मुझे आदमी का सड़क पार करना हमेशा अच्छा लगता है क्योंकि इस तरह एक उम्मीद - सी होती है कि दुनिया जो इस तरफ है शायद उससे कुछ बेहतर हो सड़क के उस तरफ। -केदारनाथ सिंह
Friday, April 16, 2010
गुलजारगी...आवारगी...हर कुछ मेरे गुलजार में
आओ सारे पहन लें आईने.. सारे देखेंगे अपना ही चेहरा..सबको सारे हंसी लगेंगे यहाँ ! गुलजार के शब्द मौजू होते हैं। आप याद करें, जब गुलजार के ये शब्द आपके कानों में आते हैं-
दो सोंधे सोंधे जिस्म जिस वक़्त..एक मुट्ठी में सो रहे थे..
लबों की मद्धिम तबील सरगोशियों में साँसें उलझ गयी थीं...,
सोचिए कैसा महसूस करते हैं आप। वे शब्दों की जादूगरी नहीं करते बल्कि आम बोलचाल के शब्दों के सहारे हमारी-आपकी बातों को सामने रख देते हैं।
तुतलाते छोटे बच्चे के लिए जब गुलजार लिखते हैं -
चंद तुतलाते हुए बोलो में आहट सुनी
दूध का दांत गिरा था तो भी वहां देखा
बोस्की बेटी मेरी ,चिकनी सी रेशम की डली
लिपटी लिपटाई हुई रेशम के तागों में पड़ी थी
मुझे एहसास ही नही था कि वहां वक्त पड़ा है
पालना खोल के जब मैंने उतारा था उसे बिस्तर पर
लोरी के बोलों से एक बार छुआ था उसको
बढ़ते नाखूनों में हर बार तराशा भी था ..
यह सब पढ़ते हुए हम-आप खो जाते हैं बचपन की यादों में। यादों और आज की बातों को कोई भी पढ़ना, सुनना और गुनगुनाना पसंद करेगा। गुलजार इस बात को भली-भांती जानते हैं। जब आप कामकाजों से तंग आ जाते हैं, बेहद व्यस्त हो जाते हैं, अपने लिए समय नहीं निकाल पाते तो झल्ला उठते हैं। लेकिन गुलजार साब यहां नब्ज पकड़ते हैं और कामना करते हैं-
बड़ी हसरत है पूरा एक दिन इक बार मैं अपने लिए रख लूँ
तुम्हारे साथ पूरा एक दिन बस खर्च करने की तमन्ना है !
गुलजार के शब्दों की माला गजब की होती है। उनकी नज्मों को कई अर्थों में समझा जा सकता है। आज और अभी उनकी दो नज्मों को पढिए..और खुद के अंदर के मानुष को टटोलिए...
पूर्ण सूर्यग्रहण
कॉलेज के रोमांस में ऐसा होता था
डेस्क के पीछे बैठे बैठे
चुपके से दो हाथ सरकते
धीरे धीरे पास आते...
और फिर एक अचानक पूरा हाथ पकड़ लेता था
मुट्ठी में भर लेता था।
सूरज ने यों ही पकड़ा है चाँद का हाथ फलक में आज।
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तुझे ऐसे ही देखा था कि...
तुझे ऐसे ही देखा था कि जैसे सबने देखा है
मगर फिर क्या हुआ जाने...
कि जब मैं लौटकर आया
तेरा चेहरा मेरी आँखों में रोशन था
किसी झक्कड़ के झोंके से गिरी बत्ती
बस एक पल का अँधेरा फिर
अचानक आग भड़की
और हर एक चीज़ जल उठी।
Saturday, June 06, 2009
पिया तोरा कैसा अभिमान... और फिर किसी मौसम का झोंका था..
चार-पांच दिन पहले की बात है। मयूर विहार में अपने दोस्त के यहां पहुंचा था। टीवी ऑन किया तो रितुपर्णो घोष की अजय देवगन और ऐश्वर्या राय को लेकर बनाई फिल्म रेनकोट शुरु ही हो रही थी।ऋतपर्णो घोष गुलज़ार साहब को 'गुलज़ार भाई' कहते है और उनकी खास फरमाइश पर गुलज़ार साहब ने खुद अपनी लिखी नज़्म को अपनी आवाज़ दी है, आप भी पढ़िए। यकीन है आपने सुना भी होगा।
Thursday, May 07, 2009
इक जरा छींक ही दो तुम, तो यकीं आए कि सब देख रहे हो
गुलजार साब भगवान से भी बात करते हैं और उनसे सवाल भी पूछते हैं। पढिए कैसे कृष्ण से गुलजार बात करते हैं-चिपचिपे दूध से नहलाते हैं
आंगन में खड़ा कर के तुम्हें ।
शहद भी, तेल भी, हल्दी भी, ना जाने क्या क्या
घोल के सर पे लुंढाते हैं गिलसियां भर के
औरतें गाती हैं जब तीव्र सुरों में
मिल कर पांव पर पांव लगाये खड़े रहते हो
इक पथरायी सी मुस्कान लिये
बुत नहीं हो तो परेशानी तो होती होगी ।
जब धुआं देता, लगातार पुजारी
घी जलाता है कई तरह के छौंके देकर
इक जरा छींक ही दो तुम,
तो यकीं आए कि सब देख रहे हो ।
Tuesday, February 24, 2009
इतने अरसे बाद" हेंगर "से कोट निकाला ......

गुलजार साब, नमक इश्क का और जय हो कहने वाले गुलजार साब। अभी उनकी हर जगह जय हो हो रही है, जरी वाले रहमान के साथ। वैसे यह कोई नई बात नहीं है। उनकी जय तब से हो रही है, जब उन्होंने कहा था- मोरा गोरा अंग लई ले.....। खैर, अभी उनकी त्रिवेणी में डूबकी लगाकर तृप्त होने की कोशिश करें।
गिरीन्द्र
इतने अरसे बाद" हेंगर "से कोट निकाला
कितना लंबा बाल मिला है 'कॉलर "पर
पिछले जाडो में पहना था ,याद आता है
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आओ सारे पहन लें आईने
सारे देखेंगे अपना ही चेहरा
सबको सारे हंसी लगेंगे यहाँ !
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सामने आए मेरे देखा मुझे बात भी की
मुस्कराए भी ,पुरानी किसी पहचान की खातिर
कल का अखबार था ,बस देख लिया रख भी दिया
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