Wednesday, September 26, 2007

हम सभी कंप्यूटर की दुनिया की पैदाइश हैं। ये उसी तरह से हमारा औजार है, जिस तरह से हँसुआ और हथौड़ा मजदूरों का हथियार है- रविकांत

भावना ने इसे भेजा है, लगे हाथ इनका परिचय दे दूँ- आप वर्ल्ड इनर्जी काँसिल मे इन दिनों काम कर रही हैं। मीडिया से इनका नाता है, सो इस तरह के काम करती रहती हैं। आपने सरहद के नाम से एक छोटी फिल्म भी बनाई है।
सराय के रविकांत के साथ उनकी ये बातचीत पुरानी है, लेकिन आज भी यह हमारे लिए प्रासंगिक है। तो आप भी इस बात चीत को पढ़ें .....

गिरीन्द्र


विकासशील समाज अध्ययन पीठ का कार्यक्रम सराय के संस्थापक सदस्यों में से एक रविकान्त इतिहासकार, अनुवादक और लेखक हैं। ÷ट्रांसलेटिंग पार्टीशन' के सहसंपादक रविकान्त ने नवसंचार के मसलों पर शोध किया है। दीवान-ए-सराय के श्रृंखला संपादक रविकान्त के संपादन में ÷दीवान-ए-सराय ०१ः मीडिया विमर्श /हिन्दी जनपद' और ÷दीवान-ए-सराय ०२ः शहरनामा' वार्षिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। संप्रति वे जनसंचार, लोकसंस्कृति व देसी कंप्यूटरी के मुद्दों पर सराय में कार्यरत हैं। प्रस्तुत है रविकान्त के साथ पुस्तक व आधुनिक मीडिया विमर्शमें हिन्दी पर आधारित बातचीतः

÷दीवान-ए-सराय का पहला विशेषांक मीडिया विमर्श और हिन्दी जनपद पर फ़ोकस करने की खास वजहें क्या थीं?

यह पुस्तक हिन्दी के पाठकों को संबोधित है। मीडिया एक वृहत्तर क्षेत्र है। नानाविध मीडिया रूप, उनके साथ हिन्दी का ऐतिहासिक, अभी के जमाने में उसमें क्या बदलाव हो रहे हैं, उसकी बानगी है... यह अंक। भाषा में भी नए ईजाद होते हैं। जाहिर है, बड़ा इलाक़ा है। भाषा के विकास और सामाजिक विज्ञानों के परिप्रेक्ष्य में मीडिया और भाषा के संबंधों को लेकर हमारे वक्त की सार्थक चीजें को पेश किया गया है, उनका टेस्ट लिया गया है ताकि लोग इन विषयों में घुसे और भी आगे जाएँ। अंग्रेजी के ÷पब्लिक डोमेन' के लिए हिन्दी में कोई उपयुक्त शब्द नहीं मिला, पर हिन्दी जनपद के जरिए उसी ÷पब्लिक डोमेन' को सामने रखा गया है।

पुस्तक के लिए लेखों का चयन किस प्रकार किया गया क्योंकि अधिकांश पठन सामग्री अनूदित है?
हम सभी मानते हैं कि भाषा भी अपनी पब्लिक की प्रकृति को तय करती है। अपनी खास रूचियों, चिन्ताओं और सरोकारों का ध्यान रखना पड़ता है। अकेडमिक जर्नल्स की दुनिया को सरलीकृत होना चाहिए ताकि वृहत्तर लोगों तक पहुंचे हम जानते हैं कि संचार की अधिकांश सामग्री अंग्रेजी में है और हिन्दी में जो लोग लिख रहे हैं उससे तवारूफ कराने की कोशिश की गई है। अनुवाद के जरिए दोनों भाषाओं के ज्ञान का समन्वय है। हम पुस्तक के लेखों के लिए विज्ञापन देते हैं। हमें उस क्वालिटी के लोग मिलते नहीं है जिनकी हमें दरकार है। लेखों का संकलन करने के लिए लोगों के पास जाना होता है। ख्याल रखते है कि मिला-जुला हो। हिन्दी के पाठकों को भी बदलावों को जानना चाहिए और उम्मीद की जानी चाहिए कि ये उनके लिए उपयोगी होगा।

आपने अकेडमिक जर्नल्स के सरलीकरण की बात कही है। क्या पत्रिका की भाषा सरल है, उस पर अनुवाद के साए में इसे क्या कोई स्कूली छात्र पढ़ने में सहज महसूस करेगा?
ये पत्रिका उनके लिए है ही नहीं। ये ग्रेजुएशन कर रहे छात्रों के स्तर की है। इस पत्रिका को पढ़ने-समझने के लिए जरूरी है कि पाठक पहले से थोड़ा-बहुत जानता हो, और उसमें वैचारिक स्तर पर परिपक्वता हो ताकि वह आगे भी जानने की कोशिश करे। क्या सभी साहित्यिक पत्रिकाएँ लोगों की समझ में आ रही हैं? इसमें वैचारिक चुनौती है, भाषा की चुनौती है। पाठक को जूझना पड़ेगा। हम मानकर चलते हैं कि यह पाठक की पहली किताब नहीं होगी। हिन्दी की कितनी पत्रिकाएँ सरल हैं। क्रांति कुमार जैन के संस्मरण कितने लोगों की समझ में आते है।उनके मुकाबले तो यह फिर भी सरल है। हिन्दी की पत्रिकाओं में दुरूहता है, भले ही वैचारिक स्तर की न हो, पर भाषा के स्तर पर तो है। हाँ... हमारी पत्रिका सापेक्ष अवश्य है। किस हद तक हम चीजों को सरलीकृत करेंगे। इसमें एक खतरा, एक अजम्पशन(Assumption) रहता है कि पाठक बेवकूफ है, पर हम लोग यह नहीं मानते, हम सोचते हैं, हमारा पाठक प्रबुद्ध, जागरूक है। अनुवाद की कमियों को कम स्वीकारते हैं, पर हमारे पास जो संसाधन हैं, वे नाकाफ़ी हैं। हिन्दी में जो पीढ़ियाँ गुजरी हैं, वे जिम्मेदार हैं। हमारे पास अच्छे शब्दकोश नहीं हैं। हमारी विरासत में कमी है और हम जैसे कुछ लोगों ने इसमें दखलअंदाजी करने की कोशिश की है। इस मामलें में हमारी कोशिशें बेजा नहीं गई।

इस पत्रिका का उद्देश्य क्या है?
सबसे पहले यह पत्रिका नहीं है। कई समीक्षकों ने इसका पत्रिका के तौर पर जिक्र किया है। यह पुस्तक श्रृंखला है। अलग विधा का संचय है। शहर, मीडिया, अच्छे लेखन का एक संकलन करने का प्रयास है। पत्रिका का तेवर कुछ और होता है।
क्या दीवान-ए-सराय के लिए सर्कुलेशन मायने नहीं रखता क्योंकि यह सीमित,पाठक वर्ग के लिए है?
हमारे पास सर्कुलेशन का बाजारू ताक़तों वाला दबाव नहीं है। हम चाहेंगे कि चीजें बिके, इसलिए कोशिश की है कि इसकी क़ीमत कम रहे। इसकी समस्या सर्कुलेशन की नहीं, वितरण की है। दूर-दराज के लोग जब चिट्ठी लिखते है तो कई बार हम मुफ्त में भी भेज देते हैं।निश्चित तौर पर बाजार की सफलता की भी चाह है। अब तक तो संतोषजनक प्रदर्शन रहा है।

सुधीश पचौरी का लेख "इस प्रपंच में स्त्री न थी' को पुस्तक में शुमार किए जाने का मंतव्य क्या था क्योंकि इस लेख का कथ्य स्पष्ट नहीं है?
इस लेख को हमने रखा है लिहाजा मैं इसे डीफ़ेन्ड करूँगा। मीडिया विश्लेषक सुधीच्च पचौरी का यह लेख इंद्रप्रस्थ भारती के लिए लिखा गया था जो काफ़ी चर्चित रहा था। इसमें मीडिया में महिला की छवि को प्रश्नांकित किया गया है। यहाँ एक मुक्त नारी है, जो कभी गृहणी के रूप में, कंज्यूमर के रूप में बाजार की व्यवस्था की शिकार है ...इन छवियों को दिखाया गया है, उत्तर-आधुनिक स्वर भी रहे हैं, जेंडर स्टडीज पर भी अध्ययन है। खरीदार भी औरत है, विक्रेता भी स्त्री है। फिर ऐसा लगता है कि इस प्रपंच के लिए स्त्री कितनी जिम्मेदार है।

पुस्तक में एक लेख टैक्टिकल मीडिया पर है। टैक्टिकल मीडिया की प्रासंगिकता क्या है?
मीडिया नियंत्रण के रूप में टैक्टिकल मीडिया की जरूरत है। रंग दे बसंती' के त्रासद अंत में इसका इस्तेमाल किया गया है। महत्त्वपूर्ण यह है कि एफ एम स्टेशन में लोग मारे जाते हैं। इसमें पहला जनसमपर्ण मिलता है जिसमें वे अपने कृत्यों का मक़सद जनता के सामने मीडिया के जरिए रखते हैं। सरकार मीडिया पर नियंत्रण चाहती है, चाहती है कि लोग इसके साथ छेड़-छाड़ न करें, इससे खौफ़जदा रहें। जिस तरह से पेज थ्री' में कॉर्पोरेट मीडिया की आलोचना है कि सब-कुछ बिकता है, उसी तरह से रंग दे बसंती' में मीडिया नियंत्रण दिखाया गया है।आपने नंगला मांझी का पत्र पढ़ा है। अब खुद प्रकाच्चन करना कोई मुश्किल काम नहीं है। पहले की तरह बड़े ताम-झाम की आवश्यकता नहीं रही। हमारे यहाँ लघु पत्रिकाओं के आंदोलन का पूरा इतिहास है। सरकारी संरक्षण अपवाद है। लोगों ने अपने घर-बार बेचकर इन्हें जीवित रखा। आज की स्थितियाँ अलग है। लोग तकनीक का इस्तेमाल करें। टैक्टिकल मीडिया में यही मैसेज है। लोग जब तक मीडिया से डरते रहेंगे, उसे कोसते रहेंगे।

आलोक राय जी टीवी की हिन्दी को वीभत्स हिंदी' करार देते हैं। क्या मीडिया ने हिन्दी को विकृत किया है?
मीडिया का भाषायी नियंत्रण भी लोग अपने हाथ में चाहते हैं। मीडिया में कोई भाषायी बंधन नहीं है, सिनेमा में उर्दू को फ्रीडम मिली है। जनमाध्यमों को जनभाषा में ही संवाद करना पड़ेगा। फिल्मों की भाषा तो हम नहीं बदल पाए। अब हिन्दी में काफ़ी निखार आ रहा है। हिन्दी केवल हिन्दी बेल्ट की भाषा नहीं रह गई है। आपको टेक्नीक, फाइनेंस, स्पोर्ट्स एक्सपर्ट जरूरी नहीं की हिन्दी के जानकार मिले। एक मद्रासी भी टीवी पर हिन्दी बोलने की कोशिश करता है। कृष्णमचारी श्रीकांत भी हिन्दी बोलते नजर आते हैं। हिन्दी केवल साहित्यकारों की भाषा नहीं है। मीडिया की सामग्री की अंतर्वस्तु समाज के कई लोग दे रहे हैं। अब वे मीडिया में बोलने से पहले हिन्दी की कोचिंग तो लेंगे नहीं कि वे विशुद्ध हिन्दी में बाइट्स देंगे।हम इस पर मूल्य विषयक निर्णय नहीं दे सकते। मानें या न मानें यह तो होगा ही। इतनी ज्यादा सामग्री ऐतिहासिक तौर पर पैदा नहीं होती। हिन्दी के अखबार सर्कुलेशन में टॉप पर हैं। ये सब इसी जमाने में हो रहा है। दरवाजे खुले रखने होंगे। चौकसी बिठाने से संकीर्णता आती है और इसी से जनपद का दायरा सीमित होता है।

क्या मीडिया का हिन्दी की ओर रूझान व्यावसायिकता की देन नहीं है? वाह वाह' मंचीय कविता के कार्यक्रम को एंकर बेस्ड प्रोग्राम और कॉन्टेस्ट के रूप में तब्दील करना किस प्रवृत्ति का सूचक है?
हाँ, बाजार के दबाव ने हिन्दी को सर आँखों पर बिठाया है। मीडिया मंचीय कविताओं को पुनर्जीवित करने का मौका दे रहा है। अशोक चक्रधर का अपना बाजार रहा है। कल्पना शक्ति की जरूरत है, बेहतर प्रोग्राम किए जा सकते हैं। लोगों को लगता है कि बाजार नहीं है। कुछ चीजें की आजमाइश करनी होगी।
अक्सर माना जाता है कि एक अच्छा साहित्यकार मीडिया की दुनिया में जाकर रचनाधर्मिता से वंचित हो जाता है।÷मास मीडिया और साहित्य' में मनोहर श्याम जोशी इसी कश-म-कश में बयान करते हैं। क्या ये उहापोह आधारहीन है?
मीडिया में पढ़ने-लिखने का दबाव कम है, वहाँ अन्य दबाव ज्यादा हैं। इसलिए क्वालिटी की कमी है, डिबेट की कमी है, साथ ही संस्कार भी नहीं है। अच्छा टैलेंट उसमें चला गया तो वह बिक गया, यह विरोधाभास रहा है। तीन घंटे में पंद्रह मिनट की फिल्म तो अर्थपूर्ण तो होती है ही। इसमें अच्छी फिल्में भी तो बनती हैं। संघर्ष और रचना के अलग-अलग पैमाने हैं। हम नहीं टिक सके, ये तो कोई जवाब नहीं है। एक सैनिक अगर फौज की ड्रिल, वर्जिश से डरकर आर्मी छोड़ दे, एक मजदूर शहर की भूल-भूलैया से भय खाकर गाँव वापस चला जाए और फौज, शहर को कोसता रहे, ये तो सरासर ग़लत है। यहाँ एडैप्टेशन की कमी है। इसी चीज को जोशी जी ने ललकारा।

प्रायः साहित्यिक रचनाओं पर आधारित फिल्मों को कृति की विद्रूपता के आरोपों को झेलना पड़ता है।
ये आरोप ग़लत हैं। तमस' की कहानी से बेहतर धुंध' फिल्म है, पिंजर भी अच्छी फिल्म है। तीसरी कसम को देखिए कहानी तो अच्छी है ही, फिल्म भी कम नहीं है। ये हो-हल्ला बेफ़िजूल है।
कमर्शियल वर्सेज लिटरेरी, लुगदी साहित्य बनाम गंभीर साहित्य, मीडिया बनाम सिनेमा की बहसों में वर्चस्व की लड़ाई नहीं है?
जो लोग अपने आपको नॉन- कमर्शियल मानते हैं, अव्यावसायिकता का ढोल पीट रहे हैं, वे भी स्वांत सुखाय नहीं लिख रहे हैं। संस्कृति का आडंबर रचते हैं। कभी पटरी पर लगने वाले साहित्य को पढ़िए, उसकी भाषा में कितनी रवानगी होती है। उस पर अब तक शोध नहीं हुआ था।
क्या इस आग्रह में सुलभता व जनप्रियता के बरक्स दुलर्भता और अभिजातवादी मानसिकता का अनुशीलन नहीं है यानी आसानी से मिलने वाली चीजें घटिया होंगी,आम पहुँच से बाहर, मुश्किल से हासिल होने वाली वस्तुएँ आला दर्जे की होंगी।
मुझे लगता है कि इसमें नैतिक संकट ज्यादा है। पटरी साहित्य को जानना मास स्टडी का ही अंग है। जन प्रचलन को दरकिनार करना अब असंभव है।
आप कॉपीराइट एक्ट और बौद्धिक संपदा क़ानून की ख़िलाफ़त करते हैं? क्या पुस्तक के लिए लेखों व अनुवाद के लिए भुगतान नहीं किया गया?
हमने इसी शर्त पर लेख लिए थे कि हम उन्हें पेमेंट नहीं करेंगे, हाँ अनुवादकों को हम पैसा देते हैं। हमारी किताबें नेट पर भी डाउनलोड के लिए उपलब्ध हैं।
एक प्रकाशक, लेखक पुस्तक प्रकाशन की लागत को वसूलना नहीं चाहेगा कॉपीलेफ्ट उसकी क्या सहायता करेगा?
हम प्रचार के तरीक़ो का विरोध नहीं करते हैं। मध्य प्रदेश में लोगों ने इसे कॉपी किया है, प्रिंट किया है। इसके टेक्सट बहुत-सी पत्रिकाओं में लगाए गए। हम तो पब्लिक इंस्टीट्यूशन हैं। हम क्यों कमाने की सोचेगें। ये आपको तय करना पड़ेगा कि ज्यादा से ज्यादा लोगों के बीच में पुस्तक किस प्राइस पर पहुँचेगी। हम पुस्तकालयों पर कम निर्भर हैं।
पुस्तक के लेआउट डिजाइनिंग में कंप्यूटराइजेशन की छाप है। क्या यह सायास प्रयास था?
हाँ, हम सभी कंप्यूटर की दुनिया की पैदाइश हैं। ये उसी तरह से हमारा औजार है, जिस तरह से हँसुआ और हथौड़ा मजदूरों का हथियार है।
क्या पुस्तक के लिए हिन्दी जगत से मौलिक लेख नहीं मिले?
कह लीजिए कि हमारे मतलब के नहीं थे। विज्ञापन के जवाब में बहुत ही कम ऑफर आए। हिन्दी के बहुत से लेखक बाजार के लिए लिखते हैं। तीसरे दीवान के लिए हम लोग पारिश्रमिक देना प्रारंभ कर देंगे। पैसा एक मोटिवेशन है।
इयान क्लार्क की लघुकथा आग का कॉपीराइट' क्या ज्ञान को व्यक्ति सापेक्ष बनानेकी आशंका जन्म नहीं देती है क्योंकि अगर कोई व्यक्ति अपरिहार्य कारणों से सूचना विशेष को देने से इनकार करता है तो उस केस में ज्ञान, सूचना उस व्यक्ति के कब्जे में रहेगी और कॉपीलेफ्ट का उद्देश्य निजी संबंधों के इर्द-गिर्द ही सिमटकर रह जाएगा।
देखिए! भौतिक वस्तुओं के उत्पादन और अमूर्त सूचना, ज्ञान के उत्पादन में फ़र्क है। मेरे पास यह लाइटर है... अगर मैं इसे किसी और को दे देता हूं तो मेरे पास यह नहीं रहेगा, परंतु यदि मैं किसी म्यूजिक सीडी को राइट करता हूं तो मेरे पास तो यह रहेगी मैं और लोगों को भी बाँट सकता हूं। फ्री सॉफ्टवेयर इसी का मॉडल है। आफ्टर ऑल हम सभी पैसा कमा रहे हैं। हम यह सवाल उठाना चाहते हैं कि आपने पैदा होने के बाद से लेकर अब तक हर उस इंसान को पैसे दिए है, समाज को पे किया है। हर इंसान के पास अपने लिए वक्त होता है, पर हम औरों के लिए कुछ न करें ...यह तो ज्यादती है।
भारतीय मूल की लेखिका काव्या पर साहित्यिक अंच्च की चोरी का इल्जाम है। क्या कॉपीलेफ्ट की आड़ में इसे बख्शा जा सकता है?
हमें काव्या से सहानुभूति है। सिर्फ़ काव्या ही चोर नहीं है। कॉपी करने में भी रचनात्मकता होनी चाहिए। बाजार चूंकि उस चीज को प्रोडक्ट समझता है, उसका एक दाम है, पर बहुत-सी ऐसी चीजें जिनका ब्रांड नहीं है, कोई टैग या लेबल नहीं लगा हुआ है। उनकी क़ीमत नहीं ली जाती है और हम उनका इस्तेमाल कर रहे हैं।
काव्या की इस चोरी के पीछे प्रकाशकों का दबाव बताया जा रहा है। व्यावसायिक लेखन के चलन में जहाँ से सामग्री का इस्तेमाल किया गया है, उसका श्रेय न देना ग़लत नहीं है?
बौद्धिक ईमानदारी तो होनी ही चाहिए। जहाँ से लिया गया है उसे अक्नॉलेज किया जाना चाहिए। अगर ऐसा नहीं होता तो यह बैड प्रैक्टिस है।
संपादन में आपके सहयोगी संजय शर्मा रहे हैं। इस अंक को लेकर उनकी सोच क्या थी? क्या मीडिया की पृष्ठभूमि से आगत होने के कारण वे कहीं पर अतिवादी तो नहीं हुए?
संजय को मैंने एक सेमिनार के दौरान अप्रोच किया और पुस्तक के पहले अंक के सिलसिले में बातचीत की उन्हें यह विचार काफी रास आया। वे मीडिया प्रोफेशनल हैं। कह सकते हैं कि उनके हमारे पैमाने मिलते-जुलते थे। उन्होंने बीबीसी के लिए काम किया है और भारत में उसका अपना वफादार श्रोता समूह है।
संजय शर्मा और अभयकुमार दूबे ने क्रमश बीबीसी की कार्यप्रणाली और क्रिकेट मैचों के संदर्भ में राष्ट्रवादी मानसिकता के तुष्टिकरण का हवाला दिया है। पिछले कुछ वर्षों में मीडिया की ट्रैक टू के जरिए अपनी गतिविधियाँ दर्ज करने की कोशिशें कितनी वस्तुनिष्ठ हैं?
औपनिवेशिक मानसिकता की डिवाइड एंड रूल पॉलिसी अभी भी जारी है। हमने भाषाओं का बँटवारा किया, मीडिया को बाँटा। लोग जब एक जगह से दूसरी जगह जाते हैं तो उन्हें मूर्खताएँ समझ में आती हैं। मैं लाहौर गया। हिन्दू मन भी है। पूरा एक संस्कार लेकर पाकिस्तान जाते हैं तो एक संशय का भाव है, खान-पान के रूप् में एक हिन्दू के रूप में, एक हिन्दूस्तानी के रूप में यह उहापोह वाला सफ़र है।ट्रैक टू हमेशा से ही मौजूद रहा है, पर यह विजिबल नहीं था। मंटो ने नेहरू को लिखा था कि हमारी किताबें अवैध रूप भारत में छापी जा रही हैं। मीडिया भी तो सरकार भक्त है, जब सरकार ने बातचीत करनी शुरू कर दी तो मीडिया ने भी सर्कुलेट करना शुरू कर दिया। ताजमहल तो पाकिस्तान में अब रिलीज हुई है, उससे पहले भी तो भारतीय फिल्में पाकिस्तान में पहले भी चोरी-छिपे धड़ल्ले से देखी जाती रही हैं। बॉर्डस होने ही नहीं चाहिए।
मीडिया नियंत्रण की कवायदों में क्या कंप्यूटर के सर्वर पर प्रथम विश्व का आधिपत्य नहीं है? इंटरनेट और नेटवर्किंग तकनीक पर पश्चिमी दुनिया की मिल्कियत से बौद्धिक संपदा क़ानून को समर्थन नहीं मिलता है क्योंकि इसका ईजाद सामरिक आवश्यकताओं के चलते किया गया था?
अच्छा सवाल है! सामरिक जरूरतों के साथ अकेडमिक नीड्स भी थी। इसे तरह-तरह की कंपनियों ने फंड किया, पर इसका स्वरूप ही ऐसा था कि इसे आजाद ही रहना था। हमारे डेटा में कोई सेंध मार सकता है, वह सुरक्षित नहीं है, इस डर के बजाय चीजें को खुला छोड़कर जीना ज्यादा सहज है। गोपनीयता कम-से-कम हमारे लिए तो कोई समस्या नहीं है। जहाँ तक लोगों की प्राइवेसी का सवाल है, अगर मेरा ई-मेल कोई अमेरिका में पढ़ सकता है क्योंकि रास्ता तो वहीं से होकर गुजरता है तो चिंता हो सकती है, पर इतने सारे लोगों के मेल, डेटा पर निगरानी करना आसान काम नहीं है। इस तरह कंप्यूटर का खुफ़िया विभाग इतना सक्षम नहीं है। इसकी थियोरोटिकलक पॉसिबिलिटी तो है, पर प्रैक्टिकल तौर पर हर चीज की पहरेदारी असंभव है।
लोगों की निजी जिंदगी में तांक-झांक करने की विधा स्टिंग ऑपरेशन को गोपनीयता के परिप्रेक्ष्य में क्या सही ठहराया जा सकता है?
ये टी.आर.पी रेटिंग बढ़ाने का उपाय है पर यह पत्रकारिता का विकल्प नहीं हैं सनसनी फैलाने का हथकंडा है।
क्या पश्चिमी मीडिया भारतीय मीडिया का मॉडल है क्योंकि वहाँ के कई मीडिया ट्रेंड यथा सेन्सेशनलाइजेशन, या एमएमएस कांड की तर्ज पर पपराजी जर्नलिज्म के कई उदाहरण सामने आ रहे हैं?

ट्रेंड को फॉलो करना ग़लत नहीं है। हमारे यहाँ मीडिया लोगों की निजी जिंदगी में दखल नहीं करता। जरूरी नहीं की टेबलॉयड अच्छे मानक पैदा करता है। प्रिंट के मनोहर कहानियाँ, सत्य कथाएँ की तरह ही अपराध कार्यक्रम क्राईम रिपोर्टर, वारदात इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में अस्तित्व में आए हैं।
ब्रेकिंग न्यूज होती है कि युवराज की पीठ में दर्द है! या मीडिया के पास सामग्री का अभाव है?
आइडियाज की कमी है, ह्यूमन रिसोर्स मैनेजमेंट की कमी है। लोगों के पास पढ़ने का वक्त कम है। जो मिलता है उसी काम चलाते हैं। सब लोग तो अखबारों के पीछे की राजनीति, एसएमएस के पीछे का खेल नहीं समझते हैं। लोगों में रिएक्शन इंस्टिक्ट की कमी है। ज्यादा रिसर्च, विश्लेषण, डेटा होना चाहिए।
कंप्यूटर को रेडियो, टीवी के मॉडिफिकेच्चन के रूप में देखा जा रहा है? क्या कंप्यूटर क्रांति रेडियो, टीवी के वजूद को चुनौती दे रही है?
अगर पटना के अखबार को यूएस में पढ़ना है तो आप नेट पर पढ़ सकते है। भारत में अखबारों के डिस्ट्रिब्यूशन में फ़िजिकल चैलेन्ज भी है। ऐसे रेडियो भी वेव मीडियम होने के कारण काफी पकड़ रखता है। आज एफएम सब जगह बज रहे हैं। रेडियो की पहुँच टीवी से ज्यादा है।
पुस्तक में हैकर नैतिकता की बात कही गई है। क्या ये कुछ अटपटा नहीं लगता कि आपके कंप्यूटर के कामकाज को पंगु कर देने वालों के लिए नैतिकता की माँग की जाए।
अक्सर लोग ग़लत समझते हैं। जो आपके कंप्यूटर को नुक़सान पहुँचाता है वह क्रैकर होता है।

3 comments:

संजय तिवारी said...

गिरीन्द्र भाई अच्छा काम कर रहे हो.

हफ्तावार said...

अनुभव के सरोकारों का दायरा क़ाबिले तारीफ़ है. रविकांत का साक्षात्कार तकनीकी और मीडिया के कई परतों को बड़ी बारीकी से खोलता है. भावना ने सवाल भी बेहद सधे हैं. साधुवाद.

भावनाजी के परिचय में एक बात जो छूट गयी वो ये कि वो सफ़र की मीडिया संयोजक भी हैं.

vijay said...

गिरिजी,
बहुत ही अच्छा लगा पढ़कर... विविध प्रकार की जानकारी साक्षात्कार प्रारुप में....धन्यवाद इसके लिए आपको भी और भावना को भी