मुझे आदमी का सड़क पार करना हमेशा अच्छा लगता है क्योंकि इस तरह एक उम्मीद - सी होती है कि दुनिया जो इस तरफ है शायद उससे कुछ बेहतर हो सड़क के उस तरफ। -केदारनाथ सिंह
Tuesday, November 30, 2021
माटी की खुशबू
Friday, January 11, 2019
कदंब के नाम पाती
अब जब
तुम सब हो गए हो बड़े
अब जब
तुम्हारी बस गई है
अपनी बस्ती
तो अब खुलकर
बातें करो आसमां से,
बातों ही बातों में कभी
तुम सब छू लेना बादलों को
और
पूछना सूरज से कि
ऊंचाई से हरी पत्तियां
कैसी लगती है?
किसी पूर्णिमा की रात
करना चाँद से गुफ्तगू
बारिश के मौसम में
बादल के कोमल हाथों से
पहले स्नान का सुख
हमें बताना साथी...
यूँ ही सिर ऊंचा किए
हमसे भी कभी
गुफ्तगू करना साथी
और बताना
पतझड़-सावन-बसंत-बहार
की कहानी
#ChankaResidency
Saturday, December 15, 2018
गाम-घर और खेत -खलिहान
घंटों चुपचाप बैठना और फिर खेत तक टहलना, इन दिनों आदत सी बन गई है।गाछ-वृक्ष का जीवन देख रहा हूं, तालाब में छोटी मछलियों का जीवन समझ रहा हूं। तमाम व्यस्तताओं के बीच ख़ुद को कुछ दिन अकेला छोड़ देना, कभी कभी रास आने लगता है।
नीम का पौधा अब किशोर हो चला है। दो साल में उसकी लम्बाई और हरियाली, दोनों ही आकर्षित करने लगी है। इन्हें देखकर लगता है कि समय कितनी तेज़ी से गुज़र रहा है। लोगबाग से दूर गाछ-वृक्ष के बीच जीवन का गणित आसान लगने लगता है।
कुछ काम जब अचानक छूट जाता है और दुनिया का अर्थशास्त्र जब ज़बरन आप पर धौंस ज़माने लगता है, उस वक़्त आत्मालाप की ज़रूरत महसूस होती है।
अहाते के आगे कदंब के पेड़ बारिश इस मौसम में और भी सुंदर दिखने लगे हैं। पंक्तिबद्ध इन कदंब के पेड़ को देखकर लगता है जीवन में एकांत कुछ भी नहीं होता है, जीवन सामूहिकता का पाठ पढ़ाती है।
पेड़-पौधों से घिरे अपने गाम-घर में जीवन स्थिर लगता है। पिछले कुछ दिनों से एक साथ कई मोर्चे पर अलग अलग काम करते हुए जब मन के तार उलझने लगे थे तब लगा कि जीवन को गाछ-वृक्ष की नज़र से देखा जाए। बाबूजी ने जो खेती-बाड़ी दी, उस पर काकाजी ने हरियाली की दुनिया हम लोगों के लिए रच दी, अब जब सब पौधे वृक्ष हो चले हैं तो उसकी हरियाली हमें बहुत कुछ सीखा रही है।
खेत घूमकर लौट आया हूं, साँझ होने चला है, पाँव धूल से रंगा है। अपने ही क़दम से माटी की ख़ुश्बू आ रही है। पाँव को पानी से साफ़कर बरामदे में दाख़िल होता हूं, फिर एक़बार आगे देखना लगता हूं। हल्की हवा चलती है, नीम का किशोरवय पौधा थिरक रहा है। यही जीवन है, बस आगे देखते रहना है।
Tuesday, September 08, 2015
खेती-किसानी, बारिश-बाबूजी
आज शहर से अपने गाँव जाते वक्त मेरी नजर एक बूढ़े शख्स पर टिक गयी जो लाठी के सहारे कदम बढ़ा रहा था. उम्र उसकी 80 के करीब होगी। लेकिन इसके बावजूद वो सात -आठ साल के एक लड़के को थामे था। वह बूढ़ा उस लड़के को सहारा दे रहा था कि वह लड़का उस बुजुर्ग को थामे था, यह तो मुझे नहीं पता लेकिन यह अहसास जरूर हुआ कि हम सब जड़ों में लिपटने की जुगत में रहते हैं। यही जुगत शायद जीने की आश को बचाए रखती है।
नहर के एक छोर पर उन दोनों को देखकर मुझे बाबूजी की याद सताने लगी। दरअसल हम सब स्मृति में जीवन तलाशते हैं। स्मृति की दूब हमेशा हरी बनी रहे, हम सब ऐसा सोचते हैं। कोई हमारे बीच से गुजरकर भी मन में एक पगडंडी बनाकर निकल जाता है, जिसकी लकीर पर हम जीवन भर चलते रहने की मंशा पाल बैठते हैं।
लेकिन नियति जो चाहती, होता तो वही है। कबीर की वाणी ऐसे में मुझे याद आने लगती है। गाम का कबीराहा मठ मुझे खींचने लगता है। मैं खुद ही बुदबुदाने लगता हूं- कबीरा कुआं एक है..और पानी भरे अनेक..।
फिर जीवन में फकीर की खोज में लग जाता हूं तो कबीर का यह लिखा सामने आ जाता है- "हद-हद टपे सो औलिया..और बेहद टपे सो पीर..हद अनहद दोनों टपे. सो वाको नाम फ़कीर..हद हद करते सब गए और बेहद गए न कोए अनहद के मैदान में रहा कबीरा सोय.... भला हुआ मोरी माला टूटी, मैं रामभजन से छूटी रे मोरे सर से टली बला..।"
आज गाम-घर करते हुए यही सब सोचता रहा। इस बीच धूप की दुनिया बादलों में कब बदल गयी पता भी नहीं चला। अचानक खूब बारिश होने लगी। बारिश की कई यादें हैं मन के भीतर, कई कहानियां हैं, कई नायक-नायिकाएं हैं..लेकिन फिलहाल धान के खेत का कैनवास ही मन में घर बनाए हुए है।
बारिश से धान के खेतों की हरियाली और भी मायावी दिखने लगती है। बाबूजी का अंतिम संस्कार मैंने उन्हीं धान के खेतों के मुंडेर पर किया, जहां वे फसलों से अपनी और हम सबकी दुनिया रचते थे। हमारी साल भर की रोजी-रोटी के लिए जी-तोड़ मेहनत करते थे। ट्रैक्टर से घंटों खेतों को समतल करते थे।
देखिए न उन खेतों में अब धान के संग कदम्ब अपनी कविता-कहानी हमें सुनाने की जिद कर रहा है। इस अहसास के साथ कि बाबूजी भी ये सब सुन रहे होंगे, मैं आंखें बंद कर उन्हें याद कर लेता हूं। यह जानकर कि मेरा यह भरम भी टूट जाएगा एक दिन...
हर रोज शहर से गांव करते हुए इन दिनों एक साथ ऐसी ही कई चीजें मन में चलती है। तबियत ठीक नहीं रहने की वजह से लिखना कम हो गया है। ड्राइविंग और लेखन से थोड़ी दूरी बनाने को डाक्टर ने कहा है, दोनों ही अति-प्रिय चीज...जा रे जमाना..हर कुछ पर पाबंदी। डाक्टर भी न ..लेकिन करना तो वही होगा..।
कम बारिश की वजह से खेती-बाड़ी इस बार मन माफिक नहीं होगी, ये पता है लेकिन इसके बावजूद हार मानने वाले हम हैं नहीं। बाबूजी अक्सर कहते थे- ‘ किसानी करते हुए निराशा के बादल खूब मंडारते हैं, उन बादलों को बस बरस जाने दो...।’
आज खेती-किसानी और बारिश के बहाने बस इतना ही।
Saturday, January 24, 2015
एक खत बसंत के नाम
| सरसों के खेत में पंखुरी |
ठंड जाती है तो तुम आ जाती हो, हां तुम ठीक समझ रही हो मैं तुम्हारी ही बात कर रहा हूं। तुम्हारी ही। हां, तुम्हारी ही। तुम बसंत हो। पीले रंग से मोहब्बत कराने की आदत तुम्हारी ही संगत से आई है। एक मौसम हजार अफसाने लिए जब तुम आती हो तो मैं पत्ते को छूकर कह देता हूं कि तुम आ गई हो।
तुम सखी हो न, इसलिए आने की आवाज सुन लेता हूं। हल्की ओस के बूंद से पत्ते की चमक देखकर, तुम्हारी रंगत का पता चल जाता है। खेत में सरसों के पीले फूल के चारों ओर उड़ती तितलियां वाजिब ही कहती है कि तेरे रंग में ही नशा है, जिसमें डूबकर ही कोई तुझे पा सकता है।
तुम्हें याद है न बसंत, जब तुम्हें पहली बार मैं जान सका था। कुछ याद आ रहा है कि नहीं ?, अरे खेत के मंडेर पर चलते वक्त जब पहली बार सरसों के पौधे से हाथ मिले थे, एक सफेदी हाथ में लगी थी, पीले फूल स्याह काली कमीज से चिपक गए थे। मैं जानता हूं तुम मुझे देख रही थी। मेरी उमर कम थी लेकिन मन के उस कोने में तुमने दस्तक दे थी।
मैं जानता हूं, तुम्हारे प्यार करने का अंदाज ऐसा ही होता है। हर साल तुम कम दिनों के लिए आती हो लेकिन जैसे ही आती हो रंग में मुझे सरोबार कर लेती हो। जानती हो तुम्हारे आने की आहट से ही मैंने मेंहदी हसन को जाना। तुम्हारी वजह से मैंने उनकी गजलों को समझा।
अपने भीतर तुम्हारे होने के अहसास के बाद मैंने यह गजल सुनी- “मुझे तुम नजर से गिरा तो रहे हो , मुझे तुम कभी भी भुला न सकोगे, न जाने मुझे क्यूँ ये यकीन हो चला है, मेरे प्यार को तुम मिटा न सकोगे..।” तुम अपने संग एक हवा लाती हो, जिसमें अजीब सा नशा होता है। कई बार पूछना चाहा कि क्या तुम भी नशा करती हो?
रामचंदर को जानती हो न, जिसके साथ मैं बरसों पहले सरसों के खेत देखने गया था और उस पीले रंग के सफेदी के बहाने तुमसे मुलाकात हुई थी। उसीने बताया था कि तेरे साथ जो हवा आती है न उसमें गांजा से भी ताकतवर नशा है। एक ही कश में कोई भी बौरा सकता है? मैं उसी नशे की बात कर रहा हूं।
एक बात और जानती हो। गाम के ठाकुर स्थान का मंहत सरजनवा कहता है कि कबीर को जानने के लिए तुम्हें समझना जरुरी है। वैसे तो मैं सरजना की बातों में अक्सर उलझ जाता हूं लेकिन आज उसने तुम्हारे लिए जब यह कहा- “ न पल बिछुड़े पिया हमसे न हम बिछड़े पियारे से, उन्हीं से नेह लागी है, हमन को बेकरारी क्या ?” तो मैं सोच में पड़ गया। इस सवाल का भी इस बार तुम जवाब देना।
Saturday, May 31, 2014
इस मोड़ से जाते है, कुछ सुस्त कदम रस्ते...
एक अनुभूति होती है, किसी के होने का अहसास होता है। तब पता चलता है कि यह तो अपने होने का अहसास है। प्रसून जोशी का लिखा याद आने लगता है, जिसमें वे कहते हैं- "जब तेरी गली आया, सच तभी नज़र आया, मुझ में ही वो खुशबू थी, जिससे तूने मिलवाया...”
Wednesday, March 19, 2014
'हरा' है सब, 'हारे' नहीं हैं और गर्मी की दस्तक...
लोगबाग का कहना है कि लगातार मेहनत से मन ‘हार’ जाता है लेकिन मक्का की हरियाली ‘मन से हार’ को मिटाकर ‘मन को हरा’ कर देती। होली के बाद हवा ने भी रुख बदला है, धूल ने हवा का साथ दिया और गर्मी ने इन दोनों के बीच अपने लिए जगह बनाकर दस्तक देने की कोशिश की है।
आम और लीची के पेड़ फलों के लिए तैयार हो रहे हैं। आम के मंजर मन के भीतर टिकोले और आम के बारे में सोचने को विवश कर रहे हैं। मन लालची हुआ जा रहा है। उन मंजरों में किड़ों ने अपना घर बना लिया है, मधुमक्खियां इधर-उधर घूम रही है।
दरअसल मैं किसानी को पेशा मानता हूं क्योंकि अभी भी तथाकथित विकसित समाज इसे पेशा मानने को तैयार नहीं है। कई लोग ऐसे मिले जो किसानी को मजबूरी कहते हैं।
जो सुख में सुमरिन करे, दुख काहे को होय ॥ “
Tuesday, March 04, 2014
बस, रेणु के लिए
देखिए न आज अपने रेणु का जन्मदिन भी है। वही रेणु जिसने गाम की बोली-बानी, कथा-कहानी, गीत, चिडियों की आवाज..धान-गेंहू के खेत..इन सभी को शब्दों में पिरोकर हम सबके सामने रख दिया और हम जैसे पाठक उन शब्दों में अपनी दुनिया खोजते रह गए। रेणु का लिखा जब भी पढ़ता हूं खुद से बातें करने लगता हूं। रेणु के बारे में जबसे कुछ ज्यादा जानने-समझने की इच्छा प्रबल हुई, ठीक उस समय से पूर्णिया जिले की फिजा में धुले उनके किस्से इकट्ठा करने में लग गया। घाट-बाट में रेणु को ढूढ़ने लगा। “इन स्मृति चित्रों को प्रस्तुत करते समय अपने लगभग एक दर्जन करीबी लंगोटिया यारों की बेतरह याद आ रही है। वे किसानी करते हैं, गाड़ीवानी करते हैं, पहलवानी करते हैं, ठेकेदार है, शिक्षक है, एमएलए हैं, भूतपूर्व क्रांतिकारी और वर्तमानकालीन सर्वोदयी हैं, वकील हैं, मुहर्रिर हैं, चोर और डकैत हैं। वे सभी मेरी रचनाओं को खोज-खोज कर पढ़ते हैं-पढवाकर सुनते हैं और उनमें मेरे जीवन की घटनाओं की छायाएं ढूंढ़ते हैं। कभी-कभी मुझे छेड़कर कहते हैं- साले उस कहानी में वह जो लिखा है, सो वहां वाली बात है न ?” (पांडुलेख से)
आज रेणु के जन्मदिन पर मैं बस यही सब सोच रहा हूं। उनका लिखा पढ़कर मानस बना है और अब किसानी करते हुए रेणु के पात्रों से रुबरु हो रहा हूं।
Saturday, February 22, 2014
बनते किसान की छोटी सी कहानी
पूर्णिया जिला मुख्यालय से 25 किलोमीटर दूरी पर स्थित एक गांव है चनका। यहां हमने किसानी के पारंपरिक रुप को बदलने की कोशिश की है। जिन खेतों में पहले केवल धान-गेंहू-मक्का आदि उपजाया जाता था वहां हम अब प्लाइवुड के लिए लकड़ी उपजाने लगे हैं। इसके साथ ही मिट्टी की उपजाऊ गुणवत्ता बनी रहे इसके लिए हम पारंपरिक खेती भी जारी रखे हैं।
हमने खेती के आर्थिक महत्व को देखते हुए कदंब को प्रमुखता दी है। यह पौधा 10 से 12 साल के भीतर ही प्लाइवुड फैक्ट्री के लिए तैयार हो जाता है। कदंब की कहानी ठीक वैसे ही है जैसे पहले पंजाब में बड़े स्तर पर पॉपलर की खेती हुआ करती थी। हालांकि अब वहां भी कदंब की खेती होने लगी है। गांव में इसे वन खेती का नाम दिया गया है। इसका एक फायदा यह भी है कि आपको जलावन समय-समय पर मिलता रहेगा। मसलन जब पेड़ की छटांई होगी किसान को जलावन मिलेगा।
एक किसान के तौर पर मेरा मानना है कि वन खेती को सरकार ब़ढावा दे। यह आर्थिक कारणों से काफी लोकप्रिय हो रहा है। सागवान या कदंब का एक पौधा बैंक एफडी से ज्यादा रिर्टन दे रहा है।
इसकी कीमतें पिछले चार सालों में दोगुनी हो गई है। कदंब का एक पेड़ 3000 से 15000 रुपये तक बिकता है। वहीं इसका जलावन 600 रुपये क्विंटल तक बिकता है। यह किसान को सवार्धिक फायदा देने वाला पेड़ है। यदि आप केवल जलावन के लिए ही इसकी खेती करना चाहते हैं तो ज्यादा इंतजार भी नहीं करना होगा, केवल एक साल में जलावन के लिए कदंब तैयार हो जाता है।
Tuesday, December 03, 2013
अंचल की रात और किसानी की बात
धान की तैयारी होने के बाद किसानों के हाथों में कुछ पूंजी आ चुकी है। कोई भगैत करवा रहा है तो कोई ग्राम्य देवता की पूजा-अर्चना। गाम के रामठाकुर स्थान से देर रात तक ढोलक की थाप सुनाई देती है। पलटन ऋषि की आवाज और हारमोनियम की धुन कान तक जब पहुंचती है तो मन साधो-साधो करने लगता है। वहीं कबीर मठ से भी आवाज आ रही है। यह सब लिखते हुए मन बार-बार यह पूछ रहा है कि अंचल अब कैसा लग रहा है? सवाल सुनकर मन ही मन मुस्कुराता हूं और कबीर की पाती बुदबुदाने लगता हूं- “कबीरा मन निर्मल भया, जैसे गंगा नीर......”
अंचल की रात और यह लैपटॉप इन दिनों लिखते रहने की बात करने लगा है। फसल की तरह शब्दों की भी खेती करते रहने की सोचने लगा हूं। फिलहाल नहर के उस पार से कुछ आवाजें आ रही है। घड़ी की तरफ देखता हूं तो सुबह के तीन बज रहे हैं। भैंसवार की आवाज पहचान जाता हूं। पस्सर खोलने का समय है, भैंसवार गीत गा रहा है। आवाज में विरह है, बिना शास्त्रीय ज्ञान के ही भैंसवार हमें शास्त्रीय संगीत सुना रहा है। आंखों से नींद गायब है और मैं किसानी के संग रेणु की लिखी बातों में डूबने लगता हूं।

