Thursday, March 04, 2021

रेणु के बहाने : पलायन, राजनीति और किसानी...आज के हिरामन की तीन कसमें

खेत में जब भी फसल की हरियाली देखता हूँ तो लगता है कि रेणु हैं, हर खेत के मोड़ पर। उन्हें हम सब आंचलिक कथाकार कहते हैं लेकिन सच यह है कि वे उस फसल की तरह बिखरे हैं जिसमें गांव-शहर सब कुछ समाया हुआ है। उनका कथा संसार आंचलिक भी है और शहराती भी। यही कारण है कि रेणु आंचलिक होकर भी स्थानीय नहीं रह जाते। लेकिन जरा सोचिए, यदि इस दौर में रेणु होते तो क्या सोचते ? क्या होती उनकी तीन कसमें? महामारी, संक्रमण, देश-काल की राजनीति को यदि वे देखते – भोगते तो क्या वे पटना से हमेशा के लिए औराही लौट आते? क्या वे फिर से चुनाव लड़ते? क्या वे भी नई वाली हिंदी की बात करते या फिर वह भी निकालते किसान मार्च!

आज रेणु को याद करते हुए हम सब उनके साहित्य, जीवन और तमाम चीजों पर गुफ्तगू कर रहे हैं लेकिन आज हम आपको रेणु की ही बोली बानी में बताएंगे कि यदि फणीश्वर नाथ रेणु आज होते तो पलायन, राजनीति और किसानी मुद्दे पर क्या कहते....

दृश्य -एक
लोग महानगरों से लौट रहे हैं, हर दिन अखबार में पढ़ रहा हूँ कि महामारी, लॉकडाउन की वजह से नौकरी गंवाने वाले लोग अपने गाँव शहर लौट रहे हैं। सच कहूँ तो दुख होता है, लेकिन फिर सोचता हूँ कि लौटने वाले लोग घर ही तो लौटे हैं। मैं स्वार्थी हो गया हूँ शायद। मेरे टोले में लोगबाग लौट आएंगे तो चहल-पहल बढ़ जाएगी। गाँव मुर्दा तो नहीं लगेगा.. । फिर सोचता हूँ पलायन का दंश झेलना वाला यह अंचल अपनी माटी के लोगों का किस तरह स्वागत करेगा। क्या रोजगार का सृजन स्थानीय स्तर पर संभव है? क्या इस सदी में मैं फिर यह कह पाउंगा कि ‘आवरण दैवे पटुआ, पेट भरन देबे धान, पूर्णिया के बसैय्या रहे चदरवा तान...’
सच कहूँ तो औराही के आसपास का जीवन भी अब बदल चुका है लेकिन उम्मीद तो मैं बेहतर कल के लिए ही करूंगा न। आशा है लौट रहे लोग अपने अंचल को संवारेंगे। मुझे परती परिकथा का अपना नायक जितेंद्र याद आ रहा है, वह भी तो लौटा था, उसके पास पुरखे की जमीन जायदाद थी लेकिन उनका क्या जिसके पास एक धूर जमीन भी नहीं है...जा रे जमाना....

दृश्य- दो
दरअसल बात ऐसी हुई कि पुलिस की लाठी से एक छात्र का सिर फट गया। उस समय पुलिस वालों को माइक पर आदेश दिया जा रहा था माइल्ड लाठी चार्ज का, जिसका मतलब होता है लाठी कमर के नीचे लगनी चाहिए, और इधर कई लड़के बुरी तरह घायल हो गए थे। मुझे याद है, उन्हें बचाने के लिए जयप्रकाश जी भी अपनी जीप से कूद आए और मैं भी लपका। जिस लड़के के सिर में चोट आई थी, वह लड़खड़ा कर गिरने लगा तो मैंने आगे बढ़कर उसे अपनी बांहों में ले लिया। मेरे सारे कपड़े उसके खून से तर हो गए। लोगों ने समझा यह मेरा खून है। कुछ भी हो, खून तो खून ही होता है- मेरा हो चाहे किसी और का...। आपको बताता चलूं कि यह घटना 74 की है। मन से कहूं तो राजनीति मेरे बस की बात नहीं। चुनाव भी लड़ा, जमानत जब्त हुई। आंदोलनों में भी बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया लेकिन सच कहूं तो मन टूट गया था। 74 में मुझे देह से अधिक चोट हृदय में लगी, बहुत बड़ी चोट है यह! अब तो मुखिया के चुनाव में भी धनबल का जोर दिखता है, विधायक की तो बात ही छोड़िए। लेकिन क्या यह सब सोचकर जो जहाँ है, वहीं चुप बैठ जाए? नहीं, यह उचित नहीं होगा। नए सवेरे की आशा है। मन है अपने गाम में एक आश्रम खोल दूं लोगों को स्वराज की बात कहूं, पता है लोग मजाक बनाएंगे लेकिन मुझे पता है कि मैं लोकतंत्र का मजाक नहीं उड़ा रहा हूं। क्या मेरे आश्रम में कोई जनप्रतिनिधि आएंगे, मेरी बात सुनने या फिर आएंगे केवल चुनाव के वक्त....मुझे अपनी ‘चुनावी लीला’ याद आने लगी है...

दृश्य-तीन
किसान हर दौर में प्रासंगिक रहे हैं और रहेंगे। आप इस कौम को दबा नहीं सकते। आज किसान आंदोलन की बात हर घर में हो रही है, यदि कोई चुप है तो जान लें, वक्त सबसे हिसाब मांगता है। मुझे आज यह सोचकर हंसी आ रही है कि मैंने कभी यह लिखा था कि एक बीघा खेत में खेती कर लेना पाँच लेख और पाँच कहानियां लिखने से ज्यादा फायदेमंद है। अफसोस होता है, कि यह मैंने कैसे लिख दिया। किसान और हिंदी लेखन दोनों की स्थिति देखकर निराश हो जाता हूँ। मैं फसलों की बुआई या कटाई के समय गाँव आ ही जाता था। अब लगता है कि उस गुजरे वक्त में मैंने गाँव को कम समय दिया। हिंदी लेखन को अधिक दिया। वैसे 1949 में मैंने एक किसान यात्रा का नेतृत्व किया था। मेरे गाँव औराही हिंगना से शुरू हुई इस यात्रा में 550 किसान शामिल हुए थे। 13 दिनों तक पैदल चलकर हम सब पटना पहुँचे थे। मैं पटना पहुंचते ही बीमार हो गया। आज जब दिल्ली से और देश के अलग-अलग हिस्सों से किसान आंदोलन को लेकर खबरें सुनने को मिलती है तो मैं अपने पुराने दिनों को याद करने लगता हूँ।

और चलते-चलते..
खेती-बाड़ी करते हुए इस धरती के धनी कथाकर-कलाकार से मेरी अक्सर भेंट होती है, आप इसे मेरा भरम मान सकते हैं लेकिन जब भी रोज की डायरी लिखने बैठता हूँ तो लगता है फणीश्वर नाथ रेणु खड़े हैं सामने। छोटे-छोटे ब्योरों से लेखन का वातावरण गढ़ने की कला उनके पास थी। रेणु को पढ़ते हुए गांव को समझने की हम कोशिश तो कर ही सकते हैं। रेणु पर सोचते हुए अक्सर एक चीज मुझे चकित करती रही है कि आखिर क्या है रेणु के उपन्यासों - कहानियों में जो आज के डिजिटल युग में भी उतना ही लोकप्रिय है, जितना पहले थे।

परती परिकथा का परानपुर कितने रंग-रूप में रेणु हमारे सामने लाते हैं। गांव की बदलती हुई छवि को वे लिख देते हैं। वहीं मैला आंचल का मेरीगंज देखिए। हर गांव की अपनी कथा होती है, इतिहास होता है। इतिहास के साथ वर्तमान के जीवन की हलचल को रेणु शब्दों  में गढ़ देते हैं। गांव की कथा बांचते हुए रेणु देश और काल की छवियां सामने ला देते हैं।

रेणु अपने साथ गांव लेकर चलते थे। इसका उदाहरण 'केथा' है। वे जहां भी जाते केथा साथ रखते। बिहार के ग्रामीण इलाकों में पुराने कपड़े से बुनकर बिछावन तैयार किया जाता है, जिसे केथा या गेनरा कहते हैं। रेणु जब मुंबई गए तो भी 'केथा ' साथ ले गए थे। दरअसल यही रेणु का ग्राम है, जिसे वे हिंदी के शहरों तक ले गए। उन्हें अपने गांव को कहीं ले जाने में हिचक नहीं होती थी। वे शहरों से आतंकित नहीं होते थे. रेणु एक साथ देहात -शहर जीते रहे, यही कारण है कि मुंबई में रहकर भी औराही हिंगना को देख सकते थे और चित्रित भी कर देते थे। रेणु के बारे में लोगबाग कहते हैं कि वे ग्रामीणता की नफासत को जानते थे और उसे बनाए रखते थे।

गिरीन्द्र नाथ झा 

( रेणु जन्मशती पर दैनिक भास्कर में प्रकाशित) 




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