Tuesday, July 08, 2014

बजट से पहले 'किसानी-गप्प'

यह वक्त नई सरकार के बजट का है तो दूसरी ओर मानसून के वक्त खेतों में डटे किसान के लिए यह वक्त धनरोपनी का है। एक किसान के लिए यह स्वर्णिम काल होता है।  समाचार चैनलों और अखबारों में किसानी के अलावा ढेर सारे मुद्दों पर चर्चा होती रहती है। ऐसे में मेरे जैसा किसान बजट से पहले किसानी की बात करना चाह रहा है।


मैं अपनी बात धनरोपनी के वक्त कादो से सने रोपनी करते लोगों के पैर से शुरु करना चाहता हूं। कादो से सने पांव ही किसान की ताकत है। धरती की महक और जल का मिश्रण किसान के मन को मजबूत करता है। धनरोपनी के वक्त खेत में खेती के संग गीत-नाद का भी माहौल बना रहता है। मेरे लिए यही अंचल की सांस्कृतिक विरासत है। 

खेती – बाड़ी का गप्प करें और मन में रेणु न आएं, ऐसा भला कभी हुआ है। तो दोस्तों अपनी कथाओं के जरिए जन-मानस को गांव से करीब लाने वाले लेखक फणीश्वर नाथ रेणु अक्सर कहते थे कि खेती करना कविता करना है, कहानी लिखना है..।

रेणु ने एक दफे कहा था, “एक एकड़ धरती में धान उपजाना, उपन्यास लिखने जैसा है...,लेखन का ही आनंद मिलेगा खेती करने में..”। साथ ही वे खेती को एक अलग नजरिए से लोगों के सामने लाने की कोशिश भी करते थे। एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा था- "आबरन देवे पटुआ,पेट भरन देवे धान। पूर्णिया के बसइया, रहै चदरवा तान।" 

ऐसे में ‘लिखने वाला’ यह सवाल पूछ रहा है कि क्या आप किसान हैं?  चलिए आपसे न पूछकर, सवाल करने वाला खुद से यह सवाल करता है, दरअसल किसानी पृष्ठभूमि में जिसका मानस तैयार हुआ है, वह भी ऐसे सवाल पर लंबी चुप्पी साध लेता है। हालांकि अभी भी किसानी की दुनिया में खुश्बू बरकरार है, बस हिंदुस्तानी समाज का नजरिया बदल गया है। 

रेणु, कोसी के जिस इलाके में पटुआ (जूट) की खेती से खुशहाल रहने वाले किसानी युग की चर्चा करते थे, अब वह युग बदल गया है। पटुआ के जगह पर पहले सूरजमुखी ने किसानों को खुशहाल बनाया, फिर मकई ने और अब वह जगह लकड़ी ले रहा है। इन सब उदाहरणों के संग खेती छोड़ने वाले लोगों का भी जिक्र जरुरी है।

आखिर ऐसी क्या वजह सामने आ गई बिहार के कोसी इलाके के तथाकथित बड़े किसानों का खेती से मोह भंग हो गया? यह एक बड़ा सवाल है और इसी के आसपास ‘क्या आप किसान हैं’ जैसा सवाल उठ खड़ा हुआ है।  


क्या आप किसान हैं?  के सकारात्मक जवाब के लिए किसानी के अंदाज को पेशेवर ढंग से पेश करने की भी जरुरत है। ऐसी बात नहीं है कि धान, गेंहू या अन्य किसी नकदी फसल के बदौलत एक परिवार का भरन पोसन नहीं हो सकता है। बस किसानी का अंदाज बदलना होगा।

दरअसल, इस सवाल के बीच में दो तरह के लोग ‘अतृप्त’ हुए खड़े हैं। एक ऐसे किसान, जिनके पास जमीन है और जो पहले खुट्टा गाड़कर गांव में जमे रहते थे और उसी के संग लोग काम करते थे और दूसरे ऐसे  लोग जो बड़े किसानों के यहां खेती स जुड़े काम करते आए हैं। 

 (कृप्या इन अतृप्त जमात के बीच हम-आप भूमि-वितरण को न खड़ा करें क्योंकि राजनीति करने वाले इसका हल कभी नहीं निकालेंगे क्योंकि वे पिछले कई दशकों से इसी की बदौलत अपनी दुकान चला रहे हैं। हमें खुद इसका हल निकालना होगा, सकारात्मक तरीके से।)

अब सवाल उठता है कि फिर ऐसी तस्वीर कैसे उभर गई कि दोनों जमात गांव से दूर हो गए। ऐसे में यह भी सवाल लाजमी है कि क्या उन इलाकों में अब खेती ही नहीं हो रही है? क्योंकि जमीन वाले, काम करने वाले हैं ही नहीं।

 दरअसल इन सबके संग एक दूसरी तस्वीर भी तैयार हुई, वह पलायन के भीतर पलायन का है। गांव से पलायन का रुख शहर का रास्ता तय करता है लेकिन यह भी जानने की जरुरत है कि एक पलायन का रास्ता गांव से गांव का भी है। ये ऐसे लोग होते हैं, जो नकदी फसल के लिए एक ही जिले के दूसरे गांव का रुख करते हैं।

कोसी के अधिकांश इलाकों में पलायन का यह रुप सबसे अधिक देखा जा रहा है। मेहनतकश लोगों की बड़ी जमात पहले पंजाब, हरियाणा, दिल्ली आदि जगहों से मेहनत कर आते हैं, कुछ पूंजी जमा करते हैं और फिर उन किसानों के संपर्क में आते हैं, जो अब शहर का रास्ता अपना चुके हैं।

 यहीं आकर खेती एक कांट्रेक्ट का रुप अख्तियार करती है। ये मेहनतकश प्रवासी किसान अधिक भूमि वाले किसानों के खेतों को ठेके पर लेते हैं और शुरु होती है नकदी फसल की एक नई फिल्म, जिसमें फसल के लिए नकद का प्रावधान है। इस फिल्म का नायक एक प्रवासी किसान होता है,जिसमें परिस्थितियों के संग कदम मिलाने की ताकत होती है।

किसानी की नई परिभाषा गढ़ते इन लोगों को करीब से समझने की जरुरत है। इसमें प्रवासियों की मनोस्थिति को भी जानना होगा। समाजशास्त्र के अध्येताओं को इस पर नजर डालने की जरुरत है।

 मीडिया को इस ओर देखना होगा,ताकि एक बड़े तबके का किसानी व्यवस्था से मोह भंग न हो और जब यह सवाल कोई पूछे कि “क्या आप किसान हैं? ” तो जवाब सकारात्मक ही आए, इसकी गारंटी मिले।

2 comments:

Neeraj Tiwari said...

मीडिया को इस ओर देखना होगा,ताकि एक बड़े तबके का किसानी व्यवस्था से मोह भंग न हो और जब यह सवाल कोई पूछे कि “क्या आप किसान हैं? ” तो जवाब सकारात्मक ही आए, इसकी गारंटी मिले।

बेहतरीन लेख

Amrita Tanmay said...

बढ़िया विश्लेषण..