गुलज़ार ने प्रेमचंद को कैसे जाना , बीबीसी से साभार ।
गिरीन्द्र
से जीवन में मेरी मुलाक़ात तीन बार हुई है, एक बार उस समय जब मैं ने अपने पिता को देखा कि वह मेरी तीसरी क्लास की उर्दू की किताब से माँ को एक कहानी सुना रहे हैं और दोनों रो रहे है.'प्रेमचन्द
ईदगाह पढ़ी तो लगा कि यह तो अपनी ज़िंदगी से बहुत क़रीब है, उसे पढ़ के एसा लगा कि अगर हम भी मेले गए होते तो मैंने भी हामिद की तरह चिमटा ही खरीदा होता.
वह कहानी प्रेमचंद की ‘हज्जे अकबर’ थी. उसके बाद मेरी माँ मुझे हमेशा वह कहानी पढ़ के सुनाने को कहती और पढ़ते पढ़ते हम इतना रोते कि कहानी अधूरी रह जाती. यह कहानी आज तक हम दोनों से पूरी पढ़ी ना जा सकी.
यह वह पल था जब मुंशी प्रेमचंद ने पहली बार मुझे छुआ. फिर ईदगाह पढ़ी तो लगा कि यह तो अपनी ज़िंदगी से बहुत क़रीब है, उसे पढ़ के ऐसा लगा कि अगर हम भी मेले गए होते तो मैंने भी हामिद की तरह चिमटा ही खरीदा होता.
प्रेमचंद से मेरी दूसरी मुलाक़ात कॉलेज में हुई जब मैंने कई अलग-अलग तरह के लेखकों को पढ़ा. प्रेमचंद को मैंने हिंदी और उर्दू दोनों में पढ़ा और उन्हें फिर से पढ़ा तो पता चला कि इसका एक और भी पहलू है, यानी सामाजिक पहलू.
अगर कोई किरदार ऐसा है तो क्यों है? यह है वह दूसरा लेवेल जहाँ हम प्रेमचंद से मिलते हैं.
प्रेमचंद से तीसरी बार उस समय मिला जब गोदान और ग़बन पर फिल्में बनीं, यानी एक फ़िल्मकार की हैसियत से अब जाकर हमारी मुलाक़ात प्रेमचंद से हुई.
हम किसी भी साहित्यकार से कई स्तर पर मिलते हैं, ग़ालिब से उस वक़्त मिले जब मौलवी साहब शेर पढ़ते और मतलब बताते और कहते कि चचा ने कहा है, उस समय ग़ालिब हमें चचा ही लगते थे, फिर जब बड़े होकर ग़ालिब को पढ़ा तो उनकी शख़्सियत हमारे ऊपर खुलती गई.
मुंशी प्रेमचंद की कहानियाँ आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं जैसे सौ साल पहले थीं.
यह बात एक लेखक के लिए प्रतिष्ठा की बात है कि उसकी कहानियाँ सौ वर्ष बाद भी जीवित हैं, लेकिन सामाजिक तौर पर यह अफ़सोसनाक बात है कि वे हालात अभी तक नहीं बदले, ग़रीबी अब भी वैसी ही है जैसी कि प्रेमचंद ने बयान की थी.
मैं प्रेमचंद को इसलिए भी क़रीब पाता हूँ क्योंकि मेरा और उनका हिंदू-मुसलमान का साझा कल्चर है. उनके यहाँ किसान किसान था, हिंदू या मुसलमान नहीं.
अब 'नमक का दरोग़ा' को ही ले लें, इस में दो सिपाही हैं वज़ीर ख़ान और बदलू सिंह, यहाँ सिपाही सिपाही है उसका हिंदू या मुसलमान होना नहीं नज़र आता है.
मेरी फ़िल्मों में भी ऐसा ही है, मेरी फिल्म 'लेकिन' में अमजद साहब जब नमाज़ पढ़ने जाते हैं तो उस वक़्त पता चलता है कि अच्छा यह मुसलमान हैं और इनकी बीवी हिंदू है, बड़ा ख़ूबसूरत है यह हमारा मिलाजुला कल्चर।
गुलज़ार
(साभार बीबीसी )





2 comments:
बिल्कुल सही कहा है गुलजार जी ने
प्रांसगिक..!!!!! शायद...हो सकता है...
लेकिन मह्ताव्पूर्ण नहीं है किसी की भी नज़र में!
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