Wednesday, May 02, 2007

वैसे अभी भी काफी कुछ बदलने को बांकी है ..लेकिन यह सच है कि शुरूआत हो चुकी है..

क्या हम बदल रहे हैं? यह सवाल अक्सर मुझे तंग करता रहा जब तक मैं नार्थ बिहार के ग्रामीण इलाको का चक्कर लगाता रहा. बदलाव की आंधी में न जाने कितने नये चीज इन इलाकों में नजर आये. लोगबाग से लेकर पारिवारिक कोणों तक बदलती दुनिया नजर आयी. लगभग दो सालों में इतना बदलाव आखिर क्या कहता है?
पटना शहर से लेकर कोसी के भयावह धमदाहा,मधेपुरा तक बदलाव हीं बद्लव नजर आया. लोगो से बात करते वक्त यह साफ नजर आया कि वे अब अपनी बात कहने में डर नही रहे हैं. एक दम बिंदास अंदाज में वे अपनी बातों को कहते नजर आये.
ग्राम पंचायत स्तर पर भी काम हो रहे हैं. हां, यह अलग बात है कि कुछ् पंचायतों में काम उतन नही हो रहा है जितना होना चाहिए... एक बात और कि लोकल मीडिया इन इलाको में एक प्रेसर ग्रुप की तरह काम कर रहा है. जिस करण कुछ छुपाना कठिन नजर आता है..
सड्कें और बिजली जो मूलभूत आवश्यकता की श्रेणी मे आते है वो सब धीरे-धीरे इन इलाको में पहुंच रहे हैं, शायद इसी कारण गांवों से पलायन थमता नजर आ रहा है. सड्के बन रही है तो मजदूर चाहिए हीं, सो गांव वालो को दैनिक रोजगार मिलने लगा है. पूर्णिया के एक गांव बभनी का जब मैने दौरा किया तो वहां एक ग्रामीण अरविन्द ने बताया कि-" भैया पाईपलाईन में काम आ गया है..सो काम होवे करेगा..एक साल में तो और भी बद्लेगा गांव सब्.."
सड्के आ जाने से गांव वाले अब फसल को शहर के मुख्य बाजार में ले जाने लगे हैं. अब यह वाकया नजर नही आया कि स्कूल केवल नाम का है..सुपौल के कर्णपुर गांव मे अब नियमित क्लास होती है,बच्चे स्कूल में पढ्ते नजर आये.

वैसे अभी भी काफी कुछ बदलने को बांकी है ..लेकिन यह सच है कि शुरूआत हो चुकी है..

2 comments:

महावीर said...

समय के साथ साथ सब बदलते रहे हैं, बदलते रहेंगे। इतिहास साक्षी है।
प्रश्न यह है कि यह बदलाव, प्रगति, जीवन के नए अंदाज़ हवा का रुख किधर ले जा रहे हैं। देखना केवल यह है कि बदलते रंगों के बीच कोई ऐसा रंग तो नहीं आ रहा है जो इंसान को भदरंग बना दे।
अच्छा विचारशील लेख है।

manya said...

सुन के अच्छा लगा की बद्लाव हो रहा है.. पर गति बहुत धीमी है.. पर शुरुआत की ये चिंगारी जल्दी ही आग बने यही कामना है.. बहुत धीरे चले हैं .. अब तो प्र्वाह आवश्यक है..