Sunday, August 09, 2009

ख़बरों के कारोबार में टिके रहने के लिए सबसे ज़रूरी चीज़ है साख

बीबीसी संवाददाता राजेश प्रियदर्शी ने खरी-खरी बीबीसी हिंदी ब्लॉग में बैतुल्लाह महसूद के मारे जाने की कथित खबरों के बहाने पत्रकारिता को लेकर एक बहस छेड़ दी है। उन्होंने तीन महत्वपूर्ण बातें कही,
पहला- सीमाओं को याद रखना चाहिए और उनका सम्मान करना चाहिए, ख़ास तौर पर पत्रकारों को
दूसरा- ख़बरों के कारोबार टिके रहने के लिए सबसे ज़रूरी चीज़ है साख.
तीसरा- संयम और सतर्कता हमेशा अच्छा पत्रकार बने रहने का पहला नियम है।

आप भी पढ़िए उनकी पूरी पोस्ट।
गिरीन्द्र

पत्रकारिता की अपनी सीमाएँ हैं.किसकी नहीं हैं? तालेबान कमांडर बैतुल्लाह महसूद ने पहले पाकिस्तानी सेना की सीमाओं का एहसास कराया और अब अनजाने में पत्रकारिता का भी. हमने पहले पाकिस्तानी मंत्रियों के हवाले से बताया कि महसूद 'लगता है कि' मारे गए हैं, अब तालेबान के एक कमांडर कह रहे हैं कि वे ज़िंदा हैं.

दोनों में से एक ही बात सच हो सकती है, हम दोनों कह रहे हैं फिर हम सच कैसे कह रहे हैं?
दुनिया की लगभग हर समाचार संस्था सिर्फ़ सच रिपोर्ट करने का दावा करती है, हम भी करते हैं.
बैतुल्लाह ही नहीं, डूबी हुई नावें, टकराई हुई रेलगाड़ियाँ या फटे हुए बम... अक्सर पत्रकारों के लिए इम्तहान बनकर आते हैं.

पहले पुलिस कमिश्नर कह जाते हैं कि '50 लोग मारे गए', फिर गृह मंत्री बताते हैं कि '45 लोग मारे गए'... तो क्या इसका ये मतलब हुआ कि पाँच लोग मरकर जी उठे? इन पेंचों को पत्रकारिता के उस्ताद ख़ूब समझते हैं. ख़बरों के कारोबार टिके रहने के लिए सबसे ज़रूरी चीज़ है साख. यही वजह है कि हर विश्वसनीय समाचार माध्यम बताता है कि ख़बर किस ज़रिए से आ रही है, यह उसकी अपनी खोज नहीं है.

जब हम महसूद के मारे जाने की ख़बर तैयार कर रहे थे तो हमारे एडिटर ने याद दिलाया- 'ये ज़रूर कहना कि तालेबान ने इसकी तस्दीक नहीं की है, और ऐसे कई दावे पहले ग़लत साबित हो चुके हैं.' हमने एक तरह से मान लिया था कि महसूद मारे गए हैं, हमने ये चर्चा भी कि उनकी जगह कौन लेगा, लेकिन साथ ही हमने लोगों को कई बार याद दिलाया कि पाकिस्तानी मंत्री ऐसा कह रहे हैं तालेबान या महसूद के परिजन नहीं.

सच को ढूँढ निकालने का जोश अच्छा पत्रकार होने की शर्त है, मगर संयम और सतर्कता हमेशा अच्छा पत्रकार बने रहने का पहला नियम. सीमाओं को याद रखना चाहिए और उनका सम्मान करना चाहिए, ख़ास तौर पर पत्रकारों को.

कुछ लोग कहते हैं कि रेस में ध्यान सिर्फ़ तेज़ दौड़ने पर होता है, लेकिन मुझे लगता है कि अपनी लेन में ही दौड़ना चाहिए उसके बाहर नहीं.

2 comments:

काजल कुमार Kajal Kumar said...

हमारे यहां के न्यूज़ चैनलों को देखकर तो यही कि ये तीनों बातें इनपर लागू नहीं होतीं. इनके लिए हर चीज़ ब्रेकिंग न्यूज़ है व एेसी ब्रेकिंग न्यूज़ जो पूरा पूरा दिन चल सकती है भले ही उसका सामाजिक सरोकार दो कौड़ी का भी न हो. इन चैनलों के यहां माफ़ी मांगने का भी रिवाज़ नहीं है ...जब तक कि कहीं से डंडा ही न आ जाए.

Anonymous said...

बहुत धन्यवाद, अच्छी सामग्री पढ़वाने के लिए, चैनल वाले भाइयों को लिंक भेज दीजिए.
रवींद्र शर्मा