पंजाब की राजनीति इन दिनों चुनावी होती जा रही है। हर दल अपने अपने अंदाज में चुनावी कथा सुना रहा है। इन सबके बीच खबर आ रही है कि पंजाब की राजनीति के दो पुराने साथी अब फिर से गठबंधन करने जा रहे हैं। हालांकि अभी यह बस बात है, बात पक्की है कि कच्ची, यह तो बाद में पता चलेगा।
राजनीति के अंदरखाने की खबर है कि भारतीय जनता पार्टी और शिरोमणि अकाली दल अब फिर से गठबंधन करने जा रहे हैं। यदि ऐसा होता है तो पंजाब में बड़े फेरबदल की शुरूआत होती दिखेगी। अभी से ऐसी बातें सुनने को मिल रही है कि पंजाब में पुरानी दोस्ती फिर से रंग ला रही है।
राजनीति कब करवट लेती है, यह केवल आलाकमान को ही पता रहता है, बाद बाकी लोगबाग सूत्रों के नाम पर बातें करते आए हैं। लेकिन यह सच है कि भाजपा ने 2027 के चुनावों के लिए शिरोमणि अकाली दल से एक बार फिर से हाथ मिलाने का मन बना लिया है।
पंजाब के जानकार साथी बता रहे हैं कि दोनों के बीच सीटों की डील भी हो चुकी है, बस दिवाली तक का इंतजार करना होगा।
पंजाब चुनाव की सरगर्मियों के बीच दीपावली के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बठिंडा दौरे पर आ सकते हैं। इस दौरान मोदी सीमावर्ती पंजाब को बड़ी सौगात दे सकते हैं। वहीं अकाली दल बादल के साथ गठबंधन का भी एलान होने की संभावना जताई जा रही है। गौरतलब है कि बठिंडा मालवा क्षेत्र का प्रमुख राजनीतिक केंद्र है और बादल परिवार का भी इस क्षेत्र में मजबूत प्रभाव रहा है। ऐसे में यहां प्रधानमंत्री की मौजूदगी से भाजपा अपने चुनावी अभियान को धार देने के साथ गठबंधन की संभावनाओं को भी सियासी संदेश में बदल सकती है।
पंजाब भाजपा ने प्रधानमंत्री के दौरे और रैली के लिए केंद्रीय नेतृत्व से समय मांगा है। 15 से 20 नवंबर के बीच रैली की तारीख तय होने की संभावना है।
उधर, अंदरखाने की खबर है कि गठबंधन की डील लगभग पक्की हो चुकी है और फिलहाल सीटों के बंटवारे पर बातचीत चल रही है। शर्त यह रखी गई है कि पंजाब में अगर सरकार बनती है, तो मुख्यमंत्री की कुर्सी अकाली दल के खाते में जाएगी। इस बार भाजपा पहले से ज्यादा यानी 35 से 40 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतार सकती है, जबकि बाकी बची 67 सीटों पर अकाली दल चुनाव लड़ेगा। याद रहे, 1997 से 2017 तक बीजेपी सिर्फ 23 सीटों पर ही चुनाव लड़ती थी, लेकिन इस बार भाजपा बराबरी का हक मांग रही है।
कुछ दिन पहले ही गृह मंत्री अमित शाह ने 2027 में पंजाब में NDA की सरकार बनने का दावा किया था, जिससे इस गठबंधन की बात पुख्ता हो गई है।
चर्चा थी कि अकाली दल से अलग हुए बागी गुट (जैसे अकाली दल पुनर्सुरजीत) भी इस गठबंधन का हिस्सा बन सकते हैं, लेकिन अब ऐसा होना मुश्किल लग रहा है। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि यह गुट अभी तक एक रजिस्टर्ड पार्टी नहीं बन पाया है। ऐसे में उन्हें चुनाव लड़ने के लिए भाजपा या अकाली दल के चुनाव चिह्न का ही सहारा लेना पड़ेगा।
गठबंधन होते ही अकाली दल को केंद्र सरकार में बड़ा तोहफा मिल सकता है। सुखबीर बादल की पत्नी हरसिमरत कौर बादल को एक बार फिर से मोदी कैबिनेट में मंत्री बनाया जा सकता है। रवनीत बिट्टू के हटने के बाद से केंद्र में पंजाब का कोई प्रतिनिधित्व नहीं है, इसलिए चुनाव से पहले यह पंजाब के वोटरों को लुभाने का एक बड़ा मास्टरस्ट्रोक हो सकता है।
अकाली दल के मुखिया सुखबीर सिंह बादल ने भी इस गठबंधन को लेकर साफ इनकार नहीं किया है। उन्होंने हाल ही में बड़ा बयान देते हुए कहा था कि कांग्रेस और आम आदमी पार्टी उनके सबसे बड़े दुश्मन हैं, लेकिन जिनकी सोच उनसे मेल खाती है, उनके लिए गठबंधन के दरवाजे हमेशा खुले हैं। उनकी पत्नी हरसिमरत कौर भी पहले ही इसके साफ इशारे दे चुकी हैं।
बीते कुछ दिनों से पर्दे के पीछे चली बातचीत के बाद, दोनों दलों के नेताओं ने गठबंधन पर हामी भरी। कभी सहयोगी रहे और फिर एक-दूसरे के विरोधी बन गए इन दलों ने अगले साल होने वाले पंजाब विधानसभा चुनाव के लिए अपने गठबंधन की रूपरेखा तय कर ली है। इस संबंध में जल्द ही कोई घोषणा की जा सकती है।
इससे पहले खबर आ रही थी कि भाजपा गठबंधन में बड़े भाई की तरह रहना चाहती है लेकिन शायद ऐसा होता नहीं दिख रहा है। शिरोमणी अकाली दल ही बड़े भाई का रोल अदा करेगी। माना जा रहा है कि भाजपा अब मान गई है कि उसे अकाली दल की बैसाखियों की जरूरत है।
इससे पहले केंद्रीय सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता राज्य मंत्री और रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (अठावले) के राष्ट्रीय अध्यक्ष रामदास अठावले ने पंजाब की राजनीति को लेकर चंडीगढ़ में बड़ा बयान दिया था। उन्होंने कहा था कि यदि पंजाब में शिरोमणि अकाली दल (शिअद) और भाजपा के बीच गठबंधन होता है तो आगामी विधानसभा चुनाव में जीत पक्की है।
गौरतलब है कि केंद्र के तीन कृषि कानूनों को लेकर विवाद के बाद सितंबर 2020 में अकाली दल ने NDA से नाता तोड़ लिया था। बाद में केंद्र सरकार ने इन कृषि कानूनों को वापस ले लिया था।
2022 के पंजाब विधानसभा चुनाव में दोनों पूर्व सहयोगी दलों ने अलग-अलग चुनाव लड़ा था। चुनाव परिणामों ने दोनों पार्टियों के सामने खड़ी राजनीतिक चुनौतियों को उजागर कर दिया था।
अलग-अलग चुनाव लड़ने का खामियाजा दोनों दलों को भुगतना पड़ा। अकाली दल को जहां 18.38 प्रतिशत वोट मिलने के बावजूद केवल तीन सीटें मिलीं, वहीं भाजपा 6.60 प्रतिशत वोट हासिल कर सिर्फ दो सीटें जीत सकी।
जानकारों का मानना है कि भाजपा और अकाली दल के एक साथ आने से एनडीए को चुनावी लाभ मिल सकता है। इससे अकालियों के पारंपरिक ग्रामीण और सिख वोट बैंक के साथ भाजपा के शहरी तथा हिंदू वोट बैंक को एक मंच पर लाने का अवसर मिलेगा।
दूसरी ओर, यदि भाजपा और अकाली दल के बीच चुनाव पूर्व गठबंधन नहीं होता है तो विपक्षी वोटों के बंटवारे का फायदा कांग्रेस को मिल सकता है।
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