मुझे आदमी का सड़क पार करना हमेशा अच्छा लगता है क्योंकि इस तरह एक उम्मीद - सी होती है कि दुनिया जो इस तरफ है शायद उससे कुछ बेहतर हो सड़क के उस तरफ। -केदारनाथ सिंह
Friday, October 16, 2026
क्या आपको जम्मू के बसोहली उत्सव की जानकारी है!
सनातन संस्कृति, कला और अनूठी ऐतिहासिक विरासत की भूमि बसोहल (प्राचीन नाम: विश्वस्थली) एक बार फिर अपने भव्य बसोहली उत्सव 2026 की मेजबानी के लिए पूरी तरह सज-धज कर तैयार है।
जम्मू-कश्मीर के कठुआ जिले में रावी नदी के किनारे बसा छोटा-सा पहाड़ी शहर बसोहली अपने आकार से कहीं अधिक समृद्ध विरासत को समेटे हुए है। कभी 'विश्वस्थली'के नाम से जाना जाने वाला बसोहली आस्था और तीर्थ की भूमि होने के साथ-साथ ऐतिहासिक रूप से व्यापार, वस्त्र शिल्प और भारत की प्रसिद्ध लघु चित्रकला परंपरा के प्रमुख केंद्रों में से एक रहा है।
हाल के वर्षों में इस गौरवशाली विरासत को बसोहली उत्सव के माध्यम से एक औपचारिक और वार्षिक मंच मिला है। बहुदिवसीय यह उत्सव तेजी से जम्मू क्षेत्र के महत्वपूर्ण सांस्कृतिक आयोजनों में अपनी पहचान बना रहा है।
बसोहली उत्सव की शुरुआत वर्ष 2023 में उपराज्यपाल मनोज सिन्हा द्वारा की गई थी। इसका उद्देश्य बसोहली को भारत के सांस्कृतिक मानचित्र पर उसका उचित स्थान दिलाना और इसकी गहरी ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक पहचान को राष्ट्रीय स्तर पर सामने लाना था।
इस पहल का आयोजन जम्मू-कश्मीर कला, संस्कृति एवं भाषाएँ अकादमी, जम्मू संभागीय प्रशासन, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (IGNCA) और विश्वासस्थली संगठन द्वारा संयुक्त रूप से किया जाता है। इन सरकारी सांस्कृतिक संस्थाओं और विरासत से जुड़े संगठनों ने मिलकर इस आयोजन को एक व्यापक सांस्कृतिक मंच का स्वरूप दिया है।
अपनी शुरुआत के बाद से बसोहली उत्सव लगातार आगे बढ़ रहा है। इसका तीसरा संस्करण 28 सितंबर से 2 अक्टूबर 2025 तक आयोजित किया गया था। जम्मू प्रशासन, IGNCA और अन्य संगठन द्वारा आयोजित इस संस्करण में क्षेत्र की जीवंत परंपराओं और ऐतिहासिक विरासत को प्रमुखता से प्रस्तुत किया गया। इस दौरान रामायण परंपरा पर विशेष ध्यान दिया गया और रामायण आधारित प्रदर्शनियां एवं पुस्तिकाएं, लोक कला प्रदर्शनियां, लोक नृत्य एवं गायन की राष्ट्रीय प्रतियोगिताएं, स्थानीय खेल प्रतियोगिताएं तथा विभिन्न कला और सांस्कृतिक गतिविधियां आयोजित की गईं।
बसोहली के महत्व को समझने के लिए उसके गहरे ऐतिहासिक मूल को जानना आवश्यक है। ऐतिहासिक रूप से बसोहली कठुआ जिले की एक तहसील रहा है और पवित्र रावी नदी के किनारे स्थित है। ऋग्वेद में रावी को ‘इरावती’ कहा गया है और इसे सप्त-सिंधु की सात महान नदियों में शामिल किया गया है। शिवालिक पर्वत श्रृंखलाओं के बीच स्थित बसोहली अपने वर्तमान अपेक्षाकृत छोटे स्वरूप के बावजूद प्राचीन गौरव की एक समृद्ध विरासत रखता है।
बसोहली उत्सव का आयोजन विशेष रूप से शहर की ऐतिहासिक पहचान विश्वासस्थली के रूप में पुनर्स्थापित करने के उद्देश्य से किया गया। यह पहचान उस समय की ओर संकेत करती है जब बसोहली व्यापार का एक समृद्ध केंद्र था और अपने पश्मीना ऊन उत्पादों, लघु चित्रकला तथा रणनीतिक भौगोलिक स्थिति के लिए प्रसिद्ध था। रावी नदी के किनारे अनेक मंदिरों की उपस्थिति और वहां होने वाले धार्मिक अनुष्ठानों के कारण बसोहली को लोकप्रिय रूप से “लघु काशी” अर्थात छोटी काशी या वाराणसी भी कहा जाता था।
बसोहली उत्सव के एक उद्घाटन अवसर पर उपराज्यपाल ने इसे “कला, संस्कृति और परंपरा का महाकुंभ” बताया था और कहा था बसोहली केवल मानचित्र पर स्थित एक भौगोलिक स्थान नहीं है, बल्कि यह कला, साहित्य और परंपरा से जुड़े साधकों का “ऊर्जा क्षेत्र” है।
बसोहली उत्सव को केवल एक औपचारिक समारोह के रूप में नहीं, बल्कि एक बहुदिवसीय सांस्कृतिक उत्सव के रूप में तैयार किया गया है। इसमें बसोहली शॉल बुनाई के प्रदर्शन, क्षेत्र की प्रसिद्ध जीआई-टैग प्राप्त पश्मीना ऊन शिल्प, बसोहली चित्रकला की प्रदर्शनियां और प्रत्यक्ष प्रदर्शन, क्षेत्र की ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक विरासत से जुड़ी प्रदर्शनियां, पारंपरिक नृत्य और लोक संगीत, रामलीला एवं रामायण आधारित कार्यक्रम, लोक नृत्य और गायन की राष्ट्रीय प्रतियोगिताएं, स्थानीय खेल प्रतियोगिताएं, क्षेत्रीय डोगरा व्यंजनों के खाद्य स्टॉल तथा मनोरंजक खेल और सामुदायिक गतिविधियां शामिल हैं।
बसोहली की रामलीला परंपरा को विशेष पहचान मिली है।
इस बार भी बसोहली में ऐतिहासिक रामलीला की तैयारियां जोरों पर हैं, जहाँ कलाकार बिना किसी पारिश्रमिक के रामायण के पात्रों को जीवंत कर रहे हैं। यह 114 साल पुरानी परंपरा क्षेत्र की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
बसोहली की रामलीला केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि क्षेत्र की ऐतिहासिक, धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। वर्ष 1912 में पहली बार बसोहली में रामलीला का मंचन किया गया था। इसके बाद से यह परंपरा लगातार आगे बढ़ती रही है।
उत्सव का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य पर्यटकों और तीर्थयात्रियों को भी बसोहली की सांस्कृतिक विरासत से जोड़ना है, विशेष रूप से नवरात्र के दौरान वैष्णो देवी मंदिर आने वाले यात्रियों को। इस प्रकार बसोहली उत्सव केवल स्थानीय संस्कृति का उत्सव नहीं रह जाता, बल्कि जम्मू क्षेत्र के व्यापक तीर्थ और पर्यटन परिपथ में बसोहली को जोड़ने का प्रयास भी बनता है।
बसोहली की सांस्कृतिक पहचान का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा उसकी प्रसिद्ध बसोहली चित्रकला है। इसे व्यापक पहाड़ी लघु चित्रकला शैली की प्रारंभिक शैली के रूप में देखा जाता है, जिससे आगे चलकर गुलेर, कांगड़ा, चंबा और कुल्लू जैसी शैलियां विकसित हुईं। बसोहली शैली स्थानीय शासकों संग्राम पाल (1635–1673) और बाद में किरपाल पाल (1678–1693) के संरक्षण में विकसित हुई। इस परंपरा को प्रमुख कलाकारों देविदास और बाद में मनाकू ने आगे बढ़ाया।
बसोहली चित्रकला के प्रारंभिक ज्ञात उदाहरणों में देविदास द्वारा 1694 ईस्वी में बनाई गई रसमंजरी की चित्रावली महत्वपूर्ण मानी जाती है। वहीं 1730 ईस्वी की मनाकू की गीत गोविंद श्रृंखला इस शैली के परिष्कार को दर्शाती है। प्रारंभिक बसोहली चित्रों में पश्चिमी भारत की चौरपंचाशिका शैली से समानता दिखाई देती थी, लेकिन समय के साथ यह एक विशिष्ट और जीवंत पहाड़ी कला शैली के रूप में विकसित हुई।
बसोहली चित्रकला अपने रंगों और रेखाओं की प्रभावशाली जीवंतता के लिए जानी जाती है। इसमें विशेष प्रकार का चित्र प्रारूप, वास्तु संबंधी विवरण और लाल सीमाएं दिखाई देती हैं। चित्रों में चेहरे प्रायः पार्श्व रूप में दिखाए जाते हैं और बड़ी, तीव्र अभिव्यक्ति वाली आंख उनकी विशेष पहचान होती है। चमकीला गेरुआ पीला, भूरा और हरा रंग इसकी रंग योजना में प्रमुख हैं। रंग और भावनाओं की इसी तीव्रता के कारण जर्मन विद्वान डॉ. हरमन गोल्ट्ज़ ने बसोहली चित्रों को “भारतीयों की महान उपलब्धियों में से एक” बताया था।
बसोहली कला की केंद्रीय प्रेरणा वैष्णव परंपरा है। इसके चित्रों में महान महाकाव्यों और पुराणों से विषय लिए गए हैं। इसके साथ ऐतिहासिक, समकालीन, साहित्यिक और अन्य विषय भी चित्रित किए गए। इन चित्रों में गहरी भावनात्मक तीव्रता के साथ बसोहली के प्राकृतिक परिवेश की काव्यात्मक अनुभूति दिखाई देती है। इन्हें सुंदर रूप से “रंगों में कविताएं” कहा गया है।
आधुनिक समय में बसोहली चित्रकला को औपचारिक पहचान मिली और इसे भौगोलिक संकेतक (GI) टैग प्राप्त हुआ। यह जम्मू क्षेत्र के हस्तशिल्प के लिए जीआई पंजीकरण के इतिहास में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि थी। इसके साथ बसोहली पश्मीना ऊनी वस्तुओं को भी मान्यता मिली। आज यह कला केवल संग्रहालयों तक सीमित नहीं है, बल्कि पारंपरिक रूप से आज भी जीवित है। इसकी निरंतर कलात्मक परंपरा मनिकांठ परिवार से जुड़ी है, जिसके कलाकार मुगल दरबार से यहां आए थे। इस परंपरा को आज प्रसिद्ध कलाकार प्रकाश चंद मनिकांठ आगे बढ़ा रहे हैं।
बसोहली की कला परंपरा से जुड़े प्रमुख व्यक्तित्वों में देविदास, जो 1694 की रसमंजरी चित्रावली के लिए प्रसिद्ध हैं; मनाकू, जो 1730 की गीत गोविंद श्रृंखला के लिए जाने जाते हैं; आनंद कुमार कूमारस्वामी, जिन्होंने बसोहली चित्रकला को वैश्विक विद्वत जगत के ध्यान में लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई; तथा राजा संग्राम पाल और राजा किरपाल पाल, जिनके संरक्षण में यह कला शैली विकसित हुई, शामिल हैं। समकालीन समय में प्रकाश चंद मनिकांठ इस पारंपरिक चित्रकला के प्रमुख संरक्षक हैं। वहीं उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने वर्ष 2023 में बसोहली उत्सव की परिकल्पना की और इसकी शुरुआत की।
बसोहली उत्सव केवल कैलेंडर में दर्ज एक सांस्कृतिक आयोजन नहीं है, बल्कि यह सांस्कृतिक पुनर्स्थापना का एक प्रयास है। चित्रकला, वस्त्र शिल्प, नृत्य, रंगमंच और तीर्थ-पर्यटन को एक मंच पर लाकर यह उत्सव आधुनिक पीढ़ी को उस शहर की विरासत से जोड़ने का प्रयास करता है, जिसने कभी भारतीय कला के इतिहास को प्रभावित किया था।
रावी नदी के दाहिने तट पर बसे इस खूबसूरत शहर में आगामी 19 से 21 अक्टूबर तक तीन दिवसीय सांस्कृतिक महाकुंभ का आयोजन किया जा रहा है। यह महोत्सव न केवल डोगरा संस्कृति और कलात्मक धरोहरों का अद्भुत संगम है, बल्कि इसका सीधा जुड़ाव पर्यटन को वैश्विक मानचित्र पर स्थापित करने से है। माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने भी अपने कार्यक्रम 'मन की बात' में बसोहली उत्सव की अनूठी सांस्कृतिक पहचान की सराहना की थी।
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