Friday, June 19, 2026

पंजाब में चुनाव से पहले दलों की सियासी रणनीति की कहानी! क्या समय से पहले होंगे चुनाव?

पंजाब में विधानसभा चुनाव तय समय से पहले कराए जाने की संभावना को लेकर राजनीतिक हलकों में चर्चाएं तेज हो गई हैं। वर्ष 2027 में प्रस्तावित जनगणना और विधानसभा चुनाव के संभावित टकराव को देखते हुए चुनाव आयोग समय से पहले मतदान कराने के विकल्प पर विचार कर सकता है।
यदि यह ऐसा होता है तो फरवरी 2027 के बजाय नवंबर या दिसंबर 2026 में ही पंजाब सहित कुछ अन्य राज्यों में चुनाव कराए जा सकते हैं। हालांकि इस संबंध में अभी तक कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है।

जनगणना 2027 दो चरणों में आयोजित की जा रही है। पहला चरण हाउस लिस्टिंग का है, जबकि दूसरा और सबसे महत्वपूर्ण चरण पापुलेशन एन्यूमरेशन (पीई) फरवरी 2027 में प्रस्तावित है। इसी दौरान जातीय गणना भी कराई जाएगी। जनगणना और चुनाव, दोनों प्रक्रियाओं के लिए बड़ी संख्या में शिक्षकों और सरकारी कर्मचारियों की ड्यूटी लगती है। ऐसे में दोनों बड़े राष्ट्रीय कार्य एक ही समय पर होने से कर्मचारियों की उपलब्धता और प्रशासनिक प्रबंधन बड़ी चुनौती बन सकता है। इसी वजह से समयपूर्व चुनाव कराने के विकल्प पर मंथन चल रहा है। पंजाब में सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी इस संभावना को देखते हुए पहले ही चुनावी मोड में दिखाई दे रही है।

इन सबके बीच पंजाब में राजनीतिक पार्टियों ने जाति आधारित राजनीति को धार देना शुरू कर दिया है। आम आदमी पार्टी (AAP), शिरोमणि अकाली दल (SAD), बीजेपी और कांग्रेस चारों ही अलग-अलग समुदायों को साधने में जुट गए हैं। चुनाव से पहले इस तरह की हवा आम है!

ये चारों पार्टियां अपने पारंपरिक जनाधार को बचाने के साथ-साथ एक जातीय समीकरण बनाने की रणनीति पर काम कर रही हैं। इन पार्टियों की नजर जाट सिख, अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC), अनुसूचित जातियां (SC) के अलावा व्यापारी, महिला और युवा वर्ग पर है।

आकड़ों के मुताबिक पंजाब की आबादी में सिखों की हिस्सेदारी लगभग 57 प्रतिशत है, जबकि हिंदू लगभग 38 प्रतिशत हैं। दशकों तक पंजाब में बीजेपी को मुख्य रूप से शहरी हिंदू वोटरों का ही समर्थन मिलता रहा है।  

हाल ही में बीजेपी ने सिख जाट नेता केवल सिंह ढिल्लों को पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष बनाया है। बीजेपी का यह कदम पंजाब में उसकी 'हिंदू पार्टी' वाली छवि को बदलने और सिख वोटरों, खासकर प्रभावशाली जाट सिख समुदाय के बीच अपनी पैठ मजबूत करने के तौर पर देख जा रहा है।
 
इसके अलावा बीजेपी ओबीसी, सैनी तथा अन्य पिछड़े वर्गों के बीच लगातार कोई न कोई कार्यक्रम या संवाद के जरिए पैठ बनाने का प्रयास कर रही है।
ऐसा लगता है जैसे बीजेपी की नजर रणनीतिक तौर पर महत्वपूर्ण पंजाब  के मालवा, दोआबा और माझा पर है। केवल सिंह ढिल्लों मालवा इलाके से आते हैं, जहां पंजाब की 117 विधानसभा सीटों में से 69 सीटें हैं। 

माझा इलाके में 25 सीटें, जबकि दोआबा में 23 सीटें हैं। मालवा इलाके में केवल सिंह ढिल्लों, पूर्व मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह और केंद्रीय मंत्री रवनीत सिंह बिट्टू जैसे जाट सिख नेताओं  के जरिए बीजेपी जाट वोटरों के बीच पार्टी की पहुंच बढ़ाने में लगी है। इसके अलावा दलित वोटबैंक को साधने के लिए बीजेपी के पास पूर्व केंद्रीय मंत्री विजय सांपला, पूर्व केंद्रीय राज्य मंत्री सोम प्रकाश और पूर्व मुख्य संसदीय सचिव अविनाश चंदर जैसे नेता हैं।

दूसरी तरफ अकाली दल की राजनीति पारंपरिक रूप से जाट सिख प्रभुत्व के इर्द-गिर्द घूमती रही है। अकाली दल का मुख्य समर्थन आधार प्रदेश में जाट सिख, पंथ सिख रहा है। वहीं, कांग्रेस का समर्थन आधार जाट सिख, दलित और कुछ हिंदूओं का समर्थन रहा है। साल 2022 में AAP के सत्ता में आने के बाद से इन पार्टियों के समर्थन आधार में सेंध लगी है। अकाली दल एक बार फिर से अपना पारंपरिक वोट वापस पाने में लगी है. हालांकि, SAD अपने वोट आधार से हटकर पहले 70 से अधिक विधानसभा क्षेत्रों में एससी-बीसी, महिला और युथ विंग को सक्रिय कर चुकी है। इसके अलावा SAD ने 67 विघानसभा क्षेत्रों में  व्यापार विंग के 67 विभिन्न विधानसभा हलकों के हलका प्रधानों की नियुक्ति की है। इस तरह ये पार्टी शहरी और गैर-पारंपरिक वोट बैंक को मजबूत करने के प्रयासों में हैं। 
कांग्रेस हर स्तर पर पार्टी के समर्थन को मजबूत करने में जुटी
वहीं, कांग्रेस पार्टी दलित और जाट सिखों के समर्थन को वापस पाने में लगी है। पार्टी की मजबूती के लिए कांग्रेस जिला स्तर पर नियुक्तियों में विभिन्न सामाजिक वर्गों को प्रतिनिधित्व देने पर जोर दे रही है। इसके जरिए पार्टी उन वर्गों में अपनी पकड़ को मजबूत करेगी जहां उसका जनाधार कमजोर था। इसके अलावा कांग्रेस अपने एससी विभाग, ओबीसी विभाग, किसान कांग्रेस, महिला कांग्रेस, यूथ कांग्रेस और व्यापार प्रकोष्ठ को सक्रिय कर रही है ताकि हर स्तर पर अपने समर्थन को मजबूत कर सके।
 
इन सबके बीच पंजाब की सत्ताधारी पार्टी 
AAP का फोकस सत्ता में बने रहने और सत्ता विरोधी लहर को तोड़ना है। साल 2022 में AAP की जीत में दलित वर्ग, ग्रामीण मालवा क्षेत्र और जाट सिख किसानों की भूमिका रही थी। AAP विभिन्न समुदायों तक सीधी पहुंच बनाने के लिए जिला और विधानसभा स्तर पर कल्याण बोर्ड का गठन कर रही है। प्रदेश सरकार पहले ही 21 राज्य स्तरीय कल्याण बोर्ड बना चुकी है। इसके जरिए विभिन्न समुदायों से सीधे बातचीत की जाएगी और उनसे सरकार के कामों को लेकर फीडबैक लिया जाएगा। 

समय पूर्व चुनाव और जाति की राजनीति की खबरों के बीच
पंजाब में एक सवाल लगातार चर्चा में बना हुआ है कि क्या 2027 विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी और शिरोमणि अकाली दल फिर से साथ आएंगे? दोनों दलों का करीब ढाई दशक पुराना गठबंधन कभी पंजाब की राजनीति का सबसे सफल समीकरण माना जाता था। लेकिन 2020 में कृषि कानूनों के मुद्दे पर यह रिश्ता टूट गया और तब से दोनों दलों के रास्ते अलग हो गए। हाल के महीनों में इनके बीच गठबंधन की संभावनाओं को लेकर चर्चाएं फिर तेज हुई हैं। बीजेपी के सीनियर नेता खुले तौर पर ऐलान कर चुके हैं कि पार्टी राज्य में अकेले चुनाव लड़ेगी। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने तो मार्च 2026 में यहां तक कहा था कि बीजेपी अब पंजाब में ‘छोटा भाई’ नहीं बनेगी। लेकिन राजनीति में कभी भी कुछ भी हो सकता है, इसलिए अभी कुछ भी कहना सही साबित नहीं होगा!

Friday, June 12, 2026

एलएलसी निशांत कुमार 12 वीं पास!




एक समय बिहार में लालू यादव के बेटे तेज प्रताप और तेजस्वी की शिक्षा को सियासी मुद्दा बनाकर मीडिया में खूब परोसा जाता था। दरअसल, तेज प्रताप कॉलेज ड्रॉप आउट हैं और तेजस्वी यादव स्कूल ड्रॉप आउट। मतलब, उन्होंने बीच में ही पढ़ाई छोड़ दी। अब समय का फेर देखिए,  बिहार के भूतपूर्व मुख्यमंत्री और सुशासन बाबू के नाम से प्रसिद्ध नीतीश कुमार के पुत्र निशांत कुमार को लेकर 12 वीं पास का हल्ला जोड़ पकड़े हुए है। पिछले कुछ दिनों से यह मामला बिहार की हेडलाइन बनकर लोगों की जुबान पर चढ़ा हुआ है।

कुछ महीने पहले तक जेडीयू के कई वरिष्ठ नेता निशांत को इंजीनियर बताते नहीं थकते थे। और तो और, इस बात पर न तो कभी नीतीश कुमार ने और ना ही निशांत ने किसी तरह की टिप्पणी दी। दरअसल ये बात तब सामने आई जब बिहार विधान परिषद के नॉमिनेशन फॉर्म में दर्ज किया गया कि निशांत सिर्फ 12वीं पास हैं।

राष्ट्रीय जनता दल (RJD) ने सोशल मीडिया एक्स पर लिखा, 'जिस नीतीश कुमार के बेटे को लोग इंजीनियर बताते नहीं थकते थे, वह 12वीं निकला। चुनावी हलफनामें में स्वयं बताया कि वह ग्रेजुएट नहीं है। ताउम्र परिवारवाद के विरोध की नौटंकी करने वाले बेईमान लोगों की सारी परतें खुलेंगी। इंतजार कीजिए।'

इस बीच अब नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव की प्रतिक्रिया भी सामने आई है। गुरुवार (11 जून, 2026) को मीडिया से बातचीत में आरजेडी नेता ने इस पर बयान दिया। निशांत कुमार को लेकर तेजस्वी यादव ने कहा, "बिहार के शिक्षा मंत्री पर पूरा विश्वास है कि निशांत जी को इंजीनियर बनाने का काम करें. एक प्रोफेसर बन गए... एक इंजीनियर बन जाएंगे."

अब भले निशांत कुमार एलएलसी बन चुके हैं लेकिन राज्यसभा सांसद नीतीश कुमार के बेटे और बिहार सरकार में स्वास्थ्य मंत्री के तौर पर निशांत कुमार की शैक्षणिक योग्यता पर सियासत जारी है। उनकी तथाकथित बी.टेक  की डिग्री को लेकर सबसे पहले आरजेडी ने हल्ला बोल किया था।

हालांकि अबतक निशांत कुमार ने इस मुद्दे पर कुछ नहीं बोला है। समाचार चैनलों के मुताबिक बुधवार (10 जून, 2026) को निशांत कुमार जब मीडिया के सामने आए तो पत्रकारों ने बी.टेक पर सवाल किया था पत्रकार पूछने लगे कि कुछ तो इस पर बोल दीजिए लेकिन निशांत कुमार सवालों को सुनकर चुप रहे। उन्होंने किसी तरह की प्रतिक्रिया नहीं दी थी

बिहार विधान परिषद चुनाव के लिए दाखिल हलफनामे ने निशांत की डिग्री की सच्चाई सबके सामने खोलकर रख दी है।अब तक उन्हें इंजीनियर माना जाता रहा, लेकिन चुनावी दस्तावेजों से साफ हो गया कि उन्होंने इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी ही नहीं की थी।

हलफनामे के अनुसार निशांत कुमार ने 1998 में पटना साइंस कॉलेज से इंटरमीडिएट की पढ़ाई पूरी की थी। इसके बाद उन्होंने बिरला इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (BIT Mesra) में बैचलर ऑफ इंजीनियरिंग (कंप्यूटर साइंस) में दाखिला लिया।
हालांकि, 8 सेमेस्टर के कोर्स में वे केवल 5 सेमेस्टर तक ही पढ़ाई कर सके और वर्ष 2001 में उनकी पढ़ाई अधूरी रह गई।
यानी लंबे समय से उन्हें “इंजीनियर” बताने की जो धारणा बनी हुई थी, वह अब गलत साबित हुई है। चुनावी हलफनामे में उनकी शैक्षणिक योग्यता ने इस भ्रम को पूरी तरह खत्म कर दिया।


विपक्ष का कहना है कि यह मामला केवल शैक्षणिक योग्यता का नहीं, बल्कि उस राजनीतिक छवि का भी है जो वर्षों से निशांत कुमार के बारे में बनाई गई। राजद का दावा है कि कई जदयू नेताओं ने सार्वजनिक रूप से उन्हें इंजीनियर बताया, जबकि इस पर कभी सार्वजनिक रूप से कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया।

गौरतलब है कि लालू प्रसाद, नीतीश कुमार और रामविलास पासवान जैसे बिहार के शीर्ष दिग्गज नेताओं ने शिक्षा और सुधारों की बात तो की, लेकिन उनके अपने ही घरों में इसका असर नहीं दिखा। तेजस्वी और चिराग के बाद अब विपक्ष के निशाने पर नीतीश कुमार के बेटे निशांत कुमार हैं, जिन्हें '12वीं पास' बताकर घेरा जा रहा है। हालांकि इस मुद्दे पर सबकी स्थिति एक जैसी ही है,  इसे बिहार का दुर्भाग्य ही माना जाएगा!

पिछले महीने सम्राट चौधरी सरकार के विस्तार के दौरान मंत्री पद की शपथ लेने वाले निशांत को स्वास्थ्य मंत्रालय का महत्वपूर्ण प्रभार सौंपा गया था। जबकि उपमुख्यमंत्री पद पार्टी के वरिष्ठ नेताओं बिजेंद्र प्रसाद यादव और विजय कुमार चौधरी को दिए गए, जेडीयू ने निशांत को अपना भावी नेता घोषित किया है।

कैबिनेट में निशांत की तेजी से एंट्री और उसके बाद उन्हें एमएलसी बनाने की सियासी पहल दरअसल बिहार की राजनीति में एक बड़ा बदलाव दिखाता है। सालों तक नीतीश कुमार ने परिवारवाद का खुलकर विरोध किया और अपने परिवार को पार्टी के मामलों से दूर रखा।लेकिन अब जब यह वरिष्ठ नेता अपनी विरासत को सुरक्षित करने और पार्टी के भविष्य के नेतृत्व ढांचे को औपचारिक रूप देने की कोशिश कर रहे हैं, तो निशांत का आगे आना जेडीयू के भीतर एक सोची-समझी प्रक्रिया का संकेत है, जिससे राज्य के कामकाज में अगली पीढ़ी को आगे लाया जा रहा है।

गौरतलब है कि बिहार विधान परिषद चुनाव में सभी 10 उम्मीदवारों ने निर्विरोध जीत दर्ज कर ली है। कई उम्मीदवारों ने 11 जून को बिहार विधानमंडल जाकर जीत का सर्टिफिकेट भी लिया। कुल 10 सीटों के लिए 10 उम्मीदवार थे, इसलिए वोटिंग की नौबत ही नहीं आई।

भारतीय जनता पार्टी के सभी चारों उम्मीदवारों को जीत हासिल हो गई है। बिहार विधानपरिषद चुनाव में एनडीए के पास अपने 8 उम्मीदवारों के लिए पूरे वोट थे। जबकि नीतीश कुमार की खाली सीट पर भी जीत तय थी। इस तरह से बीजेपी के सभी चारों उम्मीदवार निर्विरोध विधान पार्षद निर्वाचित हो गए हैं।

उधर जदयू के भी चारों उम्मीदवार निर्विरोध निर्वाचित हो गए। इनमें से एक ललन मंडल उर्फ ललन प्रसाद पूर्व सीएम नीतीश कुमार की खाली की गई सीट से उम्मीदवार थे। यानी उपचुनाव में भी एनडीए को किसी दिक्कत का सामना नहीं करना पड़ा।

लोजपा रामविलास ने एनडीए की तरफ से अपने उम्मीदवार अशरफ अंसारी को मैदान में उतारा था। वो चिराग पासवान के पुराने वफादार नेताओं में से एक हैं। अब वो भी एलएलसी चुनाव में निर्विरोध जीत कर पहली बार अपने संसदीय जीवन की शुरूआत करेंगे। वहीं राष्ट्रीय जनता दल (RJD) ने सुनील कुमार सिंह को उम्मीदवार बनाया था। राज्यसभा चुनाव की तरह राजद को यहां चुनौती का सामना नहीं करना पड़ा और सुनील सिंह निर्विरोध विधान पार्षद चुन लिए गए।

Friday, June 05, 2026

कैसा रहेगा पंजाब का चुनावी जायका!


पंजाब विधानसभा चुनाव 2027 में अब ज्यादा समय नहीं बचा है. भारतीय जनता पार्टी की तरह ही कांग्रेस ने भी अपनी कमर कस ली है और चुनावी तैयारियां शुरू कर दी हैं. इसी क्रम में कांग्रेस ने राज्य संगठन में बड़े फेरबदल की योजना बना रही है और पंजाब प्रदेश अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी किसी और को सौंप रही है. 

गौरतलब है कि पंजाब चुनाव से पहले भारतीय जनता पार्टी ने भी अपना प्रदेश अध्यक्ष बदला है. अब केवल सिंह ढिल्लों को पंजाब बीजेपी की जिम्मेदारी सौंपी गई है. इसके बाद कांग्रेस में भी बदलाव की चर्चा तेज हो गई. 

पिछले हफ्ते कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने पंजाब के शीर्ष पांच नेताओं को दिल्ली बुलाया था. इस मीटिंग में पंजाब प्रदेश अध्यक्ष के नए नाम पर चर्चा हुई. इसके संकेत पंजाब के पूर्व उप मुख्यमंत्री और गुरदासपुर से सांसद सुखजिंदर रंधावा ने दिए.

जिन पांच नेताओं को दिल्ली बुलाया गया था उनमें चरणजीत सिंह चन्नी, प्रताप बाजवा, सुखजिंदर रंधावा, डॉ. अमर सिंह और राजा वडिंग शामिल थे. इनके अलावा, राहुल गांधी, कांग्रेस पंजाब प्रभारी भूपेश बघेल और अन्य पार्टी नेता भी बैठक में मौजूद रहे.

वहीं दूसरी ओर पंजाब के राजनीतिक गलियारों में पूर्व मुख्यमंत्री और बीजेपी नेता कैप्टन अमरिंदर सिंह की 'घर वापसी' की अटकलें तेज हो गई हैं. यानी, कैप्टन अमरिंदर बीजेपी छोड़कर कांग्रेस में वापसी कर सकते हैं. ऐसी अटकलें इसलिए लगाई जा रही हैं, क्योंकि हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के बड़े नेता भूपिंदर सिंह हुड्डा का कहना है कि कैप्टन अमरिंदर सिंह कांग्रेस के संपर्क में हैं.

कैप्टन अमरिंदर सिंह की कांग्रेस वापसी की अटकलें ऐसे समय लगाई जा रही हैं, जब कुछ ही महीनों में पंजाब में विधानसभा चुनाव होने हैं. 2021 के विधानसभा चुनाव से पहले ही कैप्टन अमरिंदर कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में चले गए थे.

इन सबके बीच भाजपा ने पंजाब में नशे की समस्या को अपने राजनीतिक अभियान का प्रमुख मुद्दा बनाने का फैसला किया है. पार्टी राज्यव्यापी जनसंपर्क कार्यक्रमों और यात्राओं की तैयारी कर रही है. उसका प्रयास है कि नशे के खिलाफ लड़ाई को सिर्फ चुनावी वादा नहीं, बल्कि एक सामाजिक मिशन के रूप में पेश किया जाए. अमित शाह के लिए भी यह कोई नया मुद्दा नहीं है. वे इस पर काफी पहले से काम करते आए हैं.

यह एक ऐसा मुद्दा है जो जाति, क्षेत्र और राजनीतिक मतभेदों से ऊपर उठकर लोगों को प्रभावित करती है. यह देखना बाकी है कि यह रणनीति मतदाताओं को कितना प्रभावित कर पाती है, लेकिन इतना तय है कि भाजपा इसे 2027 चुनाव का प्रमुख मुद्दा बनाने जा रही है. 

इस चुनाव में लंबे समय तक राज्य में सहयोगी दलों के सहारे अपनी राजनीतिक मौजूदगी बनाए रखने वाली बीजेपी अपने दम पर लड़ने और सत्ता के लिए मजबूत दावेदारी पेश करने की रणनीति पर काम कर रही है। यहीं कारण है कि वो अब पहले की तुलना में कहीं अधिक सक्रिय और आक्रामक नजर आ रही है।
वहीं अकेले चुनाव लड़ने की बात करते हुए भाजपा और भी बहुत कुछ सोच रही है. दशकों तक पंजाब में भाजपा, शिरोमणि अकाली दल (SAD) के साथ गठबंधन के जरिए राजनीति करती रही है. लेकिन इस बार अकेले लड़ने की बात करके वह जनता के बीच अपनी आवाज मुखर तरीके से पहुंचाने की कोशिश में है.

पंजाब विधानसभा चुनाव 2027 से पहले भाजपा ने पूरे राज्य में अपना अभियान तेज कर दिया है. इसके लिए वो काफी हद तक आम आदमी पार्टी (AAP) के पूर्व नेताओं राघव चड्ढा और संदीप पाठक के अनुभव पर भरोसा कर रही है, जिन्होंने राज्य में आम आदमी पार्टी के उभार में अहम भूमिका निभाई थी.

भाजपा अपनी रणनीति के केंद्र में संगठनात्मक विस्तार और नशे की समस्या को भी रख रही है. राज्य में भाजपा का लक्ष्य साफ है, संगठन को मजबूत करना और नशे की समस्या को राजनीतिक मुद्दा बनाना है.

इस बार भाजपा अकेले चुनाव लड़ने के लिए भी तैयार नजर आ रही है. पंजाब की राजनीति में अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने के लिए सहयोगियों पर निर्भर रहने का दौर खत्म होता दिख रहा है. असम, बंगाल के नतीजों के बाद भाजपा नेताओं के अंदर बहुत उत्साह नजर आ रहा है.

माना जा रहा है कि यदि भाजपा पूरी ताकत और संसाधनों के साथ मैदान में उतरे, तो पंजाब में सत्ता हासिल करना अब कोई दूर का सपना नहीं है. 

लोगबाग कह रहे हैं कि पंजाब की राजनीतिक पटकथा में इस बार दो नेताओं की भूमिका अहम होने वाली है. पहला संदीप पाठक और दूसरा राघव चड्ढा. दोनों ने दिल्ली के बाहर आम आदमी पार्टी की सबसे बड़ी सफलता दिलाने में अहम योगदान दिया था. अब ये दोनों भाजपा में हैं.

संदीप पाठक को आम आदमी पार्टी के 'पंजाब मॉडल' का प्रमुख रणनीतिकार माना जाता रहा है। पाठक ने बूथ स्तर की मैपिंग, डेटा विश्लेषण, सर्वेक्षण और स्वयंसेवकों के मजबूत नेटवर्क के जरिए 2022 के विधानसभा चुनाव से पहले पार्टी की जमीनी पकड़ मजबूत करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया था। राजनीति में उनका काम करने का तरीका हमेशा पर्दे के पीछे रहकर संगठन को मजबूत करने वाला माना जाता रहा है। वहीं, राघव चड्ढा ने पंजाब में आम आदमी पार्टी के प्रमुख चेहरे के रूप में काम किया। उन्होंने दिल्ली नेतृत्व और पंजाब इकाई के बीच समन्वय स्थापित करने के साथ-साथ चुनावी रणनीति को जमीन पर उतारने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

इन दोनों नेताओं के आलावा भी आनेवाले दिनों में ऐसे कई चेहरे सामने आयेंगे जो 'पंजाबी पोलिटिकल जायके' को लजीज बनाने का काम करेंगे! 

आने वाले दिनों में पंजाब पर देश की निगाहें होगी! कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, अकाली दल की राजनीतिक गुटबाजी के बीच भाजपा अपने प्रचार तंत्र से किस अंदाज में प्रहार करेगी, इस पर सभी की नजर रहेगी! अभी तो पंजाब की चुनावी कहानी शुरू ही हुई है!

Friday, May 29, 2026

आइए, जानते हैं कि क्या है अन-नैचुरल डेमोग्राफिक चेंज !


पिछले कुछ सालों में असम, बंगाल, मणिपुर, त्रिपुरा, नागालैंड जैसे सीमावर्ती राज्यों के साथ-साथ बिहार, महाराष्ट्र, गुजरात, दिल्ली और यूपी जैसे राज्यों में डेमोग्राफिक चेंज (जनसांख्यिकी बदलाव) को लेकर विवाद सामने आए हैं. इन इलाकों में अवैध प्रवास, सीमा पार से घुसपैठ और फर्जी पहचान पत्रों के सहारे बसने के आरोप लगते रहे हैं.
सरकार का मानना है कि इस बदलाव का सीधा असर वहां के स्थानीय संसाधनों, रोजगार, सामाजिक ताने-बाने और राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर पड़ रहा है. खासकर जनजातीय क्षेत्रों में सांस्कृतिक पहचान और जमीन के अधिकारों को लेकर चिंताएं बढ़ी हैं. 

ऐसे में यह सवाल उठने लगे हैं कि क्या सचमुच में भारत की डेमोग्राफी क्या बदल रही है? अब इसकी स्टडी के लिए केंद्र सरकार ने एक हाई लेवल कमेटी बना दी है. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने जब से कमेटी बनाए जाने का ऐलान किया है, तभी से इस मसले पर खूब चर्चा हो रही है. यह कमेटी एक साल के भीतर अपनी रिपोर्ट सौंपेगी. हालांकि, जरूरत पड़ी तो इसका कार्यकाल 6 महीने और बढ़ाया जा सकता है. 

इस कमेटी का काम घुसपैठ और दूसरे कारणों से बदल रही भारत की डेमोग्राफी पर स्टडी करना है. डेमोग्राफी चेंज से कैसे निपटा जा सकता है? इसे लेकर भी कमेटी अपने सुझाव देगी.

गृह मंत्री अमित शाह ने X पर पोस्ट कर कहा है कि अप्राकृतिक तरीके से डेमोग्राफी बदलना किसी भी देश के वर्तमान और भविष्य के लिए बड़ी चुनौती है. इसी चुनौती से निपटने के लिए 15 अगस्त 2025 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक हाई-लेवल कमेटी बनाने का ऐलान किया था और अब सरकार ने इस कमेटी का गठन कर दिया है.

केंद्र सरकार लंबे समय से डेमोग्राफी चेंज होने की बात करती रही है. पिछले साल 15 अगस्त को लाल किले से भाषण देते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने डेमोग्राफी चेंज को एक बड़ी चुनौती बताया था.

अमित शाह डेमोग्राफी चेंज के लिए सबसे बड़ा कारण 'घुसपैठ' को मानते हैं. पिछले साल अक्टूबर में अमित शाह ने X पर आबादी को लेकर कुछ आंकड़े जारी किए थे. इसमें 1951 से 2011 तक की जनसंख्या के आंकड़े बताए गए थे.

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में डेमोग्राफिक चेंज और घुसपैठ बड़ा मुद्दा था. इस मुद्दे को लेकर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने तत्कालीन ममता बनर्जी सरकार का घेराव किया था. इसी आधार पर बीजेपी ने विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस को मात दी और पूर्ण बहुमत से सत्ता हासिल की. ऐसे में अब केंद्र सरकार द्वारा डेमोग्राफिक चेंज पर हाई लेवल कमेटी गठित करना अहम माना जा रहा है. 

अब लोगबाग यह सवाल करने लगे हैं कि यह कमिटी आने वाले दिनों में कैसे काम करेगी. आसान भाषा में समझें तो यह कमेटी 6 काम करेगी- 
1. डेमोग्राफिक चेंज से जो चुनौतियां पैदा हुईं, उन पर विचार करना।
2. डेमोग्राफिक चेंज की वजहें- जैसे सीमापार से अवैध घुसपैठ, आर्थिक वजहें और दूसरे सोशियो-इनवायरमेंटल फैक्टर्स की स्टडी करना।
3. डेमोग्राफिक चेंज के पीछे कुछ और अंडरलाइंग फैक्टर- जैसे बस्तियां बसाने के असामान्य पैटर्न, माइग्रेशन वगैरह की पहचान करना।
4. धार्मिक या सामाजिक कम्युनिटीज में पॉपुलेशन चेंज की एनालिसिस करना। खास तौर पर वहां, जहां पॉपुलेशन नॉर्मल ट्रेंड से काफी अलग तरीके से बदल रही है।
5. देश में मौजूद घुसपैठियों को कानूनी तरीके से पहचानने, हिरासत में लेने और डिपोर्ट करने की स्थायी मैकेनिज्म बनाना।
6. बॉर्डर मैनेजमेंट, आबादी कंट्रोल करने और इससे जुड़ी चीजों को मॉनिटर करने के लिए एक मैकेनिज्म सुझाना।
इनके अलावा कमेटी केंद्र और राज्य सरकारों के बीच अवैध घुसपैठ, डेमोग्राफिक चेंज के मामले में बेहतर को-ऑर्डिनेशन के लिए पॉलिसी बनाने का भी सुझाव देगी।

यह समिति मुख्य रूप से इन तीन क्षेत्रों पर प्रमुखता से काम करेगी- 

• असामान्य बदलावों की जांच और विश्लेषण: समिति यह पता लगाएगी कि देश के किन खास क्षेत्रों और सामाजिक समुदायों में असामान्य रूप से जनसंख्या का असंतुलन पैदा हुआ है.
• अवैध प्रवासियों की पहचान और निर्वासन: भारत में अवैध रूप से रह रहे प्रवासियों की पहचान करने, उन्हें हिरासत में लेने और उनके वापस भेजने के लिए एक स्थायी और मजबूत कानूनी व्यवस्था का सुझाव देना इस समिति का प्रमुख काम होगा.
• कड़े नियमों और नीति का निर्माण: भविष्य में किसी भी तरह की घुसपैठ को पूरी तरह रोकने के लिए सीमा प्रबंधन को कैसे मजबूत किया जाए, समिति इस पर सरकार को विस्तृत योजना सौंपेगी ताकि डेमोग्राफिक असंतुलन को सुधारा जा सके.

दरअसल सरकार पूरे देश के डेमोग्राफिक पैटर्न का वैज्ञानिक और संस्थागत अध्ययन कराना चाहती है, ताकि वास्तविक स्थिति के आधार पर ठोस नीतियां बनाई जा सकें. गौरतलब है कि भारत की बदलती डेमोग्राफी के पीछे घुसपैठ, धर्मांतरण, कथित लव जिहाद और ज्यादा आबादी को बड़ा कारण बताया जाता है. लेकिन अब तक आधिकारिक तौर पर इसका कोई ठोस कारण नहीं बताया गया है. उम्मीद है इस कमेटी की रिपोर्ट से इस सवाल का जवाब भी मिल जाएगा. 



Girindra Nath Jha
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Friday, May 22, 2026

क्या पंजाब में 'उड़ता पंजाब' ही होगा चुनावी मुद्दा

पंजाब पिछले कई दशकों से नशे की समस्या से ग्रस्त है। जैसा कि हम सब जानते हैं कि साल 2017 और 2022 के विधानसभा चुनाव में नशा प्रमुख राजनीतिक मुद्दा बना था। पंजाब में ड्रग्स को लेकर बहस इसलिए ज्यादा होती है क्योंकि वहां लंबे समय से ड्रग्स एक बड़ा राजनीतिक और सामाजिक मुद्दा रहा है। सीमा पार से तस्करी, ड्रोन के जरिए हेरोइन सप्लाई और युवाओं में नशे की लत जैसी घटनाओं ने राज्य को लगातार सुर्खियों में रखा। नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो की रिपोर्ट के अनुसार, 2024 में देशभर में जब्त हुई हेरोइन का बड़ा हिस्सा पंजाब से बरामद किया गया था। सीमा से लगे इलाकों में ड्रोन के जरिए ड्रग्स गिराने की घटनाओं में भी तेजी आई है।
पंजाब में अगले साल की शुरुआत में विधानसभा चुनाव होंगे। विधानसभा चुनाव से पहले राज्य में एक बार फिर ड्रग्स का मुद्दा उठ गया है। जहां एक तरफ पंजाब सरकार ने नशे के खिलाफ अभियान चलाया है। वहीं, विपक्षी पार्टियां सरकार पर नशे के खिलाफ काम ना करने का आरोप लगा रही हैं। विधानसभा चुनाव में यह मुद्दा एक बड़े मुद्दे के रूप में उभरने लगा है।  

हालांकि नशे का मुद्दा केवल पंजाब का ही नहीं है, अन्य राज्य भी इसकी चपेट में हैं। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक साल 2022 में देशभर में एनडीपीएस एक्ट के तहत करीब 1.15 लाख मामले दर्ज किए गए थे। इनमें सबसे ज्यादा केस केरल में सामने आए। महाराष्ट्र दूसरे स्थान पर रहा जबकि पंजाब तीसरे नंबर पर पहुंचा। इसके बाद उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु जैसे राज्यों का नाम भी सूची में शामिल रहा। आंकड़ों के अनुसार, कुल मामलों में केरल की हिस्सेदारी करीब 23 प्रतिशत, महाराष्ट्र की 12 प्रतिशत और पंजाब की लगभग 11 प्रतिशत रही। यानी सिर्फ इन तीन राज्यों में ही देश के बड़ी संख्या में ड्रग केस दर्ज हुए हैं। आंकड़ों में भले ही पंजाब में नशे की समस्या अन्य राज्यों से कम दिखाई देती हो लेकिन पंजाब में आज के समय में यह एक बड़ा मुद्दा है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि सिर्फ दर्ज मामलों के आधार पर किसी राज्य को पूरी तरह नशे का केंद्र मान लेना सही नहीं होगा। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो खुद अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट करता है कि उसके आंकड़े पुलिस में दर्ज मामलों पर आधारित होते हैं। इसका मतलब यह है कि जहां पुलिस ज्यादा सक्रिय है, वहां केसों की संख्या भी ज्यादा दिखाई दे सकती है। कई राज्यों में बड़े स्तर पर एंटी ड्रग अभियान चलाए जाते हैं, जिसके चलते एफआईआर और गिरफ्तारियों की संख्या बढ़ जाती है।

दरअसल पंजाब में अगले साल विधानसभा चुनाव हैं तो राजनीतिक दल अब नशे के मुद्दे पर सबसे अधिक मुखर दिखेगी। जहां एक ओर राज्य में सत्तारुढ़ आम आदमी पार्टी इस मुद्दे को सक्रियता से उठा रही है वहीं अब भारतीय जनता पार्टी भी इस मुद्दे को केंद्र पर रखकर पॉलिटिकल कैंपेंन शुरु कर सकती है।

पश्चिम बंगाल और असम में मिली राजनीतिक सफलता के बाद अब भाजपा की नजरें पंजाब में होने वाले विधानसभा चुनाव पर हैं। माना जा रहा है कि इस राज्य को फतह करने के लिए भाजपा बंगाल की रणनीति अपनाएगी। नशा और राज्य की सुरक्षा को पार्टी आगामी चुनाव का प्रमुख मुद्दा बनाएगी। माना जा रहा है कि भाजपा आगामी जून महीने में ही विधानसभा प्रभारियों की नियुक्ति कर देगी ताकि पंजाब में चुनावी अभियान ग्राउंड स्तर पर दिखने लगे।

पार्टी सूत्रों के अनुसार पश्चिम बंगाल में कमल खिलाने की योजना साकार होने से उत्साहित भाजपा अब पंजाब को भगवामय करने के लिए पूरी ताकत झोंकेगी। इसके लिए पार्टी पश्चिम बंगाल की तर्ज पर ही जून महीने में ही सभी विधानसभा सीटों और तीन क्षेत्रों माझा, दोआबा और मालवा के लिए प्रभारियों की नियुक्ति करेगी। बंगाल की तरह ही गृह मंत्री अमित शाह राज्य की सियासत की नब्ज टटोलकर संगठन को सक्रिय करने की मुहिम में जुट जाएंगे।

गौरतलब है कि बंगाल की तरह ही पंजाब भी सीमावर्ती राज्य है। पार्टी सूत्रों का कहना है बंगाल में बांग्लादेश से घुसपैठ राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा था, जबकि पंजाब में पाकिस्तान से हो रही ड्रग्स की आपूर्ति बड़ा खतरा बनती जा रही है। बंगाल में इस खतरे को मुद्दा बनाने केलिए पार्टी ने परिवर्तन यात्राओं का सहारा लिया था। चूंकि ड्रग्स रैकेट को खत्म करने के वादे के साथ सत्ता में आई आम आदमी पार्टी इस मोर्चे पर बुरी तरह विफल रही है, ऐसे में पार्टी पंजाब को नशामुक्त करने का अभियान छेड़ते हुए पूरे राज्य में नशे के खिलाफ यात्रा निकालेगी।

वहीं दूसरी ओर आम आदमी पार्टी के सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल बुधवार को सीएम भगवत मान के साथ लुधियाना पहुंचे थे। वे शुक्रवार तक पंजाब में रहकर पार्टी की शीर्ष लीडरशिप के साथ विधानसभा चुनाव की तैयारियों को लेकर मंथन करेंगे। हलवारा हवाई अड्डे पर पहुंचने के बाद उन्होंने पत्रकारों से बातचीत में दावा किया कि पंजाब में आम आदमी पार्टी के पक्ष में माहौल पहले से अधिक मजबूत हुआ है।

केजरीवाल ने दावा किया है कि आगामी विधानसभा चुनाव में पार्टी पिछला रिकॉर्ड भी तोड़ेगी। सामान्य तौर पर किसी भी सरकार के चार वर्ष पूरे होने के बाद लोगों में नाराजगी दिखाई देती है, लेकिन पंजाब में स्थिति इसके विपरीत है। उन्होंने कहा कि राज्य में आम आदमी पार्टी सरकार के प्रति लोगों में सकारात्मक माहौल है और जनता सरकार के कामों को लेकर चर्चा कर रही है.

सूत्रों के अनुसार आने वाले कुछ दिनों में पार्टी संगठन, चुनावी रणनीति, उम्मीदवार चयन और सरकार की उपलब्धियों को जनता तक पहुंचाने को लेकर कई अहम बैठकें हो सकती हैं। पार्टी नेतृत्व आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर अभी से सक्रिय दिखाई दे रहा है।

पंजाब की राजनीति में आम आदमी पार्टी की आगामी रणनीति को लेकर यह दौरा महत्वपूर्ण माना जा रहा है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि पार्टी चुनाव से पहले संगठन को और मजबूत करने तथा सरकार की योजनाओं को चुनावी मुद्दा बनाने की तैयारी में जुटी हुई है।

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Friday, May 15, 2026

बंगाल में किस रंग में दिखेगी ममता की ‘लक्ष्मी भंडार योजना’





पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले से जब बंगाल के सुदूर इलाकों की यात्रा कर रहा था तो राज्य सरकार की जिस एक योजना की चर्चा हर एक की जुबान पर थी, वह थी ममता बनर्जी की महत्वाकांक्षी ‘लक्ष्मी भंडार’ योजना। अब जब ममता बनर्जी सत्ता गंवा चुकीं हैं तो भी इस योजना की खूब चर्चा हो रही है।

पश्चिम बंगाल में सत्ता परिवर्तन के बाद से महिलाओं के मन में यह सवाल बार बार उठ रहा था कि क्या नई सरकार लक्ष्मी भंडार योजना में कोई फेरबदल करेगी या फिर बंद ही कर देगी ? शायद पश्चिम बंगाल की नई सरकार राज्य की महिलाओं के मन की बात सुन ली है क्योंकि मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व वाली नयी भाजपा सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि राज्य की महिलाओं को आर्थिक मदद देने वाली फ्लैगशिप योजना ‘लक्ष्मी भंडार’ न केवल जारी रहेगी, बल्कि इसे नये कलेवर और बढ़ी हुई राशि के साथ लागू किया जा सकता है।

सूत्रों के अनुसार भाजपा का मानना है कि जनहित की योजनाओं का नाम बदल सकता है, लेकिन लोगों को मिलने वाले लाभ बंद नहीं होना चाहिए। गौरतलब है कि इस बार के चुनाव में महिला वोट बैंक ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। 2026 के बंगाल चुनाव में महिलाओं ने बढ़-चढ़कर मतदान किया है। इन सबकी निगाहें अब नई सरकार पर है। जैसा कि हम सब जानते हैं कि लक्ष्मी भंडार के जरिये राज्य की करोड़ों महिलाएं सीधे तौर पर लाभान्वित हो रही हैं और भारतीय जनता पार्टी महिला वोट बैंक को नाराज नहीं करना चाहेगी।

जिस तरह ममता बनर्जी ‘लक्ष्मी भंडार’ के जरिए महिला वोट बैंक में अपनी पैठ बनाए हुए थी, ठीक उसी तरह भारतीय जनता पार्टी भी अपनी एक महत्वाकांक्षी योजना के जरिए राज्य की महिलाओं को लाभ देने जा रही है। भाजपा की भी निगाह महिला वोट बैंक पर है। भाजपा ने अपने संकल्प पत्र में ‘अन्नपूर्णा भंडार’ का वादा किया था। माना जा रहा है कि आने वाले दिनों में लक्ष्मी भंडार को इसी योजना में मिला दिया जाएगा, जिसमें आर्थिक सहायता की राशि को बढ़ाकर 3,000 रुपए तक किया जा सकता है।

ब्रांड के लिहाज से काम करने वाली भाजपा चाहती है कि इस योजना को भी ‘मोदी की गारंटी’ की-वर्ड से जोड़कर रखा जाए। भाजपा हमेशा से डबल इंजन शब्द का इस्तेमाल करती है और इसी रास्ते पर चलकर वह कई राज्यों में सत्ता तक पहुंच रही है।

लक्ष्मी भंडार योजना को लेकर बंगाल की नई सरकार की रणनीति अपने पूर्ववर्ती सरकार से अलग है। नयी सरकार का आरोप रहा है कि पिछली सरकार में इन योजनाओं में लीकेज थी। अब इसे सीधे डीबीटी (DBT) के जरिये और भी पारदर्शी बनाया जायेगा, ताकि बिचौलिये खत्म हो सकें।

मुख्यमंत्री शुभेंदू अधिकारी लक्ष्मी भंडार के लाभार्थियों को केंद्र की ‘आयुष्मान भारत’ योजना से जोड़ना चाहते हैं ताकि महिलाओं को नकद राशि के साथ-साथ मुफ्त इलाज की सुविधा भी मिले। शुभेंदू अधिकारी ने बातचीत में बताया कि उनकी सरकार किसी भी लोक-कल्याणकारी कार्य को बाधित नहीं करेगी, बल्कि उसे केंद्र की योजनाओं के साथ जोड़कर और अधिक प्रभावी व लोककल्याणकारी बनायेगी।

विधानसभा चुनाव के दौरान तृणमूल कांग्रेस लगातार प्रचार कर रही थी कि यदि भाजपा सत्ता में आएगी तो लक्ष्मी भंडार बंद कर देगी। ऐसे में शुभेंदू अधिकारी के इस कदम को लेकर ममता बनर्जी की पार्टी ने लंबी चुप्पी साध ली है।

राज्य की नई सरकार और योजनाओं की चर्चा के बीच गुरुवार को बंगाल की पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी एक नए अवतार में दिखी। ममता बनर्जी बृहस्पतिवार को कलकत्ता हाईकोर्ट में चुनाव बाद हुई हिंसा के मामले में तृणमूल कार्यकर्ताओं की पैरवी करने पहुंची थीं। वहां उन्होंने बाकायदा काला गाउन पहनकर बहस की।

हालांकि ममता बनर्जी के गाउन में कलकत्ता हाईकोर्ट में पेश होने के मामले ने नया कानूनी मोड़ ले लिया है। बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने इस घटना का संज्ञान लेते हुए पश्चिम बंगाल बार काउंसिल से 48 घंटे के भीतर विस्तृत रिपोर्ट तलब की है।
बीसीआई जांच कर रहा है कि क्या मुख्यमंत्री पद छोड़ने के बाद ममता बनर्जी ने अपने लाइसेंस को रिन्यू करने के लिए बार काउंसिल में आवेदन किया था? क्या उन्होंने मुख्यमंत्री रहते हुए भी अपना पंजीकरण सक्रिय रखा था? यह बार काउंसिल के नियमों का उल्लंघन माना जा सकता है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि उनके पास सक्रिय लाइसेंस नहीं था, तो कानूनी पोशाक (Legal Attire) पहनकर कोर्ट में जिरह करना उन्हें बड़ी मुसीबत में डाल सकता है। 

ममता बनर्जी को भविष्य में वकालत करने से रोका जा सकता है। पश्चिम बंगाल बार काउंसिल को शनिवार तक अपनी रिपोर्ट दिल्ली भेजनी होगी। यदि रिपोर्ट में नियमों की अनदेखी पायी गयी, तो ममता बनर्जी को भविष्य में वकालत करने से रोका भी जा सकता है। फिलहाल, सबकी नजरें बार काउंसिल के अगले कदम पर टिकी हैं। बार काउंसिल ने पूछा कि क्या ममता का लाइसेंस सक्रिय है? बीसीआई ने पूछा है कि क्या ममता बनर्जी का वकालत का लाइसेंस सक्रिय है? क्या मुख्यमंत्री रहने के दौरान उन्होंने नियमों का पालन किया था? इस रिपोर्ट के आने के बाद ममता बनर्जी की ‘प्रोफेशनल’ वकालत की स्थिति पर बड़ा संकट खड़ा हो सकता है। 

बार काउंसिल ऑफ इंडिया के प्रधान सचिव श्रीरामंतो सेन की ओर से जारी पत्र में कई गंभीर सवाल उठाये गये हैं। बीसीआई ने पश्चिम बंगाल बार काउंसिल के सचिव को निर्देश दिया है कि 2 दिन के भीतर ममता बनर्जी के पंजीकरण (Registration) से जुड़ी पूरी जानकारी भेजी जाए। बार काउंसिल जानना चाहता है कि 2011 से 2026 तक, जब ममता बनर्जी मुख्यमंत्री के संवैधानिक पद पर थीं, तब उनके वकालत के लाइसेंस की स्थिति क्या थी।

गौरतलब है कि नियमों के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति संवैधानिक पद पर कार्यरत होता है या किसी अन्य लाभकारी पद पर रहता है, तो उसे वकालत का लाइसेंस अस्थायी रूप से निलंबित करना होता है। सेवा समाप्त होने के बाद ही इसे पुनः सक्रिय किया जा सकता है। इसी संदर्भ में बीसीआई ने यह जांच शुरू की है कि क्या सभी प्रक्रियाओं का पालन किया गया था या नहीं।

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Friday, May 08, 2026

पश्चिम बंगाल और बिहार – क्या सीमावर्ती इलाकों में दिखेगा बदलाव







पश्चिम बंगाल में चुनावी नतीजों के बाद जारी हिंसा साल 2021 के विधानसभा चुनावों के बाद की हिंसा को दोहराती नज़र आ रही है। भारी तादाद में केंद्रीय बलों की तैनाती के कारण चुनाव तो लगभग हिंसा-मुक्त रहे। लेकिन नतीजों के बाद राज्य के विभिन्न इलाक़ों से लगातार हिंसा की खबरें आ रही हैं। इन खबरों के बीच पश्चिम बंगाल के सीमा से सटे बिहार के इलाकों में लोगबाग यह मान रहे हैं कि पश्चिम बंगाल में नई सरकार के आने से बिहार को बड़ा फायदा होगा।

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से पहले बिहार के पूर्णिया, अररिया, किशनंगज और कटिहार जिले पर सभी की निगाहें थी। दरअसल इन जिलों की सीमाएं बंगाल से जुड़ती है। जहां तक चुनाव की बात है तो भारतीय जनता पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व की भी इन इलाकों पर नजर थी। बंगाल को साधने के लिए बिहार के इन इलाकों की भूमिका हमेशा से अहम रही है। यही वजह है कि भाजपा ने इन इलाकों की भूमिका पहले से तय कर दी थी। बिहार से सटे विधानसभा क्षेत्र के लिए खास प्लान बनाए गए थे। इसके अलावे बड़ी संख्या में बिहार से भाजपा के कार्यकर्ताओं और नेताओं की तैनाती की गई थी। इन इलाकों के जरिए 50 से अधिक सीटों पर ध्यान रखा गया था। इनमें खास तौर पर उत्तर दिनाजपुर, मालदा और दार्जिलिंग के इलाके शामिल थे। इसके अलावा उत्तर बंगाल के कूच बिहार, जलपाईगुड़ी और अलीपुरद्वार में भी बिहार के कार्यकर्ताओं को सक्रिय भूमिका दी गई, क्योंकि 2021 में यहां भाजपा का प्रदर्शन मजबूत रहा था। भाजपा को लगभग 22 सीटों पर जीत हासिल हुई थ। 2026 में भाजपा ने सीमावर्ती इलाकों में क्लीन शुरू कर दिया और 50 से अधिक सीटों पर जीत हासिल हुई।

अब माना जा रहा है कि पश्चिम बंगाल में भाजपा की नई सरकार बनने से बिहार के सीमांचल इलाकों इलाकों में घुसपैठ और तस्करी पर रोक लगेगी। इसके अलावा वाराणसी-कोलकाता सिक्स लेन और अपर महानंदा सिंचाई परियोजनाएं भी रफ्तार पकड़ेंगी।

गौरतलब है कि बिहार में एनडीए की सरकार है और अब बंगाल में भी बीजेपी का मुख्यमंत्री होने से दोनों राज्यों के बीच लंबे समय से चले आ रहे विवादित मुद्दों पर आसानी से सहमति बन सकेगी। इसका सबसे बड़ा फायदा बिहार के सीमावर्ती जिलों को मिलेगा।

घुसपैठ और तस्करी पर लगेगी रोक
बंगाल की ममता सरकार के दौरान बिहार को घुसपैठ के मुद्दे पर सहयोग नहीं मिल पा रहा था। इसी के कारण सीमावर्ती इलाकों में यह समस्या लगातार गंभीर हो रही थी। लेकिन अब केंद्र, बिहार और बंगाल- तीनों जगह समान विचारधारा वाली सरकार होने से घुसपैठियों के खिलाफ ठोस और संयुक्त कार्रवाई की जा सकेगी। इससे न केवल अवैध रूप से आने वाले लोगों पर नकेल कसेगी, बल्कि सीमा पर होने वाली तस्करी पर भी पूर्ण रूप से रोक लगेगी।

वाराणसी-कोलकाता सिक्स लेन परियोजना पकड़ेगी रफ्तार
उत्तर प्रदेश के वाराणसी से बिहार और झारखंड होते हुए कोलकाता तक बनने वाले महत्वाकांक्षी 'सिक्स लेन राष्ट्रीय राजमार्ग' को भी अब नई गति मिलेगी। ममता सरकार के कारण बंगाल की लगभग 285 किलोमीटर की इस परियोजना पर कोई ठोस काम नहीं हो सका था, जबकि यूपी, बिहार और झारखंड में प्रक्रिया शुरू हो चुकी थी। नई सरकार के आने से यह बाधा दूर होगी, जिसके बाद सड़क बनने पर बिहार से बंगाल का सफर सिर्फ 7 घंटे में तय किया जा सकेगा।
अपर महानंदा सिंचाई और फरक्का बराज पर सकारात्मक पहल
इंफ्रास्ट्रक्चर के अलावा जल बंटवारे के मामले में भी बिहार को बड़ा फायदा होने की उम्मीद है। 1978 के समझौते के तहत 'अपर महानंदा सिंचाई परियोजना' से जुड़ी 8 किलोमीटर लंबी नहर का काम अब रफ्तार पकड़ेगा। इससे 67 हजार एकड़ कृषि भूमि को सिंचाई का पानी मिल सकेगा। वहीं, 1996 के समझौते के तहत फरक्का बराज से बांग्लादेश को पानी देने की बाध्यता पर भी राज्य सरकार ने पुनर्विचार का अनुरोध किया था। अब इस दिशा में अच्छी पहल होने की उम्मीद है, जिससे गंगा के पानी में बिहार की भागीदारी बढ़ सकेगी।

दरअसल सीमांचल केवल बिहार का एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं है, बल्कि यह भारत के पूर्वी सीमा क्षेत्र की एक महत्वपूर्ण रणनीतिक बेल्ट का हिस्सा माना जाता है। यह इलाका नेपाल और बांग्लादेश की सीमाओं के करीब है और सिलीगुड़ी कॉरिडोर से भी ज्यादा दूर नहीं है, जिसे भारत का लाइफलाइन कॉरिडोर कहा जाता है। सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि सीमा पार घुसपैठ, मानव तस्करी, ड्रग रूट और बदलते भू राजनीतिक समीकरणों के कारण यह क्षेत्र लंबे समय से सुरक्षा एजेंसियों के लिए संवेदनशील बना हुआ है।

वैसे तो चिकन नेक नाम से मशहूर सिलिगुड़ी कॉरिडोर की सुरक्षा भारत के लिए हमेशा ही चिंता का विषय रहा है। लेकिन हाल के समय में यह चर्चा में तब आया जब बांग्लादेश में हिंसा भड़कने के बाद चुनी हुई सरकार को गिरा दिया गया और प्रधानमंत्री शेख हसीना को भारत में शरण लेनी पड़ी। इसके बाद मोहम्मद यूनुस को अंतरिम सरकार का चीफ एडवाइजर बनाया गया। चीफ एडवाइजर बनने के बाद मोहम्मद यूनुस ने भारत के खिलाफ जहर उगलना शुरू कर दिया। यहां तक कि वह चीन के अम्बेसडर को सिलिगुड़ी कॉरिडोर के पास मौजूद बांग्लादेश के तीस्ता प्रोजेक्ट पर भी ले गए। यहां तक कि पाकिस्तानी जनरलों ने भी बांग्लादेश का दौरा किया और वहां से भी चिकन नेक को कट करने की बात कही गई।

सिलिगुड़ी कॉरिडोर क्षेत्र में सिलीगुड़ी, देबग्राम-फुलबारी, माटीगारा-नक्सलबाड़ी और फांसीदेवा चार सीटें आती हैं। सिलिगुड़ी विधानसबा सीट पर भाजपा प्रत्याशी शंकर घोष को 120760 वोट मिले और उन्होंने 73192 मतों से जीत दर्ज की। देबग्राम-फुलबारी सीट से भाजपा की सिखा चटर्जी ने जीत दर्ज की। उन्हें कुल 166300 मत मिले और उन्होंने 97715 वोटों से जीत हासिल की। माटीगारा-नक्सलबाड़ी में सिलिगुड़ी कॉरिडोर की सबसे बड़ी जीत हासिल हुई है। यहां पर भाजपा प्रत्याशी आनंदमय बर्मन को कुल 166905 वोट मिले और उन्होंने एक लाख से ज्यादा वोटों (104265) से जीत दर्ज की। जबकि फांसीदेवा विधानसभा क्षेत्र से भाजपा प्रत्याशी दुर्गा मुर्मू ने 45263 मतों से जीत हासिल की, उन्हें कुल मिलाकर 118241 वोट मिले। इस तरह पूरे चिकन नेक क्षेत्र की चारों सीटों पर भारतीय जनता पार्टी के प्रत्याशियों को ही जीत मिली है।

अब देखना है कि पश्चिम बंगाल की नई सरकार इन इलाकों में विकास को लेकर किस तरह का काम करती है। 


Girindra Nath Jha
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