचेन.. जैसे संवादों को सुनने के लिए कान हमेशा तरसरता ही रहता है। फिल्म को बिहारी संवाद चूल्हे पर चढ़ाने का काम  अपने रविकान्त, प्रभात झा और संजीव कुमार के साथ जोज़ेफ़ मथाई ने किया है। ऐसे में मेरे जैसे लोगों का इंतजार बढ़ ही जाता है आखिर यह है ही इट्स लव इन बिहार

फेसबुक पर फिल्म के बारे में जानने के लिए चटका लगाइए.
* शीर्षक फिल्म के टेलर से 

2 comments:

कविता रावत said...

खुसरो दरिया प्रेम का, उल्टी वाकी धार/जो उबरा सो डूब गया है, जो डूबा सो पार’।

...सच कुछ पाने के लिए खुद ही गहराई में उतरना ही पड़ता है..
..शानदार प्रस्तुति..

दीपक की बातें said...

पिछले दिनों 'साहब, बीवी और गैंगस्‍टर'के शो में एक संक्षिप्‍त मुलाकात हमारी भी हुई थी। देखने से तो अच्‍छी फिल्‍म लग रही है। वैसे ये स्‍टार सिस्‍टम हमें ना तो समझ आता है, और ना भाता है। होटल का शेफ के खाने में स्‍वाद होगा, पर ढाबे के खाने का भी तो अपना मजा है। सिनेमा किसी के बाप की बपौती है क्‍या। यह कला की दुनिया है जो कलाकार होगा वो तवज्‍जो पाएगा।