Sunday, September 27, 2009

अब टाइम पत्रिका ने कहा- बिन्देश्वर पाठक हैं हीरोज ऑफ द इन्वॉयारमेंट

देश-विदेश में कई प्रतिष्ठित सम्मान हासिल कर चुके गैर सरकारी संगठन सुलभ इंटरनेशनल के संस्थापक बिन्देश्वर पाठक को प्रतिष्ठित अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका टाइम ने विश्व भर में पर्यावरण के क्षेत्र में काम करने वाले मशहूर लोगों की सूची हीरोज ऑफ द इन्वॉयारमेंट 2009 में शामिल किया है।

उन्हें हाल ही में स्वीडन में भी सम्मानित किया गया था। आप पूरी रपट यहां पढ़ सकते हैं। टाइम की इस रपट को Mridu Khullar ने तैयार किया है। रपट के अंत में पाठक के हवाले से एक GREEN TIP दिया गया है, आप भी इसे पढिए-

'Always clean up after yourself. You are responsible for the waste you produce and you should ensure that it's disposed of in an environmentally sound manner.' — Bindeshwar Pathak

सूची में शामिल अन्य लोगों के नाम

Leaders & Visionaries

Activists

Joe Romm
Marc Ona
Marco Arana
Syeda Rizwana Hasan
Yuyun Ismawati
Zhao Zhong
Nnimmo Bassey

Scientists & Innovators

Moguls & Entrepreneurs
फोटोः टाइम पत्रिका

Saturday, September 26, 2009

दुर्गा पूजा-तस्वीरें और यादें

बचपन के दिनों में दुर्गा पूजा में हम हॉस्टल से घर आया करते थे। बाद में इसके साथ मेला घुमने का भाव भी जुड़ा लेकिन ऐसा काफी कम दिन ही हो सका। पढ़ाई और फिर नौकरी के चक्कर में पूजा मंडपों से उठने वाली धूप की सुगंध और कलश के नीचे उगने वाली जयंती हमसे दूर होती गई। आज बीबीसी पर उड़ीसा के एक कलाकार की रेत की इस कृति पर नजर गई तो पुरानी यादों में खो सा गया और नीचे की तस्वीर में डॉना की प्रस्तुति से महालया की याद आ गई। पहले डीडी नेशनल पर कलशस्थापना के एक दिन पहले तड़के हम यह देखा करते थे।

पुरी में दुर्गा पूजा और जलवायु परिवर्तन के मुद्दे को आधार बनाकर कलाकार ने रेत से ये ख़ूबसूरत कलाकृति बनाई है

मुंबई में दुर्गा पूजा में प्रस्तुति देती डॉना गांगुली।


तस्वीर उधार बीबीसी हिंदी डॉट कॉम

Thursday, September 24, 2009

हमारे 'बच्चे' ने चांद पर पानी खोजा

देश के पहले चंद्रमिशन 'चंद्रयान-1' के परियोजना निदेशक और वरिष्ठ अंतरिक्ष वैज्ञानिक एम।अन्नादुरई ने चांद पर पानी के प्रमाण मिलने पर खुशी जाहिर करते हुए कहा कि हमारे 'बच्चे' ने चांद पर पानी खोज कर अपना काम पूरा कर लिया है।


चंद्रयान अपने साथ अमेरिकी उपकरण मून मिनरोलॉजी मैप्पर यानी 'एम 3' भी लेकर गया था और इसी के माध्यम चांद की सतह पर पानी के प्रमाण मिले हैं।

अन्नादुरई ने कहा, "चांद पर पानी खोजने में मदद कर बच्चे ने अपना काम पूरा कर लिया है।" उन्होंने कहा कि चांद पर पानी का प्रमाण मिलना एक 'बड़ी खोज' है।

अन्नादुरई ने कहा, "यह मील के पत्थरों में एक है। यह टीम के संयुक्त प्रयास का नतीजा है। चांद पर पानी या बर्फ की मौजूदगी का पता लगाना मिशन के प्रमुख वैज्ञानिक उद्देश्यों में से एक था।" उन्होंने कहा कि अंतर्राष्ट्रीय वैज्ञानिक पत्रिकाओं में चंद्रयान-1 की और खोजों के बारे में रिपोर्ट प्रकाशित होगी।


वरिष्ठ अमेरिकी वैज्ञानिक कार्ल पीटर्स ने गुरुवार को चंद्रमा पर जल की पुष्टि की। उन्होंने कहा कि अमेरिकी अंतरिक्ष विज्ञान एजेंसी (नासा) के उपकरण चंद्रयान-1 के साथ भेजे गए मून मिनरोलॉजी मैप्पर यानी 'एम 3' के अनुसार चांद पर जल है।

'एम 3' चंद्रयान में शामिल 11 वैज्ञौनिक उपकरणों में एक था। चंद्रयान को 22 अक्टबूर 2008 को श्री हरिकोटा से प्रक्षेपित किया गया था लेकिन अगस्त 2009 में चंद्रयान का नियंत्रण कक्ष से रेडियो संपर्क टूट गया था और इसके साथ यह मिशन समाप्त हो गया।


चंद्रयान पर पांच भारतीय और छह विदेशी उपकरण थे, जिसमें दो नासा के, तीन यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (ईएसए) और एक बुल्गारिया का था।


अमेरिकी वैज्ञानिक पीटर्स ने चांद पर जल की मौजूदगी की पुष्टि करते हुए इसे प्रमुख खोज बताया। उन्होंने इसका श्रेय भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान परिषद (इसरो) को देते हुए कहा, "यदि यह इसरो के साथ नहीं होता तो हम यह खोज करने में असमर्थ होते।"


नासा के अंतरिक्ष यान कैसिनी पर मौजूद विजुअल एंड इंफ्रारेड मैप्पिंग स्केटोमीटर(वीआईएमएस) और अंतरिक्ष यान 'ईपीओएक्सआई' के हाई-रेसोल्यूशन इंफ्रारेड इमेजिंग स्पेक्टोमीटर ने भी चांद पर पानी मिलने के प्रमाण की पुष्टि की है।


अन्नादुरई ने कहा कि चंद्रयान से जुड़ी और जानकारी सामने आएगी क्योंकि इसके साथ 11 उपकरण थे। उन्होंने कहा, "हम अगले कुछ हफ्तों या महीने में और जानकारी की आशा करते हैं।"

(यह रिपोर्ट आईएएनएस के बेंगलुरू संवाददाता फकीर हसन का है। उन्होंने आज अन्नादुरई से बातचीत की थी )

नोट- अन्नादुरई के साथ एनडीटीवी के एक पुराने (October 16, 2008 ) साक्षात्कार को पढ़ने के लिए यहां आएं। यह साक्षात्कार चंद्रयान-१ के लांच होने से पहले की है।

Sunday, September 20, 2009

बिहार में पेड़ लगाने का रिकॉर्ड

बीबीसी हिंदी डॉट कॉम से साभार एक सार्थक रपट।

बिहार में लाखों ग़रीबों को रोज़गार देने के लिए भारतीय प्रशासनिक सेवा से जुड़े एक अधिकारी एसएम राजू राज्य में बड़ी संख्या में पेड़ लगाने की योजना पर काम कर रहे हैं।


राजू की मुहिम है कि लोगों को पेड़ लगाने के लिए तैयार किया जा सके ताकि रोज़गार के साथ-साथ ग्लोबल वॉर्मिंग जैसी समस्याओं से प्रभावी ढ़ंग से लड़ा जा सके। उनकी इस मुहिम को हाथों-हाथ लिया जा रहा है।

उनकी योजना की सफलता का सबूत यह है कि पिछले 30 अगस्त को उन्होंने वृक्षारोपण के एक बड़े कार्यक्रम में साढ़े सात सौ गाँवों के तीन लाख लोगों को इकट्ठा किया। उनके इस क़दम से ग़रीबी रेखा से नीचे रह रहे लोगों को रोज़गार भी मिला।


राजू अपनी 'सामाजिक वानिकी' के इस कार्यक्रम को राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना (नरेगा) से भी जोड़ते हैं। नरेगा का मक़सद ग़रीबी रेखा से नीचे जीवन बसर कर रहे लोगों को साल में कम से कम सौ दिन रोज़गार देना है।


बिहार की 44 प्रतिशत आबादी ग़रीबी रेखा से नीचे है और अंतरराष्ट्रीय मज़दूर संघ का कहना है कि जब से रोज़गार गारंटी योजना लागू हुई है तब से हज़ारों परिवारों को फ़ायदा पहुँचा है। पर राजू कहते हैं कि चूँकि बिहार देश की सबसे ग़रीब और ख़राब क़ानून व्यवस्था वाला राज्य है ऐसे में वहाँ नरेगा के फंड का सही तरह से इस्तेमाल नहीं हो सका है।


राजू कहते हैं, "ऐसा अधिकारियों में योजना के प्रति जागरूकता की कमी के कारण हुआ है."
उनका कहना है कि ख़राब मॉनसून से जहाँ फ़सल की हालत अच्छी नहीं है वहीं कुछ जगहों पर बाढ़ की वजह से स्थिति और भी ख़राब है।


राजू कहते हैं, "तब मेरे ज़ेहन में विचार आया कि क्यों नहीं ग़रीबी रेखा से नीचे रह रहे लोगों को सामाजिक वानिकी के काम पर लगाया जाए और इस योजना के तहत सौ दिनों का रोज़गार दिया जाए।।"


नरेगा मददगार


और राजू ने जल्दी से अपने विचार को मूर्त रुप दिया और उनकी इस योजना को उनके सीनियरों से भी समर्थन मिला।


जून महीने में राजू ने इस काम के लिए एक पुस्तिका भी प्रकाशित की और उसमें पेड़ लगाने के बारे में दिशा निर्देश बताए गए. पुस्तिका को ज़िला और पंचायत अधिकारियों को भी भेजा गया है.
इस कार्यक्रम से लाखों लोगों को रोज़गार मिलेगा।


राजू कहते हैं, "मैंने गाँव वालों को बताया है कि पेड़ लगाने और उसे सुरक्षा देने से उन्हें साल में सौ दिनों को काम मिलेगा। काम देने में बूढ़े, लाचार और विधवाओं को प्राथमिकता दी जाएगी।"


प्रत्येक पंचायत को 50 हज़ार पेड़ लगाने का लक्ष्य दिया गया है। चार परिवार के एक समूह को दो सौ पेड़ों लगाने और अगले तीन साल तक सुरक्षा प्रदान करना होगा यानी पेड़ के बड़े और मज़बूत होने तक।


योजना के दिशा निर्देश के बारे में राजू कहते हैं, "काम करने वाले को पुरी मज़दूरी तब दी जाएगी जब 90 प्रतिशत पेड़ बचे रहेंगे, अगर 75-80 प्रतिशत पेड़ बचे तो आधी मज़दूरी दी जाएगी और अगर 75 प्रतिशत से कम पेड़ बचते हैं तो उस समूह के परिवारों को बदल दिया जाएगा।


राजू के अनुसार इस योजना की वजह से मज़दूरों का पलायन भी रुका है। पैगंबरपुर के पंचायत मुखिया इंदिरा भूषण कहती है, "हम कभी नहीं सोच सके कि पेड़ लगाने और उसे सुरक्षा प्रदान करने के लिए रोज़गार दिया जाएगा।"


हालाँकि इस समय राजू अपने कारनामे को गीनीज़ बूक ऑफ़ वल्ड रिकॉर्ड में दर्ज कराने में लगे हुए हैं। अभी तक ये रिकार्ड पाकिस्तान के पास है।


Saturday, September 19, 2009

ब्लॉग स्पॉट पर पहली पोस्ट.-Village Speak

ब्लाग स्पॉट डॉट कॉम से रिश्ता और पहली पोस्ट (10 अप्रैल 2006 )। इससे पहले ब्लॉगसोर्स डॉट कॉम के जरिए मन की बात लिखता था। बाद में ब्लॉग स्पॉट के बारे में जानकारी हुई तो यहां सिफ्ट कर गया।

मुझे फ्लैश बैक में जाना कभी-कभी बेहद अच्छा लगता है। आज यूं ही ब्लॉग आक्राइव में जाकर पुराने पोस्टों को खंगाल रहा था। नजर पड़ी 10 अप्रैल 2006 को लिखी अपनी पहली पोस्ट पर, जिसका टाइटल है- Village Speak

आर्थिक युग मे अर्थ पर आश्रित रहना लाजमी है और इसे नज़रन्दाज़ करना हास्यास्पद ही होगा। महानगरीय ज़ीवन इस परिप्रेक्ष्य मे काफी आगे है। यहा काम के बद्ले दाम मायने रखता है। दिल्ली से नज़दीकी रिश्ता रख्नने वाले प्रदेश इस बात को भली-भांती ज़ानते है। उतर प्रदेश, हरियाणा के ज़्यादातर ग्रामीण इलाके के लोग रोज़ी-रोटी के लिए दिल्ली से सम्बध बनाए रखे है। हरियाणा का होडल ग्राम आश्रय के इसी फार्मुले पर विश्वास रखता है।

दिल्ली से ९० कि।मी. की दूरी पर स्थित यह गांव विकास के सभी मापदण्डो पर खरा उतरता है। सड़क , बिज़ली,ज़ैसी मूलभूत सुविधाओं से यह गांव लैस है, ज़िसे आप ज़ाकर देख सकते है। लेकिन पलवल ज़िला का यह गांव रोज़गार के लिए प्रत्यक्ष रूप से दिल्ल्री पर निर्भर है।

कृषि बहुल भूमि वाले इस गांव मे एक अज़ीब किस्म का व्यवसाय प्रचलन मे है, ज़िसे हम छोटे -बडे शहरो के सिनेमा हॉल या फैक्ट्री आदि ज़गहो पर देखते है। वह है-साइकिल-मोटरसाइकिल स्टैंड। दिल्ली मे काम करने वाले लोग रोज़ यहां अपना वाहन रख कर दिल्ली ट्रैन से ज़ाते हैं। एवज़ मे मासिक किराया देते है।

ज़ब मैं होडल के स्थानीय स्टेशन से पैदल गुजर रहा था तो मैने एक ८० साल औरत को एक विशाल परती ज़मीन पर साईकिलों की लम्बी कतारों के बीच बैठा पाया...उस इक पल तो मैं उसकी उम्र और विरान जगह को देखकर चकित ही हो गया पर जब वस्तुस्थिती का पता चला तो होडल गांव के आश्रयवादी नज़रिया से वाकिफ हुआ। जब मैंने उस औरत से बात करनी चाही तो वह तुरंत ही तैयार हो गयी और मुझसे हरिय़ाणवी में बतियाने लगी। उसने कहा कि खेती से अच्छा कमाई इस धंधा मे है...इसमे पूंजी नही लगती है....।

इस प्रकार के गांवो मे घुमना मुझे काफी भाता है। खासकर विकास के मापदंड पर खरा गांव...फणीश्वर नाथ रेणु के सपनो का गांव याद आ जाता है..।

Tuesday, September 15, 2009

अमेरिका के ज्यादातर लोग मानते हैं, पत्रकार पक्षपात करते हैं

पत्रकारों के लिए एक बुरी खबर। अमेरिका के ज्यादातर लोग मानते हैं कि पत्रकार पक्षपात करते हैं और उन्हें अपना काम ठीक ढंग से नहीं आता। यहां ऐसा सोचने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है।


पीपल एंड द प्रेस के प्यू रिसर्च सेंटर द्वारा कराए गए सर्वे के मुताबिक 63 फीसदी अमेरिकी मानते हैं कि ज्यादातर खबरें सच नहीं होती। इसके पहले प्यू ने ऐसा सर्वेक्षण 1985 में कराया था। तब ऐसा मानने वाले लोग 34 फीसदी ही थे। जबकि 74 फीसदी ने कहा कि मीडिया किसी भी मुद्दे से जुड़े केवल एक पहलू को दिखाता है। दो साल पहले के मुकाबले यह 66 प्रतिशत ज्यादा है।



प्यू सेंटर के निदेशक एंड्रयू कोहुट ने कहा कि लोगों में मीडिया के प्रति ऐसी धारणा दिनों दिन मजबूत होती जा रही है। सर्वे के परिणाम से संकेत मिलते हैं कि अमेरिका के अखबार और प्रसारणकर्ता दर्शकों को खींचने के लिए ऐसा कर रहे हैं। अमेरिका की लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था को देखते हुए माना जा रहा है कि मीडिया ऐसा करने पर मजबूर है।



प्यू रिसर्च सेंटर के सह निर्देशक माइकल डिमोक ने बताया कि सर्वे में इस्तेमाल की गई प्रश्नावली से यह अनुमान नहीं लगाया जा सकता है कि लोगों की ऐसी धारणा से मीडिया को कितना नुकसान हो रहा है।



आप पूरी रपट यहां पढ़ सकते हैं । यहां आप इस संबंध में विस्तृत आंकड़े देखिए और जानकारी बढ़ाने की कोशिश करें। इस रपट के बारे में जानकारी जागरण डॉट कॉम और वेबदुनिया के जरिए मिली।

Sunday, September 13, 2009

मेरे भीतर का चोर

आदमी बदल जाता है पर नहीं बदलता उसका रंग-रूप
आदमी के भीतर हजारों आदमी में से एक
जब बदलता है तो बदल जाती है उसकी तस्वीर।

कई दिनों से इसी उधेड़बुन में कि
कब मेरे अंदर का अन्य पुरुष बदल गया।
मैं अचंभित था खुद में छुपे चोर को देखकर
सच्चाई से डरने वाला मेरे अंदर का दूसरा आदमी
अचानक सामने आता है।

वह चोर है, झूठ बोलता है....
उसमें केवल आगे बढ़ने की भूख-प्यास है,
इसके लिए वह कुछ भी कर सकता है॥।
खुद के इस आदमी से पहली मुलाकात में
घृणा हो गई, एक आदमखोर की गंध से
अपना मन का कमरा भर गया॥।

इसके बाद ही पता चला कि
आदमी बदल जाता है पर नहीं बदलता उसका रंग-रूप
मेरे चोर और झूठे आदमी का भी रूप मेरे जैसा ही है
पर आसानी से वह पकड़ में आ जाता है
अंदर छुपे हजारों आदमियों में
अपने अंदर का कुदरूप आदमी..।

Friday, September 11, 2009

सरोद और बल्ले वाले पहुंचे रैंप पर

रैंप पर उतरे उस्ताद अमजद अली ख़ान के बेटे अमान अली बंगश और अयान अली बंगश
वीरेंदर सहवाग रैंप पर उतरे, उन्होंने रॉकी एस की डिज़ाइन की हुई शेरवानी पहनी

बेटों का जब कैटवॉक पूरा हुआ तो पिता अमजद अली ख़ान से रहा नहीं गया, वो भी आ गए।
सभी फोटो उधार-बीबीसी हिंदी डॉट कॉम से। (कोलकाता फैशन वीक)

Thursday, September 10, 2009

तटभ्रंश


तटभ्रंश मनोज कुमार झा की कविता है। उन्हें हाल ही में भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार से सम्मानित से किया गया है। वे दरभंगा में रहते हैं। उन्हें स्थगन कविता के लिए भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार दिया गया है। मुझे उनकी कविता तटभ्रंश काफी पसंद है क्योंकि इससे कई गुजरी बातें, शब्द आदि अनायास ही याद आ जाते हैं। मनोज कुमार झा ने सीएसडीएस के लिए विक्षिप्तों पर पड़ती निगाहों की दास्तां विषय पर शोध कार्य भी किया है।

फिलहाल पढ़िए तटभ्रंश।

शुक्रिया

गिरीन्द्र



आँगन में हरसिंगार मह मह
नैहर की संदूक से माँ ने निकाला था पटोर

पिता निकल गए रात धाँगते

नहीं मिली फिर कहीं पैर की छाप
पानी ढ़हा बाढ़ का तो झोलंगा लटकाये आया मइटुअर

सरंगी लिए माँ ने किया झोलंगा को उसकी देह का

और ताकने लगी मेरा मुँह

ऐसा ही कुर्ता था तुम्हारे बाप का

पता नहीं किस वृक्ष के नीचे

खोल रहा होगा साँसों का जाल
उसी पेड़ की डाल से झूलती मिली परीछन की देह

जिस के नीचे सुस्ताता था गमछा बिछाकर
सजल कहा माँ ने –

यों निष्कम्प न कहो रणछोड़

उत्कट प्रेम भी रहा हो कहीं जीवन से ।

Tuesday, September 08, 2009

कोसी की जनता पानी के नाम पर जहर पी रही है..

यह रपट जागरण डॉट कॉम से साभार है। जब इसे पढ़ रहा था तो पूर्णिया से जुड़ी मैथिली की एक कहावत याद आ गई- जहर नै खाउ, माहूर ने खाउ, मरबाक होए तो पूर्णिया आउ। इसका अर्थ यह है कि यदि आपको मरना है तो न जहर खाइए और न ही माहूर खाइए, बस पूर्णिया आ जाइए।

हालांकि हम जैसे लोग वहीं पले-बढ़े हैं और मरने के लिए नहीं बल्कि जिंदगी जीने के लिए वहां जाते हैं। बहरहाल यह सच्चाई है कि कोसी के इलाके का पीने का पानी लौहयुक्त होता है, जो तमाम तरह की बीमारियों की जड़ है। जागरण ने इसी को लेकर यह रपट प्रकाशित की है।
शुक्रिया
गिरीन्द्र

कोसी की ५० लाख की आबादी पानी के नाम पर जहर पी रही है। कोसी के पूर्णिया, अररिया, कटिहार, किशनंगज एवं सहरसा सुपौल तथा मधेपुरा जिले में लोगों की प्यास बुझाने के लिये तीस हजार से अधिक चापाकल लगे हुए हैं। लेकिन इन चापाकलों से पानी के बदले जहर निकल रहा है। इन चापाकलों से निकलने वाले दूषित पानी को पीकर हर वर्ष औसतन साढ़े तीन सौ लोग मौत के मुंह में समा रहे हैं।


"सरकारी फाइलों में भले ही पूर्णिया में 5613, कटिहार के 5854 व अररिया के 3658 चापाकल पीने का पानी उपलब्ध कराये जाने का दावा विभाग एवं सरकार द्वारा किया जा रहा है। मगर हकीकत यह है कि इन चापाकलों से पानी नहीं जहर निकल रहा है। धनकू मंडल कहते हैं की आयरन युक्त पानी से निजात दिलाने की मांग कई बार उनके द्वारा कई गयी मगर आज तक इसकी अनसुनी की जाती रही।"


सीसा युक्त पानी पीने के कारण कुल आबादी के बीस फीसदी लोग कैंसर। किडनी, मानसिक तनाव, फाइलेरिया, पागलपन, दंत रोग कब्ज की बीमारी से पीड़ित हैं। कुल आबादी का 2।3 प्रतिशत लोग निपुंसकता का दंश इसी दूषित पानी को पीने के कारण झेल रहे हैं। कोसी में पीने के उपयोग में लाये जाने वाली पानी में आयरन ।91 मिलीग्राम प्रति लीटर होने की बजाय 1।5 मिलीग्राम प्रतिलीटर है। इसी तरह फ्लोराइड .56 मिलीग्राम प्रतिलीटर रहान चाहिए जबकि यहां पीने वाले पानी में इसकी मात्रा 1.9 मिलीग्राम प्रति लीटर है। सबसे खतरनाक स्थिति सीसा की है। जिसकी मात्रा शुद्ध पानी में औसतन .5 मिलीग्राम प्रति लीटर होनी चाहिए जो यहां 1.2 मिली ग्राम प्रति लीटर है।

सीसा की इतनी अधिक मात्रा पानी में मौजूद रहना सबसे घातक स्थिति है। लोक स्वास्थ्य अभियत्रंण विभाग के कार्यपालक अभियंता रमण जी झा ने बताया की कई स्थानों पर जहां आयरन एवं फ्लोराइड ज्यादा मात्रा में पायी जाती है। वहां अमृत पेयजल योजना के तहत लौह निष्कासन संयंत्र लगाये गये हैं। मगर अधिकांश स्थानों पर ये खराब या बेकार पड़े हुए हैं। डा। टीएन ताड़क कहते हैं की दूषित पानी पीने के कारण कोसी के लोगों में कई तरह की बीमारियां बढ़ रही है। इनमें दांत संबंधी बीमारियां, मानसिक तनाव, किडनी संबंधी बीमारी, कैंसर की बीमारी बढ़ रही है।

सबसे खतरनाक स्थिति निपुंसकता को लेकर है। श्री ताड़क ने कहा कि अगर इस पर तत्काल नियंत्रण नहीं पाया गया तो स्थिति बड़ी ही भयावह हो जायेगी। कोसी में पूर्णिया के गुलाबबाग, रानीपतरा, गढ़बनैली, कटिहार के मिरचाबाड़ी, ड्राइवर टोला, कालोनी नंबर एक अररिया के फतेहपुर, बलुआ, भीमपुर, नाथपुर, पिठौरा, मिरदौैल, पेरवाहा, रानीगंज, फारबिसगंज के बथनाहा, जोगवनी, अंचरा, एवं सहरसा के नवहंट्टा प्रखंड के पांच दर्जन गांव तथा कोसी तटबंध के भीतर के सैकड़ों गांव में लोग दूषित पानी पी रहे हैं।

सुपौल जिले घूरन, दिवरा, लालगंज, महेशपुर, छपकाही, नेमुआ, कालीगंज सहित कई गांवों में लौह युक्त पानी पीने के लिये लोग विवश हैं। दूषित पानी पीने से हर वर्ष सैकड़ों की संख्या में लोग मौत के मुंह में समा रहे हैं।

सरकारी फाइलों में भले ही पूर्णिया में 5613, कटिहार के 5854 व अररिया के 3658 चापाकल पीने का पानी उपलब्ध कराये जाने का दावा विभाग एवं सरकार द्वारा किया जा रहा है। मगर हकीकत यह है कि इन चापाकलों से पानी नहीं जहर निकल रहा है। धनकू मंडल कहते हैं की आयरन युक्त पानी से निजात दिलाने की मांग कई बार उनके द्वारा कई गयी मगर आज तक इसकी अनसुनी की जाती रही।

Monday, September 07, 2009

अभी न पर्दा गिराओ, ठहरो - गुलजार


अभी न पर्दा गिराओ, ठहरो, कि दास्ताँ आगे और भी है
अभी न पर्दा गिराओ, ठहरो!अभी तो टूटी है कच्ची मिट्टी,
अभी तो बस जिस्म ही गिरे हैं
अभी तो किरदार ही बुझे हैं।
अभी सुलगते हैं रूह के ग़म,
अभी धड़कते हैं दर्द दिल के
अभी तो एहसास जी रहा है.


यह लौ बचा लो जो थक के किरदार की हथेली से गिर पड़ी है
यह लौ बचा लो यहीं से उठेगी जुस्तजू फिर बगूला बनकर
यहीं से उठेगा कोई किरदार फिर इसी रोशनी को लेकर
कहीं तो अंजाम-ओ-जुस्तजू के सिरे मिलेंगे
अभी न पर्दा गिराओ, ठहरो!
पेंटिग- रविन्द्र व्यास/ साभार प्रतिलिपी डॉट इन

Sunday, September 06, 2009

बेमिसाल रेड्डी की मौत पर बिलखता ब्लॉग जगत

आंध्र प्रदेश के दिवंगत मुख्यमंत्री वाईएस राजशेखर रेड्डी की मौत के सदमे से उबर पाना लोगों के लिए मुश्किल हो गया है। इसे भारतीय राजनीति का दुर्भाग्य कहा जा सकता है कि रेड्डी जैसे लोकप्रिय और कर्मठ नेता को असमय काल के गाल में जाना पड़ा। हिंदी ब्लॉग जगत भी उनकी मौत से आहत है।

देश-विदेश के लाखों ब्लॉगरों ने इस कर्मठ राजनेता को श्रद्धांजलि दी है। सभी ब्लॉगरों ने एक स्वर में कहा है कि आम आदमी की राजनीति के शिखर पुरुष थे वाईएसआर।


विस्फोट डॉट कॉम ने टिप्पणी की है, ‘‘राजशेखर रेड्डी की मौत की खबर ही न जाने कितनों के लिए मौत का कारण बन गई। उनके जाने के गम में 122 लोगों ने प्राण त्याग दिए। आंध्र प्रदेश में स्थानीय मीडिया के मुताबिक कुछ लोगों की सदमे से मौत हो गई तो कुछ ने आत्महत्या कर ली।’’


रेड्डी के निधन से आहत एक युवा ने अपने सुसाइड नोट में लिखा है, ‘‘रेड्डी ने अपना जीवन लोगों के लिए समर्पित कर दिया, मैं उनके लिए अपना जीवन समर्पित कर रहा हूं।’’ भावनाओं का ऐसा सैलाब देश में शायद ही पहले कभी देखने को मिला हो।


‘बुरा भला’ ने टिप्पणी की है, ‘‘रेड्डी का असमय काल के गाल में जना भारतीय राजनीति और विशेष रूप से कांग्रेस के लिए एक बड़ी त्रासदी है। वह कांग्रेस के ऊर्जावान, करिश्माई और संभावनाओं से भरे हुए एक ऐसे नेता थे, जिन्होंने खुद की क्षमता सिद्ध की। उनकी छवि करिश्माई नेता के रूप में तब तब्दील हुई, जब उन्होंने पांच साल तक शासन करने के बाद सत्ता विरोधी रुझान को मात देते हुए दोबारा जीत हासिल की।’’


‘आइए करें गपशप’ ने टिप्पणी की है, ‘‘मौत निश्चित है। सब जनते हैं, लेकिन कभी-कभी उसका आक्रमण हमें भेद जाता है। ऐसा शून्य भर जाता है कि वह कभी नहीं भरता। किसी व्यक्ति की मौत के बाद लगता है कि उसकी और जिंदगी थी। आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री वाईएस राजशेखर रेड्डी के निधन के बाद ऐसा ही लगा।’’


‘संस्कृति’ ने टिप्पणी की है, ‘‘रेड्डी की मौत के बाद उमड़े जन सैलाब ने स्वतंत्र भारत में एक इतिहास रच दिया है। जनता को रोकने के लिए उनके पुत्र ने उनके पार्थिव शरीर को एक घंटे पहले दर्शन स्थल से स्थानांतरित करा दिया था, क्योंकि जन-सैलाब नियंत्रण में नहीं आ रहा था। जनता की ऐसी श्रद्धांजलि स्वतंत्र भारत में एक मिसाल बन गई।’’


ब्लॉगवाणी पर इन दिनों सैंकड़ों ब्लॉगर हर रोज वाईएसआर को शब्दों के जरिए श्रद्धांजलि दे रहे हैं। एक ब्लॉगर ने वाईएसआर के शब्दों को दोहराया है, जिसे वह अक्सर अपने प्रशंसकों के बीच कहा करते थे, ‘‘अपने जीवन के वर्ष मत गिनो। खुद से यह सवाल करो कि तुम्हें ईश्वर ने जो अवसर दिए, उनका फायदा उठाकर तुमने समाज की भलाई के लिए क्या कुछ किया है।’’
(मेरी इस रपट को आप दैनिक हिंदुस्तान डॉट कॉम और जागरण पर भी पढ़ सकते हैं।)

Saturday, September 05, 2009

आदमी भी क्या अनोखा जीव होता है

एक दिन कहने लगा मुझसे गगन का चांद यूं,
आदमी भी क्या अनोखा जीव होता है।
उलझने अपनी बनाकर आप ही फंसता,
और फिर बेचैन हो जगता न सोता है।।
दिनकर

Thursday, September 03, 2009

देश ने असमय खोए हैं कई सितारे ......

इसे भारतीय राजनीति और कांग्रेस के लिए दुर्भाग्य ही कहा जा सकता है कि गत दो दशक के दौरान इस पार्टी ने अपने कई ऐसे लोकप्रिय और करिश्माई नेताओं को उस समय हादसों में खोया है, जब वे अपने राजनीतिक करियर के चरम पर थे। हेलीकाप्टर हादसे का शिकार बने आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री वाई.एस.राजशेखर रेड्डी इसी सिलसिले की ताजा कड़ी हैं। जिनकी असमय मौत से देश शोक में डूबा हुआ है।

"पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी, पूर्व केंद्रीय मंत्री माधवराव सिंधिया, राजेश पायलट और रेड्डी में यही समानता है कि ये सभी राजनीति में लोकप्रियता के उत्कर्ष पर रहने के दौरान असमय मौत का शिकार बने।"


कांग्रेस प्रवक्ता शकील अहमद ने आज कहा, "पार्टी को कई नेताओं की असमय मौत से गहरा धक्का लगा है। राजीव गांधी, माधव राव सिधिया, राजेश पायलट और अब राजशेखर रेड्डी। इन सभी नेताओं की मौत से राजनीतिक जीवन और उनके प्रशंसकों के जीवन में शून्यता आ गई, जिसे कभी नहीं भरा जा सकता है। "

अहमद ने कहा, "वाईएसआर की मौत आंध्र प्रदेश, देश और कांग्रेस के लिए अपूरणीय क्षति है। हमने एक महान नेता और एक अच्छे इंसान को खोया है।"

कांग्रेस ने सितंबर 2001 में पूर्व रेल मंत्री माधवराव सिधिया को एक विमान हादसे में खोया था। उस समय सिधिया की उम्र 56 वर्ष थी। लोगों को उनसे काफी उम्मीदें थी। वह लगातार नौ बार सांसद चुने गए थे।

जून 2000 में पूर्व आंतरिक सुरक्षा मंत्री राजेश पायलट की एक सड़क हादसे में मौत हो गई थी। उस समय उनकी उम्र 55 वर्ष थी। भारतीय वायुसेना (आईएएफ) के लड़ाकू विमानों के पायलट रह चुके राजेश कांग्रेस के उभरते नेता थे।

कांग्रेस को सबसे बड़ा धक्का मई 1991 में लगा, जब उसने राजीव गांधी को खोया। तमिलनाडु में एक चुनावी सभा के दौरान 46 वर्षीय गांधी आत्मघाती हमले का शिकार बने। उस समय कांग्रेस केंद्र में वापसी करने की पूरी तैयारी में थी और आम चुनाव के बाद सत्ता में लौटी भी थी।

कभी-कभी करिश्मे भी हुए
(साभार बीबीसी)

कई ऐसी हेलिकॉप्टर दुर्घटनाएँ भी हुईं जिनमें कई राजनेता बस बाल-बाल बचे. पीछे मुड़कर नज़र डालें तो 1977 का मामला याद आता है जब तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई हेलिकॉप्टर हादसे में बाल-बाल बचे थे. वे कुछ अन्य नेताओं के साथ हेलिकॉप्टर के ज़रिए पूर्वोत्तर के दौरे पर जा रहे थे जब हेलिकॉप्टर असम में दुर्घटनाग्रस्त हो गया. पायलटों ने हेलिकॉप्टरों को खेत में कुछ इस तरह उतारा कि सबसे ज़्यादा नुकसान कॉकपिट को हुआ और पीछे का हिस्सा बच गया जिसमें प्रधानमंत्री थे. इस तरह मोरारजी देसाई और अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री समेत दूसरे नेता तो बच गए लेकिन भारतीय वायु सेना के पांच लोगों को जान गवांनी पड़ी.

जुलाई 2003 में उद्योगपति विजय मालया का हेलिकॉप्टर भी दुर्घटनाग्रस्त हुआ था. उड़ान के दौरान पाइलट का हेलिकॉप्टर पर से कोई नियंत्रण नहीं रहा था. उस समय वे जनता पार्टी के नेता थे.
इसे करिश्मा ही कहा जा सकता है कि सभी लोगों की जान बच गई. हेलिकॉप्टर में फ़िल्म अभिनेता संजय खान भी थे.

सितंबर 2006 में पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह भी इसी तरह बाल-बाल बचे थे. वे गुरदासपार आ रहे थे जब उनका पवन हंस हेलिकॉप्टर हाई टेंशन लाइन में जाकर फँस गया. उन्होंने बाद में खुद कहा था कि ऐसी स्थिति में ज़िंदा बचना करिश्मे के जैसे है.

लेकिन ऐसे करिश्मे कभी-कभार ही देखने को मिलते हैं. मंगलवार, 03 सितंबर 2009 की दोपहर को जब वाईएसआर राजशेखर रेड्डी का हेलिकॉप्टर लापता हुआ था तो लोग पहले उम्मीद करते रहे कि कहीं सुरक्षित उतर गया होगा.

समय गुज़रता गया तो लोगों को उम्मीद थी कि अगर हेलिकॉप्टर दुर्घटनाग्रस्त हो भी गया है तो शायद मुख्यमंत्री सुरक्षित होंगे. लेकिन गुरुवार सुबह होते-होत ये स्पष्ट हो गया कि हेलिकॉप्टर में उड़ान भर रहे सभी लोगों की मौत हो गई है।

अपने जीवन के वर्ष मत गिनो.- रेड्डी


डाक्टरी के पेशे से राजनीति में कदम रखने वाले येदुगुरी संदिंती राजशेखर रेड्डी, जो वाईएसआर के रूप में लोकप्रिय थे, की छवि सूझ-बूझ वाले ऐसे सशक्त प्रशासक की थी जो जनता की नब्ज पकड़ना जानता था।



उनका कहना था-





अपने जीवन के वर्ष मत गिनो. ख़ुद से यह सवाल करो कि तुम्हें ईश्वर ने जो अवसर दिए उनका फ़ायदा उठाकर तुमने समाज की भलाई के लिए क्या-कुछ किया है

Tuesday, September 01, 2009

आज आधा गांव वाले राही मासूम रजा का जन्मदिन है

आज आधा गांव वाले राही मासूम रजा का जन्मदिन है। आज ही के दिन गाजीपुर के गंगौली गांव में उनका जन्म हुआ था। राही ने `आधा गांव', `दिल एक सादा कागज', `ओस की बूंद',`हिम्मत जौनपुरी' उपन्यास व 1965 के भारत-पाक युद्ध में शहीद हुए वीर अब्दुल हमीद की जीवनी `छोटे आदमी की बड़ी कहानी' लिखी।

कविता कोष से साभार उनकी एक कविता- अजनबी शहर के..

अजनबी शहर के/में अजनबी रास्ते , मेरी तन्हाई पर मुस्कुराते रहे ।
मैं बहुत देर तक यूं ही चलता रहा, तुम बहुत देर तक याद आते रहे ।।


ज़हर मिलता रहा, ज़हर पीते रहे, रोज़ मरते रहे रोज़ जीते रहे,
जिंदगी भी हमें आज़माती रही, और हम भी उसे आज़माते रहे ।।


ज़ख्म जब भी कोई ज़हनो दिल पे लगा, तो जिंदगी की तरफ़ एक दरीचा खुला
हम भी गोया किसी साज़ के तार है, चोट खाते रहे, गुनगुनाते रहे ।।


कल कुछ ऐसा हुआ मैं बहुत थक गया, इसलिये सुन के भी अनसुनी कर गया,
इतनी यादों के भटके हुए कारवां, दिल के जख्मों के दर खटखटाते रहे ।।


सख्त हालात के तेज़ तूफानों, गिर गया था हमारा जुनूने वफ़ा
हम चिराग़े-तमन्ना़ जलाते रहे, वो चिराग़े-तमन्ना बुझाते रहे ।।