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Sunday, April 03, 2011

यहां सबके सब एक्सपर्ट थे


     
युव-राज
एक विश्वकप और हजार अफसाने, दिन शनिवार और आशा एक शानदार रविवार की। क्रिकेट की दीवानगी क्या होती है, इसे चाहने वाले किस कदर हो-हल्ला में भी जुनून खोजते हैं, इसे शनिवार रात और फिर रविवार की दोपहरी को जाना। जब डगमगाई पारी को संभालने कप्तान महेंद्र सिंह धोनी क्रम तोड़कर वानखेड़े में दाखिल हुए तो ऐसा लग रहा था कि बिना फार्म का यह कप्तान क्या हर भारतीय के सपने को साकार कर पाएगा? शुरुआत में बेहद धीमे वे बल्ले को गेंद से मेल-मुलाकात करवा रहे थे, मानो गेंद कोई अजनबी हो बल्ले के लिए। लेकिन कुछ ही पल में स्क्रिप्ट ही चेंज हो गई। धोनी का बल्ला बोलने लगा। ऐसा लग रहा था मानो धोनी ने अबतक सबकुछ आज के लिए बचाकर रखा हो। पसीने से लथपथ, थकान से चूर लेकिन बल्ला बदस्तूर फर्राटे मार रहा था और अंत में जब इस खिलाड़ी ने छक्का लगाया तो मानो पूरा मुल्क कुछ पलों के लिए शीशे की गिलास में डूब गया हो, सचमुच यह क्रिकेट प्रेमियों के लिए जश्न की रात थी।



अब अपनी कहानी, शनिवार मेरे लिए घोषित छुट्टी होती है, मतलब साप्ताहिक अवकाश। इसलिए कभी-कभार क्रिकेट का लुत्फ उठाने वाला शख्स भी शनिवार को अंतिम ऑवर में ही टीवी स्क्रीन के करीब पहुंचा, उससे पहले अपने ढेर सारे काम निपटाए, शाम में अपने हाथों से लजीज सेंडविच तैयार की और फिर हमदोनों ने उसका आनंद लिया। रात में ब्लू जर्सी वालों की जीत पर हम भी मुस्कुराए लेकिन कानपुर के सिविल लाइंस स्थित कृष्णा टॉवर की नौवीं मंजिल पर इससे बढ़कर बहुत कुछ हो रहा था। यहां जीत के लिए एक-एक रन का हिसाब हमारे सहकर्मी ले रहे थे।

क्रिकेट के तंदरूस्त जानकार दोस्तों ने चैनल युगी एक्सपर्ट की तरह टिप्पणी रसीद रहे थे। हमारे एक सहकर्मी पुनीत भाई इन सारी वारदातों को अपने मोबाइल में कैद कर लिया था। रविवार को मैंने इसका भरपूर आनंद उठाया। जैसे ही धोनी ने छक्का जड़ा हमारे दीपक मिश्रा भाई भावुक हो गए। वीडियो को देखकर ऐसा लगा मानो वे जन्म-जन्मांतर से इस पल का इंतजार कर रहे थे। एक पक्के क्रिकेट आशिक की तरह उन्होंने कहा- ये कांबली के आंसूओं का हिसाब है (युवराज की विजयी आंसू पर उनकी टिप्पणी)। जब दीपक भाई यह बोल रहे थे तब उनकी आवाज भर्रायी से जान पड़ रही थी। वे एक-एक खिलाड़ी को टीवी स्क्रीन पर देखकर सटीक टिप्पणी कस रहे थे। वहीं शायद धोनी की बल्लेबाजी पर मय़ंक भाई ने कहा- सारे मिथक टूट गए.....।

हमारे एक अन्य सहकर्मी अरुण त्रिपाठी सेंसर बोर्ड को एक किनारे करते हुए कंमेट्री कर रहे थे। वे पूनम पांडे को खोज रहे थे, शायद वे पाकिस्तान फोन लगाने की बात कर रहे थे, लेकिन उन्होंने एक अहम टिप्पणी भी की, जिसमें उन्होंने कहा- अब चैनलों और अखबारो में यादों के लिए ट्रॉफी लिए कपिल देव नहीं दिखाए जाएंगे....।  


पुनीत भाई के सौजन्य से ऑफिस चालीसा देखकर यह विश्वास हो गया कि हां, इस मुल्क में एक धर्म और है, और वह है क्रिकेट। तभी मेरी नजर फेसबुक पर
अजय ब्रह्मात्‍मज  की पोस्टिंग पर गई-


‘’ इंडिया जीत गया, भारत रीत गया। प्‍लीज, इस जीत में 1 अरब 21 करोड़ भारतीयों को बगैर उनकी सहमति के शामिल न करें। करोड़ों को तो मालूम ही नहीं कि उन्‍हें किस जीत में शामिल बताया जा रहा है। इस जीत में देश की भारी हार छिपी है। मुझे 'पार' के नौरंगिया और रमा याद आ रहे हैं। वे बिहार की हिंसा से भाग कर कलकत्‍ता पहुंचे है। वहां 1983 के वर्ल्‍ड कप का जश्‍न मनाते लोग उन्‍हें छेड़ते हैं। आज 2011 में वह छेड़खानी पूरे देश से हो रही है। देश के कोने-कोने में मीडिया केजरिए रंग में भंग डाल रहे नौरंगिया और रमा को छेड़ा जा रहा है। मुमकिन है कोई फिल्‍मकार अपनी स्क्रिप्‍ट में इस छेड़खानी को दर्ज कर रहा हो।

अजय जी की यह टिप्पणी हमें कई चौराहों पर सोचने के लिए मजबूर करती है। तभी नजर ब्रजेश झा के स्टेट्स गई –


भारत जीता तो हमसब झूम उठे हैं। सड़कों पर हैं। पर, दूसरा पक्ष भी है। 73 वर्ष के अन्ना हजारे भ्रष्टाचार मिटाने व जनलोकपाल बिल के लिए 5 अप्रैल से भूख हड़ताल पर जा रहे हैं। उनकी इच्छा है कि देश की जनता आगे आए। यकीनन, हमें उनके साथ राष्ट्रधर्म निभाने के लिए आगे आना चाहिए। आप क्या सोचते हैं ? ”

Wednesday, March 30, 2011

क्रिकेट, कबीर और गुलजार

मोहाली का माहौल दिल की धड़कनों में धड़क रहा था। क्रिकेट से आशिकी न होने के बावजूद भी ईएसपीएन क्रिकइनफो पर आंखें टिकी थी। टीवी स्क्रीन से दूरी बना रखा था ताकि अंखिया सग मन की दूरी बनी रहे। सचिन के रनों की संख्या जोड़ रहा था। ऑफिस भी मोहाली स्टेडियम की तरह क्रिकेट में रमा था। काम से थोड़ी दूरी बनाए रखने की वजह से तमाम वेबसाइट्स की गलियों में दस्तक दे रहा था।

भारत और पाकिस्तान के बीच हो रहे मैच के प्रति लोगों की सोच अजीब होती है। सभी की आंखों में अजीब सी चमक नजर आ रही थी, वहीं मैं कबीर, फैज अहमद फैज और गुलजार में खोया था। यूट्यूब पर गुलजार बोल रहे थे- “आंखों को वीजा नहीं लगता, सपनों की सरहद नहीं होती, बंद आखों से रोज मैं सरहद पार चला जाता हूं मिलने मेंहदी हसन से।“  गुलजार को सुनते हुए लग रहा था मैं भी पड़ोस के मुल्क में अजहर मियां के यहां चाय पी रहा हूं। अजहर मियां से मेरी मुलाकात किशनगंज में हुई थी। वे लाहौर में रहते हैं। किशनगंज के ईरानी बस्ती पर डॉक्यूमेंट्री बनाने  वे पहुंचे थे। तब मैं दसवीं  में पढ़ाई कर रहा था। बस आधे घंटे की मुलाकात में उन्होंने मुझे लाहौर की गलियों में पहुंचा दिया था। आज गुलजार को सुनते हुए अजहर चाचा याद आ गए। मैं भी गुनगुनाने लगा सपनों की सरहद नहीं होती....

क्रिकेट एडिक्ट न होने के बावजूद भी सचिन तेंदुलकर की बल्लेबाजी से इश्क है। उनके शतकों पर नजर टिकी रहती है। मोहाली में वे 85 रन बनाकर पवेलियन लौट गए। मैं निराश हुआ, काश वे शतक ठोंक पाते। उन्हें अजमल भाई ने अफरीदी भाई के हाथों कैच करवाया। खैर, क्रिकेट जारी है, दोनों मुल्कों के वजीर-ए-आला भी नजर-ए-इनायत कर रहे हैं।  

इकबाल बानो की गायकी से मुहब्बत रखने वाले जानते हैं कि फैज उनके पसंदीदा शायर थे। इस विद्रोही शायर को जब जिया उल हक की फौजी हुकूमत ने कैद कर लिया, तब उनकी शायरी को अवाम तक पहुंचाने का काम इकबाल बानो ने खूब निभाया था। अपने मुल्क को भी करप्शन खा रहा है। लोकपाल बिल के समर्थन में पांच अप्रैल से समाजसेवी अन्ना हजारे अनशन पर जा रहे हैं। ऐसे में मुझे फैज की शायरी याद आ रही है। यूट्यूब के सहारे इकबाल बानो की आवाज में हम देखेंगे लाज़िम है कि हम भी देखेंगे वो दिन कि जिसका वादा है.. सुनने लगा। इसे सुनते हुए खो चुका था।

दरअसल जब हम एक साथ कई चीजों को आजमाते हैं तो खुद के साथ एक्सपेरिमेंट करने का सबसे अधिक मौका मिलता है। हम खुद को जान पाते हैं कि हम कहां हैं और कहां तक जा सकते हैं। कबीर के दोहे का ख्याल आया। कबीर के दोहों को जगजीत सिंह के अलावा आबिदा परवीन ने भी आवाज दी हैं। मैं कबीर में खोना चाहता था, यूट्यूब ने साथ दिया। मैं बुदबुदाने लगा, पंछी को छाया नहीं फल लागे अति दूर...दुर्लभ मानुष जन्म है...., पक्का फल जो गिर पड़ा लगे न दूजी बार..काशी काबा एक है एक है राम रहीम...... अच्छे दिन पीछे गए....  अब पछताए होत क्या जब चिडिया चुग गई खेत...

भारतीय बल्लेबाज मोहाली में स्कोर बोर्ड पर रन जोड़ने के लिए स्ट्रगल कर रहे थे। 42 ओवर में छह विकेट के नुकसान पर 205 रन ही जुटा सका था। लगता है क्रिकेट प्रेमियों के लिए आज की रात कयामत की रात होगी।

Friday, March 25, 2011

यूं होता तो क्या होता


आंख में भी जीत
फेसबुक के दोस्तों में एक और चैनल आईबीएन 7 से जुड़े पंकज श्रीवास्तव  के स्टेटस पर जरा गौर करें- भारत की जीत पर खुश होना लाजिमी है। लेकिन पागल होने का क्या मतलब ? ये अखबारों और चैनलों में कुचल दो, मिटा दो, जला दो की भाषा क्या संकेत करती है? ये कैसा खेल है जो खेलभावना की हत्या के साथ शुरू होता है ?....क्या बिल गेट्स की इस बात को दरकिनार कर देना चाहिए कि भारत में बड़ी तादाद में लोग टीबी से मर रहे हैं, लेकिन यहां क्रिकेट का बुखार चढ़ा है।“ 

मैं खुद क्रिकेट एडिक्ट नहीं हूं। मुझे इस खेल से अधिक गीतों से लगाव है। लेकिन
इस खेल को लेकर समाचार चैनलों की भाषा से मुझे सख्त नफरत है। चैनलों में हेडिंग हिंसक हो जाते हैं, तब मन विचलित हो जाता है और रिमोट के बटन पर दर्शक अत्याचार करने लगता है। इस पोस्ट को लिखते वक्त मन 360 डिग्री के कोण पर नाच रहा है, वह स्थिर नहीं हो पा रहा है। अजीब लगता है कि पैसे के खेल का जश्न, भूखे पेट सोने वाला रामू भी मना रहा है। मेरा रामू भूखा है फिर भी धोनी के धुरंधर (चैनल/अखबारी शब्द) पर फिदा है। वह इनके लिए मकबूल फिदा बन जाना चाहता है।

खैर
, मैं विषयांतर होता जा रहा हूं। मैं रिकी पोंटिंग की बात करना चाहता हूं। क्रिकेट की दुनिया का सफलतम कप्तान, जिसके लिए जीत एक भूख है, जीत एक जश्न है, एक ऐसी भूख, जिसे मिटाने के लिए वह और उसकी सेना सारे दांव-पेंच लगा सकती है। लेकिन गुरुवार की रात उसके अश्वमेध यज्ञ के घोड़े को नीली जर्सी वाली सेना ने रोक लिया और फिर पूरे मुल्क में विजयी सेना और उसके सेनापति की जय-जयकार होने लगी।

फेसबुक और तमाम सोशल नेटवर्किग साइट्स पर गुरुवार के खेल पर टिप्पणियों की बारिश हो रही थी। फेसबुक पर सभी के वॉल मैदान सरीके नजर आ रहे थे। फेसबुक पर मेरे दोस्त और जागरण प्रकाशन के टेबलॉयड आईनेक्स्ट से जुड़े प्रभात गोपाल झा जी ने लिखा -
PONTING KA CHEHRA KAISA LAG RAHA THA...(पोंटिंग का चेहरा कैसा लग रहा था )। उनकी इस टिपप्णी पर अलग-अलग टेस्ट की ढेरों प्रतिक्रियाएं आईं। एक ने लिखा-उजड़ा चमन। मैंने भी हिम्मत कर टिप्पणी छोड़ी- एक यौद्धा की तरह, जिसने जीवन में केवल जीत को अपना लक्ष्य बनाया हो, याद कीजिए, गेंद को रोकने के चक्कर में उसकी ऊंगली में चोटच लग गई थी, गंभीर चोट , तो भी उसने हार नहीं मानी, मैदान में डटा रहा। मैं क्रिकेट एडिक्ट नहीं हूं लेकिन रिकी पोंटिंग के जज्बे से जरूर सीख लेता हूं, अंत तक आप जीत को लेकर आशान्वित बनें रहे हैं। यह जज्बा लाइफ के हर फिल्ड में आजमा सकते हैं।


दरअसल प्रभात जी के स्टेटस पर लिखते हुए मेरे दिमाग में विजयी सेनापति का मनो-स्वभाव छंलागें लगा रहा था। बात यह है कि मुझे पोंटिंग के जुनून से इश्क है। मैंने पोंटिंग के जुनून की क्लिपिंग गुरुवार को भी मैदान में देखी। वह और उनकी टीम कंगारुओं की तरह कुलाचे मार रही थी। गेंद सीधे उनके हाथों में आ रहे थे और जो नहीं आना चाह रहे थे उसे वे जबरन अपने हाथों में कैद कर रहे थे।

भले ही नीली जर्सी वालों ने मैच को अपने नाम कर लिया लेकिन पोंटिग की सेना भी हर पल जीत के करीब आने के लिए जी-जान से मेहनत कर रही थी।
पोंटिंग के जज्बे को मैं क्रिकेट से ऊपर मानता हूं। मेरे लिए वे हार-जीत से आगे हैं। भले ही आप उनकी आलोचना करें लेकिन मैं तो गालिब के बहाने यही कहूंगा – 
      
          “ना था कुछ तो खुदा था, कुछ ना होता तो खुदा होता डूबोया मुझको होने ने, ना होता मैं तो क्या ... ना होता