Thursday, August 13, 2009

संसद परिसर पहुंची 'अलवर की राजकुमारियां'

हाल ही संसद भवन परिसर में ऑस्कर विजेता फिल्म स्लमडॉग मिलियनेयर की विशेष स्क्रीनिंग करवाई गई थी, जिसमें गीतकार गुलजार , संगीतकार ए.आर.रहमान और रेसुल पुक्कुटी को सम्मानित किया था। सम्मान समारोह में गीतकार गुलजार ने बेहद सौम्य लहजे में बात पते की कही थी। उन्होंने कहा था- "भले ही आप समुद्र में डुबकी लगा चुके हों लेकिन जो आनंद गांव के तलाब में डुबकी लगाने में आता है, उसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता क्योंकि उसका अलग ही आनंद होता है।"

यहां इस बात को इसी कारण उठाया जा रहा है क्योंकि संसद भवन परिसर में ही एक समारोह में कुछ ऐसी महिलाएं लोकसभा अध्यक्ष के साथ नजर आईं, (आप तस्वीर में नीली साड़ी में जिस महिला को देख रहे हैं) जिन्हें संयुक्त राष्ट्र में सम्मानित किया जा चुका है। शायद उन्हें देश के सर्वोच्च परिसर में कदम रखकर वैसी ही अनुभूति हुई होगी, जैसा गुलजार को हुआ।

सिर पर मैला ढोने के अभिशाप से मुक्त कराई गईं राजस्थान के अलवर और टोंक जिले की महिलाओं के आत्मविश्वास ने लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार को इस कदर प्रभावित किया कि उन्होंने इसे महिला सशक्तिकरण की मिसाल करार दे दिया। मौका था देश के सौ से अधिक पत्रकारों और बुद्धिजीवियों द्वारा इन पुनर्वासित महिलाओं की जिंदगी पर अंग्रेजी और हिंदी में लिखीं पुस्तक के विमोचन का।


गैर सरकारी संगठन सुलभ इंटरनेशनल द्वारा पुनर्वासित इन महिलाओं की जिंदगी की सच्ची कहानी पर अंग्रेजी में लिखित पुस्तक 'न्यू प्रिसेंस ऑफ अलवर' और हिंदी में लिखित पुस्तक 'अलवर की राजकुमारियां' का लोकार्पण करने के बाद मीरा कुमार ने कहा कि नौजवानों और बुद्धिजीवियों को इस कुप्रथा से देश को निजात दिलाने के लिए आगे आना होगा, तभी महात्मा गांधी और अंबेडकर का सपना पूरा होगा। पुस्तक का विमोचन संसद भवन परिसर के बालयोगी सभागार में किया गया। समारोह की अध्यक्षता पूर्व राज्यपाल और पूर्व केंद्रीय मंत्री भीष्म नारायण सिंह ने की।

मीरा कुमार ने कहा कि सुलभ ने इन महिलाओं को नारकीय जिंदगी से निजात दिलाकर सामाजिक बदलाव का अनूठा उदाहरण पेश किया है। उन्होंने कहा कि इन पुनर्वासित महिलाओं का आत्मविश्वास देखकर समाज में बदलाव की उम्मीद बढ़ी है। इस मौके पर भीष्म नारायण सिंह ने कहा कि जिस संवेदना और रचनात्मक ईमानदारी के साथ पुस्तकों में इन महिलाओं की कहानी पेश की गई है, वह प्रशंसनीय है।

इस मौके पर कई महिलाओं ने आपबीती सुनाई। सुलभ के संस्थापक विदेश्वर पाठक ने सुलभ की संस्था 'नई दिशा' द्वारा इन महिलाओं के पुनर्वास की कहानी पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जब तक समाज में ऐसी कुप्रथा है, हमें चैन से नहीं बैठना चाहिए।

पुस्तकों में इन महिलाओं की आपबीती और दर्द भरी कहानियां हैं, जिन्हें दिल्ली के 110 पत्रकारों ने शब्दों में पिरोया है। इन सच्ची कहानियों की पात्र आज समाज में सम्मानित जिंदगी जी रही हैं और इसका श्रेय सुलभ को जाता है जिसने इन्हें सिलाई, कढ़ाई, आदि का हुनर सिखा कर सिर ऊंचा कर चलने के काबिल बनाया।

3 comments:

परमजीत बाली said...

जानकारी के लिए आभार।

विनय ‘नज़र’ said...

समाचार के लिए सद-शुक्र

अर्शिया अली said...

जन्माष्टमी की हार्दिक बधाई.
( Treasurer-S. T. )