Saturday, January 17, 2009

आहटे फिर से आने लगी हैं

लगभग दो साल पहले पटना मे पवन श्रीवास्तव से मिला था, कवि हैं। उस समय मैंने उनकी एक कविता सुनी , और उसे नोट भी किया था। आज पुराने पन्नों से फिर पवन याद आ गये -

आहटे फिर से आने लगी हैं

कोशिशें सुगबुगाने लगी हैं

कोई आवाज देने लगा है

चुप्पियां गुनगुनाने लगी हैं

कोई हलचल है सागर के तल में

किश्तियां डगमगाने लगी हैं

देखना कोई आंधी उठेगी

चीटिंया घर बनाने लगी हैं।”

4 comments:

Vinay said...

सुन्दर भाव वाली रचना, पढ़कर अच्छा लगा

---मेरे पृष्ठ
गुलाबी कोंपलें । चाँद, बादल और शाम । तकनीक दृष्टा/Tech Prevue । आनंद बक्षी

संगीता पुरी said...

बहुत सुंदर रचना।

Udan Tashtari said...

कभी हमसे भी मिल लो तो शायद कविता छाप दो और हम धन्य हो जायें. :)

अच्छी रचना.

तरूश्री शर्मा said...

वाह...बढ़िया कविता है। बहुत सुंदर... और वैसा ही प्रवाह।