| फोटो, साभार गूगल |
शुक्रिया
गिरीन्द्र
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मुखर्जी नगर के उस कमरे में रेडियो और किताब के अलावा उसकी आवाज को सहेजकर रखने के लिए भी 'जगह' थी। उसकी आवाज जब भी सुनता, कैंप से नार्थ कैंपस की ओर जाने वाली सड़क पर रुई धुनने वाली दुकान की याद ताजा हो जाती। दुकान में उड़ते हुए रुई के फाहे याद आने लगते। ऐसा लगता मानो उसकी सांसें नर्म नाजुक फाहों की तरह आस पास उड़ रही हो और मैं उन फाहों को गुलजार की किताब 'यार जुलाहे' में सहेज कर रख रहा हूं। (रवीश मैनिया)
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और आज जब उसी शाम ने फिर से दस्तक दे ही दी है तो एक बात कहूं, मैंने आज बरस भर का बसंत तुम्हारे नाम कर दिया है। सुबह की डाक का इंतजार करना, बस कबूल कर लेना। (रवीश मैनिया)
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हम दोनों को ही एकांत बहुत पसंद रहा। मुखर्जीनगर के उस दो कमरे वाले 'मकान' में हम दोनों दिन भर 'घर' में ही रहते थे, अपने-अपने कमरे में। हमारे दरवाजे खुले ही रहते। खुले दरवाजों वाले कमरों में एक दूसरे के अस्तित्व का अहसास होता था पर कोई दखल नहीं। हम दोनों एकांत में लिखते थे, अपने-अपने हिस्से के मन के लिए। (रवीश मैनिया)
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सच कहूं, मुझे गोता लगाना कभी नहीं आया, यदि आता तो कुछ पत्थर संग लाता ताकि उन पत्थरों को भी तुम्हारे स्पर्श से प्यार हो जाता। लेकिन मुझे तो बस डूबना आया, वो भी तुम्हारे लिए। जब भी होश बेखबर हुए तुम्हारे बगैर, मैं डूब गया। जानती हो, मेरा डूबना ही तुम्हें पाने की सीढ़ी रही। डूबते हुए सुबह को शाम तुमने ही किया था, याद है न उस दिन, जब तुम्हरी जुल्फ झुकी थी, तो सुबह भी शाम हो गई थी। (रवीश मैनिया)
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मुखर्जीनगर के चावला रेस्टोरेंट में उसने मसाला डोसा के प्लेट पर ऊंगलियां चलाते हुए कहा, "क्या सचमुच तुमने शहर छोड़ने का मन बना लिया है?" उसके सवाल पर मैंने मुस्कुरा दिया। तभी उसने झट से प्लेट से हाथ हटाकर मेरे ऊंगलियों को छूते हुए कहा- "ऐसे तो तेरी ना में भी मैंने ढूंढ ली अपनी खुशी, तू जो गर हां करे तो बात होगी और ही..." यह सुनकर मैंने बस उसका हाथ थाम लिया। (रवीश मैनिया)
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मेरे चांद के माफिक तुम्हें भी छिपना आ गया... (रवीश मैनिया)
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दिल्ली के आईटीओ चौराहे पर लाल बत्ती पर हमारी गाड़ी रुकती है। एक बे-मौसम बारिश, शाम के वक्त बारिश रुकी ही थी। तभी एक छोटी बच्ची हाथ में सफेद फूलों के गजरे लिए हाजिर होती है। हमदोनों की तरफ गजरा बढाती है। मैं कहता हूं- अरे ये तो बेली फूल है न..सुगंध देखो...। तभी गा़ड़ी में एफएम गोल्ड गूंज उठता है- " फूल के हार, फूल के गजरे शाम फूलों की बात फूलों की.... आपका साथ, साथ फूलों का ..आपकी बात बात फूलों की...।" बच्ची के हाथ से गजरा अब हमदोनों के हाथों में था, बारिश के बाद उसकी हंसी में भी बेली की महक आ रही थी। (रवीश मैनिया)
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मॉल रोड से नार्थ कैंपस में दाखिल होते ही, ठीक मानसरोवर हॉस्टल के आगे वह मिलती है। फरवरी के गुनगुनी धूप में हमें जाने क्यों उस छाते पर तरस आता है, जो उसके बाएं हाथ को थामे था। तभी मेरे मन के भीतर बारिश का खयाल आता है। उसके हाथों को थामे कह ही देता हूं "जानती हो, बारिश करवानी है बस तुम्हारी इस सतरंगी छतरी के लिए, उस दिन तुम्हारी ही छतरी भींगेगी.. तुम नहीं.।" उसने धीमे से कहा- "अबके सावन उस बारिश के लिए दुआ करुंगी...।" (रवीश मैनिया)
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जनवरी गुजरने को बेताब थी, बसंत में मन में राग बसंत गूंज रहा था लेकिन सर्दी की धमक जारी थी। इस बीच हम दोनों अपने हिस्से के धूप के लिए मुखर्जी नगर के उस पार्क में पहुंचे, जो दो मोहल्ले को आपस में जोड़ती थी। उस दिन दोपहरिया की धूप सच में कयामत ढा रही थी। हमने एक दूसरे की आंखों को धूप का स्वाद चखते देखा। तभी वह धीरे से बोली- उजाले में तुम्हारी आंखों का रंग बिल्कुल बदल जाता है। क्या आंखों को भी धूप लग गई है...? " (रवीश मैनिया)
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वह आज आसमां की बातें कर रही थी, ऐसा लग रहा था मानो मुझे इकोनोमिक्स पढ़ा रही हो। मुखर्जी नगर के बत्रा सिनेमा की सीढ़ियों पर चढ़ते हुए उसने कहा- "चांद और सूरज को देखो न, दोनों एक दूसरे से कितने सहज हैं। एक जब आसमां में खो जाता है, तो दूसरा सामने आ जाता है।" मुझसे रहा न गया, पूछ बैठा- "जब दोनों साथ-साथ सामने आ जाएंगे तो क्या होगा"? उसके चेहरे पर मुस्कान की रेखाएं खींच आईं, हाथ थामे उसने धीरे से कहा- 'चलो सुहाना भरम तो टूटा...' (रवीश मैनिया)
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हम चुप थे लेकिन दोनों का मन बोल रहा था। दिल्ली की सर्दी में पीयूष मिश्रा के बोल (फिल्म गुलाल) याद आ रहे थे- "बढ़ती हवाओं के झोंकों से दिल में नगमा कोई ला भी दो..।" तभी वह बोल उठी- "खोने की जिद में क्यूं भूलते हो पाना भी होता है।" इस बीच ठंड बढ़ती ही जा रही थी, आगे खालसा कॉलेज दिख रहा था, कोहरे की चादर "लिफाफे" की माफत हमदोनों को कैद करने के जुगत में थी। ठीक उसी पल मानसरोवर होस्टल के ठीक सामने हमने उसके हाथों को थाम लिया, मानो लिफाफे के ऊपर किसी ने 'स्टाम्प' चस्पा कर दिया हो। (रवीश मैनिया)
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मुखर्जी नगर के उस कमरे में अजीब सी चुप्पी छाई थी, जो कमरे की सुंदरता में चार चांद लगा रही थी। तभी मैंने चुप्पी तोड़ते हुए पूछा- "तुम्हारी चुप्पी तुम्हें कैसी लगती है?" सवाल सुनकर वह मुस्कुराने लगी फिर धीरे से बोली- "तुम्हारे रेणु तुम्हें कैसे लगते हैं?" मैंने जवाब देना उचित समझा और कहा- "गुलजार के चांद की तरह।" हम दोनों मुस्कुराने लगे, कमरे की चुप्पी भी आड़ी-तिरछी होकर मुस्कुराने लगी थी..। (रवीश मैनिया)
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6 comments:
ये मैनिया शब्द हिन्दी की किसी मैना से तो नहीं आया ? पर्त दर पर्त खूबसूरत एहसास छूते हुए से लगते हैं , फुहारों में भीगने जैसा कुछ कुछ
har kahani me apni ek alag khushboo hai, mithas hai. Bas baar-baar padhne ko mann karta hai :)
क्या बात है ..खूबसूरत मैनिया ..
और आज जब उसी शाम ने फिर से दस्तक दे ही दी है तो एक बात कहूं, मैंने आज बरस भर का बसंत तुम्हारे नाम कर दिया है। सुबह की डाक का इंतजार करना, बस कबूल कर लेना.... badhiya bhai
Imandari ki kamai moti hoti hai...
exam me full lane ki ummeed choti hoti hai ...
naye dost chahe jitne bhi bana do ..
Purane kamino ki baat hi kuch aur hoti hai ...
अजीब से यादों की और अनुभवों की दुनिया में ले जात है आप भाई साहब...आज सोचा की इस Mania inspired गध्य में कुछ मुस्कुरा लूं,कमबख्त हंसी तो आई पर आंसुओं के साथ ||
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