पश्चिम बंगाल में अगले कुछ महीनों के अंदर विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। माना जा रहा है कि अप्रैल में दो-तीन चरणों में मतदान कराए जा सकते हैं। राज्य में सत्तारुढ़ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) और मुख्य विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) आमने – सामने है। दोनों ही इस बार सत्ता हासिल करने के लिए दम-खम के साथ ग्राउंड में जुटी हुई है।
मुख्य विपक्षी दल भाजपा ने इसके लिए तैयारियां शुरू कर दी हैं तो वहीं लगातार चौथी बार सत्ता में वापसी के लिए टीएमसी ने भी कमर कस ली है। ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी ने इसके लिए बड़ी तैयारी की है और वह इन दिनों राज्य में यात्रा पर निकले हुए हैं। वे इस बार पूरा बंगाल ही मथने के प्लान में हैं। अपनी यात्रा में वह पूरे बंगाल के हर जिले तक पहुंचने में लगे हैं। यह यात्रा इसलिए भी अहम है क्योंकि इसी दौरान अभिषेक बनर्जी टीएमसी के विधायकों का फीडबैक भी जनता से लेंगे। ऐसे में यह यात्रा इस चीज को भी तय करेगी कि किसे चुनाव में टिकट मिलेगा और किसे नहीं। इसके अलावा उन सीटों पर भी वह कार्यकर्ताओं और जनता से फीडबैक लेंगे, जहां भाजपा के विधायक हैं। टीएमसी का प्लान यह है कि यदि किसी विधायक के खिलाफ ऐंटी-इनकम्बैंसी लोकल लेवल है तो उसे रिप्लेस कर दिया जाए। पार्टी नहीं चाहती कि किसी एक नेता या विधायक से नाराजगी का असर चुनाव जीत की संभावनाओं पर पड़े।
पूरे सूबे में विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक सरगर्मी तेज हो गई है। बुधवार को पुरुलिया के हुड़ा थाना क्षेत्र स्थित लधुड़का के चंडेश्वर मैदान में आयोजित एक विशाल जनसभा को संबोधित करते हुए तृणमूल कांग्रेस के सांसद अभिषेक बनर्जी ने भारतीय जनता पार्टी पर जमकर हमला बोला।
उन्होंने दावा किया कि आगामी चुनाव में भाजपा राज्य में 50 सीटों के भीतर सिमट जाएगी और पुरुलिया जिले की सभी सीटों पर उसे हार का सामना करना पड़ेगा।
इस चुनाव में एक बार फिर अभिषेक बनर्जी टीएमसी को भीतरखाने से लीड करते दिख रहे हैं। दरअसल अभिषेक बनर्जी की पार्टी में भूमिका लगातार बढ़ती जा रही है। साल 2021 के बाद उन्हें राष्ट्रीय महासचिव का पद मिला। साल 2023 की यात्रा ने उन्हें पश्चिम बंगाल में स्थापित किया। साल 2024 लोकसभा चुनाव से पहले इंडिया गठबंधन की बैठक में वह हर जगह ममता बनर्जी के साथ नजर आने लगे। अगस्त 2025 में ममता बनर्जी ने उन्हें लोकसभा में टीएमसी का नेता बना दिया। अब उनके समर्थक कहते हैं कि ममता बनर्जी हो सकता है कि धीरे-धीरे राज्य की कमान अभिषेक बनर्जी को सौंप दें।
पश्चिम बंगाल में मार्च-अप्रैल 2026 में विधानसभा चुनाव के मद्देनजर टीएमसी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी ने अपनी राज्यवापी 'अबार जिते बांगला' की शुरुआत की है। इस नारे का मतलब है, बंगाल फिर जीतेगा। अभिषेक बनर्जी इस महीने के शुरुआत से ही बंगाल के अलग-अलग जिलों में घूम रहे हैं। वह रोड शो कर रहे हैं, जनसभाएं कर रहे हैं और लोगों से सीधे संवाद कर रहे हैं। अटकलें लग रहीं हैं कि अब ममता बनर्जी, राज्य में उन्हें बड़ी जिम्मेदारी देना चाहती हैं, कोलकाता में लोग तो यह भी कहने लगे हैं कि ममता दीदी इसी टर्म में उन्हें अपनी राजनीतिक विरासत सौंप सकती हैं।
अभिषेक बनर्जी, टीएमसी के युवा चेहरे हैं। वह मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के राजनीतिक वारिस हैं। पार्टी में वह नंबर दो की हैसियत रखते हैं। बंगाल घूमते हुए वह ममता सरकार की उपलब्धियां गिना रहे हैं। वह ममता सरकार की कल्याणकारी योजनाओं को जनता तक पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं और साथ ही भाजपा पर हमला तेज किए हुए हैं।
टीएमसी में अभिषेक बनर्जी मतलब सत्ता की चाभी भी है। राज्य में उनकी पहचान ममता बनर्जी के भतीजे होने से जुड़ा है। लोगबाग तो यहां तक कहते हैं कि ‘ममता बनर्जी ऑफिस’ की तरह एक ऑफिस ‘अभिषेक बनर्जी’ का भी है जो सत्ता को नियंत्रित करता है।
अभिषेक बनर्जी ने अपने पॉलिटिकल कैंपेंन के जरिए पार्टी में अपनी अलग पहचान बनाई है। शुरुआती अभियानों में उन्होंने अपनी अलग छवि बनाई, अक्सर ममता के भरोसेमंद सहयोगी के रूप में देखे गए, लेकिन अब पार्टी के भीतर वे एक निर्णायक भूमिका गढ़ते हुए नजर आ रहे हैं।
पार्टी के भीतर समीकरणों को साधने और पुराने नेताओं के साथ मतभेदों के बीच संतुलन बनाने की उनकी क्षमता ने उनकी पकड़ मजबूत की है। 2024 के लोकसभा चुनावों में उम्मीदवारों के चयन, जैसे अपेक्षाकृत नए चेहरों को मौका देना, उनकी रणनीतिक समझ और राजनीतिक परंपराओं को चुनौती देने की इच्छा दिखाता है।
गौरतलब है कि 2021 के विधानसभा चुनावों में अभिषेक तृणमूल के नंबर-दो नेता के रूप में उभरे और जल्द ही पार्टी के महासचिव बने। उस चुनाव में टीएमसी ने 213 सीटें जीतकर ऐतिहासिक जीत दर्ज की, जबकि भाजपा 77 सीटों पर सिमट गई। वोट शेयर के लिहाज से भी तृणमूल ने 47.9 प्रतिशत के साथ रिकॉर्ड बनाया। 2016 में पार्टी ने 211 सीटें और 44.9 प्रतिशत वोट शेयर हासिल किया था।
पश्चिम बंगाल के रायगंज इलाके में एक बुजुर्ग से बातचीत हो रही थी। उन्होंने बताया कि ‘लोग भले अभिषेक बनर्जी को टीएमसी का नेता मानते हों लेकिन हम लोग उन्हें पार्टी का मैकेनिक मानते हैं। क्योंकि उन्हें पता है कि कैसे वोटरों को पार्टी से जोड़ा जा सकता है।’
अभिषेक बनर्जी मतदाताओं से जुड़ने वाली कहानियां गढ़ने में माहिर हैं। हाल-फिलहाल चुनाव आयोग की कार्रवाइयों पर उनकी आपत्ति इसी रणनीति का हिस्सा है, वे इन्हें सिर्फ प्रशासनिक मुद्दा नहीं, बल्कि बंगालियों की पहचान पर खतरा बताते हैं। केंद्र की नीतियों को दमनकारी बताकर वे बंगाल की अस्मिता को पार्टी का मुद्दा बनाना चाहते हैं।
टीएमसी में अभिषेक बनर्जी की भूमिका स्पष्ट हो रही है। संगठनात्मक फैसलों और राष्ट्रीय मुद्दों पर अभिषेक की बेबाक राय से पता चलता है कि ममता उन्हें भविष्य के नेतृत्व के रूप में स्थापित कर रही हैं। 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने 18 सीटें जीतकर टीएमसी को कड़ी चुनौती दी थी। लेकिन, 2021 विधानसभा चुनाव में टीएमसी ने 294 में से 213 सीटें जीतकर जोरदार वापसी की। 2024 के लोकसभा चुनाव में भी टीएमसी की बढ़त बरकरार रही। मगर, भाजपा का वोट शेयर भी खत्म नहीं हुआ। अब दो दलों के बीच सीधा मुकाबला है। देखते हैं कि बंगाल की जनता इस बार किसके हाथ सत्ता की चाभा सौंपती है, टीएमसी या भाजपा ?
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