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Monday, April 02, 2012

यह गोबर-गेउठा, टट्टी काल है!

किसी महीने की पहली तारीख की अपनी तारीफ होती है। नौकरीपेशा लोग इसके महामात्य से भली भांति परिचित होंगे। आज अप्रैल की पहली तारीख की बात हो रही है लेकिन गंध के बहाने। दरअसल भाष्कर डॉट कॉम ने अप्रैल की पहली ताऱीख पर मजाक की सीमा को तोड़ते-फोड़ते हुए 'कुछ एक बेहूदगी' दिखाई थी। बेहूदगी के स्नैपशॉट को फेसबुक के पन्ने पर चस्पा करने के बाद बतकही की लंबी माला बनती चली गई। 'पत्रकारिता के गोबर गेउठा काल' की एक-लाइनी व्याख्या पाइप लाइन से निकलने लगी।

इसी बीच सुशील झा ने कहा- "आपत्ति है स्टेटस में..इसे गोबर गेउठा काल न कहें..गोबर पवित्र है भारतीय समाज में BULL_SHIT या COW_SHIT नहीं...अगर आपका अभिप्राय पत्रकारिता के टट्टी काल से है..।"

सुशील भाई की टिप्पणी में मौजूद 'पत्रकारिता के टट्टी काल' ने  कथावाचक को गंध के पीछे छिपे मर्म से मिलवा दिया। अब इसका असर देखिए, पत्रकारिता के गंध से उबते हुए कथावाचक मिनटों में अंचल पहुंच गया। नहर के आसपास मैदानों में चारा का आनंद उठाते सैकड़ों मवेशी उसकी आंखों के सामने आ गए। जी हां, वही मवेशियां जिनके गोबर से खेत की महिमा बढ़ती है। फसल की पैदावर बढ़ती है। बैलों के गले में बंधी घंटियों की आवाज कानों में देसी संगीत देने लगी। लेकिन उसी पल गांव से कुछ दूर पर मौजूद शहर के डेयरी फार्म की भी याद आने लगी।

बात यह है कि शहर के फार्म की गाय-भैंस, गांव की मवेशियों की तरह आजाद नहीं होती हैं। उनके पेट को हमेशा भर देने के लिए बोरे में भरे दाने मुहैया कराए जाते हैं। इन दानों को खाने के बाद दूध की मात्रा बढ़ जाती है। कुछ 'गौ-पालक' तो दूध बढाने के लिए गाय को जबरन इंजेक्शन भी ठोंकते हैं। खैर, ऐसे दानों का आहार लेने के बाद गाय के गोबर के रंग-गंध के बारे में आप अंदाजा लगा सकते हैं। कथावाचक का मन चारागाह से सीधे अन्न भंडार पर टिक जाता है।

सुशील झा की टिप्पणी गोबर के रंग-गंध पर सोचने को मजबूर कर देती है और लिखना पड़ता है- "गाय का गोबर अब मनुख के टट्टी जैसा गंध करता है। जर्सी गाय को जो चारा खिलाया जाता है उससे टट्टी ही निकलता..।"

अब बात पते की यह है कि गोबर पर लंबी बात करने के आवश्यकता आ पड़ी है। गोबर मौजू बन चुका है। गोबर जरुरत बन चुका है।  गजल, शायरी, कविता की दुनिया से बाहर निकलकर अब गोबर पर बात होनी चाहिए। गंभीर बात, न कि 'गोबरमय' बात।

पत्रकारिता के इस गोबर-गेउठा काल में गोबर के चरित्र पर भेपर-लाइट मारने की जरुरत है। किसानी कर रहे लोगों के गुहाली (गौशाला का देहाती रुप) में गोबर कर रहे गाय-बैल-भैंस की स्थिति पर नजर दौड़ाने की जरुरत है। वहीं राज्य सरकारों के डेयरी योजनाओं से उपजे मवेशियों के लिए चारा बनाने वाले लोगों की मानसिक स्थिति पर विचार करना होगा।

लेकिन  इन सबके संग पाठकों के लिए अखबार छाप रहे मीडिया कंपनियों में कार्यरत 'सर्व-गुण-संपन्नों' की 'शाब्दिक कलाकारी' पर भी विचार करना होगा। हर कुछ के लिए 'मजबूरी' नामक भ्रामक शब्द का दामन थाम रहे लोगों के मन में जमा गोबर को हटाना जरुरी है। वैसे पत्रकारिता के इस गोबर काल में गेउठा भी कमजोर बनने लगा है, हमें 'ग्लूकोज' की जरुरत है..ताकि 'नमक का कर्ज' चुकाने के तर्ज पर 'ग्लूकोज का कर्ज' भी चुकाने की बात हो सके।

(इति-गोबर वार्ता ..गंध के लिए माफी नहीं मांगा जाएगा, क्योंकि गंध ही सत्य है। )

Tuesday, February 21, 2012

एक 'बकैत' की 'अटरिया'

बकैत, रोहित
सोशल नेटवर्क के तार पर हाथ रखिए, सा रे गा मा.. बज उठेगा, अरे आप चौंक गए। आपको तो बहस की तलब लगी थी लेकिन आपका कथावाचक तो संगीत की बात करने लगा है। वह तो तानपुरा निकालने की जिद करने लगा है।

दरअसल फेसबुक और ट्विटर के अटरिया पर लगातार डेरा डालने की वजह से कथावाचक को अपने मन-राग का आलाप करने का भरपूर मौका मिलता रहा है। ऐसे में ही उसकी मुलाकात एक 'बकैत' से हो जाती है। एक ऐसा बकैत जिसे गुलजार प्रिय हैं, जो गीतों में डूबा रहता है, जिसे शास्त्रीय संगीत से राग है, जिसे विज्ञापनों के शब्दों व वीडियो से प्रेम है। यह बकैत टि्वटर की अटरिया पर खूब चहलकदमी करता है। वह बकैत है अपना रोहित

उसे पढ़कर लगता है कि मानो उसका मानस संगीत से बना है और जिसे सिंचने का काम खुद गुलजार ने किया हो। तो बात यह है कि कथावाचक से रोहित की सीधी मुलाकात नहीं है, बस ट्विटिया मुलाकात है। ठीक वैसे ही जैसे एयरटेल के विज्ञापन में कोरस में चलता है- "हर एक फ्रैंड जरुरी होता है..." हम ट्विट से बतकही करते हैं, ठीक वैसे ही जैसे चौक पर कोई बकैती करता है।

इस बकैती में रस है क्योंकि रोहित के बकैत में संगीत रचा बसा है। ठैठ लखनवी अंदाज में जहां उसकी अवधी बोली खींचती है वहीं संगीत के लिए दिया गया उसका लिंक और १४० शब्दों की बकैती हमारे अंतर्मन को शांति देती है। हम वाह-वाह करने लगते हैं। उसके ट्विट में कथावाचक को सूफी प्यार झलकता है तो ऐसे में उसने #sufi नामक एक ट्रेंड की ही शुरुआत कर दी, खास अपने बकैत के लिए।

जब भी उसकी बकैती को पढ़ना होता है, मन में अमीर खुसरो बजने लगते हैं- "अबके बहार चुनर मोरी रंग दे, पिया रखले लाज हमारी, निजाम..।" संयोग देखिए जब कथावाचक को अमीर खुसरो याद आते हैं, ठीक उसी वक्त बकैत रोहित हमें कुमार गंधर्व की आवाज में माया महाठगनी सुनाने लगता है, ऐसे में महसूस होता है कि यह बकैत किसी रंग में कोई दूसरा रंग डाल रहा है, शायद वह भी रंगरेज से बात करना चाहता है।

साहेबान, बकैत की स्मृति की पोथी काफी मोटी है शायद, वह यादों की खेती करता है शायद। शायद इसी वजह से उसके जेहन में संगीत के कई रुप में हैं, वह विज्ञापनों के पुराने दौर में ले जाता है। हमें मोटरसाइकिल कंपनियों के प्रचार के लिए बनाए गए जिंगल के करीब लाता है, हम हुरि बाबा कहने लगते हैं, बजाज मोटरसाइकिल के लिए।

दरअसल स्मृतियों का जीवन में जो महत्व है, शायद वही असली संगीत है, असली रियाज और शुद्ध आलाप है। औऱ इन्हीं बातों को लेकर वह झीनी झीनी चदरिया ट्विटर पर बून रहा है। देखिए न, कथावचक को कबीर याद आने लगे हैं- काहे कै ताना काहे कै भरनी, कौन तार से बीनी चदरिया...

कथावाचक को कुछ इन्हीं वजहों से यह बकैत खींचता है। और जब नजर उसके टि्वट परिचय पर जाता है तो और भी रस मिलता है, जहां वे अपने बारे में लिखते हैं- "Sa Re Ga Ma' Pa Dha Ni Sa. Sa. Ni Dha Pa Ma' Ga Re Sa. A servant to Gulzar sahab and Music (in that very order) बकैत " अपना बकैत ब्लॉग भी लिखता है, वह भी संगीत में डूबा, वक्त हो तो देखिएगा, पता है-Almost a review per post…Almost!

अब देखिए न यह पोस्ट तैयार करते वक्त कबीर सबसे अधिक याद आ रहे हैं, उनसे बकैती करने का जी करने लगा है। ऐसे में यूट्यूब से बेहतर कौन है, कथावाचक कबीर भजन सुनना चाहता है, क्या आप भी सुनेंगे, शायद मेरे बकैत रोहित भी यही चाहेंगे.. "दास कबीर जतन करि ओढी, ज्यों कीं त्यों धर दीनी चदरिया "

Monday, January 02, 2012

उम्मीद वाली धूप और वो खाली डिब्बा

देखिए फिर एक नया साल आ गया और हम-आप इसके साथ कदम ताल करने लगे। शायद यही है जिंदगी, जहां हम उम्मीद वाली धूप में चहकने की ख्वाहिश पाले रखते हैं। उधर, उम्मीदों के धूप-छांव के बीच आपका कथावाचक सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट पर उम्मीद के लिए लिखे जाने वाले शब्दों को देखने में जुटा है, दोस्तों के फेसबुक स्टेटस को पढ़ रहा है और टि्विट पीपुल्स की 140 शब्दों की कथाओं के तार पकड़ रहा है।

उम्मीद वाली धूप के बीच उसे अपने प्रिय सदन झा का स्टेटस पढ़ने को मिला। उन्होंने लिखा- “ मुझे खाली डिब्बा  हमेशा से मोहित करता रहा है..।“  कथावाचक को यह वाक्य तिलिस्म की तरह लगा, डीडी पर एक जमाने में दिखाए जाने वाले चंद्रकांता की याद आई, जहां अक्सर क्रूर सिंह यक्कू कहते हुए हथेली के जरिए एक डिब्बा बना देता था। हम उम्मीद कहीं भी देख लेते हैं, खाली कमरों में भी और मानुष से भरे कमरे में भी, जहां विचारों का अविरल प्रवाह हो रहा हो या फिर गाम की नहर, जिसमें बलूहाई पानी बह रही हो। 

सदन झा आगे कहते हैं कि खाली डिब्बा अच्छा लगने का मतलब यह नहीं है कि उन्हें भरा हुआ डिब्बा अच्छा नहीं लगता है। वे कहते हैं- “ लेकिन खाली बर्तन में आप तमाम सपनों और हसरतों को संजो सकते हैं। नये साल की शुभकामनायें कुछ इसी तरह की हैं। फोन पर एक साथ भेजे गये संदेश,  ईमेल और फेसबुक पर अन्य  हजारों के साथ आये विशेज में अपनेपन की गर्माहट,  तकनीकि के खेल और नये साल की कर्मकांड के बीच यह साल खाली केनवास सा सामने है… सपनों के रंग के इंतजार में, आपकी हसरतों का राह तकते. ।”

इस पूरी विचार प्रक्रिया को पढ़ते हुए यही खयाल आता है कि खाली डिब्बे में भर जाने की हिम्मत होती है। डिब्बे के ऊपर रंग भर दें तो और भी सुंदर। खालीपन से भारीपन की यात्रा, आहिस्ता आहिस्ता जारी रहती है, बस साल बदलता जाता है। जब सदन झा खाली केनवास की बात करते हैं तब जवाहर लाल यूनीवर्सिटी के लाल दीवारों की याद आती है, जहां हाथों से लिखी बातें मन के कमरे में पहुंच जाती थी।

आपके कथावाचक को फेसबुक के स्टेटस उम्मीद वाली धूप ही लगती है और जिस चीज से वह इस धूप का आनंद उठाता है वह सचमुच में एक खाली डिब्बा ही हैं, जिसे वह जाने कब से भरता आ रहा है। ठीक इसी बीच सुशील झा का स्टेटस पढ़ने को मिलता है। वे लिखते हैं- “ साल बदले तो बदले, ईमान न बदले।“

कथावाचक एक पल के लिए ठहर जाता है।  सुशील झा के स्टेटस के बहाने सदन झा के खाली डिब्बे में उसे बदलते साल की अनवरत कथा के बीच ‘ईमान’ नाम का एक पात्र दिखने लगता है। कथावाचक को अपने प्रिय फणीश्वर नाथ रेणु के पात्र भिम्मल मामा याद आने लगते हैं, जिसे बार-बार दौरा पड़ता है लेकिन इसके बावजूद उसका ईमान नहीं डोलता है..। वहीं बावनदास याद आते हैं, जिसने दो ही डग में इंसानियत को नाप लिया था।

सुशील झा का स्टेटस इन्हीं बातों को याद दिलाता है। भरम से परे दुनिया को देखने की ख्वाहिशों को पालने की इच्छा बढ़ने लगती है।

खैर, 2012 में आप उम्मीदों के धूप सेकते रहिए, खाली डिब्बे को भरते रहिए साथ ही ईमान को बचाए रखिए। कथावाचक को अंचल की याद आने लगी है, वह शहरी मुखौटा उतारने जा रहा है, रेणु की ही वाणी में वह कहता है- नए साल में 'मुखौटा' उतारकर ताजा हवा फेफड़ों में भरें ...

चलते-चलते कबीर वाणी सुनिए. शुभा मुदगल की आवाज में




Thursday, December 08, 2011

फेसबुक पर हरियाली


यही तस्वीर दिखी फेसबुक पर
मुल्क में एकाएक इंटरनेट के तार उलझते दिखे। इंटरनेट का समाज ऊर्फ सोशल नेटवर्किंग वेब साइट पर हुजर-ए-आला के सिपहसलार जैसे बरस पड़े थे। मंत्री जी ऊर्फ कपिल मुनी फेसबुक, ट्विटर आदि जगहों पर सेंसर लागू करने के लिए न जाने कैसी कैसी बैठकें कर रहे थे। उधर, आपका कथावाचक फैज अहमद फैज को गुनगुना रहा था- बोल कि लब आजाद हैं तेरे..।

वह फेसबुक-ट्विटर के बीच पसरे मोहल्ले में फेरी लगा रहा था, तभी फेसबुक के आंगन में उसे हरियाली दिखी।
हमारे लिए हरियाली का सीधा और सरल मतलब खेत से होता है। आपका कथावाचक हरियाली को लेकर तमाम तरह के विशेषणों के पीछे मगजमारी न कर सीधे खेत को निहारने लगता है।

तो कद्रदानों, बात यह है कि फेसबुकिया और असल में हमारे खास दोस्त आशीष कुमार अंशु ने सामाजिक संजाल ऊर्फ फेसबुक पर खेत में पसरी हरियाली का एक तस्वीर चस्पा किया। अपनी बात शुरु करने से पहले जिसके जरिए बात हो रही है, उनके बारे में बताता चलूं कि अंशु भाई मेरे लिए एक घुम्मकड़ प्राणी हैं। वे खूब घुमते हैं और खूब लिखते भी हैं।

अंशु भाई ने फेसबुक पर फोटो चस्पा करते हुए लिखा-  पूसा के तीन कृषि वैज्ञानिकों की वजह से यह संभव हुआ कि बुलंदशहर (उत्तरप्रदेश) में एक किसान ने एक पौधा लगाया जो देखने में तो केले के पौधे की नजर आता है लेकिन वह केला नहीं है. थोडा बताइए कृषि वैज्ञानिक डॉ छिल्लर, डॉ डबास और डॉ परिहार की मदद से बुलंदशहर के किसान ने जो खेती की है, वह वास्तव में किस पौधे की खेती है???? कोई है फेसबुक पर कृषि जानकार...।

अंशु भाई का सवाल बस इतना ही था लेकिन उत्तर के फेर में कथावाचक का मानस आठ सौ किलोमीटर दूर गाम पहुंच गया। पोखर के चारों तरफ हर बरसात में उगते हरे रंग के कोंपल उसे याद आने लगे। जंगल में उग आने वाले हल्दी के उन्नत संस्करण की तस्वीर अंशु भाई ने लगाई थी लेकिन एक शाश्वत हरियाली कथावाचक के मन में फैल गई, जिसमें हल्दी के पत्ते की खुश्बू आ रही थी।

उसे अगस्त-सितंबर का महीना याद आ रहा था, जब बन हल्दी (वन-हल्दी) यौवन के चरम पर रहती है। उसके पास से गुजरते वक्त उसकी सुगंध शरीर में समा जाती है। पत्ते हाथ से लग जाएं तो उसकी पहुंच नाक तक पहुंच जाती है।


दरअसल, फेसबुक पर जब ऐसे सवाल पूछे जाते हैं तो मन साधो-साधो करने लगता है। आखिर कौन पूछता है किसानों की बात? जबकि सच्चाई है कि किसानी की दुनिया के ही एक कोने में हम सब पांव फैलाए जिंदगी गुजारते हैं। लेकिन उसके बारे में बात करने से पहले इधर-उधर देखने लगते हैं। अंचल की दुनिया, हमें खुद को समझने का मौका देती है लेकिन अफसोस हम उस दुनिया से कोसों दूर भागने लगे हैं।


ऐसे में अंशु भाई के माध्यम से फेसबुक पर लगाया गया हल्दी का बाग हमारे दिल को बाग-बाग कर रहा था। आज सुबह उठकर एक बार फिर उनके प्रोफाइल में हल्दी के लहलहाते पौधे देखने लगा और एक पल के लिए अपने पोखर के महार (पोखर के चारों तरफ का इलाका) पर विचरने लगा। 

(यही वजह है कि जब कपिल सिब्बल साब इस दुनिया पर सेंसर का ताला लटकाने की बात करते हैं तो मुख से अजीब-अजीब तरह के शब्द निकलने लगते हैं। आखिर मन की बात करने से सरकार को गुस्सा क्यों आता है?) 

Sunday, October 16, 2011

ट्विटर का आंगन और यादों की पोटली {‘Trends’}


इंटरनेट पर नेटवर्क का बड़ा जाल कभी-कभी हमें मोहल्ला-टोला या कहें कस्बे की ओर जाने वाली सड़क की ओर मोड़ देता है। अजनबी से शहर में अपने लिए दोस्तों की खोज की तरह हम इस नेटवर्क में संस्कृति खोजने लगते है और ऐसे में ही बन जाता है नेटवर्क संस्कृति। एकदम अंचल की तरह, विस्तृत.. परती जमीन और उसमें जीवन की तलाश की तरह भटकते कुछ लोग। आपका कथावाचक आज इसी नेटवर्क संस्कृति का एक मोहल्ला, जिसे दुनिया जहान ट्विटर कहता है, उसकी सैर करने निकला है।
फेसबुक की तरह ट्विटर भी अपनी दुनिया बनाए हुए है। 140 शब्दों में बातों ही बातों में यह हमारे मन में अपनी उपस्थति दर्ज करा रहा है। यहां बातों को या कहे संवादों को एक चलन (ट्रेंड्स) के रुप में पेश किया जाता है, ठीक वैसे ही जैसे हम चौपालों पर महफिल सजाते हैं और बातचीत के दौर को आगे बढ़ाते हैं। इसी ट्रेंड में एक शब्द इन दिनों आपके कथावाचक के मानस में खूब उछल-कूद मचा रहा है, जिसका नाम है- #inthe90s. दरअसल यह ट्रेंड हमें 90 के दौर की दुनिया की याद दिलाता है।

यदि आप चलन-ए-ट्विटर के इस कस्बे का दौरा करेंगे तो पाएंगे कि लोग किस अंदाज में और कितनी बेबाकी से
90 के दशक की बातों को यहां रख रहे हैं। अपने मुल्क की बातों का 90 के दशक का अंदाज यहां अलग तरीके से पेश किया गया है। गंभीर मसलों के संग कुछ ऐसी बातों को आप यहां पढ़ पाएंगे, जिसे अक्सर मन के किसी कोने में हम दबाकर निकल जाते हैं,  लंबी यात्रा पर।

नरेंद्रनाथ के कुछ ट्विट्स इसी को ओर हमें ले जाते हैं। जैसा कि उनका एक ट्विट है-
90 के दशक में फैशन का स्टेटमेंट था उजले जूते और कसी हुई सफेद रंग की पेंट (#inthe90s Action ke white shoes and tight white pant was fashion statement for male..)। यकीन मानिए इसे पढ़ने के बाद आपके मन में कई यादें सिनेमाई पर्दे की तरह दौड़ने लगी होगी। फिल्मी दृश्य हो या फिर मोहल्ले का वह सबसे स्टाइलिश बंदा। अरे, अपने राजेश भैया भी तो सफेद रंग की ही पेंट पहनते थे न, एकदम कसी हुई फीटिंग और रग-रग सफेद जूता।

नरेंद्रनाथ इसी तरह का एक और ट्विट इस मोहल्ले में रखते हैं
, जिसका अंदाज हमें और भी कुछ सोचने को मजबूर करता है। इस ट्विट में वे कहते हैं- नब्बे के दशक में गणेश दूध पीया करते थे... (#inthe90s Ganesha used to drink milk...) । दरअसल यादों की दुनिया यही होती है, बस खंगालने की जरुरत होती है।

चलन-ए-ट्विटर विषय पर सी. मिशेल लिखती हैं- नब्बे के दशक में न फेसबुक था और न ट्विटर ..कैसे कटती होगी जिंदगी..। मिशेल का यह ट्विट पढ़ते वक्त हमें इंटरनेट के विभिन्न पहलूओं पर युवाओ के रुख का ख्याल आता है, इसके विभिन्न औजारों और इंटरनेट अड्डों पर युवाओं के साथ विभिन्न आयु वर्गों के लोगों की दिलचस्पी को भी समझने की जरुरत आ पड़ती है।

दरअसल ट्विटर के चलन-ए-ट्विटर कोने की सैर दुनिया के अलग अलग हिस्सों में बैठे लोगों की यादों से हमें मुलाकात करवाती है। सोचिए न, 140 शब्दों में दशकों की चर्चा यहां चुटकी में हो जाती है और हम-आप उसमें अपने हिस्से की यादों को टटोलने में जुट जाते हैं। आपका कथावाचक अंचल की ओर निकलने से पहले इंटरनेट के  इन्हीं मोहल्लों से यादों की फुलवाड़ी के लिए कुछ फूल चुनने में जुटा है ताकि उस पार के लोगों को बताया जा सके कि जिंदगी में यादों की अहमियत क्या होती है।

Wednesday, August 03, 2011

अंचल की सांस्कृतिक स्मृति *

समय के बदले जगह, राष्ट्र के बदले प्रान्त में  सदन झा कहते हैं-  " रेणु का आंचलिक गाँव तीन बातों पर टिका हुआ है. ये हैं, रेणु का अनोखा लहजा (उनके लेखनी में साहित्य के अनूठे रूपों के साथ खेलने की बाजीगरी) जो उन्हें प्रेमचंद की विरासत से अलग करती है; दूसरा, उनके द्वारा अंचल और गाँव के जीवन से जुड़े सूचनाओं का अपार संग्रह और उपयोग (ग्रामीण जीवन का लेखा जोखा जो अद्भुत एन्थ्रोपोलॉजिकल डिटेल और सूक्ष्म नजरिये से भरा पड़ा है) जिसे मैं अंचल की सांस्कृतिक स्मृति कहूँगा; और तीसरा  उनके कथा कहने का अनूठापन. ये तीन कुल मिलाकर अंचल की एक बिशिष्ट छवि बनाते हैं जिसमे आंचलिक ग्राम्य के साथ अपनापे (belongingness) की अहम् भूमिका है. यह अपनापा हमे एक ख़ास एतिहासिक परिपेक्ष्य में आंचलिक ग्राम्य का एक वैकल्पिक आर्काइव प्रदान करता है."

सदन झा का यह आलेख अंचल की कथा की तरह, जिसे शब्दों के जरिए देखा, सुना और महसूस किया जा सकता है। आज यह पोस्ट तैयार करने के पीछे मेरे मानस से जुड़ा कोसी, रेणु और गुलजार का कभी न खत्म होने वाला अध्याय है। रेणु साहित्य के जरिए सदन झा पूरी तरह से कोसीमय होते दिखते हैं। वहां की बोली-बानी, घाट-बाट सब जोहते हुए वे लिखते हैं।

वहीं जब मेरी नजर फेसबुक संजाल पर कोसी नामक एक ग्रुप पर जाता है, जहां लिखा है-  "फेसबुक पर यह ग्रुप इस उद्देश्‍य से बनाया गया है कि कोसी अंचल, जिसके अंतर्गत बिहार के सात जिले - कटिहार, पूर्णिया, अररिया, किशनगंज, सहरसा, सुपौल और मधेपुरा - शामिल हैं, की साहित्‍यिक-सांस्‍कृतिक गतिविधियों और उपलब्‍धियों को एक-दूसरे से साझा किया जा सके।" तो मैं थम सा जाता हूं।

मैं कुछ दिन पहले ही इस समूह से जुड़ा था लेकिन आज सुबह पता चला कि इसे केवल कोसी अंचल के निवासियों तक सीमित कर रखा है तो 'मन तीत' हो गया। उफान मारती कोसी याद आने लगी, बाढ राहत शिविरों तक पहुंचने वाले वे लोग याद आने लगे, जो अलग अलग हिस्सों से वहां पहुंचे और लोगों की सहायता की।

कई शोध पत्र सामने नाचने लगे, जिनके टैग में कोसी अंचल के निवासी होने का प्रमाण पत्र नहीं था। मेरे लिए सदन झा उसी सूची में आते हैं, जिनके लिखे से हम  काफी कुछ सीख रहे हैं। तो सवाल उठता है कि अभी सूरत में रहने वाले और मूल रूप में दरभंगा-मधुबनी के निवासी सदन झा क्या कोसी ग्रुप से नहीं जुड़ पाएंगे? क्योंकि तकनीकी रुप से वे कटिहार, पूर्णिया, अररिया, किशनगंज, सहरसा, सुपौल और मधेपुरा से नहीं जुड़े हैं।

रेणु साहित्य पर कलम चलाने वाले इस शख्स को क्या हम इस समूह से जुड़ने का न्यौता नहीं दे पाएंगे, व्यक्तिगत तौर पर मैं दुखी हूं। यह मेरे लिए एक ऐसे घर की कहानी की तरह है, जहां बाहर से कुछ लाने पर  सख्त पाबंदी होती है।

वहीं प्रोफ़ेसर कैथरिन हैन्सन याद आती हैं, उनके कुछ पर्चे सामने दिख आते है। उनका नाम रेणु साहित्य से जुड़े विद्यार्थियों के लिए नया नहीं है। रेणु भाषा पर अध्ययन करने वाली कैथरिन पर भी यह समूह तकनीकी रूप से पाबंदी लगाती है। ऐसे में अंचल की सांस्कृतिक स्मृति इस समूह के लिए एक सीमा तय करती दिखती है और मेरे जैसे कई लोग, जिनके लिए ऐसी स्मृति पहचान की तरह है, दुखी होता है।

इस समूह को तैयार करने वाले मित्र देवेंद्र कुमार देवेश तक जब अपनी बात पहुंचाई तो उनकी प्रतिक्रिया आई-

"फेसबुक मित्रों का एक विशाल समूह आपको देता है। लेकिन जब आप अपनी बात पोस्‍ट करते हैं, तो आपकी पोस्‍ट सैकड़ों-हजारों पोस्‍टों में कहीं खो जाती है। ऐसे में आपकी पोस्‍ट तभी पढ़ी जाती है, जब रुचिपूर्वक आपकी वाल पर जाकर उसे कोई पढ़े। अन्‍यथा जिन्‍हें आप पढ़ाना चाहते हैं, उन्‍हें अपनी पोस्‍ट से tag करें। दूसरा तरीका यह है कि आप विषय या रुचि या किसी अन्‍य आधार पर समूह का निर्माण करें, ताकि आपकी पोस्‍ट समूह में शामिल सभी मित्रों तक पहुँचे। यह समूह कई तरह के होते हैं। ऐसे समूह भी हो सकते हैं, जिनपर हुए विमर्श को आप एक कमरे में हुई बातचीत की तरह बिलकुल अगोचर रखें। हमारा समूह  कोसी निवासियों को एक-दूसरे से जोड़ने और आपसी संवाद के उद्देश्‍य से बनाया गया है, लेकिन इस पर हुए विमर्श को फेसबुक का कोई भी सदस्‍य पढ़ सकता है। सिर्फ टिप्‍पणी करने या कोई पोस्‍ट करने के लिए सदस्‍यता जरूरी है और इसके लिए  भी कि समूह पर होनेवाली प्रत्‍येक गतिविधि की सूचना आप तक पहुँचे। गिरीन्‍द्र जी की आपत्‍ति पर मुझे बस इतना ही कहना है, बाकी मित्रों की क्‍या राय है।"

मैं उनके तर्क से संतुष्ट नहीं हूं। कोसी को लेकर खास अपनापा रखने वाले शोधार्थी व ब्लॉगर  विनीत कुमार भी इस समूह से जुड़ना चाहते थे लेकिन क्षेत्रीय सीमा रेखा उनके बीच आ गई। वे कहते हैं - "आगे चलकर हम चाहते हैं कि उस इलाके में लंबा वक्त गुजारें और करेंगे भी लेकिन क्षेत्रीयता की सीमाओं को हमारी भावनाएं भला कहां समझ पाती है   ?.... "


मैं फेसबुक पन्ने पर टाइप करने लगता हूं-   "कोसी, रेणु और गुलजार से मानस बना है। हाल ही में कोसी नामक एक ग्रुप से जुड़ा लेकिन आज इससे नाता तोड़ने जा रहा हूं, दरअसल इस ग्रुप को क्षेत्रीय तरीके से बांधा जा रहा है, जबकि मेरे लिए कोसी बंधन- मुक्त है। जब इस ग्रुप को भी बंधनों से मुक्त कर दिया जाएगा तो फिर मैं वहां खुद को टहलते पाउंगा, उनमुक्त...."

*पोस्ट शीर्षक- सदन झा के आलेख से कट-पेस्ट कॉपी

Monday, August 01, 2011

टोला, मोहल्ला और फेसबुक

नेटवर्क तो सोशल बन गया है लेकिन इसके साथ ही यह एक ऐसी दुनिया रच रहा है, जिसमें समाज के सभी तथ्य मौजूद हैं पर एक अलग रंग में। मेरे लिए यह नेटवर्क एक संस्कृति है। साहेबान, मैं अपने खास फेसबुक और उस जैसे तमाम सोशल नेटवर्किंग साइट की बात कर रहा हूं।

पिछले हफ्ते ही फेसबुक पर मेरा जुड़ाव दो समूहों (फेसबुक की भाषा में ग्रुप)  से हुआ है। मेरे लिए ये समूह नहीं बल्कि टोला और मोहल्ला है। दरअसल फेसबुक पर दोस्तों के ग्रुप और टैग से जोड़ने की आदत से मैं अक्सर परेशान रहता हूं लेकिन पिछले हफ्ते दो करीबी फेसबुकिया यारों ने जब मुझे दो अलग-अलग समूहों से जोड़ा तो खुशी मिली।

कोसी और सरिसब पाही नामक ये दोनों ग्रुप मेरे लिए खास हैं।  इनसे जुड़कर ऐसा लगता है मानो ये दोनों समूह मूल को जानने की छटपटाहट को शांत करने के लिए बनाई गई हो। हालांकि इन दोनों जगहों पर किए जाने वाले पोस्ट, जिसे हम-आप चर्चा कह सकते हैं, मेरी इस सोच पर सवाल भी उठाते हैं। खैर, काम की चीजों को अपने हिस्से में समेटने में हर्ज किया है, आखिर यहां भी कुछ काम का मिल ही जाता है।

सरिसब पाही पर इलाकाई खुश्बू का असर है तो कोसी आदतन बहसों में, भूगोल में उलझी है। कभी यह अपने हिस्से को जलमग्न करती है तो कभी अपने हिस्से से बाहर की दुनिया में दखल देने लगती है। मेरे लिए ये दोनों ग्रुप इस पार से उस पार की कथा की तरह है।

सरिसब पाही समूह पर एक मित्रवर लिखते हैं- "सरिसबक चमैनिया डाबर शंकर मिश्रक कथा सँ जुडल अछि। आइयो ओकरा प्रति बड आदर भावना छै। मुदा सोचल जाए जे ओ पोखरि किएक नहि कहओलक। पोखरि आ डाबर मे की अन्तर। जकर यज्ञ भेल हो, से पोखरि भेल। ओहि चमाइनक खुनाओल डबराक यज्ञ के करबितथि। चमाइन यजमानक पौरोहित्य के करबितथि। आर्थिक अभाव नहि छल। तखनि यज्ञ किएक नहिँ भेल। की आबो ओएह स्थिति अछि। देखल जाए जे कहिया ओहि सँ डाबर शब्द हटैत अछि।"  

मित्रवर के इस पोस्ट से अपनापा सा लगता है। सरिसब से दूरी यह पोस्ट पाट देती है, ठीक वैसे ही जैसे किसान पटसन (पटुआ, जूट) को पानी में रखता है और उससे रेशा निकालता है। मैं पोखर को लेकर बचपन से सुनती आ रही कथाओं में लिपट जाता हूं। नानी मां कहती थी कि पोखर की शादी होती है, बीच पोखर में  लकड़ी के मोटे टुकड़े  को स्थापित किया जाता है, इसके बाद ही वह पवित्र होती है। ननिहाल में घर के आगे बड़े पोखर में खड़ी लकड़ी याद आने लगती है। मित्रवर ने पोस्ट में चमैनिया डाबर का जिक्र किया तो मैं लोक कथाओं और यादों में डूबकी मारने लगा।

उधर, कोसी पर लोग नदी के बहाने अपनी कथा बांचने में लगे है। वहां एक मित्र लिखते हैं-कोशी नदी ने अपने ही धरोहरो को जमीन्दोज करते रहने का काम किया है|  ठीक इसके विपरीत धरोहरों को संजोने के आपके कार्यों ने एक तरह से इस नदी के विघटणकारी चरित्र के खिलाफ़ लड़नेवाले व्यक्तित्व के रुप मे आपको चिन्हित किया है, जिसके लिये बड़े साहस की जरुरत होती है और जो आपके पास प्रचूर है| यह ग्रुप भी आपके पिछले कार्यों की तरह साहसिक और प्रसंसनीय है| मेरी बधाई और शुभकामनाये स्वीकार करें।

यहां तो कोसी और कोशी लिखने पर भी बहस चल पड़ी, खैर यह बहस खत्म हो गई है।  इस ग्रुप में लोग अंचल को साझा कर रहे हैं। बातों ही बातों कोसी के जिला मुख्यालयों की खबरों को रख रहे हैं लेकिन इन सबके बीच मुझे मूल कोसी गायब होती दिखती है लेकिन यहां लोगों की आवाजाही बढ़ रही है, इसलिए आशा है कि यहां भी बातें बनती रहेगी। कोसी की गंध का अहसास यहां देर सवेर जरूर होगा।

दूसरी और मेरा अपना मन इन दोनों समूहों के बीच इस पार से उस पार की कथा बुनने में जुटा है। ऐसा लगता है मानो अपने कामत के आगे दस साल में काटकर बेच दिए जाने वाली लकड़ियों की गाछी में खड़ा हूं। कुछ पल के लिए गाछी आरण्यक की भांति लगती है लेकिन भ्रम टूटता है तो पता चलता है कि इसे तो पैसे के लिए लगाया गया है, कल ही इसे काटकर प्लाइवुड फैक्ट्री भेज दिया जाएगा।

इन अनुभवों के बावजूद इंटरनेट से इतर भी कोसी और सरिसब को समझने में जुटा हूं। मूल को समझने की अपनी कोशिश, जारी रहे। कबीर बुदबुदाते नजर आते हैं- "जब मैं था तब हरि‍ नहीं, अब हरि‍ हैं मैं नाहिं...." । लगता है मैं विषयांतर हो रहा हूं।

Friday, July 15, 2011

मोबाइल-इंटरनेट संगम


बीच दुपहरिया में फेसबुक मैसेज बॉक्स में एक संदेश गिरता है, मैं राजू, पहचाना क्या? मैंने बिना लाग-लपेट के नहीं लिख दिया लेकिन तुरंत ही राजू नामक मेहमान के फेसबुक एकांउट में दाखिल हुआ। फिर पता चलता है कि यह तो राजेश मेहता है अपने गांव का। मैं अचरज में हूं इस वेब संसार को लेकर। दूरियों को पाटना कोई इससे सीखे।

बुखार में फंसने की बात पल में 1200 किलोमीटर दूर तक पहुंच गई। वैसे इंटरनेट की बहुयामी दुनिया का सबसे रोचक अध्याय मोबाइल है। अब बड़ी संख्या में लोग मोबाइल के जरिए इंटरनेट ब्राउज कर रहे हैं। मैं इस ब्राउज अध्याय से ब्लैकबेरी को दूर रख रहा हूं क्योंकि कम मूल्य के मोबाइल से भी अब उसी तेजी में ब्राउज किया जा रहा है, जिसपर साल भर पहले तक महंगे स्मार्टफोन व ब्लैकबैरी का आधिपत्य था। दरअसल राजू का अध्याय नोकिया या सैमसंग के 2-3 हजार रुपये के मोबाइल से ही शुरु होता है।

हाल ही में कोसी और गंगा के कछारों से होकर गुजरा था। कई गांव को मोबाइलमय होते देखा लेकिन इन सबके साथ इंटरनेट के जाल को भी समझने की जरुरत है। मेरे राजू की कहानी
मोबाइल-इंटरनेट संगम से ही शुरु होती है। वह मोबाइल पर प्रयोग किए जाने वाले ब्राउजरों से वाकिफ है। उसे पता है कि ओपेरा मिनी के अपग्रेडेड वर्जन से मोबाइल पर काफी तेजी से ब्राउज किया जा सकता है। इसी अंदाज में वह धान के उन्नत बीजों के बारे में भी आपको बता सकता है। आठवीं पास इस युवक को मोबाइल-इंटरनेट संगम ने दौड़ती-भागती आगे बढ़ती दुनिया से दो हाथ करना सीखाया है।

पिछले महीने पूर्णिया से 30 किलोमीटर दूर एक गांव जाना हुआ, भगैत सुनने। भगैत के मूलगैन (मूलगायक) अवधबिहारी जी की आवाज के जादू ने मन को मोह लिया, अफसोस मैं रिकार्ड नहीं कर सका। जाते वक्त मैंने अवधबिहारी जी से कहा कि क्या आपकी कोई तस्वीर मिल सकती है
? उनका जवाब मुझे काफी रोचक लगा।

अवधबिहारी जी की उम्र 60 के आसपास होगी। गठीला बदन, स्वस्थ और तेजर्रार (उन्हें देखकर मुझे अपने बढ़े वजन और निकले पेट पर शर्म आ रही थी)। उन्होंने कहा- अहां क मोबाइल अछि कि, ब्लूटूथवा ऑन करू न। हमर मोबाइल से अहां क मोबाइल में फोटू पहुंच जाएत यौ। हमर पोता क अबै छै इ सब...


मुझे अभी भी अवधबिहार जी का कहने का अंदाज हूबहू याद है। वायरल के चक्कर में जब कल राजू का फेसबुकिया संदेश आया तो ऐसी कई यादें मन की किताब से बाहर आने लगी और मैं सादे कागज को रंगीन करने लगा। राजू और अवधबिहारी जी जैसे लोगों की बातों को सुनकर मन साधो-साधो कहने लगता है।  

Friday, June 03, 2011

मैं इस जमीं पे भटकता रहा हूं सदियों तक...*


इंटरनेट के साथ प्रयोग करने की आदत जब से पड़ी है, तब से ही मन की दीवारें छोटी पड़ने लगी है। ऐसा लगता है मानो मैं यहां सदियों से भटक रहा हूं, सारे के सारे चेहरे परिचित नजर आते हैं। मुझे यह अपनी जमीं दिखती है, जिसकी सीमाओं को मुझे तोड़ना है। रेडिफ, याहू, हॉट मेल और फिर जीमेल से यारी कभी महंगी नहीं पड़ी। सब एक दूसरे से जुड़ते चले गए और मेरे मैं का विस्तार होता चला गया। साथ ही साथ घर की बाउंड्री का भी विस्तार होने लगा।

पहले ऑरकुट और फिर फेसबुक व ट्विटर की मेरे मानस में उपस्थिति भी कुछ-कुछ ऐसी ही है। इन सबने मेरे मैं का विस्तार किया है। कबीर कहते हैं न-
बिन धरती एक मंडल दीसे/बिन सरोवर जूँ पानी रे/गगन मंडलू में होए उजियाला/बोल गुरु-मुख बानी हो जी इंटरनेट के विभिन्न सोशल नेटवर्किंग चैनल मेरे लिए यही कर रहे हैं। ये सब मेरे लिए कबीर रच रहे हैं, गुलजार बो रहे हैं और तो और, कुछ रेणु के बीज भी बो रहे हैं। ऐसे में मुझे यह दुनिया किसानी लगती है, मैं काश्तकार बन जाता हूं, जो मेरा मूल (रूट) है।  

ऑरकुट के दोस्त फेसबुक पे कॉमन हो गए तो जिले के पड़ोसी और संबंधी यहां और भी करीबी बन गए। कोई जब यह पूछता है कि आपने क्या कमाया तो मैं झटके से कह देता हूं- दोस्त कमाए हैं। आगे वाला सोचता है कि फेंक रहा है लेकिन एन वक्त पर अंदर का दोस्त साधो-साधो कह रहा होता है।
फेसबुक पर 1600 दोस्तों का आंकड़ा पार करते हुए मन में कई सवाल चिता-भस्‍म भर झोरी होकर नाच रहे हैं, मानो बनारस के किसी घाट पर पंडित छन्नू लाल मिश्रा कह रहे हों- नाचत गावत डमरूधारी, छोड़ै सर्प-गरल पिचकारी/ पीतैं प्रेत-धकोरी दिगंबर खेले मसाने में होरी….

पता नहीं इन दिनों कभी कभी रूहानी अहसास होने लगता है
, आत्मालाप की श्रेणी में यह पोस्ट लिखते वक्त मैं इस अहसास को डिफाइन नहीं कर पा रहा हूं क्योंकि ऐसे वक्त पे मन बावरा हो जात है। आप आवारा भी कह सकते हैं। खैर , दोस्त बढ़ते जा रहे हैं, 50 से 100 फिर 1600 सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर दोस्तों को एकजुट करने में उम्र कभी बाधा नहीं बनी। 70 साल के राधेश्याम वर्मा भी दोस्तों की लिस्ट में शामिल हैं तो 14 साल का नीतिन भी। राधेश्याम जी किताबों पर चर्चा करते हैं तो नीतिन फिल्मों पर बात करता है। हरी बत्ती जलते देख (चैट) सब एक हो जाते हैं। बातचीत औपचारिक से कब आत्मीय हो जाती है पता ही नहीं चलता।

अक्सर फेसबुक के रेडलाइट पर कई लोग टकराते हैं। ऐसे अवसरों पर लगता है
, मानो यह कोई स्टेज हो, जहां सब हर दिन सज-धज के आते हैं और अपने रोल को निभाकर निकल जाते हैं, अपने घर की ओर। और मैं, इन सबमें अपना रुप खोजने जुट जाता हूं। तभी पर्दे के पीछे से रवींद्र नाथ टैगोर के शब्द गूंजने लगते हैं-  विश्वरुपेर खेलाघरे/ कतई गेलेम खेले/ आपरूप के देखे गेलेम/दुटि नयन मेले../जाबार दिने.....( In the theater of this world, I played many games and assumed many roles, while doing so, "I" "saw" "me", with my own eyes...)

हमने कभी भी इस दुनिया (सोशल नेटवर्किंग) को आभासी नहीं माना
, और न ही ख्वाब। हम इसमें भी एक शहर बसाते हैं, एक चौक तैयार करते हैं। ऐसे लोगों से और करीब आते हैं, जिससे मन की बातें थोक के भाव में कर सकें, जिन्हें ड्राइंगरुम में बुलाकर अच्छी चाय पिला सकें.... सब अपने हैं यहां, कोई नहीं है पराया....। आइए, आप भी मेरे फेसबुक आंगन में दाखिल हो जाइए, कुछ बात करते हैं, कुछ कहानियां गढ़ते हैं, कुछ गीत गाते हैं....।

जाते-जाते गुलजार को पढ़ लीजिए-

अक्सर तुझको देखा है कि ताना बुनते/ जब कोइ तागा टूट गया या खत्म हुआ/फिर से बांध के/ और सिरा कोई जोड़ के उसमे/आगे बुनने लगते हो…..

*(शीर्षक गुलजार से उधार)

Wednesday, April 27, 2011

बल्‍लीमारान से फेसबुक

महेश शुक्ला, फेसबुक से साभार
शब्द से लगाव है, यही वह चीज है जिसके जरिए हम हरकुछ अभिव्यक्त कर देते हैं। गुस्सा, प्यार, कमीनापन सबकुछ। दिल की बात दिल में ही नहीं रह जाए,शायद इसी के लिए शब्द बने, फिर वाक्य और मुक्कमल साहित्य।

शायरी, नज्म,कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, फिल्म, इन सबके साथ शब्द जुड़ा है। शब्द भ्रूण है, जिसमें ब्रह्मांड रचा बसा है। फेसबुक पर इन दिनों शब्दों के जरिए ढेर सारे प्रयोग हो रहे हैं। कोई प्रेम कहानियां बांच रहा है, कोई कथेतर समाज रच रहा है तो कुछ इन्सटेंट (त्वरित) शायर बन रहे हैं। ऐसे ही  एक शायर हैं महेश शुक्ला  (तस्वीर में  देखिए)। वे अक्सर अपने वॉल-पोस्ट पर शब्दों का ताना-बाना रचते मिल जाते हैं। खबरनवीशी की दुनिया  में रहते हुए वे शब्दों से खेलने में माहिर तो हैं ही साथ ही शायरी में अच्छी करने लगे हैं। मैं विगत 11 महीने से उन्हें जानता हूं लेकिन उनकी शायरी से मुलाकात पिछले महीने से हुई है, यह मुलाकात कब यारी-दोस्ती में बदल गई, पता ही नहीं  चला। जब उन्होंने अपने वॉल-पोस्ट पर लिखा-

"तेरी जीत पर हमें फक्र है ए दोस्त, पर इस दिल का क्या करें जो अपनी हार पे रोता बहुत है....."

इसे पढ़ने के बाद से ही मैं उनके शब्दों में गोते लगाने लगा। यहां नशा जैसे शब्द का प्रयोग नहीं कर रहा हूं लेकिन कुछ-कुछ ऐसा ही अनुभव करने लगा। 
 
महेश जी के इस इन्सटेंट शायरी को पढ़ते हुए कोई भी अपने दिल के और भी करीब पहुंच सकता है। दरअसल इस भागम-भाग जिंदगी में हम अपने लिए वक्त नहीं निकालते हैं, वक्त अपने पेशे को कुर्बान करने वाली हमारी पीढि़ के लिए ऐसे शब्द ही सोचने को मजबूर करते रहते हैं।  महेश जी को पढ़ने के तुरंत बाद मुझे अविनाश याद आने लगते हैं। उनकी एक कविता है- हालांकि अब भी लोग काम कर रहे हैं.. इसमें एक जगह अविनाश कहते हैं-

"वहां जहां जीवित लोग काम करते हैं
मुर्दा चुप्पी सी लगती है जबकि ऐसा नहीं कि लोगों ने बातें करनी बंद कर दी हैं
उनके सामने अब भी रखी जाती हैं चाय की प्यालियां
और वे उसे उठा कर पास पास हो लेते हैं
एक दूसरे की ओर चेहरा करके
देखते हैं ऐसे जैसे अब तक देखे गये चेहरे आज आखिरी बार देख रहे हों"

सच कहूं तो अविनाश की शब्दों की ललक, खोजने की छटपटाहट मुझे कभी-कभी महेश जी के इनसटेंट शायरी में भी मिलती है। उनका गुलजार वॉल-पोस्ट एक जगह छटपटाता दिखता है और ऐसे में शब्द उनके लिए एक नया टूल बन जाते हैं। वे कहते हैं-

"कभी मेरी आहट से चहक उठते थे जो दरो-दीवार, आज मेरे आने पर भी उनमें कोई रौनक नहीं, एक वो वक्त था, जब सपनों में भी होती थी बातें, आज दीदार होने पर भी आंखों में कोई हरकत नहीं।"

जिंदगी में जीत के मायने हैं, इसे कोई नकार नहीं सकता। हम जीतने के लिए जिंदगी दांव पे लगा देते हैं, आगे बढ़ने के लिए कतार के पहले लोग को कुचलने में भी परहेज नहीं करते लेकिन दिल का मामला कुछ और है। यहां महेश जी फिर से दिल की जीत और हार के मायने को अलग परिप्रेक्ष्य में देखते हैं। वे कहते हैं-

"जीतने के लिए लोग दिल हार जाते हैं, पर कुछ बाजीगर ऐसे भी हैं यहां जो जज्बातों पे भी दांव लगाते हैं..."
 

दरअसल शायरी और गजल से मेरा इश्क पुराना है लेकिन इसे हर वक्त जवान बनाए रखने में दिल्ली के बल्लीमारान का सबसे बड़ा हाथ है। सन 2006 की बात है, वह साल का आखिरी महीना था। दिल्ली में गालिब पर एक समारोह था, बल्‍लीमारान में। तब वहां एक मुशायरा हुआ।

मुशायरे में मुनव्‍वर राना, गोपालदास नीरज, बाल कवि बैरागी, निदा फाजली सब थे । मेरे एक अजीज दोस्त शाहनवाज भाई हमें वहां ले गए थे, वे मुशायरे के बीच-बीच में मुझे कुछ  शब्दों के अर्थ भी बताते रहते थे, वहीं जाना की ऊर्दू जाने बगैर ये जवानी तो बेदम है दोस्त। मुशायरे में भारी भीड़ जुटी थी।

श्रोताओं के बीच अविनाश भी थे लेकिन तबतक हमारी चेहरा टू चेहरा मुलाकात नहीं हुई थी। बाद में उन्होंने इस मुशायरे का एक जगह जिक्र भी किया था, चले तो उसको जमाने ठहर के देखते हैं.. के शीर्षक से।

अब फिर से बल्लीमरान से फेसबुक पर लौटते हैं। यहां जब  महेश जी लिखते हैं कि "अब तो वो हर पल का हिसाब मांगते  है.." तो दिल्ली विश्वविद्यालय के गलियारे याद आने लगते  हैं, आर्ट्स  फेकेल्टी का वो फोटोस्टेट कार्नर आंखों के  सामने नाचने लगता है, रवीश कुमार का लप्रेक (लघु प्रेम कथा) भकभकाने लगता है। मुझे लगता है कि महेश जी यूं ही नहीं कहते हैं -

"दी थी जो खुशियां उन्होंने उस वक्त, आज वो उनकी कीमत बेहिसाब मांगते हैं..."

आप भी कुछ समय के लिए शब्दों में खो जाइए, डुबकी लगाइए। महेश जी को फेसबुक पर देखिए शब्दों के जरिए। मैं जरा पता लगाता हूं कि वे क्यूं कहते हैं-
 

" जिंदगी को जितना करीब से देखा,उतना ही उससे दूर हो गए , जितना उलझनों को समेटना चाहा, न जाने क्यों उतने ही मजबूर हो गए..."

Friday, March 25, 2011

यूं होता तो क्या होता


आंख में भी जीत
फेसबुक के दोस्तों में एक और चैनल आईबीएन 7 से जुड़े पंकज श्रीवास्तव  के स्टेटस पर जरा गौर करें- भारत की जीत पर खुश होना लाजिमी है। लेकिन पागल होने का क्या मतलब ? ये अखबारों और चैनलों में कुचल दो, मिटा दो, जला दो की भाषा क्या संकेत करती है? ये कैसा खेल है जो खेलभावना की हत्या के साथ शुरू होता है ?....क्या बिल गेट्स की इस बात को दरकिनार कर देना चाहिए कि भारत में बड़ी तादाद में लोग टीबी से मर रहे हैं, लेकिन यहां क्रिकेट का बुखार चढ़ा है।“ 

मैं खुद क्रिकेट एडिक्ट नहीं हूं। मुझे इस खेल से अधिक गीतों से लगाव है। लेकिन
इस खेल को लेकर समाचार चैनलों की भाषा से मुझे सख्त नफरत है। चैनलों में हेडिंग हिंसक हो जाते हैं, तब मन विचलित हो जाता है और रिमोट के बटन पर दर्शक अत्याचार करने लगता है। इस पोस्ट को लिखते वक्त मन 360 डिग्री के कोण पर नाच रहा है, वह स्थिर नहीं हो पा रहा है। अजीब लगता है कि पैसे के खेल का जश्न, भूखे पेट सोने वाला रामू भी मना रहा है। मेरा रामू भूखा है फिर भी धोनी के धुरंधर (चैनल/अखबारी शब्द) पर फिदा है। वह इनके लिए मकबूल फिदा बन जाना चाहता है।

खैर
, मैं विषयांतर होता जा रहा हूं। मैं रिकी पोंटिंग की बात करना चाहता हूं। क्रिकेट की दुनिया का सफलतम कप्तान, जिसके लिए जीत एक भूख है, जीत एक जश्न है, एक ऐसी भूख, जिसे मिटाने के लिए वह और उसकी सेना सारे दांव-पेंच लगा सकती है। लेकिन गुरुवार की रात उसके अश्वमेध यज्ञ के घोड़े को नीली जर्सी वाली सेना ने रोक लिया और फिर पूरे मुल्क में विजयी सेना और उसके सेनापति की जय-जयकार होने लगी।

फेसबुक और तमाम सोशल नेटवर्किग साइट्स पर गुरुवार के खेल पर टिप्पणियों की बारिश हो रही थी। फेसबुक पर सभी के वॉल मैदान सरीके नजर आ रहे थे। फेसबुक पर मेरे दोस्त और जागरण प्रकाशन के टेबलॉयड आईनेक्स्ट से जुड़े प्रभात गोपाल झा जी ने लिखा -
PONTING KA CHEHRA KAISA LAG RAHA THA...(पोंटिंग का चेहरा कैसा लग रहा था )। उनकी इस टिपप्णी पर अलग-अलग टेस्ट की ढेरों प्रतिक्रियाएं आईं। एक ने लिखा-उजड़ा चमन। मैंने भी हिम्मत कर टिप्पणी छोड़ी- एक यौद्धा की तरह, जिसने जीवन में केवल जीत को अपना लक्ष्य बनाया हो, याद कीजिए, गेंद को रोकने के चक्कर में उसकी ऊंगली में चोटच लग गई थी, गंभीर चोट , तो भी उसने हार नहीं मानी, मैदान में डटा रहा। मैं क्रिकेट एडिक्ट नहीं हूं लेकिन रिकी पोंटिंग के जज्बे से जरूर सीख लेता हूं, अंत तक आप जीत को लेकर आशान्वित बनें रहे हैं। यह जज्बा लाइफ के हर फिल्ड में आजमा सकते हैं।


दरअसल प्रभात जी के स्टेटस पर लिखते हुए मेरे दिमाग में विजयी सेनापति का मनो-स्वभाव छंलागें लगा रहा था। बात यह है कि मुझे पोंटिंग के जुनून से इश्क है। मैंने पोंटिंग के जुनून की क्लिपिंग गुरुवार को भी मैदान में देखी। वह और उनकी टीम कंगारुओं की तरह कुलाचे मार रही थी। गेंद सीधे उनके हाथों में आ रहे थे और जो नहीं आना चाह रहे थे उसे वे जबरन अपने हाथों में कैद कर रहे थे।

भले ही नीली जर्सी वालों ने मैच को अपने नाम कर लिया लेकिन पोंटिग की सेना भी हर पल जीत के करीब आने के लिए जी-जान से मेहनत कर रही थी।
पोंटिंग के जज्बे को मैं क्रिकेट से ऊपर मानता हूं। मेरे लिए वे हार-जीत से आगे हैं। भले ही आप उनकी आलोचना करें लेकिन मैं तो गालिब के बहाने यही कहूंगा – 
      
          “ना था कुछ तो खुदा था, कुछ ना होता तो खुदा होता डूबोया मुझको होने ने, ना होता मैं तो क्या ... ना होता