खेत-खलिहान और किताबों की दुनिया में रमे रहने वाले इस किसान को जिस एक शब्द में डूबने की चाहत है, वह है - 'महात्मा गांधी'। बचपन में गांधी जी हमारे पाठ्यक्रम में आए लेकिन तब इतिहास विषय को लेकर ही उन्हें समझ रहा था, या कहिए समझाया जा रहा था। लेकिन उम्र के साथ गांधी शब्द से अपनापा बढ़ता चला गया।
घर में गांधी डायरी दिखने लगी तो इस शब्द से नज़दीकी और बढ़ गई। लेकिन इन सबके बीच लेखक रामचंद्र गुहा की लेखनी से परिचय होता है और इस परिचय के सूत्रधार बनते हैं - सुशांत झा. सुशांत भाई ने रामचंद्र गुहा की किताबों का अनुवाद किया है। गांधी जी के शुरुआती जीवन और राजनीतिक सफ़र पर गुहा ने 'गांधी भारत से पहले' किताब लिखी है और उनकी दूसरी किताब जिसने मुझे गांधी जी के क़रीब पहुंचाने का काम किया वह है - 'भारत गांधी के बाद.'
बचपन से सुनता आया हूं कि गांधी जी बिहार दौरे में पूर्णिया प्रवास भी करते थे। यहां उनके नाम पर दो मुख्य आश्रम हैं, एक टिकापट्टी में और दूसरा रानीपतरा में। महात्मा गांधी 1925, 1927 और 1934 में पूर्णिया आते हैं। यहां 13 अक्टूबर 1925 में बापू की पूर्णिया के एक गांव की यात्रा का जिक्र जरूरी है।
बापू पूर्णिया शहर से 25 मील दूर एक गांव विष्णुपुर पहुंचते हैं, एक पुस्तकालय का उद्घाटन करने। वहां उन्हें सुनने के लिए हजारों लोग जमा थे। गांधी ने वहां लोगों को संबोधित किया। शाम में वे एक पुस्तकालय पहुंचते हैं, जिसका नाम मातृ मंदिर था। गांधी जी ने इस पुस्तकालय का उद्घाटन किया। चौधरी लालचंद जी ने अपनी पत्नी की स्मृति में इस पुस्तकालय की स्थापना की थी।
गांधी जी ने पुस्तकालय के बाहर महिलाओं के एक समूह को संबोधित किया था। शहर से दूर देहात में पुस्तकालय और बापू का पहुंचना ही पूर्णिया परिचय है।
गांधीजी की सादगी भी हमें खींचती है। कोई आदमी इतनी ऊंचाई पर पहुंचने के बाद इस तरह की सादगी कैसे बनाए रख सकता है, यह एक बड़ा सवाल है। महात्मा ने सादगी कोई दिखाने या नाटक करने के लिए नहीं अपनाई थी। यह उनकी आत्मा से उपजी थी, जब उन्होंने देखा था कि ब्रिटिश हुकूमत में भारत का आम आदमी भूखा और नंगा बना दिया गया है। उन्होंने अपना कपड़ा खुद बुना और खुद धोया और जब वे वायसराय लॉर्ड इरविन से मिले तब भी अपनी चिर-परिचत वेशभूषा में थे जिसे देखकर चर्चिल ने घृणा से उन्हें 'अधनंगा फकीर' कहा था।
देश-विदेश की बातें करते हुए गांव की दुनिया में गांधी जी खोजने की इच्छा जाग गई है। ऐसे में पंचायती राज का ख़्याल आता है। गांधी जी ने पंचायती राज के बारे में जो सपना देखा था वह साकार हो चुका है। गांधी जी ने ‘मेरे सपनों का भारत’ में पंचायती राज के बारे में जो विचार व्यक्त किये हैं वे आज वास्तविकता के धरातल पर साकार हो चुके है क्योंकि देश में समान तीन-स्तरीय पंचायती राज व्यवस्था लागू हो चुकी है जिसमें हर एक गांव को अपने पांव पर खड़े होने का अवसर मिल रहा है। उनका मानना था कि जब पंचायती राज स्थापित हो जायेगा तब लोकमत ऐसे भी अनेक काम कर दिखायेगा, जो हिंसा कभी भी नहीं कर सकती।
हालांकि काग़ज़ पर यह सब पढ़ने में अच्छा लगता है लेकिन ज़मीन पर गांधी जी का ग्राम स्वराज भ्रष्टाचार का अड्डा बन चुका है। आज बापू की जयंती है। लेकिन यह भी कटु सत्य है कि हम सबसे अधिक झूठ बापू के ही नाम पर बोलते हैं। अब दो अक्टूबर को आयोजित होने वाले ग्राम सभा को ही लीजिये! यह भी एक झूठ है। जबकि यह लिखते हुए मुझे गांधी जी का यह लिखा याद आ रहा है - "अगर हिंदुस्तान के हर एक गांव में कभी पंचायती राज कायम हुआ, तो मैं अपनी इस तस्वीर की सच्चाई साबित कर सकूंगा, जिसमें सबसे पहला और सबसे आखिरी दोनों बराबर होंगे या यों कहिए कि न तो कोई पहला होगा, न आखिरी।”
पिछले एक दशक से बिहार के ग्रामीण इलाके में हूँ और सच कह रहा हूँ ' ग्राम सभा' का मजाक देख रहा हूँ। एक कॉपी या कहिये एक रजिस्टर में ग्राम सभा आयोजित होती है और उस कॉपी के पन्ने पर गांधी जयन्ती लिख कर झूठ का व्यापार किया जाता है। दरअसल यहीं से 'गांधी' नाम पर घोटाले की शुरुआत होती है।
यह कटु सच है कि हम सबकी चुप्पी गांधी जी के नाम पर होने वाले झूठ के व्यापार को बढ़ावा देती आई है। इसके लिए हम सब दोषी हैं क्योंकि यह देश की संसद की बात नहीं, हमारे आपके पंचायत - वार्ड की है।
आप दिल्ली- पटना या किसी भी सूबे के प्रधान को बड़ी आसानी से दो बात कह देते हैं लेकिन आँख के सामने घर-दुआर - पंचायत में होने वाली गलतियों पर गज़ब की चुप्पी साध लेते हैं। ईमानदारी से कहूँ तो ग्राम सभा में एक चुप्पी रहती है और फिर उस चुप्पी के एवज में लम्बा व्यापार चलता है।
हमें इस चुप्पी की ही सजा मिल रही है। गांधी हमें अन्याय सहने की बात नहीं कह गए हैं। कम से कम गाँव में चुनाव के जरिये जिन्हें चुनते हैं, उनसे तो सवाल करिये।
बापू की सादगी से सीखने का यह समय है। निजी तौर पर मुझे उनकी सादगी ही खिंचती है। कोई आदमी इतनी ऊँचाई पर पहुँचने के बाद इस तरह की सादगी कैसे बनाए रखा होगा, यह एक बड़ा सवाल है। महात्मा ने सादगी कोई दिखाने या नाटक करने के लिए नहीं अपनाई थी। यह उनकी आत्मा से उपजी थी। तो आइये, सादगी से ही सही सवाल करिये!