Friday, April 25, 2008

कूड़ा बीनने वालों बच्चों की तकदीर बदलता शख्स


राजधानी के विभिन्न इलाकों में छोटे-छोटे बच्चे कूड़े ढेर में अपनी दुनिया खोजते आसानी से नजर आ जाते हैं। पढ़ाई करने की उम्र में उन्हें जबरन इस काम में लगा दिया जाता है। इन बच्चों को इस काम से मुक्ति दिलाने को लेकर दिल्ली में एक शख्स विगत 15 वर्षों से संघर्ष कर रहा है।


दिल्ली में रहने वाले देवेन्द्र ने अपनी संस्था 'बाल विकास धारा' द्वारा कूड़ा बीनने वाले बच्चों को जीवन की मुख्य धारा में लाने के लिए वर्षो से प्रयास कर रहे हैं। मूल रूप से उड़ीसा के रहने वाले देवेन्द्र बच्चों के अधिकारों को लेकर लगातार काम कर रहे हैं। खासकर दक्षिण दिल्ली में इनकी संस्था सक्रियता से काम कर रही है। बसंतकुंज, बसंत विहार, खानपुर, तुगलकाबाद आदि जगहों पर 'बाल विकास धारा' बच्चों को कूड़े की दुनिया से निकालकर विद्यालयों में प्रवेश कराती है।


देवेन्द्र ने 'बाल विकास धारा' की स्थापना 1993 में एक युवा चिकित्सक डा। भरत सिह के साथ मिलकर की थी। आज यह संस्था राजधानी के झुग्गी इलाकों में बच्चों को शिक्षा से जोड़ रही है। आंकड़ों के अनुसार संस्था 1200 से अधिक बच्चों को शिक्षा की राह से जोड़ चुकी है साथ ही संस्था ने बच्चों की पढ़ाई के लिए 26 शिक्षकों को भी नियुक्त किया है।


देवेन्द्र शुरुआती समय में 'बचपन बचाओ आंदोलन' से भी जुड़े रहे हैं। उन्होंने कहा, "मैं बचपन बचाओ आंदोलन का आज भी सक्रिय कार्यकर्ता हूं। बच्चों को जीवन की मुख्य धारा में प्रवेश कराने के लिए हमारी संस्था लगातर काम कर रही है।" जहां 'बाल विकास धारा' दिल्ली के विभिन्न इलाकों में काम कर ही है वहीं कई इलाकों में आज भी छोटे-छोटे बच्चे कूड़ा आदि बीनने के काम लगे हुए हैं।


देवेन्द कहते हैं , "हमारी संस्था लगातार प्रयास कर रही है कि दिल्ली में झुग्गियों में रहने वाले सभी बच्चे विद्यालयों तक पहुंचे, इसके लिए हम विभिन्न झुग्गी इलाकों में बच्चों को पढ़ाने का काम कर रहे हैं। हम अपनी मुहिम में विभिन्न क्षेत्रों के सामाजिक कार्यकर्ताओं को शामिल करते रहते हैं।"

3 comments:

सुशील कुमार said...

दोस्त कहाँ कहाँ से ये खबरे लाते हो। ये सब पढकर लगता है कि कहीं तो इंसान जिंदा है ।

mamta said...

तो बहुत ही अच्छी खबर है।

Anonymous said...

अच्छी खबर है। 'एक मरे, चार घायल' की पत्रकारिता के दौर में ऐसी खबरें नहीं देता है मुख्य धारा का मीडिया.