कबीर, जिन्हें पढ़ते वक्त खोने का अहसास होता है। आज जब कौन ठगवा नगरिया लूटल हो पढ़ रहा था, तब मुझे अपने गांव में निरगुण गाने वाले अनहद की याद आ गई। वह इसे जब सस्वर सुनाता है तो आंखे खुलती नहीं रहती है। वह खासकर कबीर की इस पंक्ति पर जोर देता है-चंदन काठ के बनल खटोला/ता पर दुलहिन सूतल हो। ...आज आप भी पढिए और मन ही मन गुनगुनाइए भी-
शुक्रिया
गिरीन्द्र
कौन ठगवा नगरिया लूटल हो ।।
चंदन काठ के बनल खटोला
ता पर दुलहिन सूतल हो।
उठो सखी री माँग संवारो
दुलहा मो से रूठल हो।
आये जम राजा पलंग चढ़ि बैठा
नैनन अंसुवा टूटल हो
चार जाने मिल खाट उठाइन
चहुँ दिसि धूं धूं उठल हो
कहत कबीर सुनो भाई साधो
जग से नाता छूटल हो
मुझे आदमी का सड़क पार करना हमेशा अच्छा लगता है क्योंकि इस तरह एक उम्मीद - सी होती है कि दुनिया जो इस तरफ है शायद उससे कुछ बेहतर हो सड़क के उस तरफ। -केदारनाथ सिंह
Thursday, October 29, 2009
Tuesday, October 27, 2009
मन लाग्यो मेरो यार फ़कीरी में
इन दिनों कबीर को पढ़ रहा हूं। मन लाग्यो मेरो यार फ़कीरी ..पढ़ते वक्त उनसे नजदीकी बढ़ जाती है। कबीर की वाणी का संग्रह 'बीजक' के नाम से प्रसिद्ध है। इसके तीन भाग हैं- रमैनी, सबद और साखी यह पंजाबी, राजस्थानी, खड़ी बोली, अवधी, पूरबी, ब्रजभाषा आदि कई भाषाओं की खिचड़ी है। मूर्त्ति पूजा को लक्ष्य करते हुए उन्होंने कहा था- पाहन पूजे हरि मिलैं, तो मैं पूजौं पहार। वा ते तो चाकी भली, पीसी खाय संसार। लेकिन अभी पढिए- मन लाग्यो मेरो यार फ़कीरी में..
शुक्रिया
गिरीन्द्र
जो सुख पाऊँ राम भजन में
सो सुख नाहिं अमीरी में
मन लाग्यो मेरो यार फ़कीरी में ॥
भला बुरा सब का सुनलीजै
कर गुजरान गरीबी में
मन लाग्यो मेरो यार फ़कीरी में ॥
आखिर यह तन छार मिलेगा
कहाँ फिरत मग़रूरी में
मन लाग्यो मेरो यार फ़कीरी में ॥
प्रेम नगर में रहनी हमारी
साहिब मिले सबूरी में
मन लाग्यो मेरो यार फ़कीरी में ॥
कहत कबीर सुनो भयी साधो
साहिब मिले सबूरी में
मन लाग्यो मेरो यार फ़कीरी में ॥
शुक्रिया
गिरीन्द्र
जो सुख पाऊँ राम भजन में
सो सुख नाहिं अमीरी में
मन लाग्यो मेरो यार फ़कीरी में ॥
भला बुरा सब का सुनलीजै
कर गुजरान गरीबी में
मन लाग्यो मेरो यार फ़कीरी में ॥
आखिर यह तन छार मिलेगा
कहाँ फिरत मग़रूरी में
मन लाग्यो मेरो यार फ़कीरी में ॥
प्रेम नगर में रहनी हमारी
साहिब मिले सबूरी में
मन लाग्यो मेरो यार फ़कीरी में ॥
कहत कबीर सुनो भयी साधो
साहिब मिले सबूरी में
मन लाग्यो मेरो यार फ़कीरी में ॥
Saturday, October 24, 2009
रैंप पर कैटवॉक करती भैंस...
क्या आपने कभी रैंप पर भैंस को कैटवॉक करते देखा है? शायद नहीं, लेकिन बिहार के मधेपुरा जिले में गुरुवार को कई लोगों ने रैंप पर मॉडल बनीं भैंस को कदम से कदम मिलाकर चलते देखा। अभी तक मुझे भी इसकी जानकारी नहीं थी लेकिन हमारे एक सहयोगी ने जब पटना से मेल किया तो जाकर विश्वास हुआ कि भैंस भी कैटवॉक कर सकती हैं।
मधेपुरा जिला मुख्यालय से करीब 20 किलोमीटर दूर साहुगढ़ गांव में गुरुवार को भैंसों के लिए विशेष रूप से एक फैशन शो का आयोजन किया गया था। शो में मॉडल बनी भैंसों ने रैंप पर सजधर कर अपने 'सौंदर्य' की नुमाइश की। कार्यक्रम के अंत में भैंसों को पुरस्कार भी दिया गया।
इस फैशन शो के आयोजनकर्ता प्रभात रंजन ने कहा , "शो में जया, माधुरी, राधा, शिल्पा सहित एक दर्जन भैंसों ने भाग लिया। इन भैंसों को शो में भाग लेने के पहले स्नान करवाया गया था और उन्हें लाल और पीले रंग के आकर्षक कपड़े भी पहनाए गए थे।"
रंजन ने बताया कि कोसी के इलाके में पशुपालकों को प्रोत्साहित करने के लिए इस तरह के फैशन शो का आयोजन लगातार किया जाएगा। उन्होंने बताया, "राधा नाम की भैंस के आकर्षक पहनावे और उसकी शालीनता को देखते हुए उसे विजेता घोषित किया गया और प्रथम पुरस्कार के रूप में 501 रुपये का इनाम भी दिया गया। वहीं दूसरे स्थान पर रहने वाली प्रतियोगी को 301 रुपये तथा तृतीय स्थान पर रहने वाली प्रतियोगी को 101 रुपये का पुरस्कार दिया गया।"
पुरस्कार की राशि प्रतिभागी भैंसों के पालकों को दी गई। इस कार्यक्रम को देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग उपस्थित थे।
उल्लेखनीय है कि पिछले वर्ष कोसी नदी में आई विनाशकारी बाढ़ के बाद इन क्षेत्रों के पशुपालकों को काफी नुकसान उठाना पड़ा था, जिसके बाद अधिकांश लोगों ने यहां पशुपालन करना ही छोड़ दिया।
(यह जानकारी मिली- आईएएनएस के पटना संवाददाता मनोज पाठक से)
मधेपुरा जिला मुख्यालय से करीब 20 किलोमीटर दूर साहुगढ़ गांव में गुरुवार को भैंसों के लिए विशेष रूप से एक फैशन शो का आयोजन किया गया था। शो में मॉडल बनी भैंसों ने रैंप पर सजधर कर अपने 'सौंदर्य' की नुमाइश की। कार्यक्रम के अंत में भैंसों को पुरस्कार भी दिया गया।
इस फैशन शो के आयोजनकर्ता प्रभात रंजन ने कहा , "शो में जया, माधुरी, राधा, शिल्पा सहित एक दर्जन भैंसों ने भाग लिया। इन भैंसों को शो में भाग लेने के पहले स्नान करवाया गया था और उन्हें लाल और पीले रंग के आकर्षक कपड़े भी पहनाए गए थे।"
रंजन ने बताया कि कोसी के इलाके में पशुपालकों को प्रोत्साहित करने के लिए इस तरह के फैशन शो का आयोजन लगातार किया जाएगा। उन्होंने बताया, "राधा नाम की भैंस के आकर्षक पहनावे और उसकी शालीनता को देखते हुए उसे विजेता घोषित किया गया और प्रथम पुरस्कार के रूप में 501 रुपये का इनाम भी दिया गया। वहीं दूसरे स्थान पर रहने वाली प्रतियोगी को 301 रुपये तथा तृतीय स्थान पर रहने वाली प्रतियोगी को 101 रुपये का पुरस्कार दिया गया।"
पुरस्कार की राशि प्रतिभागी भैंसों के पालकों को दी गई। इस कार्यक्रम को देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग उपस्थित थे।
उल्लेखनीय है कि पिछले वर्ष कोसी नदी में आई विनाशकारी बाढ़ के बाद इन क्षेत्रों के पशुपालकों को काफी नुकसान उठाना पड़ा था, जिसके बाद अधिकांश लोगों ने यहां पशुपालन करना ही छोड़ दिया।
(यह जानकारी मिली- आईएएनएस के पटना संवाददाता मनोज पाठक से)
Saturday, October 17, 2009
दीवाली में आई याद
बरसों, कि याद नहीं कब था
दीवाली में अपने घर पे।
शायद 12 साल पहले घर पर
अपने लोगों के साथ दीप जलाया था।
कुछ-कुछ याद है लेकिन तंदरूस्त याद नहीं..
पटाखों की आवाज यहां भी सुनता हूं
लेकिन अपने शहर की मिरचया पटाखे की तरह नहीं।
बमों, फूलझड़ियों से मोहल्ले को गुलजार करते बच्चे
फिर सुबह में बचे पटाखों को सड़कों पर खोजते बच्चे..
कितना अच्छा लगता था, उन बच्चों को देखना
पटाखों की गंध सुबह तक हमारे साथ रहती थी।
वो हुका-हुकी..जो हम खेला करते थे
वो तो बस अब याद का हिस्सा है
संठी की बनी हुका-हुकी और उसे जलाने का आनंद
बस पुराने अनुभवों की तरह ही रह गया है।
दिल्ली की भी दीवाली कोई बुरी नहीं है
यह भी रास आता है पर लगता है
जैसे पैसों से ही यहां दीवाली होती है..
चमचम करते पैक में बंद गिफ्ट..
ये सब कहां होता है अपने शहर में...
इसी बीच अजय ब्रह्मात्मज चैट पर कहते हैं
"दीप पर्व में अक्षर रोशन करें"
दीवाली में अपने घर पे।
शायद 12 साल पहले घर पर
अपने लोगों के साथ दीप जलाया था।
कुछ-कुछ याद है लेकिन तंदरूस्त याद नहीं..
पटाखों की आवाज यहां भी सुनता हूं
लेकिन अपने शहर की मिरचया पटाखे की तरह नहीं।
बमों, फूलझड़ियों से मोहल्ले को गुलजार करते बच्चे
फिर सुबह में बचे पटाखों को सड़कों पर खोजते बच्चे..
कितना अच्छा लगता था, उन बच्चों को देखना
पटाखों की गंध सुबह तक हमारे साथ रहती थी।
वो हुका-हुकी..जो हम खेला करते थे
वो तो बस अब याद का हिस्सा है
संठी की बनी हुका-हुकी और उसे जलाने का आनंद
बस पुराने अनुभवों की तरह ही रह गया है।
दिल्ली की भी दीवाली कोई बुरी नहीं है
यह भी रास आता है पर लगता है
जैसे पैसों से ही यहां दीवाली होती है..
चमचम करते पैक में बंद गिफ्ट..
ये सब कहां होता है अपने शहर में...
इसी बीच अजय ब्रह्मात्मज चैट पर कहते हैं
"दीप पर्व में अक्षर रोशन करें"
Tuesday, October 13, 2009
यहां गांव नहीं जीवन डूबा है...
इस समय पूरा मुल्क तीन राज्यों में हो रहे मतदान में उलझा हुआ है। इस बीच आंध्र और कर्नाटक में आई भीषण बाढ़ को जैसे हम भूलते जा रहे हैं। हम मतदान को लेकर एक से बढ़कर एक लीड खबर बनाकर परोस रहे हैं। लेकिन इस बीच में हम बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों को छोड़ते जा रहे हैं। ठीक ऐसा ही कोसी के साथ भी हुआ था। बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के संवाददाता उमर फ़ारुक बाढ़ से तबाह हो गए आंध्रप्रदेश के ऐतिहासिक महत्व वाले कस्बे आलमपुर से लौटे हैं । उनकी रपट को पढ़िए और जरा सोचिए॥
गिरीन्द्र
आंध्रप्रदेश में महबूबनगर ज़िले का आलमपुर क़स्बा अब तक अपने प्राचीन मंदिरों के लिए मशहूर था पर अब वो लगभग पूरी तरह से मिट चुका है।
तुंगभद्रा और कृष्णा नदियों के संगम क्षेत्र में स्थित इस 20 हज़ार की आबादी का यह कस्बा भीषण बाढ़ में पूरी तरह डूब गया था और लगभग दो सप्ताह बाद भी वहां ठहरे हुए बाढ़ के गंदे पानी, मलबे, कीच और दुर्गंध ने स्थानीय लोगों के लिए वापस लौटना असंभव बना दिया है।
जहाँ कुछ परिवारों ने साहस का प्रदर्शन करते हुए वहां लौटने, अपने घर साफ़ करके एक नए सिरे से जीवन प्रारंभ करने की कोशिश की हैं, वहीं आलमपुर की आबादी का अधिकतर हिस्सा अभी यहाँ से पांच किलोमीटर दूर एक स्कूल में शरण लिए हुए हैं और किसी कीमत पर वापस जाने के लिए तैयार नहीं है।
आलमपुर के बीचोबीच स्थित गांधीजी की मूरत तो बाढ़ के पानी से बाहर निकल चुकी है लेकिन जितना आप इस कस्बे के अंदर जाएंगे, उतना ही पानी का स्तर और कीचड़ की गहराई बढ़ती जाएगी। दुर्गंध बर्दाश्त से बाहर होने लगेगी.
नौ प्राचीन शिव मंदिरों का झुरमुट, जो क़रीब 1300 वर्ष पुराने बताए जाते हैं, दक्षिण काशी कहे जाने वाले इस कस्बे की सीमा पर स्थित हैं। बड़ी दीवार से तुंगभद्रा के पानी को रोकने वाला यह इलाका आज पूरी तरह से जलमग्न है.
दिलचस्प बात यह है कि हिंदू समुदाय के लिए धार्मिक महत्व रखने वाले आलमपुर में हमेशा ही आधे से ज़्यादा आबादी मुस्लिम समुदाय की रही है और दोनों समुदाय हमेशा की तरह अब की बार भी प्राकृतिक आपदा की यह मार मिलजुलकर झेल रहे हैं।
मैं जब आलमपुर पहुंचा तो मुझे थोड़ी ही दूरी पर घुटनों भर पानी में कीचड़ से लथपथ खड़े सलाम मियां दिखाई दिए। उन्होंने कहा, "मैंने अपने जीवन में इतना पानी कभी नहीं देखा. अब हमारे पास कुछ नहीं रह गया है. अब हम कैसे ज़िंदा रहें, कुछ समझ नहीं आ रहा है. कुछ अच्छे लोग हमें खाना दे रहे हैं लेकिन ज़िंदगी इस तरह तो नहीं गुज़र सकती."
सलाम मियां की आँखें आंसुओं से भारी हो गई थीं और बात करना मुश्किल हो गया था।
दर्द, दुख और रोष
इस कस्बे का हर आदमी गुस्से और दुख की मिलीजुली भावनाओं में डूबा हुआ मिला। चाहे वो 27 वर्ष के मारुति वैंकटनारायणा रहे हों या 90 वर्षीय जैनब खातून, हर एक की यही मांग थी कि नया आलमपुर एक नई जगह बसाया जाना चाहिए जहाँ वो कृष्णा और तुंगभद्रा नदियों की बाढ़ से बचा रहे.आलमपुर के लगभग सभी वासी अपनी ज़िन्दगी भर की कमाई से वंचित हो गए हैं और अब उन के पास शरीर पर कपड़ों के अलावा कुछ नहीं बचा है.
आलमपुर के लोग कई कारणों से सरकार से नाराज़ हैं। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि प्रशासन ने समय रहते बाँध के दरवाज़े नहीं खोले और बांध के पिछले हिस्से के पानी से बाढ़ आ गई.
अस्सी वर्षीय कोटाम्मा का परिवार उन चंद घरों में से एक था जो हिम्मत करके सफाई की कोशिश में लगे थे. कोटाम्मा ने बाढ़ से नष्ट अपने घर की ओर इशारा करते हुए कहा, "क्या एक दिन पहले हमें चेतावनी देना सरकार का काम नहीं था. उनकी लापरवाही का परिणाम हमें भुगतना पड़ रहा है."
दो बहनों चाँद बी और आयशा का कहना था की बाढ़ में उन का दो लाख रूपए का नवनिर्मित घर और 50 हज़ार का सामान नष्ट हो गया। उनमें से एक बताती हैं, "वो सोना भी चला गया जो हमने अपनी छोटी बहन के विवाह के लिए खरीदा था। अब हमारे पास कुछ नहीं रहा."
साभार-बीबीसी हिंदी डॉट कॉम
Saturday, October 10, 2009
शांति की परिभाषा बदल गई..
ओस्लो में वर्ष 2009 के नोबेल शांति पुरस्कार की घोषणा से एक नया विवाद सामने आ गया है। खासकर शांति शब्द की परिभाषा को लेकर। क्या अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा को शांति के लिए नोबेल पुरस्कार देना उचित है..? यह सवाल अभी सभी के दिलो-दिमाग में छाया हुआ है।ओबामा को नोबेल शांति पुरस्कार के लिए चुने जाने की घोषणा के बाद वाशिंगटन के एक पत्रकार डेनियल की प्रतिक्रिया हमें कई आयामों पर सोचने के लिए मजबूर करती है। डेनियल कहते हैं कि ओबामा को नोबेल शांति पुरस्कार देना ठीक वैसे ही जैसे किसी ऐसे निर्देशक को ऑस्कर पुरस्कार देना, जिसने कोई फिल्म ही निर्देशित नहीं की हो।
टेलीविजन चैनल पर कोई बोल रहा था- अभी व्हाइट हाउस पधारे इस शख्स को आठ महीने ही हुए हैं और इन्हें नोबेल का पुरस्कार थमा दिया गया.. । डेनियल की प्रतिक्रिया इसी से संबंधित है।
खुद ओबामा ने कहा, मैं खुश भी हूं और अंचभित भी..मुझे आज सुबह मेरी बेटी ने कहा- डैडी आपने नोबेल जीत लिया..।
अफगानिस्तान में शुक्रवार को तालिबान ने नोबेल समिति की घोषणा के बाद कहा कि ओबामा को युद्ध के लिए यह पुरस्कार दिया गया..। तालिबान के इस बयान ने कई सवालों को जन्म दे दिया है।
मीडिया को संबोधित करते हुए ओबामा भी गंभीर दिख रहे थे। शायद पुरस्कार के लिए चुने जाने की खबर से वे भीतर से सहमे भी होंगे। अहिंसक आंदोलन चलाने वाले गांधी को आदर्श और उनके साथ समय बिताने की इच्छा जताने वाले ओबामा शायद खुद भी शांति के लिए पुरस्कार दिए जाने की घोषणा से अपनी रणनीतियों पर विचार करने लगे होंगे (आशंका ही है)।
विश्व के सबसे शक्तिशाली देश के राष्ट्रपति, जो अफगानिस्तान में गोलियों की भाषा बोलता है, जो पाकिस्तान के वजीरिस्तान जैसे कबायली इलाकों में ड्रोन हमले करता है, उसे शांति के नोबेल पुरस्कार के लिए चुना जाना विवाद का ही दूसरा नाम होगा। एक समाचार चैनल ने सवाल पूछा कि क्या जल्दबाजी में ओबामा को नोबेल पुरस्कार दिया गया..? तो कुछ अमेरिकी अधिकारियों ने कहा कि ओबामा ने अमेरिका की छवि बदलने की कोशिश की है, इसी वजह से उन्हें इस पुरस्कार के लिए चुना गया है।
यह पुरस्कार हासिल करने वाले ओबामा अमेरिका के चौथे राष्ट्रपति हैं। 205 नोमिनी में से ओबामा को चुना गया। तो क्या दिसंबर में इस पुरस्कार को हासिल करने के बाद ओबामा अफगानिस्तान से सेना वापस कर लेंगे.? पता नहीं लेकिन उनके प्रशासन के लोग तो उन्हें प्रो-एक्टिव मैन कहते हैं। एक समाचार चैनल पर एंकर सवाल पूछता है- क्या ओबामा होलब्रुक और हिलेरी साल भर में दुनिया को बदल देंगे.और हर जगह शांति स्थापित हो जाएगी.?
एक तरफ समाचार चैनलों पर ओबामा से जुड़ी तमाम खबरें चल रही थी वहीं भोजपुरी चैनल महुआ पर सुर संग्राम जारी था, जहां शांति के लिए नहीं बल्कि सुर के लिए लोग जीत हासिल करते हैं। भोजपुरी की कम समझ के बाबजूद उसके शब्दों से खास लगाव रखता हूं। कार्यक्रम में प्रतिभागी बिरहा गा रहा था..गाने का भाव था कि परदेश में रहने वाला लोगों को घर वापस आ जाना चाहिए क्योंकि जिंदगी के सुख-दुख का स्वाद अपने लोगों के साथ ही अच्छा लगता है।
Friday, October 09, 2009
काबुलीवाला कहता है-अमरीका के पाँव दबाए जा रहे हैं
मोहन राणा ब्रिटेन मे बसे भारतीय मूल के हिंदी लेखक हैं। बाथ (ब्रिटेन का एक रोमन शहर) निवासी मोहन राणा एक ऐसे कवि हैं जिनकी कविताओं में जीवन के सूक्ष्म अनुभव महसूस किये जा सकते हैं। बाज़ार संस्कृति की शक्तियों के विरुद्ध उनकी सोच भी कविता में उभरकर सामने आती है। उनकी कविता पढ़कर महसूस होता है कि जैसे वे एक निरंतर यात्रा कर रहे हों। अपने ब्लॉग- जो देखा भूलने से पहले की ताजा पोस्ट में उनहोंने काबुलीवाला कहता है, शीर्षक से अपनी बात कही है। पढिए उनकी यह कविता-
मौसम तो जैसा है ठीक ही है
गरमी हो या सर्दी पतझर हो या बरसात
अगर में जग जाऊँ तो अच्छा है
पता नहीं पर दिल्ली में सब सो रहे हैं
यह कैसा अनाम मौसम,पता नहीं वे किसके पैर हैं
जिन्हें दिखता नहीं कहते हैं अमरीका के पाँव दबाए जा रहे हैं
दिल्ली में सब सो रहे हैं
जिन्हें दिखता नहीं कहते हैं अमरीका के पाँव दबाए जा रहे हैं
दिल्ली में सब सो रहे हैं
किसकी यह नींद किसका यह सपना
सोचता काबुलीवाला जागकर
किसी को बताऊँ जो हैरान ना हो,
उनींदे में पुकारता जागते जागते रहो
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