उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, बिहार और कर्नाटक में 28 सीटों पर विधान परिषद (एमएलसी) के चुनाव हुए। इन चुनावों में एनडीए ने शानदार प्रदर्शन किया। इन 28 में से 16 सीटें पर एनडीए को जीत मिली है। कांग्रेस को सिर्फ 1 सीट पर जीत हासिल हुई, जो महाराष्ट्र के नागपुर से मिली है। हालांकि, वाराणसी और नागपुर में भाजपा की हार पार्टी के लिए एक सीख है कि उसे अपने भीतर झाँकना होगा!
इससे पहले, बुधवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक्स पर ट्वीट करते हुए कांग्रेस पर तंज कसा था और लिखा कि बैलेट पेपर पर चुनाव होने के बावजूद कांग्रेस हार गई।
वैसे गौर करने की बात यह भी है कि यूपी एमएलसी चुनाव में प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में भाजपा को बड़ा झटका लगा है। पिछले चुनाव में भी सपा ने भाजपा को हराकर दोनों सीटें जीती थीं। सपा ने अपने प्रत्याशियों को रिपीट किया था। शिक्षक सीट पर सपा के लाल बिहारी यादव ने भाजपा के प्रमोद कुमार मिश्रा को प्रथम वरीयता में चार हजार से ज्यादा वोटों से हराया।
गौरतलब है कि चुनाव आयोग ने देश के विभिन्न राज्यों में विधान परिषद की कुल 28 सीटों के लिए चुनाव घोषित किए थे। इसमें कांग्रेस की झोली में एक सीट आई।
कर्नाटक में सरकार होते हुए भी कांग्रेस सभी चारों सीट हार गई। कर्नाटक में हाल ही में पार्टी ने अपना मुख्यमंत्री बदला है, उसे जोर का झटका लगा है। पार्टी ने सिद्धारमैया को हटाकर डी के शिवकुमार को कुर्सी सौंपी। शिवकुमार की पहचान एक आक्रामक नेता और बड़े संगठनकर्ता की है, पर उनके नेतृत्व में पार्टी चारों सीट हार गई। भाजपा-जेडीएस गठबंधन ने सभी सीटों पर बाजी मार ली है। तीन पर भाजपा और एक पर जेडीएस को जीत मिली है। यह तब हुआ, जब राज्य में भारतीय जनता पार्टी संगठन की हालत ठीक नहीं है और पार्टी अध्यक्ष विजयेंद्र को लेकर भारी धड़ेबंदी है। क्या कांग्रेस ने सिद्धारमैया को हटाकर राजनीतिक गलती की है? यह सवाल अब पूछा जा सकता है।
वहीं बिहार से भाजपा के लिए अच्छी खबर नहीं है। प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी एक नए विकल्प के तौर पर उभर रही है। प्रशांत ने पहले बांकीपुर में भाजपा की जमीन छिटकाई और अब विधान परिषद चुनाव में एक सीट जीतकर उन्होंने भविष्य के संकेत दे दिए हैं। राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस बिहार में अब बैकफुट पर दिखने लगी है। भाजपा के लिए चिंता की बात यह है कि पटना और दरभंगा जैसी जगहों में वोटर उससे छिटकते दिख रहे हैं। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बिहार से आते हैं और पहले उनके द्वारा खाली की गई बांकीपुर विधान सभा सीट पर हुए उपचुनाव में भाजपा हारी और अब एमएलसी चुनाव में पटना में भाजपा की हार हुई! जबकि राज्य में भाजपा के मुख्यमन्त्री हैं!
महाराष्ट्र विधान परिषद चुनावों में बड़ा उलटफेर हुआ है। कांग्रेस ने चौंकाते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और भाजपा के अभेद्य गढ़ नागपुर में जीत दर्ज की है। कांग्रेस के उम्मीदवार अभिजीत वंजारी ने लंबी चली मतगणना के बाद भाजपा के उम्मीदवार सुधाकर कोहले को हरा दिया। नतीजों के बाद कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने बीजेपी के खिलाफ नारे लगाए। इससे माहौल काफी गरमा गया। महाराष्ट्र में कुल पांच विधान परिषद की सीटों के चुनाव में विपक्षी गठबंधन महाविकास अघाड़ी (MVA) ने तीन पर जीत हासिल की जबकि सत्तारूढ़ बीजेपी और शिवसेना को एक-एक सीट मिली।
बात अगर यूपी की विस्तार से करें तो वहां भाजपा को समाजवादी पार्टी से टक्कर मिलती दिख रही है। उत्तर प्रदेश की राजनीति को सलीके से देखने वाले हमारे मित्र जितेन्द्र चतुर्वेदी फेसबुक पर लिखते हैं- "अखिलेश यादव ने भाजपा को रुला दिया है। कमाल का राजनीतिक कौशल दिखा रहे हैं। वे विरोधी को चौका रहे हैं,
छका रहे हैं। गोरखपुर में वे गजब खेले हैं। अंतिम समय में उन्होंने टिकट बदला था। कमलेश यादव की जगह संजय त्रिपाठी को दिया। आखिर यह दांव सपा प्रमुख ने क्यों चला? इसका सीधा सा जवाब है उन्होंने माप लिया कि कौन किस पाले में खड़ा है। दूसरा ब्राह्मण उतरा कर चुनाव को रोचक बना दिए। इस लिहाज से कि कितना BJP के पाले में गिरता है। तीसरा, अपनी राजनीतिक ताकत भी दिखा दी।
BJP को सजग हो जाना चाहिए। वे जिस अखिलेश से मुकाबिल है वह अलग अखिलेश है। प्रयोगधर्मी अखिलेश है। सियासत में जितना प्रयोग अखिलेश कर रहे हैं उतना शायद ही कोई राजनेता कर रहा होगा। वे इन दिनों जिस गठजोड़ को साधने में जुटे हैं यदि वह सध गया तो BJP बाहर हो जाएगी। इसलिए जरूरत इस बात की है कि बीजेपी फूंक फूंक कर कदम रखे।"
ऐसा अनायास नहीं कहा जा रहा है। यूपी की धुरी गोरखपुर और बनारस में सपा खेल कर रही है। एक जगह वह हार कर भी जीत जाती है। और प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र में कमाल कर देती है। यह इस बात का प्रणाम है कि सपा मजूबत हुई है।
हमने जब जितेन्द्र से इस मसले पर बात की तो उन्होंने कहा कि राज्य में फिलहाल समीकरण बीजेपी के खिलाफ चला गया है। पहले अंदाजा लगाया जा रहा था। अब साफ हो गया। जाति की बात करें तो बनिया तक टूटा है। कारण चंपत राय को टार्गेट करना। पश्चिम से वे आते हैं। आगरा में देखिए क्या हुआ? भाजपा से ब्राह्मण भी टूटे हैं। उतना नहीं। लेकिन सबसे ज्यादा चौका रहे हैं क्षत्रिय। वे सिंह से बाहर नहीं जा रहे हैं। यानि पार्टी से ज्यादा सरनेम। गोरखपुर और बनारस में साफ दिखा।
तीसरा जो प्रबुद्ध है उसमें इतना जातीय विभाजन तो नीचे क्या होगा? इसका अनुमान लगाया जा सकता है। सबसे बड़ी बात यह है कि गोरखपुर और बनारस में दुर्गति हो गई। सत्ता के दोनों केन्द्र पर भाजपा का ये हाल ठीक संकेत नहीं है।
गोरखपुर मंडल में तकरीबन 30 सीट आती है विधानसभा की। जिस तरह से यहां बीजेपी जीती है उससे साफ है कि खतरे की घंटी बज गई है। अगर क्षेत्रवार देखे तो सपा पूरब, पश्चिम और बुंदेलखंड में बढ़त ले रही है।
यहां हमने यूपी पर अधिक बात इसलिए की है क्योंकि 2027 का उत्तर प्रदेश चुनाव सत्ता की नई पटकथा लिखने वाला है।
हालांकि इन सबके बीच एमएलसी चुनाव के परिणाम कांग्रेस के लिए बुरी खबर की तरह है। राहुल गांधी की तमाम आक्रामकता के बावजूद पार्टी को इन चुनावों में कोई फायदा क्यों नहीं हुआ? हाल ही में हुए आन्दोलन के बड़े चेहरे थे राहुल गांधी।इस पर पार्टी को गहन चिंतन करनी चाहिए! राहुल की सारी मेहनत चुनाव परिणाम में बेकार क्यों चली जाती है, इस पर पार्टी के भीतर मंथन हो, यह जरूरी है।
प्रधानमंत्री ने जब एक्स पर कांग्रेस के प्रदर्शन पर टिप्पणी की तो हर पक्ष से बात सामने आने लगी है। हालांकि
यह सच है, इन चुनावों से भाजपा का मनोबल जरूर बढ़ा होगा। लेकिन प्रधानमंत्री के संसदीय सीट और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुख्यालय नागपुर में पार्टी की हार पर भाजपा नेतृत्व को सोचना होगा!
वैसे उत्तर प्रदेश की सियासी जंग है। सामने योगी आदित्यनाथ हैं। पंजाब पर भी नजर है। अभी तो रणनीति के मोर्चे पर हर पार्टी लगी हुई है, चुनाव की तारीख आने दें, असल राजनीति तब शुरू होगी!
Girindra Nath Jha
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