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Wednesday, April 11, 2012

पानी, मीन और पेंटिंग


मीनाक्षी की पेंटिंग
कागज, पेंसिल और मन के संग जीवन की कथा कही जा सकती हैयह बात हमने अपने जिले के एक कला स्कूल में सुनी थी। मिथिला पेंटिग की बारिकी सीखते हुए बहनों के साथ हमने भी इस कला में हाथ आजमाया लेकिन कमबख्त हाथ में वैसी स्थिरता ही नहीं नसीब हुई कि हम भी रेखाओं से अपनी बात रख सकें।

खैर
, वक्त के साथ इस कला में जीवन के ढेर सारे बिंब देखने को मिले। हमने इसी कला से कथावस्तु के रूप में पौराणिक कहानियों को जाना। घर में जब बहनें हिंदू देवी देवताओं की तस्वीरों और प्राकृतिक दृश्यों के साथ-साथ मोर, मछलियां और चिड़ियों को बहुत ही सुंदर तरीके से सिल्क साड़ी और कागजों पर उकेरती थीं तो मन रोमांचित हो जाया करता था। दुर्गा, काली, राधा-कृष्ण, शिव-पार्वती, गौरी-गणेश कैनवास पर उतार जाते थे। हमें काली की तस्वीर सबसे अधिक खींचती थी, आजतक नहीं जान सका कि काली ही क्यों?

खैर
, एक बार फिर हमारी नजर ऐसे ही कुछ पेंटिंग्स पर आकर रुकी है लेकिन इस बार कलाकार की कलाकारी में हमने जीवन के दर्शन को देखा है। मछली देखी है, जल देखा है और इन सबके संग जीवन को महसूस किया है। इस कला का जानकार नहीं होने के कारण इन पेंटिग्स में हमने गणित को नहीं बल्कि एक दर्शक के रुप में जीवन को देखा है। युवा कलाकार मीनाक्षी इन दिनों जीवन को माछ के रुप में कैनवास पर उतार रही हैं।
माछ के भीतर दुनिया
बचपन से गांधी जी के तीन बंदर की कहानी हमारे मन के पन्ने में जमी हुई है लेकिन कल जब मीनाक्षी की पेंटिंग में हमने माछ (मछली) को बुरा मत देखो, बुरा मत सुनो और बुरा मत बोलो कहते देखा तो लगा कि सचमुच जीवन की व्याख्या हर कोई कर सकता है। बस भीतर एक दर्शन होना चाहिए।

दरअसल मीनाक्षी मिथिला पेंटिंग्स के साथ कई प्रयोग कर रही हैं। उनकी जिस पेटिंग पर हमारी नजर सबसे अधिक देर तक टिकी है वह है मछली के पेट में कछुआ और ग्लोब। दरअसल इस तरह की पेंटिंग को बनाना सोचने के स्तर को नई ऊंचाई देने की तरह है। मिथक के अनुसार कछुआ पर दुनिया है। लेकिन मीनाक्षी का मानना है कि सब कुछ दुनिया और कछुआ सब माछ के
अंदर..। माछ सर्वशक्ति मान है। हमें कोसी के कच्छप सदृश्य परती भूमि का ख्याल आता है, जहां कछुओं को पूजा जाता है।

इस पेंटिंग में अजीब लगाव है। कला के जानकार इस पर अपनी प्रतिक्रिया दे सकते हैं लेकिन पाठक-दर्शक के तौर हमें यह माछ में सिमटी दुनिया लगती है। ऐसा प्रतीत होता है मानो पूरी दुनिया माछ के गर्भ में है।

ऐसी ही एक पेंटिंग सतरंगी मछली की है। मिथिला का होने की वजह से माछ हमारे लिए चलते रहने का भी एक माध्यम है। मीनाक्षी ने अपनी पेंटिंग में माछ को सात रंगों में कैनवास पर उतारा है। इसे देखकर मन का टेप रिकार्डर बोलने लगता है-  सतरंगी रे.. लेकिन जब अब थोड़ा थमकर इस पेंटिंग में डूबते हैं तो जल के भीतर संतरंगी मछली की कल्पना जीवित हो जाती है।

अब देखिए न हमें उस अमेरिकन रेहू की याद आ रही है जो हमारे पोखर में बरसात के मौसम में ऊपर उछल-कूद करने लगती है। उस माछ के ऊपरी हिस्से पर जब धूप की परछाई आती है तो वह चमक उठती है सात रंगों में। मीनाक्षी की यह पेंटिंग हमें अंचल लेकर चली जाती है। लेकिन पेंटिग के गर्भ में दुनिया में रंग का होना भी है शायद।
मत्स्यावतार

मीनाक्षी की एक पेंटिंग मत्स्यावतार है। हमने माछ के संग सांप का मेल पेंटिंग में पहली बार देखा। बारह माछ और उसके संग सांपों की माला, बीच में शंख, कमल चक्र.. हम मिथकों से जु़ड़ी दुनिया से जुड़ जाते हैं। मिथक जो हमारे भीतर वास करता है लेकिन एक कलाकार ही उसे बाहर दुनिया के सामने रख सकता है। हमें तो इस पेंटिंग को देखकर यही लगा।

मीनाक्षी की इन पेंटिंग्स में डूबते-उतरते हम जीवन में माछ को देखने लगते हैं। प्रतीत होता है कि माछ के जरिए हम कितनी बातें किन-किन अंदाजों में बयां कर सकते हैं। और जब मिथिला पेंटिंग की बात चलती है तो हम और भी आंचलिक हो जाते हैं, वैश्विक होने के लिए।

माछ और जीवन को लेकर यह स्कैच तैयार करते वक्त कबीर की यह वाणी भी याद आती है-
पानी बिच मीन प्यासी, मोहि सुन- सुन आवें हांसी। घर में वस्तु न नहीं आवत, वन- वन फिरत उदसी। (प्रत्येक मानव के भीतर ईश का वास है, जहाँ निरंतर आनंद- ही- आनंद है। इसी की खोज करना चाहिए। बाहर  घूमने या परेशान होने की कतई जरुरत नहीं है।)

{यदि आप भी इन पेंटिंग्स को देखना और समझना चाहते हैं तो दिल्ली में 12 अप्रैल से 19 अप्रैल तक हौजखास विलेज स्थित मुल्कराज आनंद गैलेरी (Lokayata Mulk raj Anand Gallery) में मीनाक्षी की पेंटिंग्स की प्रदर्शनी लगने जा रही है। Myths Reinterpreted नाम से।}

Saturday, April 12, 2008

एरिका स्मिथ की जमीन पर नहीं बना म्यूजियम




मिथिला पेंटिंग से अभिभूत हो कर जर्मनी की एरिका स्मिथ आज से करीब तीन दशक पूर्व मधुबनी के जितवारपुर गांव आई तो यहीं की हो कर रह गयीं। उन्होंने यहां साढ़े बाहर कट्ठा जमीन भी खरीदी और उस पर भवन निर्माण आरंभ करवाया, पर कार्य संपन्न होने से पहले ही उनका निधन हो गया।


ग्रामीणों के अनुसार एरिका ने यह जमीन यहां के कलाकारों द्वारा बनायी गयी मिथिला पेंटिंग से होने वाली आय के मुनाफा से खरीदी थी। कहते हैं कि वह इस जमीन पर म्यूजियम और गेस्ट हाउस बनवाना चाहती थीं। उनके निधन के बाद भवन तो बना पर उसमें म्यूजियम की स्थापना नहीं की जा सकी।




एरिका की जमीन पर बने भवन को हस्तकला आश्रम का नाम दे दिया गया है जिसका उद्घाटन दरभंगा प्रमंडल के आयुक्त वी। जयशंकर ने 2.10.1991 को किया था। बगल में एक और हालनुमा भवन है। इनका उपयोग बारातियों को ठहराने आदि के लिए होता है। अन्य दिनों यह यूं ही पड़ा रहता है। जमीन की घेराबंदी भी नहीं की गयी है। इसे म्यूजियम के रूप में देखने का सपना संजोने वाले इससे दुखी हैं।




कलाकारों व कला प्रेमियों को इस बात की पीड़ा है कि मिथिला पेंटिंग की नामचीन हस्तियों की कला विदेशों के संग्रहालय में तो हैं पर यहां अपनी मिट्टी पर ऐसा कुछ नहीं है जहां लोग उसे सहजता से देख-परख सकें। जितवारपुर में तो राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मिथिला पेंटिंग के माध्यम से परचम लहराने वाले कलाकर तो हैं ही, आसपास के इलाकों में भी नामचीन कलाकर हैं।




रसीदपुर की पद्मश्री गंगा देवी, भूषण लाल कर्ण, लहेरियागंज के सीवन पासवान, रांटी की महासुंदरी देवी, कर्पूरी देवी आदि की कला को भी म्यूजियम में स्थान दिया जा सकता है। पद्मश्री सीता देवी के कलाकार पौत्र मिथिलेश अपनी दादी को राष्ट्रीय व राज्य स्तर पर पुरस्कारों में मिले मेडल, शील्ड आदि दिखाते हुए कहते हैं कि बाहर से आने वाले लोगों को इसे देखने के लिए उनके आवास तक आना पड़ता है।




यदि म्यूजियम होता तो इसे वहां सुरक्षित रखा जा सकता था और लोगों के लिए इसका अवलोकन भी सहज होता। उन्हें इस बात का अफसोस है कि दादी को निधनोपरांत जब शिल्प गुरु आवार्ड प्रदान किया गया तो उसमें मिलने वाली नकद ७.५ लाख की राशि नहीं दी गयी। यदि यह मिली होती तो कलाकारों के उत्थान या म्यूजियम निर्माण की दिशा में पहल की जा सकती थी। वे कहते हैं कि सरकार यदि इस राशि का खुद यहां उपयोग करती तो भी हर्ज नहीं था, पर कुछ भी नहीं हो सका। इसी तरह लोगों को यह बात भी साल रही है कि गांव में कहीं भी ऐसा कुछ नहीं है जो इधर से गुजरने वालों को एक नजर में इस कला ग्राम की महत्ता से परिचित करा दे या फिर मिथिला पेंटिंग को विश्व पटल पर स्थापित करने वाले भास्कर कुलकर्णी व एरिका स्मिथ की याद दिला दे।


साभार जागरण डॉट कॉम