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Tuesday, November 30, 2021

माटी की खुशबू

फसल चक्र के संग एक अलग खुशबू भी साथ- साथ चलती है. हाँ, यह अलग बात है कि बहुतों के लिए यह खुशबू नहीं बल्कि गंध है.

बचपन की स्मृति में चापाकल के पास जमने वाली कजली भी है, हरे रंग की, जिस पर गलती से भी पाँव गया तो फिसल जाना तय है. उसी स्मृति के आसपास जूट (पटसन) की खेती भी है. जूट के फसल को काटकर पानी में कुछ दिन रखा जाना और फिर उससे पाट निकाल कर दुआर पर जब उसे सूखाने के लिए लाया जाता था तो उसकी एक अलग महक हुआ करती थी. घर दुआर उस महक से सरोबार हो जाया करता था. जूट के संग संठी भी आती थी. बच्चे उससे खेल के सामान बनाया करते थे.

ऐसी महक धान से चावल बनाने के दौरान भी आंगन में आया करती थी. बड़े चूल्हे पर धान को बर्तन में उबाला जाना फिर उससे उसना चावल बनाया जाना. स्मृति में ऐसी कई खुशबू है. नाक के साथ ये सब मन में भी बैठा हुआ है. जब भी फणीश्वर नाथ रेणु की यह वाणी सुनता हूँ - 'आवरण देबे पटुआ, पेट भरण देबे धान, पूर्णिया के बसैया रहे चदरवा तान...' तो नाक में अचनाक धान और पटुआ की खुशबू पहुंच जाती है! 

ऐसी ही एक सुगंध मूंग की खेती से भी जुड़ी है. मूंग के फसल की तैयारी के बाद जब उसे धूप में सुखाया जाता था और फिर जब उससे दाल बनाने का आयोजन होता था, उस वक्त की याद से भी एक ठोस सुगंध जुड़ा है. मूंग को आँच पर गरम करना फिर उसे जाँत में डालकर दाल बनाने के दौरान एक जादुई गंध नाक में बैठ जाती थी.

स्मृति में माटी की ऐसी कई खुशबू है, जिसे समेटकर हम गाम - घर करते रहते हैं. ऐसी स्मृतियों को लिखने से अधिक जीने की जरूरत है.

Friday, January 11, 2019

कदंब के नाम पाती

अब जब
तुम सब हो गए हो बड़े
अब जब
तुम्हारी बस गई है
अपनी बस्ती
तो अब खुलकर
बातें करो आसमां से,
बातों ही बातों में कभी
तुम सब छू लेना बादलों को
और
पूछना सूरज से कि
ऊंचाई से हरी पत्तियां
कैसी लगती है?
किसी पूर्णिमा की रात
करना चाँद से गुफ्तगू
बारिश के मौसम में
बादल के कोमल हाथों से
पहले स्नान का सुख
हमें बताना साथी...
यूँ ही सिर ऊंचा किए
हमसे भी कभी
गुफ्तगू करना साथी
और बताना
पतझड़-सावन-बसंत-बहार
की कहानी

#ChankaResidency

Saturday, December 15, 2018

गाम-घर और खेत -खलिहान

घंटों चुपचाप बैठना और फिर खेत तक टहलना, इन दिनों आदत सी बन गई है।गाछ-वृक्ष का जीवन देख रहा हूं, तालाब में छोटी मछलियों का जीवन समझ रहा हूं। तमाम व्यस्तताओं के बीच ख़ुद को कुछ दिन अकेला छोड़ देना, कभी कभी रास आने लगता है।

नीम का पौधा अब किशोर हो चला है। दो साल में उसकी लम्बाई और हरियाली, दोनों ही आकर्षित करने लगी है। इन्हें देखकर लगता है कि समय कितनी तेज़ी से गुज़र रहा है। लोगबाग से दूर गाछ-वृक्ष  के बीच जीवन का गणित आसान लगने लगता है।

कुछ काम जब अचानक छूट जाता है और दुनिया का अर्थशास्त्र जब ज़बरन आप पर धौंस ज़माने लगता है, उस वक़्त आत्मालाप की ज़रूरत महसूस होती है।

अहाते के आगे कदंब के पेड़ बारिश इस मौसम में और भी सुंदर दिखने लगे हैं। पंक्तिबद्ध इन कदंब के पेड़ को देखकर लगता है जीवन में एकांत कुछ भी नहीं होता है, जीवन सामूहिकता का पाठ पढ़ाती है।

पेड़-पौधों से घिरे अपने गाम-घर में जीवन स्थिर लगता है। पिछले कुछ दिनों से एक साथ कई मोर्चे पर अलग अलग काम करते हुए जब मन के तार उलझने लगे थे तब लगा कि जीवन को गाछ-वृक्ष की नज़र से देखा जाए। बाबूजी ने जो खेती-बाड़ी दी, उस पर काकाजी ने हरियाली की दुनिया हम लोगों के लिए रच दी,  अब जब सब पौधे वृक्ष हो चले हैं तो उसकी हरियाली हमें बहुत कुछ सीखा रही है।

खेत घूमकर लौट आया हूं, साँझ होने चला है, पाँव धूल से रंगा है। अपने ही क़दम से माटी की ख़ुश्बू आ रही है। पाँव को पानी से साफ़कर बरामदे में दाख़िल होता हूं, फिर एक़बार आगे देखना लगता हूं। हल्की हवा चलती है, नीम का किशोरवय पौधा थिरक रहा है। यही जीवन है, बस आगे देखते रहना है।

Tuesday, September 08, 2015

खेती-किसानी, बारिश-बाबूजी

पिता ऐसे पेड़ होते हैं, जिसकी जड़ें इतनी गहरी और मजबूत होती है कि हम उससे लिपटते चले जाते हैं और अंतत: उसमें खो जाते हैं। इस खो जाने का अपना आनंद है। पता नहीं, हर कोई इसमें खोना चाहता होगा कि नहीं लकिन मैं तो ऐसा जरुर चाहता हूं। खेती-किसानी करते हुए इस बारिश के मौसम में जब बाबूजी मुझसे बहुत दूर चले गए हैं तब उनकी जड़ों में लिपटने की चाह और बढ़ गयी है।

आज शहर से अपने गाँव जाते वक्त मेरी नजर एक बूढ़े शख्स पर टिक गयी जो लाठी के सहारे कदम बढ़ा रहा था. उम्र उसकी 80 के करीब होगी। लेकिन इसके बावजूद वो सात -आठ साल के एक लड़के को थामे था। वह बूढ़ा उस लड़के को सहारा दे रहा था कि वह लड़का उस बुजुर्ग को थामे था, यह तो मुझे नहीं पता लेकिन यह अहसास जरूर हुआ कि हम सब जड़ों में लिपटने की जुगत में रहते हैं। यही जुगत शायद जीने की आश को बचाए रखती है।


नहर के एक छोर पर उन दोनों को देखकर मुझे बाबूजी की याद सताने लगी। दरअसल हम सब स्मृति में जीवन तलाशते हैं। स्मृति की दूब हमेशा हरी बनी रहे, हम सब ऐसा सोचते हैं। कोई हमारे बीच से गुजरकर भी मन में एक पगडंडी बनाकर निकल जाता है, जिसकी लकीर पर हम जीवन भर चलते रहने की मंशा पाल बैठते हैं।  

लेकिन नियति जो चाहती, होता तो वही है। कबीर की वाणी ऐसे में मुझे याद आने लगती है। गाम का कबीराहा मठ मुझे खींचने लगता है। मैं खुद ही बुदबुदाने लगता हूं- कबीरा कुआं एक है..और पानी भरे अनेक..।

फिर जीवन में फकीर की खोज में लग जाता हूं तो कबीर का यह लिखा सामने आ जाता है-  "हद-हद टपे सो औलिया..और बेहद टपे सो पीर..हद अनहद दोनों टपे. सो वाको नाम फ़कीर..हद हद करते सब गए और बेहद गए न कोए अनहद के मैदान में रहा कबीरा सोय.... भला हुआ मोरी माला टूटी, मैं रामभजन से छूटी रे मोरे सर से टली बला..।"  

आज गाम-घर करते हुए यही सब सोचता रहा। इस बीच धूप की दुनिया बादलों में कब बदल गयी पता भी नहीं चला। अचानक खूब बारिश होने लगी। बारिश की कई यादें हैं मन के भीतर, कई कहानियां हैं, कई नायक-नायिकाएं हैं..लेकिन फिलहाल धान के खेत का कैनवास ही मन में घर बनाए हुए है।  

बारिश से धान के खेतों की हरियाली और भी मायावी दिखने लगती है। बाबूजी का अंतिम संस्कार मैंने उन्हीं धान के खेतों के मुंडेर पर किया, जहां वे फसलों से अपनी और हम सबकी दुनिया रचते थे। हमारी साल भर की रोजी-रोटी के लिए जी-तोड़ मेहनत करते थे। ट्रैक्टर से घंटों खेतों को समतल करते थे।

देखिए न उन खेतों में अब धान के संग कदम्ब अपनी कविता-कहानी हमें सुनाने की जिद कर रहा है। इस अहसास के साथ कि बाबूजी भी ये सब सुन रहे होंगे, मैं आंखें बंद कर उन्हें याद कर लेता हूं। यह जानकर कि मेरा यह भरम भी टूट जाएगा एक दिन...  

हर रोज शहर से गांव करते हुए इन दिनों एक साथ ऐसी ही कई चीजें मन में चलती है। तबियत ठीक नहीं रहने की वजह से लिखना कम हो गया है। ड्राइविंग और लेखन से थोड़ी दूरी बनाने को डाक्टर ने कहा है, दोनों ही अति-प्रिय चीज...जा रे जमाना..हर कुछ पर पाबंदी। डाक्टर भी न ..लेकिन करना तो वही होगा..। 

कम बारिश की वजह से खेती-बाड़ी इस बार मन माफिक नहीं होगी, ये पता है लेकिन इसके बावजूद हार मानने वाले हम हैं नहीं। बाबूजी अक्सर कहते थे- ‘ किसानी करते हुए निराशा के बादल खूब मंडारते हैं, उन बादलों को बस बरस जाने दो...।’ 

आज खेती-किसानी और बारिश के बहाने बस इतना ही।

Saturday, January 24, 2015

एक खत बसंत के नाम

सरसों के खेत में पंखुरी

ठंड जाती है तो तुम आ जाती हो, हां तुम ठीक समझ रही हो मैं तुम्हारी ही बात कर रहा हूं। तुम्हारी ही। हां, तुम्हारी ही। तुम बसंत हो। पीले रंग से मोहब्बत कराने की आदत तुम्हारी ही संगत से आई है। एक मौसम हजार अफसाने लिए जब तुम आती हो तो मैं पत्ते को छूकर कह देता हूं कि तुम आ गई हो। 

तुम सखी हो न, इसलिए आने की आवाज सुन लेता हूं। हल्की ओस के बूंद से पत्ते की चमक देखकर, तुम्हारी रंगत का पता चल जाता है। खेत में सरसों के पीले फूल के चारों ओर उड़ती तितलियां वाजिब ही कहती है कि तेरे रंग में ही नशा है, जिसमें डूबकर ही कोई तुझे पा सकता है।

तुम्हें याद है न बसंत, जब तुम्हें पहली बार मैं जान सका था। कुछ याद आ रहा है कि नहीं ?, अरे खेत के मंडेर पर चलते वक्त जब पहली बार सरसों के पौधे से हाथ मिले थे, एक सफेदी हाथ में लगी थी, पीले फूल स्याह काली कमीज
 से चिपक गए थे। मैं जानता हूं तुम मुझे देख रही थी। मेरी उमर कम थी लेकिन मन के उस कोने में तुमने दस्तक दे थी।

 मैं जानता हूं, तुम्हारे प्यार करने का अंदाज ऐसा ही होता है। हर साल तुम कम दिनों के लिए आती हो लेकिन जैसे ही आती हो रंग में मुझे सरोबार कर लेती हो। जानती हो तुम्हारे आने की आहट से ही मैंने मेंहदी हसन को जाना। तुम्हारी वजह से मैंने उनकी गजलों को समझा।

 अपने भीतर तुम्हारे होने के अहसास के बाद मैंने यह गजल सुनी-     “मुझे  तुम नजर से गिरा तो रहे हो , मुझे तुम कभी भी भुला न सकोगे,  न जाने मुझे  क्यूँ ये यकीन हो चला है,  मेरे प्यार को तुम मिटा न सकोगे..।” तुम अपने संग एक हवा लाती हो, जिसमें अजीब सा नशा होता है। कई बार पूछना चाहा कि क्या तुम भी नशा करती हो?

 रामचंदर को जानती हो न, जिसके साथ मैं बरसों पहले सरसों के खेत देखने गया था और उस पीले रंग के सफेदी के बहाने तुमसे मुलाकात हुई थी। उसीने बताया था कि तेरे साथ जो हवा आती है न उसमें गांजा से भी ताकतवर नशा है। एक ही कश में कोई भी बौरा सकता है?  मैं उसी नशे की बात कर रहा हूं।

 एक बात और जानती हो। गाम के ठाकुर स्थान का मंहत सरजनवा कहता है कि कबीर को जानने के लिए तुम्हें समझना जरुरी है। वैसे तो मैं सरजना की बातों में अक्सर उलझ जाता हूं लेकिन आज उसने तुम्हारे लिए जब यह कहा- “ न पल बिछुड़े पिया हमसे न हम बिछड़े पियारे से,  उन्हीं से नेह लागी है, हमन को बेकरारी क्या ?”  तो मैं सोच में पड़ गया। इस सवाल का भी इस बार तुम जवाब देना। 

Saturday, May 31, 2014

इस मोड़ से जाते है, कुछ सुस्त कदम रस्ते...

लंबे अंतराल के बाद आज लिखने बैठा हूं। वक्त इतनी तेज रफ्तार से बढ़ रहा है कि अंतराल का अहसास भी नहीं होता है। व्यस्तता दिन पर दिन बढ़ती चली जा रही है और इन व्यस्तताओं के बीच जाने कितना कुछ नया सीखने को भी मिल रहा है।

मुल्क में हुए आमचुनाव के बाद बहुतों के लिए बहुत कुछ बदल गया है तो बहुतों के लिए सबकुछ वैसा ही है जैसा पहले था। ऐसा लिखते हुए लगता है मानो दर्शन की बातें करना लगा हूं लेकिन सत्य से भला कौन पीछे हटा है और कौन हटने की हिम्मत करेगा।

सत्य को स्वीकारना भी साहस का काम है, ऐसा साहस सबके नसीब में कहां। गाम के मुसहर टोले में शाम ढलते ही लोगबाग के जीवन को देखता हूं तो उस साहस का अहसास होने लगता है। जिसके पास कुछ भी नहीं है, उससे जीवन से आनंद हासिल करने का पाठ पढ़ने को मिले तो लगता है अरे, हम तो नाहक ही परेशान थे अबतक। ये सबकुछ तो माया है।

कबीर का लिखा मन में बजने लगता है- “माया महाठगिनी हम जानी ..निरगुन फांस लिए कर डोलै, बोलै मधुरी बानी.....” ठीक उसी पल मन के रास्ते पंडित कुमार गंधर्व की भी आवाज भी कानों में गूंज लगती है- “भक्तन के भक्ति व्है बैठी, ब्रह्मा के बह्मानी…..कहै कबीर सुनो भाई साधो, वह सब अकथ कहानी”

कभी कभी लगता है क्या जीवन में कोई कथा संपूर्ण हो पाती है..। इस दौरान मुझे जीवन आंधी के माफिक लगने लगती है, सबकुछ उड़ता नजर आने लगता है। गाम के रामठाकुर स्थान से हारमोनियम की आवाज मध्यम गति से कानों तक पहुंचने लगती है। मैं अपने कमरे में बैठा की-बोर्ड पर खिटिर-पिटिर करने लगता हूं। सबकुछ अनायास ही होने लगता है।

एक अनुभूति होती है, किसी के होने का अहसास होता है। तब पता चलता है कि यह तो अपने होने का अहसास है। प्रसून जोशी का लिखा याद आने लगता है, जिसमें वे कहते हैं- "जब तेरी गली आया, सच तभी नज़र आया, मुझ में ही वो खुशबू थी, जिससे तूने मिलवाया...”

गाम में एक दिन किसी से बात हो रही थी तो उसके भीतर का भय मुझे सामने दिखने लगा। वह भय मौत को लेकर थी। मौत शायद सबसे बड़ी पहेली है, हम-सब उस पहेली के मोहरे हैं। जब गाम का पलटन ऋषि मौत और भय की बातें कर रहा था तो मुझे फ़िल्म 'आनंद' में कैंसर से जूझ रहे राजेश खन्ना और फिल्म में डाक्टर का किरदार निभा रहे अमिताभ बच्चन का संवाद याद आने लगता है, जिसमें राजेश खन्ना कहते हैं, "मौत तो एक पल है. मैं उस एक पल के डर से आने वाले लाखों पल का लुत्फ़ क्यों ना उठाऊं. जब तक ज़िंदा हूं, मरा नहीं. जब मर गया, तो साला मैं ही नहीं."

आज की रात लोक-परलोक की ऐसी कई बातें करने का मन कर रहा है। जीवन की राह पर हर राहगीर से बातें करने का मन कर रहा है। नदीम कासमी की बात याद आ रही है- रात भारी सही कटेगी जरुर, दिन कड़ा था मगर गुजर के रहा...। गुलजार भी याद आने लगे हैं ..उनका लिखा मन में गूंजने लगा है- 
"एक राह अकेली सी, रुकती हैं ना चलती है
ये सोच के बैठी हूँ, एक राह तो वो होगी
तुम तक जो पहुचती है
इस मोड़ से जाते है.. .."

Wednesday, March 19, 2014

'हरा' है सब, 'हारे' नहीं हैं और गर्मी की दस्तक...

आलू, सरसों उपजाने के बाद किसानी करने वाले अभी हरियाली में डूबे पड़े हैं। खेतों में मक्का लहलहा रहा है। किसानी करने वाले खुश दिख रहे हैं। लगातार मेहनत के बाद अभी कुछ दिन किसानों के लिए राहत का है।

लोगबाग का कहना है कि लगातार मेहनत से मन
हार जाता है लेकिन मक्का की हरियाली मन से हार को मिटाकर मन को हरा कर देती। होली के बाद हवा ने भी रुख बदला है, धूल ने हवा का साथ दिया और गर्मी ने इन दोनों के बीच अपने लिए जगह बनाकर दस्तक देने की कोशिश की है।

गाम घर में अभी उत्सव जैसा माहौल है। किसी न किसी के घर में भगैत या कीर्तन हो रहा है। वहीं कुतुबु्द्दीन चाचा जलसा करवा रहे हैं। धर्म की दीवार लोगों के बीच नहीं है, यह देखकर और इसे अनुभव कर अच्छा लगता है।

आम और लीची के पेड़ फलों के लिए तैयार हो रहे हैं। आम के मंजर मन के भीतर टिकोले और आम के बारे में सोचने को विवश कर रहे हैं। मन लालची हुआ जा रहा है। उन मंजरों में किड़ों ने अपना घर बना लिया है, मधुमक्खियां इधर-उधर घूम रही है।

बांस के झुरमुटों में कुछ नए मेहमान आए हैं। बांस का परिवार इसी महीने बढ़ता है। वहीं उसके बगल में बेंत का जंगल और भी हरा हो गया है। लगता है गर्मी की दस्तक ने उसे रंगीला बना दिया है। कुछ खरगोश दोपहर बाद इधर से उधर भागते फिरते मिल जाते हैं, वहीं गर्मी के कारण सांप भी अपने घरों से बाहर निकलने लगा है। जीव-जंतुओं का ग्राम्य संस्कृति में बड़ा दखल होता है, ऐसा मेरा मानना है।

ग्राम्य जीवन के 12 महीने की व्याख्या शब्दों में करना संभव नहीं है।  यहां जीवन हर पल बदलता है। अपना अनुभव कहता है कि किसान के भीतर मां होती है, जो 12 महीने फसल के रुप में बच्चों को पालती-पोसती है और फिर फसल को तैयार कर जब मंडी पहुंचाया जाता है तो बेटी की विदाई जैसा माहौल किसान के मन में तैयार हो जाता है। शायद ऐसी जिंदगी आप किसी पेशे में नहीं जीते हैं। किसानी में ही ऐसा संभव है।
दरअसल मैं किसानी को पेशा मानता हूं क्योंकि अभी भी तथाकथित विकसित समाज इसे पेशा मानने को तैयार नहीं है। कई लोग ऐसे मिले जो किसानी को मजबूरी कहते हैं।

वहीं किसानी में समय का अपना महत्व है या कहिए महामात्य है। हर कुछ समय पर होता है और मेहनत का फल भी समय पर मिल जाता है। गाम के कबीराहा मठ की ओर शाम में जब जाना होता है तो अंदर से साधो-साधो की आवाज गूंजने लगती है। मन ही मन बूदबूदाता हूं- धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय ।  माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय

जीवन की आपाधापी के बीच यार-दोस्त गाम में किसानी कर रहे अपने इस पागल दोस्त के यहां आ जा रहे हैं। जब भी दूर नगर-महानगर से कोई दोस्त यार आता है तो मन के भीतर हरियाली और भी बढ़ जाती है। मैं कबीर में खो जाता हूं और बस यही कहता हूं- 

दुख में सुमरिन सब करे, सुख में करे न कोय  
जो सुख में सुमरिन करे, दुख काहे को होय ॥

Tuesday, March 04, 2014

बस, रेणु के लिए

किसानी करते हुए 365 दिन का आंकड़ा पूरा हुआ। खेत-खलिहानों में अब मन रमने लगा  है। अहसास ठीक वैसे ही जैसे फणीश्वर नाथ रेणु का लिखा पढ़ते हुए और अपने गुलजार का लिखा बुदबुदाते हुए महसूस करता हूं।

देखिए न आज अपने रेणु का जन्मदिन भी है। वही रेणु जिसने गाम की बोली-बानी, कथा-कहानी, गीत, चिडियों की आवाज..धान-गेंहू के खेत..इन सभी को शब्दों में पिरोकर हम सबके सामने रख दिया और हम जैसे पाठक उन शब्दों में अपनी दुनिया खोजते रह गए। रेणु का लिखा जब भी पढ़ता हूं खुद से बातें करने लगता हूं। रेणु के बारे में जबसे कुछ ज्यादा  जानने-समझने की इच्छा प्रबल हुई, ठीक उस समय से पूर्णिया जिले की फिजा में धुले उनके किस्से इकट्ठा करने में लग गया। घाट-बाट में रेणु को ढूढ़ने लगा। 

किसानी करने का जब फैसला लिया, तब भी रेणु ही मन में अंचल का राग सुना रहे थे और मैं उस राग में कब ढ़ल गया, पता भी नहीं चला। गाम में रहते हुए रेणु से लगाव और भी बढ़ गया है। संथाल टोले का बलमा मांझी जब भी कुछ सुनाता है तो लगता है कि जैसे रेणु के रिपोतार्ज पलट रहा हूं। दरअसल रेणुकी जड़े दूर तक गांव की जिंदगी में पैठ बनाई हुई है। ठीक आंगन के चापाकल पर जमी काई (हरे रंग की, जिस पर पैर रखते ही हम फिसल जाते हैं..) की तरह।

रेणु ही थे जिनका मानना था कि ग्राम समुदायों ने तथाकथित अपनी निरीहता के बावजूद विचित्र शक्तियों का उत्सर्जन किया है। वे संथाली गीतों के जरिए कई बातें कहा करते थे। उन्होंने एक संथाली गीत के जरिए कहा था – “ जिदन संकु-संगेन , इमिन रेयो-लं सलय-एला। (सुख के जीवन के लिए, यहां आइए, यहां ढूंढ़ना है और पाना है..)

रेणु की यह पंक्ति मुझे गाम के जाल में उलझाकर रख देती है, मैं इस जाल से बाहर जाना अब नहीं चाहता, आखिर जिस सुख की खोज में हम दरबदर भाग रहे थे, उसका पता तो गाम ही है। मेरे यार-दोस्त इसे मेरा भरम मानते हैं :)    खैर।  

रेणु को पढ़कर ही डायरी और फिल्ड-नोट्स का महत्व समझ पाया। मुझे याद है सराय-सीएसडीएस के स्वतंत्र शोधार्थी के तौर पर जब टेलीफोन बूथों पर काम कर रहा था, तब सदन झा  सर ने फिल्ड-नोट्स तैयार करते रहने की सलाह दी थी, शायद वे रेणु की बात हम तक पहुंचा रहे थे। रेणु छोटे-छोटे ब्योरों से वातावरण गढ़ने की कला जानते थे। अपने ब्योरो, या कहें फिल्ड नोट्स को वे नाटकीय तफसील देते थे। मक्का की खेती और आलू उपाजकर जब मैं की-बोर्ड पर टिपियाना शुरु करता हूं तो तब अहसास होता है कि फिल्ड नोट्स को इकट्ठा करना कितना बड़ा काम होता है।

गाम के मुसहर टोले में पलटनिया ऋषिदेव के घर के सामने से जब भी गुजरता हूं तो लगता है जैसे रेणु की दुनिया आंखों के सामने आ गयी है। दरअसल उनका रचना संसार हमें बेबाक बनाता है, हमें बताता है कि जीवन सरल है, सुगम है..इसमें दिखावे का स्थान नहीं के बराबर है।  रेणु अपने पात्रों और परिवेश को साथ-साथ एकाकर करना जानते थे। वे कहते थे कि उनके दोस्तों ने उन्हें काफी कुछ दिया है। वे खुद लिखते हैं-

“इन स्मृति चित्रों को प्रस्तुत करते समय अपने लगभग एक दर्जन करीबी लंगोटिया यारों की बेतरह याद आ रही है। वे किसानी करते हैं, गाड़ीवानी करते हैं, पहलवानी करते हैं, ठेकेदार है, शिक्षक है, एमएलए हैं, भूतपूर्व क्रांतिकारी और वर्तमानकालीन सर्वोदयी हैं, वकील हैं, मुहर्रिर हैं, चोर और डकैत हैं। वे सभी मेरी रचनाओं को खोज-खोज कर पढ़ते हैं-पढवाकर सुनते हैं और उनमें मेरे जीवन की घटनाओं की छायाएं ढूंढ़ते हैं। कभी-कभी मुझे छेड़कर कहते हैं- साले उस कहानी में वह जो लिखा है, सो वहां वाली बात है न ?” (पांडुलेख से)


जरा इस कविता को पढ़कर रेणु के मानस को समझने की कोशिश करिए-
“ कहा सुना सब माफ करोगे, लेकिन याद रखोगे
बचपन के सब मित्र तुम्हारे, सदा याद करते हैं
गांव को छोड़कर चले गये हो शहर, मगर अब भी तुम 
सचमुच गंवई हो, शहरी तो नहीं हुए हो..
इससे बढ़कर और भला क्या हो सकती है बात
अब भी मन में बसा हुआ है इन गांवों का प्यार.......”

रेणु के साहित्य में डूबे रहने की आदत से ही पता चला कि मनुष्य की आकृति, रूप-रंग, बोलचाल, उसके व्यक्तित्व की वास्त्विक कसौटी नहीं है और न हीं बड़ी-बड़ी इमारतों से देश की प्रगति मापी जा सकती है। दरअसल बहुत बार जिन्हें हम भद्दा और कुरूप समझते हैं, उनमें मनुष्यता की ऐसी चिनगारी छिपी रहती है, जो भविष्य को भी जगमग कर सके। जैसा मैला-आंचल में रेणु ने बावनदास जैसे चरित्र को पेश किया। उपन्यास में बावनदास की मौत पर रेणु की मार्मिक टिप्पणी की है-“दो आजाद देशों की, हिंदुस्तान और पाकिस्तान की ईमानदारी को, इंसानियत को बावनदास ने बस दो ही डगों में माप लिया।“ (मैला आंचल पृष्ठ संख्या 320)

 आज रेणु के जन्मदिन पर मैं बस यही सब सोच रहा हूं। उनका लिखा पढ़कर मानस बना है और अब किसानी करते हुए रेणु के पात्रों से रुबरु हो रहा हूं। 


(पूर्णिया और अब अररिया जिले के औराही हिंगना गांव में आज के ही दिन यानि 4 मार्च 1921 में रेणु का जन्म हुआ था। । मेरे लिए रेणु तन्मयता से किसानी करने वाले लेखक हैं, क्योंकि वे साहित्य में खेती-बाड़ी, फसल, किसानी, गांव-देहात की बातें करते हैं।)

Saturday, February 22, 2014

बनते किसान की छोटी सी कहानी

आवरन देवे पटुआ, पेट भरन देवे धान, पूर्णिया के बसैय्या रहे चदरवा तान... फणीश्वर नाथ रेणु ने जब यह लिखा था तब पूर्णिया जिले के किसान इन्हीं दोनों (पटसन और धान) फसलों पर आश्रित थे और खूब खुश भी थे। लेकिन धीरे-धीरे किसानी का प्रारुप बदलने लगा। किसानी के इसी बदलते रंग-ढ़ंग के बीच हमने नौकरीपेशा जीवन को अलविदा कहते हुए किसानी को अपनाने की कोशिश की है। अपनी माटी से जुड़कर माटी के लिए ही  कुछ  करने के लिए हम दिल्ली-कानपुर होते हुए पहुंचे बिहार के पूर्णिया जिला। किसानी करते हुए अभी साल ही पूर हुए हैं लेकिन इतना विश्वास जरुर जगा है खेत-खलिहान का जीवन सबसे अनोखा होता है।  

पूर्णिया
जिला मुख्यालय से 25 किलोमीटर दूरी पर स्थित एक गांव है चनका यहां हमने किसानी के पारंपरिक रुप को बदलने की कोशिश की है। जिन खेतों में पहले केवल धान-गेंहू-मक्का आदि उपजाया जाता था वहां हम अब प्लाइवुड के लिए लकड़ी उपजाने लगे हैं। इसके साथ ही मिट्टी की उपजाऊ गुणवत्ता बनी रहे इसके लिए हम पारंपरिक खेती भी जारी रखे हैं।

दरअसल उत्तर भारत में किसान और किसानी के प्रति लोगों की धारणा अभी भी पुरानी ही है। कोई यह नहीं चाहता है कि उनके बाल-बच्चे किसानी को करियर बनाए जबकि यदि आपके पास पूंजी और जमीन के संग धैर्य है तो किसानी में काफी फायदा है। हमने इसी फायदे का गणित जोड़कर लकड़ी खेती की शुरुआत की। हमने खेतों में कदंब के पौधे बड़े स्तर पर लगाए। दो पौधों के बीच की दूरी हमने बीस फीट रखी है। इस दूरी की वजह से  हम उसी खेत में पारंपरिक खेती भी कर रहे हैं। मसलन धान के मौसम में धान और मक्का गेंहू के मौसम में मक्का-गेंहू भी उपजा रहे हैं।

शुरुआत में हमने केवल कदंब को इसीलिए चुना है क्योंकि कदंब केवल खेती के लिए ही नहीं बल्कि पर्यावरण के लिए भी महत्वपूर्ण है। जंगलों को फिर से हरा भरा करने, मिट्टी को उपजाऊ बनाने और सड़कों की शोभा बढ़ाने में कदंब महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह तेज़ी से बढ़ता है और से आठ वर्षों में अपने पूरे आकार में जाता है। इसलिए जल्दी ही बहुत-सी जगह को हरा भरा कर देता है। विशालकाय होने के कारण यह ढ़ेर-सी पत्तियाँ झाड़ता है जो ज़मीन के साथ मिलकर उसे उपजाऊ बनाती हैं।

 हमने खेती के आर्थिक महत्व को देखते हुए कदंब को प्रमुखता दी है। यह पौधा 10 से 12 साल के भीतर ही प्लाइवुड फैक्ट्री के लिए तैयार हो जाता है।  कदंब की कहानी ठीक वैसे ही है जैसे पहले पंजाब में बड़े स्तर पर पॉपलर की खेती हुआ करती थी। हालांकि अब वहां भी कदंब की खेती होने लगी है। गांव में इसे वन खेती का नाम दिया गया है। इसका एक फायदा यह भी है कि आपको जलावन समय-समय पर मिलता रहेगा। मसलन जब पेड़ की छटांई होगी किसान को जलावन मिलेगा।

कदंब के साथ-साथ हम सागवान के पौधे भी लगा रहे हैं। दरअसल किसानों में अब सागवान के पौधे लगाने का चलन बढ़ने लगा है। हम यहां किसानों को अधिक से अधिक वृक्षारोपण करने के लिए जागरूक कर हे  है, जिससे कि पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ किसानों को आर्थिक लाभ भी हो। सागवान का एक पौधा 80 रुपए या 100 रुपए के आसपास पड़ता है और 12-13 वर्ष में यह तैयार हो जाता है। तब प्रति पौधा किसानों को 25 हजार तक की आमदनी हो जाती है। वहीं खेतों के साथ-साथ भी इसे लगाया जा सकता है, क्योंकि इससे मृदा संरक्षण होता है और यह खेत या फसल को कोई नुकसान नहीं पहुंचाता। इसके पत्ते खेतों में गिरने के बाद गल कर जैविक खाद का कार्य करते हैं। इसकी देखरेख में भी खर्चा बहुत कम है।
वन खेती इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि देश में ऐसे 1,73,000 गांव हैं, जिनमें वन भूमि उपलब्ध है।

एक किसान के तौर पर मेरा मानना है कि वन खेती को सरकार ब़ढावा दे। यह
आर्थिक कारणों से काफी  लोकप्रिय हो रहा है। सागवान या कदंब का एक पौधा बैंक एफडी से ज्यादा रिर्टन दे रहा है।

इसकी कीमतें पिछले चार सालों में दोगुनी हो गई है। कदंब का एक पेड़ 3000 से 15000 रुपये तक बिकता है। वहीं इसका जलावन 600 रुपये क्विंटल तक बिकता है। यह किसान को सवार्धिक फायदा देने वाला पेड़ है। यदि आप केवल जलावन के लिए ही इसकी खेती करना चाहते हैं तो ज्यादा इंतजार भी नहीं करना होगा, केवल एक साल में जलावन के लिए कदंब तैयार हो जाता है।

इन सबके बीच 12 महीने पहले का चकमक जीवन भी याद आता है। सुबह नौ से शाम छह तक एसी कमरे में अपने सहकर्मियों के संग काटे कुल छह साल याद आते हैं। चाय-कॉफी के संग दुनिया जहान की बातें हम करते थे। लेकिन किसानी करते जो अनुभव हो रहा है वह उन बतकही से कोसों दूर है।

Tuesday, December 03, 2013

अंचल की रात और किसानी की बात

धान की तैयारी होने के बाद खेत में मकई बोने की तैयारी शुरु हो चुकी है। किसानी में जुटे लोग-बाग इन दिनों बहुत कुछ दांव पर लगा रहे हैं। नकदी फसल के रुप में पूर्णिया जिले में मकई का कोई जोड़ नहीं है। ट्रैक्टर की फटफट आवाज देर रात तक सुनाई दे रही है। किसानों के लिए यह महीना सबसे थकाऊ साबित होता है। आलू की फसल की पटवन के बाद मकई में पूरी ताकत झोंकी जा रही है। अंचल में दिन और रात का अंतर अभी पता नहीं चल पा रहा है। धूल-धूसरित शरीर और माटी में डूबा मन इन दिनों माटी की कविता कहानी में डुबकी लगा रहा है। 

धान की तैयारी होने के बाद किसानों के हाथों में कुछ पूंजी आ चुकी है। कोई भगैत करवा रहा है तो कोई ग्राम्य देवता की पूजा-अर्चना। गाम के रामठाकुर स्थान से देर रात तक ढोलक की थाप सुनाई देती है। पलटन ऋषि की आवाज और हारमोनियम की धुन कान तक जब पहुंचती है तो मन साधो-साधो करने लगता है। वहीं कबीर मठ से भी आवाज आ रही है। यह सब लिखते हुए मन बार-बार यह पूछ रहा है कि अंचल अब कैसा लग रहा है
?  सवाल सुनकर मन ही मन मुस्कुराता हूं और कबीर की पाती बुदबुदाने लगता हूं- कबीरा मन निर्मल भया, जैसे गंगा नीर......

पटवन और खाद-बीज के कर्ज में अबतक डूबे किसानी समाज धान की उपज से संतुष्ट है। कर्ज अदायगी के बाद उनका मन हरा दिख रहा है। नई फसल से उन्हें काफी उम्मीदें हैं। किसानी करते हुए मैं भी उम्मीदें करना लगा हूं J बेहतर कल के लिए।

अंचल की रात और यह लैपटॉप इन दिनों लिखते रहने की बात करने लगा है। फसल की तरह शब्दों की भी खेती करते रहने की सोचने लगा हूं। फिलहाल नहर के उस पार से कुछ आवाजें आ रही है। घड़ी की तरफ देखता हूं तो सुबह के तीन बज रहे हैं। भैंसवार की आवाज पहचान जाता हूं। पस्सर खोलने का समय है, भैंसवार गीत गा रहा है। आवाज में विरह है, बिना शास्त्रीय ज्ञान के ही भैंसवार हमें शास्त्रीय संगीत सुना रहा है। आंखों से नींद गायब है और मैं किसानी के संग रेणु की लिखी बातों में डूबने लगता हूं।

घर के आगे जूट के बोरे में धान को देखकर अनायस ही फणीश्वर नाथ रेणु की एक चिट्ठी का स्मरण हो जाता है। उसमें रेणु ने कोसी के इलाके में बलूहायी जमीन पर हो रही खेती का जिक्र करते हैं। वे लिखते हैं-  पिछले पंद्रह बीस वर्षों से हमारे इलाके उत्तर बिहार के कोसी कवलित अंचल में एक नई जिंदगी आ रही है। हरियाली फैल रही है..फैलती जा रही है बालूचरों पर। बंजर धूसर पर रोज रोज हरे पीले और धानी रंग मोटे ब्रश से पोते जा रहे हैं। 

सचमुच बंजर जमीन पर कदंब के संग धान-मक्का और गेंहू की खेती मुझे पेंटिंग ही लगती है। खेत मेरे लिए कैनवास बन जाता है और किसानी कर रहे लोग मशहूर पेंटर की तरह नजर आने लगते हैं। मन शांत हो जाता है, दुनियादारी कुछ पल के लिए थम सी जाती है।

खिड़की से बाहर झांकता हूं तो आसमान में अंतिम तारा सुबह के लिए व्याकुल हुए जा रहा है, चिड़ियों की हल्की चहचहाट सुनाई देने लगी है। किसान अब नए दिन की तैयारी में जुटने लगे हैं, आज खाद-बीज से खेत की दुनिया बदलनी है। सबकुछ जमीन पर।


सच कहूं तो रेणु का मैला आंचल अब आंखों में बस सा गया है। मुझे भी अपने कमरे से विशाल मैदान नजर आने लगा है। मैं भी अब कहना चाहता हूं- यही है वह मशहूर मैदान  नेपाल से शुरु होकर गंगा किनारे तक  वीरान, धूमिल अंचल. मैदान की सूखी हुई दूबों में चरवाहों ने आग लगा दी है  पंक्तिबद्ध दीपों  जैसी लगती है दूर से. तड़बन्ना के ताड़ों की फुगनी पर डूबते सूरज की लाली क्रमश: मटमैली हो रही है......