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Sunday, October 04, 2015

एक किसान की चुनावी डायरी- 7

कबीर की एक वाणी है- अनुभव गावै सो गीता। बिहार में चुनावी बयार के वक्त जब मैं घुम-घुमकर लोगों से बात करता हूं तो लगता है कि सचमुच कबीर की वाणी हमें राह दिखाती है। समाचार चैनलों पर चुनावी गणित सुलझाते विशेषज्ञों से इतर चौक चौराहों पर ऐसे लोग मिल जाते हैं जिनके पास ग्राउंड पॉलिटिक्स के ढेर सारे अनुभव हैं। ये वे लोग हैं जो खेती-बाड़ी करते हैं, दुकानदारी करते हैं...लेकिन उनके पास विशेषज्ञ का प्रमाण पत्र
नहीं है!

सिमराही बाजार में चाय दुकान चलाने वाले शिवेसर कहते हैं “बिहार की राजनीति जात से चलती है। यहां मुखिया का चुनाव भी जाति के ढेर सारे समीकरणों के आधार पर लड़ा जाता है। ये तो विधायक का चुनाव है। चुनाव से पहले जो भी आप छापते हैं या टीवी वाले दिखाते हैं उसका असर शहरी लोगों पर होता होगा, हम सब पर नहीं होता है।“

शिवेसर की बातों पर गौर करने पर पता चलता है कि कैसे ग्राउंड पर लोग चुनावी गणित को समझ रहे हैं। पत्रकारिता में ग्राउंड जीरो का मतलब शिवेसर जैसे लोग बेहतर तरीके से बता सकते हैं। उसी चाय दुकान पर अखबारों को हाथ में लिए लोग टिकट, चुनाव से अधिक सड़क –बिजली की बात करते मिले। यह मुझे अच्छा लगा।

कंप्यूटर साइंस का एक छात्र अभिनव बताते हैं कि चुनाव से पहले कुछ भी बताना टेढ़ी खीर है। फिर भी कयासों के जरिए राजनीति को पत्रकारिता में बड़े दिलचस्प तरीके से परोसा जा रहा है। पटसन की खरीद बिक्री करने वाले रमेश साह कहते हैं- “नीतीश आएं या कमल खिले, इस बार का बिहार चुनाव राष्ट्रीय स्तर की अहमियत रखता है। हर कोई बिहार की बात कर रहा है। हम सब इसी से खुश हैं।”

कालाबलुआ से पहले इंदरनगर इलाके में हमारी मुलाकात एक बुजुर्ग किसान श्रीचंद से होती है। आलू के लिए खेत तैयार कर रहे श्रीचंद चाचा ने बताया कि बिहार की मौजूदा राजनीति को समझने के लिए पहले लालू यादव को समझना होगा। उनके मुताबिक लालू बिहारी राजनीति के ‘साहेब’ हैं। इस तरह की बातें  अक्सर टेलीविचन चैनलों पर विशेषज्ञों की मुख से य फिर अखबारों में विशेष कॉलम में पढ़ने को मिलता था लेकिन एक खेतिहर की जुबान में लालू यादव की मेकिंग सुनना मुझे रास आया।

श्रीचंद आगे बताते हैं कि लालू कैसे एक जमाने में बिहार में पिछड़ों नायक बन गए थे। उनकी बोली बाली कैसे लोगों को खींच लेती थी। हम जिसे सेंस ऑफ ह्यूमर कहते हैं दरअसल श्रीचंद उसी की बात कह रहे थे। जब हमने पूछा कि अब उनके बारे में आप क्या कहेंगे, इस सवाल पर उन्होंने कहा- इस चुनाव में उनकी राजनीतिक विरासत दांव पर लगी है। बेटे के चक्कर में कहीं लालू सबकुछ गवां न दें।

इस चुनाव में यदि लालू की ‘ब्रांड पॉलिटिक्स’ की बात कर रहा है तो जरुर राजद के लिए यह अच्छी खबर है। दूसरी ओर शनिवार को पूर्णिया में रैली को संबोधित करते हुए भाजपा अध्य क्ष अमित शाह ने लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार पर हमला जारी रखा। शाह ने कहा 'अगर राज्य में लालू और नीतीश आएंगे तो जंगलराज-2 आएगा, लेकिन भाजपा और उसके सहयोगी राज्य में जंगलराज-2 नहीं आने देंगे।' उन्होंने प्रदेश में दो तिहाई बहुमत से एनडीए की सरकार बनने का विश्वास भी जताया।

राजनीति यही है। ग्राउंड पर लोगों की बातें सुनिए और फिर किसी चुनावी सभा में नेताओं की बातों पर नजर घुमाइए। तस्वीरें साफ हो जाएंगी। वैसे नीतीश कुमार को लेकर भी लोग खूब चर्चा कर रहे हैं। अररिया जिले के हासा कमालपुर चौक पर एक किराना दुकानदार परमानंद साह ने बताया कि आज नीतीश भले ही लालू
के साथ चले गए हों लेकिन उनकी पहचान लालू विरोध से ही बनी है। उन्होंने बताया कि लालू दौर के बाद बिहार में क्या बदलाव आया और राज्य में कानून व्यवस्था कैसे बेहतर हुई, यह नीतीश कुमार के अलावा कौन बता सकता है।

इस तरह के बयानों को सुनकर लगता है कि जमीन पर आकर हम यदि लोगों की बातों को सुनेंगे तो एक बेहतर रिपोतार्ज बन सकता है, जिसमें बिहार की अलग-अलग छवि को हम संकलित कर सकते हैं। कभी कभी मुझे लगता है कि राजनीति खुद में एक ‘शानदार रिपोर्ताज और किस्सागोई है’।

इन दिनों लगातार घुमते हुए यह अहसास हो चुका है कि बिहार चुनाव में सबसे बड़ा फैक्टर यदि कुछ है तो वह है जाति। गूगल करने से पता चला कि यहां 14 फीसदी यादव हैं और 15 फीसदी दलित वोटर हैं, इन दोनों को लेकर ही राजनीति हो रही है। किशनगंज के दिबाकर बनर्जी कहते हैं कि बिहार की राजनीति को
समझना है तो जातीय समीकरणों की पड़ताल जरूरी है।

चुनाव बतकही करते हुए लगता है कि हमें 1990 में राज्य में कांग्रेस के पतन के बाद की राजनीति को भी समझना होगा। राजनीति हमें अक्सर कई चीजें समझाती हैं। बाद बांकी जो है सो तो हइए है । 

Saturday, October 03, 2015

एक किसान की चुनावी डायरी- 6

पूर्णिया से दरभंगा के लिए हमने चमचमाती फोर लेन सड़क को चुना। अररिया -फारबिसगंज , सुपौल , झंझारपुर होते हुए हम दरभंगा पहुंचे। दरभंगा को लेकर कोई कुछ भी कहे हम तो इस शहर को महाराजा के किला के लिए ही जानते हैं। रास्ते जहां भी रुके लोगबाग भाजपा के विजन डाक्यूमेंट की बात करते मिले।
चुनावी घोषणापत्र को लेकर लोगबाग खूब चर्चा करते हैं, चाहे वह किसी पार्टी का हो। दरभंगा पोखरों का शहर है। इस बार गंदगी कम दिखी। यहां के सांसद भाजपा के कीर्ति झा आजाद हैं। हालांकि कोई उनकी बात करना नहीं चाहता है। भाजपा ने इस बार सिटिंग विधायक को ही टिकट दिया है। बेला चौक पर श्याम मिश्र ने कहा कि वे एमपी से खुश नहीं हैं लेकिन विधायक से खुश हैं।

श्याम मिश्र बता रहे थे कि दस विधानसभा क्षेत्र वाले दरभंगा जिले में इस बार कुछ दिग्गज नया रिकार्ड बनाने के लिए चुनाव मैदान में उतरेंगे तो कुछ रिकॉर्ड बचाने की कवायद करेंगे। इससे चुनाव रोचक होने की संभावना है। दरभंगा को लेकर पहले मन में जो छवि थी वह गंदगी की थी लेकिन इस बार साफ़ सुथरा बहुत कुछ लगा।

जाति के जाल में लोग कम फंसे मिले। दिल्ली में जब पढ़ाई कर रहा था तब मुखर्जीनगर में एक पंजाबी दोस्त कहता था कि दरभंगा का नाम सुनते ही उसके मन में मिथिला वाली मिठास का एहसास होता है। दरभंगा एक शहर नहीं बल्कि मिथिलांचल की हृदय स्थली है। बात मिथिला की होती है तो इसकी सीमा सिर्फ दरभंगा या मधबुनी तक सीमित नहीं है।  भौगोलिक रूप से मिथिला का इलाका सीतामढ़ी से लेकर सीमांचल तक फैला हुआ है।
टॉवर चौक पर हमारी मुलाक़ात सरफराज से होती है। उन्होंने बताया कि केंद्र में इस इलाके से किसी को मंत्री नहीं बनाया जाना मुद्दा है। ब्राह्मण वोटों के अलावा इलाके में मुस्लिम वोट भी अच्छी तादाद में है। कटहरबाड़ी के जितेंद्र नारायण बताते हैं कि यादवों का एक तबका इस वक्त बीजेपी के साथ मजबूती से जुड़ा हुआ दिख रहा है। इसलिए यादव वोट बैंक में सेंध तय है।

राजकुमारगंज के अरविन्द बताते हैं कि बीजेपी को लेकर बिहार में ब्राह्मणों की कसमसाहट अब सामने आ रही है। उन्हें लगता है कि बीजेपी ने केंद्र में उनके साथ अन्याय किया है। हालांकि उनका ये लगना अभी भी ‘फुसफुसाहटों’ में है।

दरभंगा में श्यामा मंदिर के प्रांगण में हमेशा की तरह लोगबाग दिखे। दरभंगा महाराज की पीढ़ियों की समाधि यहीं है और मां काली का भव्य मंदिर भी। यहां भी लोगबाग चुनाव को लेकर बतकही कर रहे हैं।
मिथिला विश्वविद्यालय के छात्र महेश मिश्र कहते हैं "नितीश कुमार ने काम तो बहुत किया है लेकिन लालू यादव से उनके जुड़ जाने हम सब दुखी हैं। जंगलराज की बात तो नितीश कुमार ने ही शुरू किया था। " दूसरी ओर एक अन्य छात्र शंकर झा कहते हैं - " भाजपा से ब्राह्मण नाराज लगते हैं, उस पार्टी से नाराज हो रहे हैं, जिसे ब्राह्मण-बनियों की पार्टी कहा जाता है।"

जाति को लेकर लोगों की बातें सुनते हुए कभी कभी लगता है कि हम किस दौर में जी रहे हैं। राजनीति हमें किस ओर ले जा रही है। नीतीश कुमार ने अपने सात सूत्री विज़न डाक्यूमेंट में दावा किया है कि उनके कार्यकाल में बिहार के 39,000 बसावटों में से 36000 बसावटों में बिजली पहुंचा दी गई है और 2016 तक हर घर में मुफ्त कनेक्शन दे देंगे। वहीं एक अक्टूबर को भाजपा ने भी अपने विजन डाक्यूमेंट में कहा है कि एक साल के भीतर हर गांव हर घर में बिजली देंगे। खेती के लिए अलग फीडर से बिजली देंगे। वादों का बाजार अभी गर्म है।

कामेश्वर साहनी बताते हैं कि भाजपा कह रही है यदि वह सत्ता में आएगी तो सरकारी तालाबों को सिर्फ मछुआरों को ठेके पर दिया जाएगा। मछुआरों की ट्रेनिंग की व्यवस्था की जाएगी। मछली पालन एवं मछली की खेती के लिए विशेष अनुदान की व्यवस्था करेंगे। लेकिन सत्ता में आने  के बाद कोई कुछ नहीं करता है।
दरभंगा और आसपास के इलाकों पर नजर घुमाते हुए लगता है कि हर कोई भाजपा और राजद की लड़ाई के बीच मारवाड़ी की बात कर रहा हो। लेकिन इन सबके बीच दरभंगा महराज का किला मुझे अपनी ओर खींचता रहा दिन भर। बाद बाँकी जो है सो हइये है।

Thursday, April 30, 2015

एक किसान की कहानी, रवीश कुमार की जुबानी


किसान गिरीन्द्र का पूरा ब्लॉग पढ़ें

मैं गिरीन्द्र। दो साल पहले तक दिल्ली और कानपुर में खबरों की दुनिया में रमा रहने वाला एक शख्स, जिसके लिए खबर की दुनिया ही रोजी रोटी थी, लेकिन उसके भीतर अपना एक गांव था, जिसमें रेणु की एक बस्ती थी...उनका मैला आंचल था...परती परिकथा थी।


उसी गांव ने मुझे महानगरीय जीवन से कोसों दूर अपनी परती जमीन की ओर ले जाने का काम किया और पेशे से पत्रकार गिरीन्द्र पहुंच गया सूबा बिहार के पूर्णिया जिला। अपने गाम-घर। खेती बारी करने। वही पूर्णिया जिला, जो इन दिनों तूफान की तबाही के कारण आप लोगों के जेहन में है। जहां के बारे में फणीश्वर नाथ रेणु कहते थे- आवरन देवे पटुआ, पेट भरन देवे धान, पूर्णिया के बसैय्या रहे चदरवा तान.. । यह सब एक झटके में नहीं हुआ था, इसके पीछे मन से हमने पांच साल तक लड़ाई लड़ी। तब जाकर मन राजी हुआ, गांव लौटने के लिए।

अब तो किसानी करते हुए दो साल हो गए हैं, मतलब कुल जमा 730 दिन। गिनती के इन दिनों में हमने ढेर सारे उतार-चढ़ाव देखे, लेकिन साल 2015 मेरे जैसे किसानी कर रहे लोगों की परीक्षा ले रहा है। मार्च के अंत में हमने बिन मौसम बारिश का तांडव देखा। गेंहू और सरसों की फसलों को आंखों के सामने तबाह होते देखा, लेकिन पिछले मंगलवार को यानी 21 अप्रैल को प्रकृति की मार ने हमारी रही सही कमर भी तोड़ दी।

तूफान की चपेट में हमने सब कुछ गंवा दिया। मक्का की फसल चौपट हो गई। कहते हैं कि पूर्णिया जिले में घासफूस के घर में रहने वाले किसान मक्का की फसल से पक्का मकान का सफर तय करते हैं। खूब आमदनी होती है इसकी खेती से, लेकिन वक्त के आगे किसी की नहीं चलती है।

मंगल की रात आधे घंटे का तूफान ने हमारी जिंदगी को एक ऐसे मोड़ पर ला खड़ा कर दिया है, जिसके आगे घुप्प अंधेरा है।  पिछले चार दिनों से बिजली हमसे दूर है। बिजली जो रोशनी देती है, वह भी हमसे दूर हो गई है। पता नहीं किसानी की किस्मत का गणित जोड़ घटाव करते हुए कैसे सब कुछ बांट देता है। गणित के उस सवाल की तरह जिसमें भाग करते हुए हमारे हिस्से में केवल शून्य ही नसीब होता है। शायद यही जीवन है। किसानी करते हुए हमने जीवन का इतना उलझा गणित नहीं देखा था।

कल तक जिस खेत में मक्के का जवान पौधा अपनी जवानी पर इठला रहा था, उसे हमने अपनी नजरों के आगे धरती मैया के गोद में रोते बिलखते देखा। खेती करते हुए हमने जाना कि हर फसल हमारे लिए संतान है। धान मेरे लिए बेटी की तरह है तो मक्का मेरा बेटा है, जो मुझे साल भर का राशन पानी देता है। उस मक्के को जब मैंने खेत में लुढके देखा तो मन के सारे तार एक साथ टूट गए।

जब मैं वातानुकूलित कैबिन वाले ऑफिस में पत्रकारिता किया करता था तो लंच टाइम में हम गांव देहात की बातें करते थे। आह ग्राम्य जीवन!  जैसे जुमले से गांव घर की बातें करते थे। हमारे लिए गांव उस वक्त एक ऐसी दंतकथा की तरह था, जिसमें केवल सुख ही सुख होता है। हम अंचल की सांस्कृतिक स्मृति में हरी दूब की तलाश किया करते थे, लेकिन जब किसानी करने धरती पर उतरे तो जान गया कि इस धरती पर किसानी ही एक ऐसा पेशा है जहां हम सौ फीसदी प्रकृति पर निर्भर होते हैं और यहां सुख की तलाश में दुख से रोज मिलनाजुलना होता है।

प्रकृति की बदौलत दौलत बनाते हैं और उसी की बदौलत दौलत को पानी में बहते भी देखते हैं। गाम की सुलेखा काकी का आंगन मंगल की रात तबाह हो गया। आंगन के चूल्हे में रात में रोटी पकी थी, दूध उबला था। खाने के बाद सब जब सोने गए तभी हवा का जोर बारिश के संग तबाही की पटकथा लिखकर आ चुका था और आंगन-घर सब कुछ उड़ाते हुए निकल गया और छोड़ दिया सुलेखा काकी को बस रोने के लिए।

सूबे के मुख्यमंत्री हेलीकॉप्टर से ऊपर से देखकर निकल लिए। मुआवजा की मौखिक बारिश करते हुए वे शांत-चित्त मुद्रा में अखबारों –चैनलों पर अवतरित हुए लेकिन सुलेखा काकी जैसे लोगों का दुख बांटने जमीन पर कोई नहीं आना चाहता। गाम के अलाउद्दीन चच्चा कहते हैं-“ तुम तो खेती किसानी करते हुए लिखते पढ़ते भी हो न! तब तो तुम्हें पता होना चाहिए कि सूबे में चुनाव होने वाले हैं। अब तो तूफान भी सियासी करने वालों के लिए वक्त पर आने लगा है...। “ इतना कहने के बाद चच्चा की आंखें भर आईं और वे मुझे अपनी बंसबट्टी दिखाने लगे जहां बांस उखड़े पड़े हैं..।

किसानी करते हुए हम सुनहरे भविष्य का सपना देखते रहते हैं। फसल बेचकर जीवन की गाड़ी को और आगे बढ़ाने में लगे रहते हैं। देखिए न, इस बार उम्मीद थी कि फसल अच्छी होगी तो बाबूजी को एक बार फिर दिल्ली ले जाएंगे। वहां किसी अनुभवी न्यूरो सर्जन से दिखाएंगे। इस आशा के साथ कि वे फिर खड़े हो जाएं और मुझे समझाएं कि फलां खेत में आलू लगाना तो पूरब के खेत में गरमा धान। बाबूजी की तबीयत को लेकर मैं खुद को एक भरम में रखता आया हूं इस आशा के साथ कि वह ठीक हो जाएंगे। पिछले दो साल से मक्का की फसल मेरे उस भरम को मजबूत करता रहा है, लेकिन इस बार वो भरम भी टूट गया।


ये अनुभव केवल मेरा नहीं बल्कि मेरे जैसे सैंकड़ों किसानों का होगा, जिसने इस बार तूफान की तबाही को भोगा है। कल रात रेडियो पर सुना कि लोकसभा में शून्यकाल के दौरान संसद में तूफान से हुई तबाही का मुद्दा छाया रहा। मेरे जैसे किसान की गुजारिश बस इतनी है कि किसानी-मुद्दे को राजनीति की किताब का कवर पेज न बनाया जाए। पूर्णिया और प्रभावित जिले के किसानों तक सहायता पहुंचे।

उस किसान के बारे में दिल्ली में बैठे लोग सोचने की कोशिश करें, जिनके घर में मातम फैला है, उन घरों के बारे में सोचें जहां कि छत हवा में उड़कर कहीं दूर चली गई और बिलखते बच्चे धूप में रो रहे हैं। यह सब आंखों से देख रहा हूं। कैमरे का लैंस तस्वीरें लेने से मना कर रहा है।

मन के भीतर बैठा खुद का संपादक दुख की मार्केटिंग करने से मना कर रहा है, वह कहता है शब्दों के जरिये लोगों तक अपनी बातें पहुंचाओ। शब्द की ताकत ऐसी होती है कि वह दिल को छू लेता है। मन की बात सुनकर मैं सहम जाता हूं और एक नजर फिर अपने खेत की ओर देता हूं और फिर मुड़कर बिछावन पर लेटे बाबूजी को देखने लगता हूं। सोचता हूं कि यदि वे ठीक रहते तो मुझे समझाते- “डरो मत, लड़ो। किसानी करते हुए लड़ना पड़ता है और फिर वे कुछ मुहावरा सुनाते और कहते कि जाओ घुमो और तबाही के मंजर को महसूस करो ताकि तुम्हें अपना दुख कम दिखने लगे क्योंकि तुमसे भी ज्यादा क्षति और लोगों की हुई है।“

किसानी करते हुए खुद का दुख मैं शब्दों के जरिये बयां करता हूं। इस बार की तबाही मुझे सुखर कर रही है। तबाही का आंकड़ा बढ़ता ही जा रहा है। किसानी के मुद्दों से राजनीति की रोटी सेंकने वाले लोगों से डर भी लग रहा है। मुआवजा का बंदरबांट होना अभी बाकी है। लोगों तक मुआवजे की राशि कब पहुंचेगी या कितनी पहुंचेगी, ये भी एक कहानी होगी। हम सब उस कथा के चरित्र होंगे, जिसे बाद हर कोई हमें भूला देगा। लेकिन याद रखिए, रोटी के लिए गेहूं , चावल के लिए धान और मल्टीप्लेक्स में आपके पॉपकार्न के लिए मक्का हम सब ही उपजाते हैं। यदि एक आंधी हमें बरबाद कर सकती है तो याद रखिए एक अच्छा मानसून हमें बंपर फसल भी देगा। हम हार नहीं मानेंगे। हम जानते हैं कि हमारे हाथ में केवल बीज बोना है। फसल की नियति प्रकृति के हाथों में हैं। आंधी और बारिश की मार से हम हार नहीं मानेंगे। सरकारी मुआवजा हमारे बैंक-खातों में कब पहुंचेगा ये तो हमें पता नहीं, लेकिन इतना तो जरूर पता है कि अगली फसल के लिए हमें खूब मेहनत करनी है। मौसम की मार सहने के बाद हिम्मत जुटाकर फिर से खेतों में लग जाना है। केवल अपने और परिवार के पेट के लिए नहीं बल्कि आप सबों के डाइनिंग टेबल के लिए भी।

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Sunday, March 27, 2011

टीवी में अखबार का वो पुराना पन्ना


हम सब जो जींस और टी-शर्ट में इतराते फिरते हैं, दरअसल चैनल काल की उपज हैं। हम पर बहुत जल्दी ही टीवी का रंग चढ़ जाता है। टीवी में हम दुनिया को देखते हैं और फिर उसी हसीन दुनिया की तरह रंगीन बनने में जुट जाते हैं। लेकिन उसी टीवी में मेरे लिए रविवार को छपने वाला एक पुराना पन्ना भी है, जिसमें मैं दुनिया को नहीं बल्कि खुद को देखता हूं। दुनिया, जिसे लोग जादू का खिलौना मानते हैं, उसे इस पुराने पन्ने में मिट्टी की तरह पेश किया जाता है। मिट्टी, जो मेरा मूल है, जो मेरे तन में समाया है, उसी मिट्टी को पुराने पन्ने में देखता हूं तो मन फिर से मिट्टी में मिल जाने का करता है। मेरे लिए, जो एक आम इंसान है, जो कभी स्पेशल नहीं बनना चाहता है, उसके लिए टीवी में अखबार का पुराना पन्ना रवीश की रिपोर्ट है।

रिपोर्ट, जिसे रवीश नामक एक प्राणी दिखाता है, लेकिन इस आम-आदमी के लिए रवीश रिपोर्ट दिखाता नहीं पढ़ाता है, अखबार के पुराने पन्ने में। पन्ना, जो मटमेला है, जिसमें चाय के गिरने और फिर उसके सुख जाने का दाग लगा है, इसके बावजूद भी शब्द अपनी छाप बनाए हुए है, आम आदमी के लिए रवीश नामक प्राणी ऐसे ही शब्द पढ़ा रहा है। अयोध्या को वह एक इतिहासकार की तरह पेश कर रहा है।

इस आम-आदमी को एक बार दिल्ली विश्वविद्यालय के मानसरोवर हॉस्टल में एक इतिहासकार-कहानीकार मिला था सदन झा, जिसे वह शबद-योगी मानता है, ठीक उसी तरह रवीश नामक प्राणी में भी कहानीकार पलथी मारे बैठा है। दरअसल जब इतिहास को समझने वाला कहानी गढ़ने लगता है तो सत्य आंखों के सामने उपस्थित हो जाता है।  रवीश नामक यह प्राणी अयोध्या को मायूसी में डूबे शहर की संज्ञा देता है तो मन कह उठता है कि
बेताब दिल की यही तमन्ना है...ऐसे ही शब्द सुनने की आदत है।

वह खबरों के बीच से हंसते हुए चोट मारकर भाग जाता है, मानो गुल्ली-डंडा खेलते हुए डंडा मारकर कोई बच्चा दौड़ता हुआ किसी पेड़ के टोह छुप जाता हो। अयोध्या की कथा बांचते हुए जब यह प्राणी बताता है कि उस शहर के सरकारी अस्पताल में एक ऐसा डॉक्टर है जो आठ घंटे की शिफ्ट में तकरीबन 200 मरीजों को देखता है तो मन में एक आशा की किरण कौंध जाती है, आम आदमी प्राउड फील करने लगता है।

इस आम आदमी को मेले से इश्क है, तो अखबार के पुराने पन्ने में वर्तमान में अतीत का मेला पढ़ने को मिल जाता है। पल में उसे विश्वास नहीं होता लेकिन फिर उसे एक मुहावरा याद आता है कि तस्वीरें तो झूठ नहीं बोला करती, यहां तो वीडियो है। रवीश नामक प्राणी पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गढ़मुक्तेश्वर में सलाना कार्तिक महीने में गंगा
किनारे लगने वाले मेले में आम आदमी को घुमाता और पढ़ाता है और बताता है कि इस मेले की खास बात पारंपरिक बैलगाड़ी की सवारी है। यह मेला 11 दिन तक चलता है. यह प्राणी खुद भी बैलगाड़ी की सवारी करता है, ऐसे में तीसरी कसम के हीरामन की याद आ जाती है। मुंह से अनायस ही निकल पड़ता है-इस्सससस।

भागम-भाग और विज्ञापनमय पत्रकारिता काल में रवीश कुमार नामक प्राणी एक आशा की तरह है, जो बताता है कि मौका मिले तो हमें काम आम आदमी के लिए भी करना चाहिए, फाइव स्टार होटल की प्रेस-वार्ता और वहां मिलने वाली विज्ञप्ति व फुटेज से इतर। यह आम आदमी, जो टीवी की दुनिया में कोर्ट-पेंट-टाई लगाने वालों को करीब से देखता है, उसके लिए रवीश कुमार नामक प्राणी एक सुबह है। गुलजार की सुबह की तरह, जिसके लिए सुबह भी एक ख्वाब है। गुलजार यूं ही नहीं कहते हैं- सुबह-सुबह इक ख्वाब की दस्तक पर दरवाजा खोला...

Sunday, January 09, 2011

रवीश आपने पर्दा गिराया नहीं उठाया है...

गिरा दो पर्दा कि दास्ताँ ख़ाली हो गई है

गिरा दो पर्दा कि ख़ूबसूरत उदास चेहरे ख़ला में तहलील हो गए हैं
-गुलजार

शुक्रवार, 7 जनवरी 2011, चैनल एनडीटीवी इंडिया। कार्यक्रम रवीश की रिपोर्ट। भूख पर लगी धारा 144। मैं इसे रवीश की बेहतरीन रिपोर्टों में एक कहता हूं, इसी वजह से जब इस ‘देखी रिपोर्ट’ पर ‘लिखने’ जा रहा हूं तो गुलजार की इन दो पंक्तियों (शुरुआत में लिखी) का इस्तेमाल कर रहा हूं। मुझे रवीश की इस रिपोर्ट ने कई बिंदुओं पर सोचने को मजबूर कर दिया। शनिवार को मैं दिन भर इस रिपोर्ट के बारे में ही सोचता रहा। शुक्रवार को रपट देखने के तुरंत बाद जब रवीश को एसएमएस किया कि ‘आंखों में आंसू आ गए हैं’ तो उनका जवाब आया – ‘मुझे अभी तक समझ नहीं आ रहा कि ये क्या हालात हैं..........।‘

25 पैसे के लिए मजदूरी करती महिलाओं की कहानी जब रवीश बयां कर रहे थे, तब मैं जयपुरिया रजाई में लिपटा आंखों को नम कर रहा था। शरम आ रही थी, मैं महंगाई पर घडियाली आंसू बहा रहा था (क्योंकि मैं कुछ कर नहीं पा रहा था, सिवाय अफसोस जताने के)। रवीश दिल्ली की कहानी बयां कर रहे थे। रवीश के साथ सहबा फारुकी थीं, जो कहानी के भीतर कहानी की रेसे को अलग कर रही थीं। सच कहूं तो इसी रपट से जान सका कि कोई दो रुपये के लिए भी आठ घंटा काम कर सकता है। मैं तो हर छह महीने में अपनी सैलेरी में 000 बढ़ाने के लिए आठ घंटे काम करता हूं। उसमें भी तमाम सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट (सबसे अधिक ट्विटर) को खंगालने में और कॉफी पीने में वक्त गुजारता हूं।

हम उस मुल्क में रह रहे हैं जहां पचीस पैसे से लेकर एक रुपये सत्तर पैसे तक के लिए लोग मजदूरी कर रहे हैं और जब सत्तारूढ़ दल अपना राष्ट्रीय अधिवेशन करता है तो करोड़ों फूंक डालता है। मैं व्यक्तिगत तौर पर शहरों में काफी कुछ ढूंढ़ता रहता हूं लेकिन अफसोस दिल्ली की इस तस्वीर को इतनी नजदीकी से नहीं समझ सका। रवीश, मैं शर्मींदा हूं। रवीश, जब आप उस घर के बारे मे बता रहे थे, जहां किचन, बाथरुम, बेडरूम सब एक में ही था, तो मुझे अपने सोफे से चिढ़ आ रही थी। गोरखपुर की साजिदा के घर आप ले गए, जो खैनी के पाउच के लिए चूने को छोटी-छोटी डिबिय़ा में पैक करती हैं। उसके हाथों को देखकर आपको क्या हुआ होगा, मैं महसूस कर सकता हूं। लेकिन जब वह बताती हैं कि इसी चूने से उसेन घर को व्हाइट हाउस बना डाला तो जिंदगी के एक दूसरे हिस्से से भी नजदीक आया कि हर पल को यहां जी भर के जीयो...

मेरे यार-दोस्त बोलते हैं कि मैं कुछ ज्यादा ही इमोशनल हूं, अरे, मैं क्या करूं, अक्सर कई चीजें मुझे हैरान कर देती है और मैं बह जाता हूं। भूख पर लगी धारा 144 ने यही हाल किया। मुझे पता है इस पोस्ट को पढ़कर भी यार-दोस्त यही कहेंगे, लेकिन मैं मजबूर हूं...। रपट देखने के बाद लगा कि दिल्ली से अच्छा तो मेरा गांव हैं, जहां दिन भर की मजदूरी 90 रुपये मिलती है। मैं इसलिए गुलजार के शब्दों के पास जा रहा हूं और बुदबुदाता हूं कि गिरा दो पर्दा कि दास्तां खाली हो गई है...।