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Monday, March 28, 2011

‘ मुझको दीवाना बना देंगे तेरे शहर के लोग ’


गांव और शहर, जीने के लिए दो घर की तरह। आप गांव में रहें या शहर में, मायने रखता है तो केवल आपका मन। एक मध्यवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखने वाले शख्स के लिए शहर सपना हो सकता है, रोशनी के आगोस में लिपटा रेस्टोरेंट हो सकता है...आप इस तरह के कई उपमा अलंकारों का प्रयोग कर सकते हैं। यह आपके ख्याल पर छोड़ देता हूं। दरअसल दो दिन पहले मशहूर ब्लॉग राइटर विनीत कुमार का इंटरव्यू सुन रहा था। इंटरव्यू के विषय की चौड़ाई में न जाकर मैं केवल उसके पहले सात मिनट की बात करना चाहता हूं। इन सात मिनटों में विनीत ने शहर की व्याख्या की है, अलग तरीक से।

विनीत कहते हैं कि पहले शहर को विलेन की तरह प्रोजेक्ट किया जाता था, गांव से ज्यादा बेहतर।‘  मैं अपने इस पोस्ट को विनीत के इसी वक्तव्य के चारों ओर घुमा रहा हूं। आखिर पहले शहर को विलेन की तरह क्यों प्रोजेक्ट किया जाता था?  मुझे अभी एक कहावत याद आ रही है, आप भी पढिए- उत्तम खेती मध्यम बान, निकृष्ट चाकरी, भीख निदान। इस कहावत के अनुसार पहले गांव ही सबसे अच्छी जगह हुआ करती थी। संभावनाओं के सभी द्वार वहीं खुलते थे, इसी वजह से उत्तम की श्रेणी में खेती को रखा गया, लेकिन आज की सच्चाई सब के सामने है। हम सत्य से मुंह नहीं छुपा सकते।

इस इंटरव्यू में
विनीत कहते हैं कि वे शहर को संभावना की तरह देखते हैं। वे जैसे-जैसे बड़े शहर की ओर बढ़ते हैं, तरक्की उन्हें सामने दिखने लगती है। विनीत इसी बहाने दिल्ली के करीब पहुंचते हैं। टाटानगर से दिल्ली तक सफर पूरा करते हैं। हम आशा करते हैं कि वे तरक्की के आसमां के चांद बनें।

शहर को संभावना की तरह देखने की बात जब विनीत कर रहे थे, तो कान में लगे ईयर फोन जैसे खुद-ब-खुद वॉल्यूम बढ़ाते जा रहा था। संभावनाओं की सीमा मेरे लिए दूर होती जा रही थी। शहर को ख्वाब की तरह देखने वाले सैकड़ों लोग आंखों के सामने नाचने लगे थे। गांव- कस्बा- शहर- मेट्रो की दूरी पाटने में कितने दरवाजे खोलने पड़ते हैं, इसका एक अलग अनुभव है, इस पर लंबी बात की जा सकती है। 

विनीत के इस इंटरव्यू को मैं एक अलग परिप्रेक्ष्य में सुन रहा था। मेरे लिए गांव एक खुश्बू है और शहर एक फूल। विनीतने काफी हदतक यह बताया कि शहर में अपार संभावनाएं होती हैं। मेहनत के लिए स्पेस होता है। दरअसल वीनित के बहाने शहर की व्याख्या की जा सकती है लेकिन ये काम थ्योरी के रूप में समाजशास्त्री ही कर सकता है, हम तो अनुभवों के सहारे शहर को देखते हैं क्योंकि अनुभव गावै सो गीता।

विनीत टाटानगर और दिल्ली की दूरियों की बात कर रहे थे लेकिन मैं शहर और गांव की बात करना चाहता हूं, मैं विषयांतर हो रहा हूं....इससे पहले की बातों ही बातों में यह कह दूं कि मुझे तुम्हारे शहर का मौसम सुहाना लगता है, इससे पहले कि मैं कह दूं कि मुझको दीवाना बना देंगे तेरे शहर के लोग आपसे विदा लेता हूं और वीनित कुमार का भी शुक्रिया।

विनीत कुमार से जुड़ा एक और पोस्ट पढ़ने के लिए क्लिक करें।

Sunday, March 15, 2009

अविनाश और बादल

कल रात सपनों में लगातार अविनाश आ रहे थे, बात नहीं हो पा रही है, सोचा कुछ लिखा जाए। याद करता हूं जब पिछली बार मैंने उन पर लिखा था- अविनाश बस मुलाकातलोगों की रंग बिरंगी प्रतिक्रियाएं आई थी, इसका मतलब ये नहीं कि आपको जो पसंद है उसके बारे में आप कुछ लिखेंगे ही नहीं, यह तो डरना कहलाएगा न। तो पढ़िए आज - अविनाश और बादल

चलिए आज अविनाश और बादल की बात करते हैं। बादल धरती को प्रोटेक्शन देता है और बारिश के रूप में एक अहसास, कि आप भींगकर काफी अच्छे लगते हैं। हंसना और रोना और अपनी बातों को चिल्लाकर कहने की आजादी आपको दोस्तों के साथ बारिश में भींगकर आनायास आ जाएगा। ठीक इसी तरह मेरे अविनाश हैं।


बादल बिना बरसाए भी एक अलग तरह का आनंद देता है और अविनाश बिना दिखाई दिए भी मुझे प्यार देते हैं। तमाम व्यस्तताओं के बीच वो खुद को साहित्य व सिनेमा से जोड़े रखते हैं। कई ऐसे वाकये याद आते हैं, जिनमें अविनाश हमें आगे बढने के लिए नए तकरीब सीखाते हैं और हमें वह सूट भी करता है। मसलन अपनी भाषा की बारीकी को समझें और लिखें, ताकि आगे बढ़ने के साथ अपनी भाषा भी आगे बढ़े।


मंडी हाउस पर चाय पीते वो कई ऐसी बातें कह डालते हैं कि कोई भी उसे पसंद कर पाएगा। साहित्य, पत्रकारिता जैसे वृहत क्षेत्रों में हो रहे बदलावों को वो नजदीक से देख रहे हैं और इस बड़ी और जटिल दुनिया में नई चीज जो़ड़ भी रहे हैं।

अविनाश बदलाव के बड़े पेरोकारों में एक हैं। उन्होंने हमेशा बदलाव की वकालत की है और उसमें सफल भी रहे हैं। कभी भी संतुष्ट नहीं दिखने वाले अविनाश की खासियत यही है। हमेशा कुछ नया करना और साहित्य से जुड़े रहना उनकी जिंदगी का हिस्सा है। और एक अजीब चीज जो उनसे हमेशा जुड़ा रहता है वो है विवाद। आप तो जानते ही हैं कि विवाद भी बादल से जुड़ा रहता है, मसलन काले मेघा तो लगे हैं, लेकिन बारिश क्यों नहीं हो रही है। बस यही हैं स्वच्छंद अविनाश।


इसी बीच अविनाश दिल्ली से निकल पड़ते हैं, यहां से दूर .....वे याद आते हैं। (फोन पर बात किए कई दिन हो गए..) मंडी हाउस से लेकर आईटीओ तक की याद ताजा हो जाती है, बस उनकी एक याद से ही। बारिश की बूंदें जब गाड़ी के शीशे पर रहकर कुछ अलग दिखते हैं ठीक वैसे ही वे अब लगते हैं। छूने की कोशिश नहीं भी करो तो भी वह गजब का सुंदर लगता है। अविनाश भी वैसे ही याद आते हैं।
अविनाश क्या आप तक मेरी आवाज पहुंच पा रही है...............


मुझे इस समय मोहन राणा की एक कविता याद आ रही है-

" कई दिन कि याद नहीं कितने बीते
यही सोचते बीते कई दिन तुम्हें याद करते ...’
‘क्या तुम सड़क के उस पार हो,
हैलो तुम्हारी आवाज सुनाई नहीं देती...
क्या तुम मुझे सुन सकती हो...."

(टेलीफोन नाम की कविता की कुछ पंक्तियां)

Saturday, February 21, 2009

कोई मिला जो इस शहर में.....-5

कई बार सोचता हूं कि शहर दिल्ली में क्या-क्या मिला...। बात एक पर ही आ कर रूक जाती है और वह हैं लोग। वह भी रंग-बिरंगे। हर का मिजाज अलग। मौसम की तरह। वैसे ही यहां लोग मिले और मिलते ही जा रहे हैं। कई से आमने-सामने तो कई से चैट बाबा (गूगल देवता) की दया से।

अभी विनीत का जिक्र करूंगा। ब्लॉगर भाई, लिखाड़ भाई और खूब पढ़ने वाले विनीत कुमार की। इनसे मुलाकात कम ही हुई, लेकिन बात ज्यादा हुई है। ब्लॉग और इससे इतर कई मुद्दों पर बात होती है। मैं इसे सार्थक कहता हूं। कुछ ही देर पहले बात हो रही थी (चैट बाबा) । पूछा नया क्या कर रहे हैं तो उनके जवाब से आश्चर्यचकित रह गया। विनीत ने ढेर सारे काम बताए ॥विभिन्न जगहों के लिए वे लिखने की तैयारी में हैं। मीडिया के विभिन्न रुपकों पर वे लिख रहे हैं। कहा- मार्च के पहले हफ्ते में विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में वे छपकर आ जाएंगे।


विनीत मुखर हैं। खुलकर आपके सामने बात को रखेंगे। उनसे बात करते वक्त कई चेहरे मुझे याद आने लगते हैं। आप समझ रहे होंगे बड़े नाम, नहीं जनाब। मुझे अपने गांव के वे लोग याद आ जाते हैं जो बिना लाग-लपेट के आपके सामने अपनी बात रखते हैं। ठीक वैसे ही विनीत कहते हैं।


एक बार विनीत के कमरे पर भी धमका हूं। किताब, बिछावन और टीवी नजर आया। मतलब बिछावन पर किताबों और रिमोट के जरिए वे मीडिया विमर्श कर रहे है। शायद वे कुछ नया करें। मीडिया के रगों पर वे हाथ रख ही चुके हैं। हम तो यही आशा करते हैं कि वे समाज को कुछ नया दें।


जारी है---(अगली बार कोई दूसरा, जो मिला इस शहर में)

Thursday, February 19, 2009

नहर में पानी देखा क्या ? -4

कई बरस बीत गए नहर में पानी देखे, जोगो कका बोल रहे थे। जोगो कका मतलब योगानंद काका। हम बचपन से ही उन्हें जोगो कका कहते आएं हैं। गांव की खेती-बाड़ी का हिसाब-किताब अब वही रखते हैं। कोसी प्रोजेक्ट और बाद में कोसी के इलाकों में नहरों को बनते उन्हें देखा है। मेरे गांव में एक समय खेतों को नहरों के पानी से सिंचा जाता था, लेकिन प्रदेश की राजनीति की तरह ही नहरों की भी राजनीति शुरू हुई और नहर पानी बिन सुन रहने लगी, कोसी मैया का प्रवाह हमारे यहां थम गया।


रात में ऑफिस से निकलने के बाद जोगो कका से भाया-मोबाइल बात हो रही थी तो पूछा कि प्रदेश में सरकार तो सुशासन का दावा कर रही है, तो क्या नहर में भी सुशासन आ गया है..? कका हंसते बोले,
धत्त, उ तो पोलिटकल नाच-गाना है बाबू...आप का चाहते हैं डीजल की बिक्री गांव में नहीं हो? अरे उ ससुरा का करेगा, वोट बैंक अपन गांव में उसकी पार्टी का नहीं है, तो काहे नहर में पानी छोडे़गा.. इ कबहूं सोचे आप? अरे दिल्ली से कोसों दूर अपन गांव आईए, जदि राजनीति समझना है। (कका ‘य’ को ‘ज’ ही बोलते हैं। इसलिए हम उन्हें जोको काका कहते हैं।)

मैं अंचभित था, कका की बोली पर। विधायक और सांसद की तो ...काफी कुछ करने पर उतारू थे। दरअसल नहर में पानी नहीं रहने पर पंपींग सेट से खेत को पटाना पड़ता है (खेत को पटाना मतलब सिंचाई ॥समझें हमारे यहां यही कहते हैं।)और इसके लिए डीजल चाहिए, जिसके लिए किसान के पास नकद की आवश्यकता होती है। और अब आप पूछिएगा बिजली नहीं है क्या..। तो सुनिए जोगो कका का कहते हैं- बिजली आती है ..किरासन का कुछ बचत हो जाता है, जब सुतने (सोने) जाते हैं तो आती है।
अब तो आप बिजली की कथा समझ गए ही होंगे, लेकिन कका निराश नहीं हैं, उन्हें विश्वास है कि एक दिन गांव की तकदीर बदलेगी। मेरे लिए वे पुरानी किताबों की तरह हैं। रेणु की परती कथा की तरह।


खैर, कका बताते हैं कि कैसे पहले नहर में पानी लबालब रहा करता था, उस समय बाबूजी गांव में रहा करते थे। शहर के आउटहाउस में डेरा नहीं डाले थे।(खेती से मोहभंग नहीं हुआ था।) भैंसे भी उसी में नहाती थी। कका कहते हैं कि बाबूजी विधायक और सांसद दोनों की पसंद थे। दरअसल उनके पास लगभग 5-6 हजार वोट था, तो भला कौन नेता गांव को नहीं देखे।


बीमारी और व्यवहार में बदलाव के कारण वे राजनीति और गांव से दूरी बनाने लगे। कका कहते हैं कि बड़का मालिक (बाबूजी) के गांव से दूरी बनाने से नेता भी दूरी बनाने लगे। दरअसल, वोट अब बंटने लगा, किसी खास पार्टी की झोली में वोट नहीं जाकर इधर-उधर बिदकने लगा। मैं जहां इसे जिंदा लोकतंत्र मानता हूं वहीं कका इसे राजनीति का अपराधीकरण कहते हैं। (समाजविज्ञानी और राजनीतिक विश्लेषक जो समझें, उनपर छोड़ देत हैं।)


कका कहते हैं कि वोट के इधर-उधर बिदकने से कई लोग वोट की दुकानदारी करने लगे। उन्हीं की जुबानी में ससुरा जिसको देखो वहीं हाथ, कमल, झोपड़ी, लालटेन, तीर ..का झंडा लिए किराना दुकान खोल लिया है। अरे इ कोनो बात है, किसी एक को वोट दो...काहे वोट कटुआ बनते हो जी..जरा हमरो समझाओ.......?


कका फोन पर गरम हो रहे थे, हमने कहा ठीक तो है, जिसे जिस उम्मीदवार पर विश्वास है, उसी को वोट देगा। कका बिदक गए इ सुनकर बोले- किस पर विश्वास करूं, सबको अजमा लिए, सब बराबर। अरे बदलना है तो नेतवन को लाठी लेकर पीटो, अक्ल ठिकाने पर आ जाएगा। कका के मुख से दनादन गालियां निकल रही थी, मानो कहीं एनकाउंटर हो रहा हो।
मैंने बात संभालने की कोशिश की, पूछा कका तो गांव में क्या कुछ पंसद भी है आपको..? कका नरम हुए। बोले रोडवा बन रहा है, चकाचक होने वाला है- प्रधानमंत्री ग्रामीण सड़क योजना वाला। ये बोलते हुए बेहद खुश थे कका ।
(मन ने कहा, कका चुनाव नजदीक है,,पर उनको ज्यादा उखाड़ने का मन नहीं कर रहा था, हम दिल्ली में थे. उ तो काकी या छोटकी दीदी पर हमारी भड़ांस निकाल देते ..सो उन्हीं के गप्प को सुनने में हमारी और काकी की भलाई थी।)
सोचा चलिए, घुप्प अंधेरे में भी उन्हें कहीं रोशनी तो दिख रही है। मेरे कैब का ड्राइवर रजनीगंधा चौक से (नोएडा) डीएनडी फ्लाइवे की ओर मुड़ चुका था, रात काफी हो चुकी थी....टोल पर 20 रुपये टैक्स देने के बाद 100 किमी. की गति से गड्ड़ी को भाया चकाचक रोड रिंग रोड़ की तरफ रपटने लगा, ।
शायद कका भी ऐसी ही सड़क की कल्पना कर रहे... हों.........................पता नहीं..। गड्डी में एफएम पर गाना चालू था-
“कोयल कूके हूक उठाए....
यादों की बंदूक चलाए..
बागों में झूलों के मौसम वापस आए...रे
घर आ जा परदेशी ....तेरा देश बुलाए रे.....
इस गांव की अनपढ़ मिट्टी...
पढ़ नहीं सकती तेरी चिट्ठी
ये मिट्टी तू आकर चूमे
तो इस धरती का दिल चूमे....
माना तेरे हैं कुछ सपने
पर हम तो हैं तेरे अपने
भूलने वाले हमको
तेरी याद सताए..
घर आ जा परदेशी..........
तेरा देश बुलाए................रे...”

(जारी है...)

Tuesday, February 10, 2009

एक है मानसरोवर, जिसे कहते हैं हॉस्टल-3

हम कॉलेज के दिनों में जम कर मस्ती किया करते थे। विषय से अलग हटकर पढ़ा करते थे। डीयू में एक हॉस्टल है- मानसरोवर। दिल्ली की याद के साथ इसका अपना अलग ही महत्व हैं मेरे मन में। (भले ही यहां रहने और पढ़ने का सौभाग्य नहीं मिला) पहली बार दिल्ली मन और आंख में उतरी तो यहीं से।

मानसरोवर में रहा करते थे सदन झामेरा उनसे मन से रिश्ता रहा है। ठीक वैसे ही जैसे अविनाश से मेरा है। दोनों को देखकर मन जैसे कह उठता है- सत-सत गुरु कहां थे आप...। सदन की पढ़ने और उसे गढ़ने की कला पर मैं जान उस समय भी लूटाता था और आज भी लूटाता हूं।


सदन ही शख्स हैं, जिनकी वजह से दिल्ली की एक अलग नब्ज को थामने की कला मैं सीख पाया। कई लोगों से मिलने और फिर उनसे जुड़ना भी उन्होंने ही सीखाया।


हंस से अपनापा भी सदन की ही देन है। एक बार कॉलेज की लाइब्रेरी में पत्रिकाओं को पलट रहा था तो हंस भी पलटा। साल 2003 होंगे, पूरी तरह याद नहीं है। डॉट कॉम की दुनिया में हिंदी को लेकर उनका लेख पढ़ा। लिटरेट वर्ल्ड डॉट कॉम को लेकर उन्होंने लिखा था। बस उसी के बाद हिंदी को डॉट कॉम.....में देखने और इस दुनिया में खुद को आजमाने की आदत बनती चली गई।


कई यादें हैं मानसरोवर से। यहीं से आगे बढ़ते हम दोस्तों के संग मिरांडा हाउस की तरफ लपकते-झटकते भागते थे। सभी दोस्त ऐसे ही लपकते-कूदते-झटकते आज कहीं से कहीं चले गए हैं। दिल्ली और अन्य जगहों में सभी धमाल मचा रहे हैं।


पटेल चेस्ट चौक पर गरमागरम जलेबी खाने की ललक मानसरोवर से निकलकर ही हुआ। जीने के तौर-तरीके सीखता यह शहर दिल्ली और सामने बैठा कोई अपना भी यहीं कभी-कभार कह उठता था- फासले ऐसे भी होंगे , ये कभी सोचा भी नहीं था।
जारी है।

Sunday, February 08, 2009

ये है दिल्ली मेरी जान – 2

“दिल्ली से रिश्ता रखोगे तो पहचान पाओगे कि आखिर बदलाव किसे कहते हैं।“ मेरे कान में पहली दफे यह शब्द दिल्ली विश्विवद्यालय के नार्थ कैंपस में आया। कॉलेज में पहला साल था, सबकुछ नया लग रहा था। एक अजनबी झोंके से मन पहली बार बावरा यहीं हुआ। जाना यहीं पहली बार आवारगी क्या होती है। जाने कितने शब्द मन और तन के डिक्शनरी में यहीं जुड़े हैं।


मुखर्जी नगर और वहां के बत्रा सिनेमा हॉल की ऊंची सीढ़ी पर बैठे हम दोस्तों के संग आवारगी किया करते थे। मुखर्जी नगर भाया कैंप और न जाने कहां से कहां हम धमाल मचाने जाया करते थे। बड़े बुजुर्ग कहा करते थे- समय जाया न करो, और एक हम ऐसे कि जाया करने और हंगामा बरपाने के लिए आतुर जैसे गुलाम अली साब कहते हैं-

हँगामा क्यूं बरपा, थोड़ी सी जो पी ली है, डाका तो नहीं डाला, चोरी तो नहीं की है।


साल दर साल हम यहां बनते और बिगड़ते चले जा रहे थे, एक ऐसा भी वक्त आया जब कॉलेज हमसे छूटा और हम जिंदगी के संग हाथ और और हाथ में रूपये कमाने की जुगत में लग गए। डीटीसी बस का पास छूटा और कॉलेज की दादागिरी से दूर हटकर जेब से पैसे निकालकर कंडक्टर को देने की शुरुआत हो गई।


नौकरी हमारी प्राथमिकता हो गई। यहीं से विषयांतर हो गई जीवन की मस्ती। ऑफिस और कमरे के बीच गांव की याद कभी तेज होती, मध्यम होती और कभी दूर भी हुई। छुट्टी की जुगत में कभी-कभार गांव की ओर भी रूख करुं इसकी भी याद जैसे छूटती गई।


जारी है।

Saturday, February 07, 2009

राह इतनी आसान नहीं थी - 1

यहां आने पर कई चीजें जहां छूट गई तो वहीं कई चीजों से जुड़ा भी। यादों को लिखने की कोशिश में हूं और उसे सिलसिलेवार यहां पेश करना चाहता हूं। श्रृंखला की पहली पेशकश- राह इतनी आसान नहीं थी - 1

हम गांव से शहर आए हैं, कहीं चीजें वहीं से मन में जुड़ी है। लाख बार बदलाव की बयार चलें तो भी हम में कुछ ऐसा है जो बदल नहीं सकता है। गांठ बंधी है वो तो टूटेगा नहीं न। नहर, सड़क और फसल हमारे जेहन में है। हर बार गांव से शहर के होस्टल जाते समय आंखों में आंसू आते थे, जो आज भी (दिल्ली आते समय) आते हैं मानो कुछ छूट रहा हो जैसे।

दिल्ली आने के बाद एक शब्द से परिचय हुआ जिसे यहां ‘छोटा शहर’ कहते हैं। पता नहीं है यह छोटा शहर क्या होता है। मेरा मानना है कि यह शब्द ऊंची इमारतों और ट्रैफिक जाम वाले शहर की डिक्शनरी से आया है।

मेरे गांव में एक नहर है जो हमारे खेतों को पानी दिया करती है। खेत में फसल उगते थे (और आज भी उगते है) और उससे आए पैसे से बाबूजी घर चलाया करते हैं। एक समय (जब हमारे यहां संयुक्त परिवार हुआ करता था) बड़े परिवार पर अधिप्तय के साथ गांव पर भी उनकी पकड़ हुआ करती थी।
सन् 1970-80-90-2000 के बीच एक बड़े कमरे में बैठकर पूरे गांव पर वे नियंत्रण किया करते थे।

शहर से एक घंटे की दूरी पर मेरा यह गांव बाबूजी के कदम ताल पर ही आगे बढ़ता था। कई गांव वालों की तरह मुझे भी उनका यह स्टाइल पसंद नहीं था लेकिन घर में छोटा और उनका एक मात्र वारिस होने के कारण कई जंजीरें मुझमें बांधी गई।

कम उम्र में गांव से निकालकर शहर के होस्टल में रखा गया। अनुशासन ऐसा था जैसे घर में था। सबकुछ घड़ी की सूई पर टिका रहा करता था। मास्टर साब के इशारे पर एक एकड़ के कैंपस में सबकुछ चला करता था। जब इंटर की पढ़ाई पूरी करने के बाद दिल्ली आया, जिसे मेरे यहां एक अलग ही निगाह से लोग देखते हैं और मन से समझते हैं, तो पहली बार बंदिशों से खुद को आजाद पाया था।

शहर दिल्ली में न सोने के लिए समय बंधा था और न ही खाने का समय। हम मन के बादशाह हुए पहली बार इसी दिल्ली में। बादशाहत आज तक बरकरार है। कई बार कई तरह की बंदिशें तोड़ी, जिसे सुनकर घर वालों की भौहें तन जाती है। बहनों वाले घर में जन्म लेने से मन की दीवारें ऊंची है। बावरा मन यहीं हुआ। मन में दबी चीजें को आजमाने का मौका यहीं दिल्ली में मिला।

हजारों ख्वाहिशें ऐसी.... फिल्म पहली बार जब देखी तो मन जैसे बावरा हो उठा। पहली बार गुलाम अली साब को यहीं सुना और देखा (पुराने किले में) तो मन में और भी धमाल मच उठे। बहनों की शादी में शहनाई और ढोल-ताशे की आवाज के बाद हारमोनियम की धुन यहीं सुनी। इतना कुछ होने के बाद मन की कुछ गांठे यहां नहीं खुल पाई। सत-सत दुहाई मेरे उसी गांव की जहां से कभी मुझे नफरत भी हुआ था।

उसी गांव और कोसी की ही देन है कि आदमी की आदमियत मेरे अंदर कुछ ही सही लेकिन अभी है।
गांव के कारण ही पड़ोस के साथ अपनापन बना रहता है और दिल खोलकर किसी से मिलने की चाहत हमेशा आवारगी करती रहती है लेकिन गालिब चचा के इस शहर में कई लोगों में बस यही कमी मुझे खलती है। शायद ये कुछ लोगों की मजबूरी हो......।

जारी है।