Showing posts with label गुलज़ारनामा. Show all posts
Showing posts with label गुलज़ारनामा. Show all posts

Thursday, March 13, 2008

मुंशी प्रेमचंद की कहानियाँ आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं जैसे सौ साल पहले थीं- गुलज़ार

गुलज़ार ने प्रेमचंद को कैसे जाना , बीबीसी से साभार ।

गिरीन्द्र

'प्रेमचन्द से जीवन में मेरी मुलाक़ात तीन बार हुई है, एक बार उस समय जब मैं ने अपने पिता को देखा कि वह मेरी तीसरी क्लास की उर्दू की किताब से माँ को एक कहानी सुना रहे हैं और दोनों रो रहे है.
ईदगाह पढ़ी तो लगा कि यह तो अपनी ज़िंदगी से बहुत क़रीब है, उसे पढ़ के एसा लगा कि अगर हम भी मेले गए होते तो मैंने भी हामिद की तरह चिमटा ही खरीदा होता.
वह कहानी प्रेमचंद की ‘हज्जे अकबर’ थी. उसके बाद मेरी माँ मुझे हमेशा वह कहानी पढ़ के सुनाने को कहती और पढ़ते पढ़ते हम इतना रोते कि कहानी अधूरी रह जाती. यह कहानी आज तक हम दोनों से पूरी पढ़ी ना जा सकी.
यह वह पल था जब मुंशी प्रेमचंद ने पहली बार मुझे छुआ. फिर ईदगाह पढ़ी तो लगा कि यह तो अपनी ज़िंदगी से बहुत क़रीब है, उसे पढ़ के ऐसा लगा कि अगर हम भी मेले गए होते तो मैंने भी हामिद की तरह चिमटा ही खरीदा होता.
प्रेमचंद से मेरी दूसरी मुलाक़ात कॉलेज में हुई जब मैंने कई अलग-अलग तरह के लेखकों को पढ़ा. प्रेमचंद को मैंने हिंदी और उर्दू दोनों में पढ़ा और उन्हें फिर से पढ़ा तो पता चला कि इसका एक और भी पहलू है, यानी सामाजिक पहलू.
अगर कोई किरदार ऐसा है तो क्यों है? यह है वह दूसरा लेवेल जहाँ हम प्रेमचंद से मिलते हैं.
प्रेमचंद से तीसरी बार उस समय मिला जब गोदान और ग़बन पर फिल्में बनीं, यानी एक फ़िल्मकार की हैसियत से अब जाकर हमारी मुलाक़ात प्रेमचंद से हुई.

हम किसी भी साहित्यकार से कई स्तर पर मिलते हैं, ग़ालिब से उस वक़्त मिले जब मौलवी साहब शेर पढ़ते और मतलब बताते और कहते कि चचा ने कहा है, उस समय ग़ालिब हमें चचा ही लगते थे, फिर जब बड़े होकर ग़ालिब को पढ़ा तो उनकी शख़्सियत हमारे ऊपर खुलती गई.

मुंशी प्रेमचंद की कहानियाँ आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं जैसे सौ साल पहले थीं.
यह बात एक लेखक के लिए प्रतिष्ठा की बात है कि उसकी कहानियाँ सौ वर्ष बाद भी जीवित हैं, लेकिन सामाजिक तौर पर यह अफ़सोसनाक बात है कि वे हालात अभी तक नहीं बदले, ग़रीबी अब भी वैसी ही है जैसी कि प्रेमचंद ने बयान की थी.
मैं प्रेमचंद को इसलिए भी क़रीब पाता हूँ क्योंकि मेरा और उनका हिंदू-मुसलमान का साझा कल्चर है. उनके यहाँ किसान किसान था, हिंदू या मुसलमान नहीं.
अब 'नमक का दरोग़ा' को ही ले लें, इस में दो सिपाही हैं वज़ीर ख़ान और बदलू सिंह, यहाँ सिपाही सिपाही है उसका हिंदू या मुसलमान होना नहीं नज़र आता है.
मेरी फ़िल्मों में भी ऐसा ही है, मेरी फिल्म 'लेकिन' में अमजद साहब जब नमाज़ पढ़ने जाते हैं तो उस वक़्त पता चलता है कि अच्छा यह मुसलमान हैं और इनकी बीवी हिंदू है, बड़ा ख़ूबसूरत है यह हमारा मिलाजुला कल्चर।

गुलज़ार

(साभार बीबीसी )

Monday, March 10, 2008

मुंशी जी आप विधाता तो न थे, लेखक थे- गुलज़ार

गुलज़ार ने प्रेमचंद से कहा -


मुंशी जी आप विधाता तो न थे, लेखक थे अपने किरदारों की क़िस्मत तो लिख सकते थे?'



'प्रेमचंद की सोहबत तो अच्छी लगती है


लेकिन उनकी सोहबत में तकलीफ़ बहुत है...


मुंशी जी आप ने कितने दर्द दिए हैं


हम को भी और जिनको आप ने पीस पीस के मारा है


कितने दर्द दिए हैं आप ने हम को मुंशी जी


‘होरी’ को पिसते रहना और एक सदी तक


पोर पोर दिखलाते रहे हो


किस गाय की पूंछ पकड़ के बैकुंठ पार कराना था


सड़क किनारे पत्थर कूटते जान गंवा दी


और सड़क न पार हुई, या तुम ने करवाई नही
‘धनिया’ बच्चे जनती, पालती अपने और


पराए भी ख़ाली गोद रही


आख़िरकहती रही डूबना ही क़िस्मत में है तो


गढ़ी क्या और गंगा क्या
‘हामिद की दादी’ बैठी चूल्हे पर हाथ जलाती रही


कितनी देर लगाई तुमने एक चिमटा पकड़ाने में


‘घीसू’ ने भी कूज़ा कूज़ा उम्र की सारी बोतल पी ली


तलछट चाट के अख़िर उसकी बुद्धि फूटी


नंगे जी सकते हैं तो फिर बिना कफ़न जलने में क्या है


‘एक सेर इक पाव गंदुम’, दाना दाना सूद चुकाते


साँस की गिनती छूट गई है
तीन तीन पुश्तों को बंधुआ मज़दूरी में


बांध के तुमने क़लम उठा ली


‘शंकर महतो’ की नस्लें अब तक वो सूद चुकाती हैं।


‘ठाकुर का कुआँ’, और ठाकुर के कुएँ से एक लोटा पानी


एक लोटे पानी के लिए दिल के सोते सूख गए


‘झोंकू’ के जिस्म में एक बार फिर ‘रायदास’ को मारा तुम ने



मुंशी जी आप विधाता तो न थे, लेखक थे


अपने किरदारों की क़िस्मत तो लिख सकते थे?'

हिंदुस्तान में दो दो हिंदुस्तान दिखाई देते हैं - गुलज़ार



आज गुलजार की नज़र से हिंदुस्तान को देखिये -


हिंदुस्तान में दो दो हिंदुस्तान दिखाई देते हैं
एक है जिसका सर नवें बादल में है

दूसरा जिसका सर अभी दलदल में है
एक है जो सतरंगी थाम के उठता है

दूसरा पैर उठाता है तो रुकता है
फिरका-परस्ती तौहम परस्ती और गरीबी रेखा

एक है दौड़ लगाने को तैयार खडा है
‘अग्नि’ पर रख पर पांव उड़ जाने को तैयार खडा है

हिंदुस्तान उम्मीद से है!
आधी सदी तक उठ उठ कर हमने आकाश को पोंछा है

सूरज से गिरती गर्द को छान के धूप चुनी है
साठ साल आजादी के…

हिंदुस्तान अपने इतिहास के मोड़ पर है

अगला मोड़ और ‘मार्स’ पर पांव रखा होगा!!
हिन्दोस्तान उम्मीद से है..

Monday, March 03, 2008

मौत तू एक कविता है,

यह गुलज़ार की कविता है। आप बस इसमे खो जायें वैसे गुलज़ार ने इस कविता को हिन्दी फ़िल्म "आनंद" में डा। भास्कर बैनर्जी नामक चरित्र के लिये लिखा गया था। इस चरित्र को फ़िल्म में अमिताभ बच्चन ने निभाया था।
ये रही कविता -

मौत तू एक कविता है,
मुझसे एक कविता का वादा है मिलेगी मुझको
डूबती नब्ज़ों में जब दर्द को नींद आने लगे
जर्द सा चेहरा लिये जब चांद उफक तक पहुचे
दिन अभी पानी में हो, रात किनारे के करीब
ना अंधेरा ना उजाला हो, ना अभी रात ना दिन
जिस्म जब ख़त्म हो और रूह को जब साँस आऐ
मुझसे एक कविता का वादा है मिलेगी मुझको