बच्चों को प्रकृति से जोड़ने का प्रयास हर व्यक्ति को करना चाहिए, खासकर खेती- बाड़ी की दुनिया से शहरी बच्चों को रूबरू कराते रहना चाहिए। भागमभाग भरी जीवन शैली में किसानी की दुनिया से नई पीढ़ी को परिचित कराना भी हम सबका काम है। इसी कड़ी में गांव में धनरोपनी उत्सव को करीब से बच्चों को दिखाने का काम किया गया, जिसकी शुरुआत एक दशक पहले चनका रेसीडेंसी ने की थी।
हमारे यहां धान को बेटी का दर्जा प्राप्त है। धान हमारे लिए फसल भर नहीं है, वो हम सबके लिए ‘धान्या’ है। धान की बाली हमारे घर को ख़ुशी से भर देती है। साल भर वो कितने प्यार से हमारे घर आँगन को सम्भालती है। आँगन के चूल्हे पर भात बनकर या दूर शहरों में डाइनिंग टेबल पर प्लेट में सुगंधित चावल बनकर, धान सबका मन मोहती है।
हमारे अंचल में पहले धान का नाम बहुत ही प्यारा हुआ करता था, मसलन 'पंकज' 'मनसुरी', 'जया', 'चंदन', 'नाज़िर', 'पंझारी', 'बल्लम', 'रामदुलारी', 'पाखर', 'बिरनफूल' , 'सुज़ाता', 'कनकजीर' , 'कलमदान' , 'श्याम-जीर', 'विष्णुभोग' आदि। समय के साथ हाइब्रीड ने किसानी की दुनिया बदल दी। एक किसान के तौर पर मन तो यही करता है कि उन पुराने बीज को इकट्ठा कर पूर्णिया का बीज बैंक बनाया जाए, जहां हम अपने अंचल के धान को एक ब्रांड के तौर पर पेश करते।
बीज बैंक के बारे में लिखते हुए मुझे असम के जोरहाट के किसान मोहान चन्द्र बोरा याद आ रहे हैं। उन्होंने अन्नपूर्णा सीड लाइब्रेरी बनाई है, जहां धान की 270 किस्म के बीज हैं।
धान की रोपनी और कटाई की बात जब भी होती है तो मन में कई गीत भी गूंजने लगते हैं जो अब खेत में सुनाई नहीं देते हैं। सुख की तलाश हम फसल की तैयारी में ही करते हैं। एक गीत पहले सुनते थे, जिसके बोल कुछ इस तरह हैं -
"सब दुख आब भागत, कटि गेल धान हो बाबा..."
हम खेती किसानी दुनिया के लोग अन्न की पूजा करते हैं। धान की जब भी बात होती है तो जापान का जिक्र जरूर करता हूं। जापान के ग्रामीण इलाक़ों में धान-देवता इनारी का मंदिर होता ही है।
जापान में एक और देवता हैं, जिनका नाम है- जीजो। जीजो के पांव हमेशा कीचड़ में सने रहते हैं। कहते हैं कि एक बार जीजो का एक भक्त बीमार पड़ गया, भगवान अपने भक्तों का खूब ध्यान रखते थे। उसके खेत में जीजो देवता रात भर काम करते रहे तभी से उनके पांव कीचड़ में सने रहने लगे।
धान हमारे घर में ख़ुशहाली लाती है। मंहगाई और तमाम तरह की राजनीतिक उलट-बांसी के बीच किसानी की बात हमें उम्मीद से भर देती है और हम पूर्णिया से असम और जापान की बात करने लगते हैं जिसके केंद्र में केवल और केवल धान ही है।
जापान की दो प्रमुख कम्पनियां होंडा और टोयोटा का अर्थ धान होता है। होंडा का मतलब मुख्य धान खेत और टोयोटा का मतलब बम्पर फसल वाला धान खेत। जापान में एक हवाई अड्डा है- नरीटा, इसका अर्थ है लहलहाता धान खेत।
दरअसल जापान में धान को प्रधानता दी जाती है। ऐसी बात नहीं है कि वहां अन्य फसलों की खेती नहीं होती है लेकिन यह बड़ी बात है कि वहां खेत का अर्थ धान के खेत से जुड़ा है। वहां धान की आराधना की बड़ी पुरानी परंपरा है।
हम भी धान को कम स्नेह नहीं देते। हमारे यहां तो धान को बेटी का दर्जा प्राप्त है। धान हमारे घर में ख़ुशहाली लाती है। बौद्ध साहित्य से पता चलता है कि गौतम बुद्ध के पिता का नाम था- शुद्धोदन यानी शुद्ध चावल। वट वृक्ष के नीचे तप में लीन गौतम बुद्ध ने एक वन-कन्या सुजाता के हाथ से खीर खाने के बाद बोध प्राप्त किया और बुद्ध कहलाए. इस कहानी को पढ़कर लगता है शायद इसी वजह से 70 के दशक में पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के कुछ इलाक़ों में एक पुरानी नस्ल की धान का नाम 'सुज़ाता' होगा। इस धान का चावल बहुत ही सुगन्धित हुआ करता था।
गूगल करिएगा तो पता चलेगा कि दुनिया का 90 प्रतिशत धान एशिया में ही उगाया और खाया जाता है। धान के पौधे को हर तरह की जलवायु पसंद है. नेपाल और भूटान में 10 हजार फुट से ऊंचे पहाड़ हों या केरल में समुद्रतल से भी 10 फुट नीचे पाताल-धान दोनों जगह लहराते हैं। ऐसे में जापान ने धान और धान के खेतों की जो ब्रांडिंग की है इसपर गंभीरता से विचार करना चाहिए।
वैसे आपने कभी इस बात का पता लगाया है कि धान के नाम पर अपने देश में कोई कंपनी है या फिर कोई व्यावसायिक प्रतिष्ठान है? सारी लड़ाई अन्न को लेकर है। हम सभी अपनी ज़िंदगी सुख-चैन से जीने के लिए मेहनत करते हैं ताकि डाइनिंग टेबल पर हम भोजन कर सकें और दूसरों को भी खिला सकें लेकिन दूसरी ओर खेतों में लहलहाती फ़सलों के नाम पर क्या हम किसी कम्पनी का नाम नहीं रख सकते? या अपने घर का नाम हम धान- गेहूं- मक्का- गन्ना के उन्नत नस्लों के नाम पर नहीं रख सकते?
खेती – किसानी की दुनिया से नई पीढ़ी को करीब लाने के उदेश्य से 2014 में जब चनका रेसीडेंसी ने धनरोपनी उत्सव की शुरुआत की थी तो इस बात अंदाजा नहीं था कि यह कारवां बढ़ता ही चला जाएगा। इस बार भी हमने धन-रोपनी महोत्सव आयोजित किया। इस बार की धन रोपनी कई मायनों में खास रही क्योंकि इसमें बिहार बाल भवन किलकारी के कला प्रेमी बच्चों ने न केवल हिस्सा लिया बल्कि धान रोपाई से सम्बन्धित गीतों को अपनी आवाज़ भी दी।
धान के बहाने यह कहानी हमने इसी कारण सुनाई क्योंकि अन्न ही जीवन है और अन्न को हम सबके घर तक पहुंचाने वाले किसानी दुनिया के लोगों के जीवन से हम सब दूर होते जा रहे हैं। ऐसे में जब भी आप बरसात के इस मौसम किसी गांव के करीब से गुजरिएगा तो एक बार जरूर किसी खेत के पास ठहरने का काम करिएगा, ताकि आप भी समझ सकें, कैसी है किसानों की दुनिया, किस रंग में हैं धान के खेत !
Girindra Nath Jha
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www.merizindagi.com ki or se apko aisa post likhne ke liye dhanvyad
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