Monday, August 31, 2009

परिवार और गांव की सूरत बदल रही हैं महिलाएं...

'' बदलाव लाने के लिए हमें किसी की सहायता नहीं लेनी है, हम अपने हाथों से यह कर दिखाएंगे। कुछ इसी तरह के जज्बे को खुद में समेटे हुए है बिहार के पूर्णिया जिले की कुछ महिलाएं। श्रीनगर ब्लॉक की कुछ महिलाएं न केवल ब्लॉक बल्कि पूरे देश के लिए मिशाल बन गई हैं। ''
पढ़िए रपट-
शुक्रिया


कल तक जो बेकार थे, आज वे पूरे गांव के लिये मिसाल बन गये हैं। जब परिवार की स्थिति नहीं सुधरी तो पति के साथ-साथ घर की महिलाओं ने भी कुछ कर दिखाने का बीड़ा उठाया। आज महिलाओं की यह कोशिश श्रीनगर प्रखंड में रंग दिखा रही है। डेयरी के सहारे यहां की दो दर्जन महिलाओं ने न सिर्फ अपने परिवार की सूरत बदली है बल्कि पूरे गांव की सूरत बदल दी है।

आज श्रीनगर की ये महिलायें आसपास के कई गांव के लोगों के लिये एक मिसाल कायम कर रही है। श्रीनगर प्रखंड के श्रीनगर गांव के मंडल टोला की महिलाओं ने जब पहली बार कुछ गायों को पालने का काम शुरू किया तो कई प्रकार के सामाजिक ताने भी उन्हें सुनने पड़े। मगर अपनी घुन की पक्की इन महिलाओं ने हिम्मत नहीं हारा।

दो चार गाय से शुरू की गयी इन महिलाओं की डेयरी में किसी में एक दर्जन गाय है जो किसी में छह से आठ। गांव में डेयरी चलाने वाली मोनिया देवी कहती है । कल तक हमें घर चलाने के लिये काफी संर्घष करना पड़ता था। आज स्थिति यह नहीं है। इस डेयरी की कमाई से न सिर्फ हम खेती कर लेते हैं बल्कि आराम से हमारे परिवार का भी गुजारा होता है। इसमें हमें प्रतिदिन पांच सौ से लेकर दौ सौ रूपये तक की आय होती है।

यहां सिर्फ मोनिया ही नहीं बल्कि इसी गांव की मंजुला देवी, उमा देवी , खोरी देवी, मुनुर देवी, शांति देवी, भारती देवी, चिंता देवी, उर्मिला देवी, मंजू देवी व उषा देवी के अलावा संपत्ति देवी, इंदु दास , मोती देवी, फुदुर देवी, माला देवी, सुनीता देवी, पारुल देवी, करैला देवी, सोनी देवी, कमली देवी, बोनी देवी, मंजुला देवी व प्रतिमा देवी है जो डेयरी के बल पर परिवार की स्थिति सुधार चुकी है।

परिवार के साथ- साथ समाज की स्थिति भी सुधर गयी है। कल तो जो इनके काम पर अंगुली उठाते थे आज सराहना करते नहीं थकते। प्रतिमा देवी कहती है की एक गाय से शुरू की गयी उसकी डेयरी में आज आठ गाय है। जिससी कमाई से वह अपने बच्चे को पढ़ाने का काम कर रही है।

दरअसल इस टोले में बसे लोगों की छह माह पूर्व तक स्थिति काफी दयनीय थी। घर के पुरुषों की बेरोजगारी और रोजी-रोटी के सुलगते सवाल ने यहां की महिलाओं को रोज-ब-रोज सालती रहती थी। अंतत: टोले की मोनिया देवी व संपत्ति देवी ने घर की दशा को सुधारने का खुद ही बीड़ा उठा लिया। इसके बाद वे गौपालन कार्य के लिये गांव की महिलाओं को जागरुक करने लगी।

बाद में इन महिलाआं ने मिलकर कल्याणी स्वयं सहायता समूह और अम्बालिका स्वयं सहायता समूह का गठन कर लिया। महिलाएं घर से कुछ पैसे बचाकर बैंक में जमा भी करनी शुरु कर दी। अब भी किसी महीने में किस्त जमा करने से चूक न जाये, इसका वे सतत ख्याल रखा करती हैं।

महिलाओं की इस पहल और संगठन की दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही मजबूती को देख समाज भी इसे आगे बढ़ने में साथ निभाने लगे। इसके बाद बैंक से मिले ऋण से इनमें कुछ महिलाओं ने गाय खरीदी और इसे रोजगार का रुप दिया। इससे जहां उन महिलाओं के घरों की माली हालत में खासा सुधार हुआ, वहीं गांव की अन्य महिलाएं भी इस कार्य में जुटनी शुरु कर दी। फिलहाल इसमें पुरुष वर्ग भी हाथ बंटाने लगे हैं। आसपास के गांव में भी न केवल अब इन महिलाओं की तारीफ होने लगी है, अन्य गांवों में इस कार्य के प्रति महिलाओं का झुकाव दिखने लगा है।


रपट -साभार जागरण डॉट कॉम
चित्र साभार-: growthforall.org/2007/11/

Saturday, August 29, 2009

आडवाणी ने जिन्ना के साथ गुप्त बैठक की, जैक्सन ने समां बांधा...

कल देर रात आडवाणी के घर जब कुछ भारतीय झंझट पार्टी (भाझपा) के नेताओं की बैठक समाप्त हुई तो इसके तुरंत बाद पूर्व उप प्रधानमंत्री पडो़सी मुल्क के संस्थापक जिन्ना साब के साथ चुपके से नैनो रथ पर सवार होकर मेरे घर आ धमके। मैं रात का खाना शिप्रा मॉल के पंजाबी ढाबे में खाकर लौटा था, जहां हाल ही एक बलुच रेस्तरां भी खुला है। (भला हो मेरी दीदी और जीजाजी का कि उन्होंने उस रेस्तरां में नहीं खिलाया, वरना कुछ तालिबानी भी हमारे घर आ धमकते।)
जब घर पहुंचा तो देखा बाहर वाले कमरे में लाइट जल रही है और दो व्यक्ति फ्रस्टाएल मूड में बैठा हुआ है और दूसरी ओर चटाई पर माइकल जैक्सन गिटार पर राग छेड़ रहे हैं।

आडवाणी काफी गुस्से में थे और जिन्ना बेहद शांत लेकिन अंदर से व्यथित दिख रहे थे। आडवाणी ने कहा- '' जिन्ना साब आपका जिन्न हमें डिस्ट्रब कर रखा है। अरे आप लोगों ने क्या एक मुल्क बनाया और सिर-फुटोव्वल मेरी पार्टी में मची है। मैं तंग आ गया हूं। कल हमारी मातृ संगठन के मुखिया भागवत ने प्रेस कांफ्रेंस कर हमें बता दिया कि वह भी राजनीति का व्याकरण समझ गए हैं इसी वजह से नाप-तौल कर प्रेस वालों के साथ बातचीत की।''

जिन्ना की मरघट चुप्पी को जैक्सन ने तोड़ा। उसने कहा, ''अरे मियां क्या चुपचाप बैठो है, देखो आयरन मैन (आडवाणी की ओर गिटार दिखाते हुए) तब से बोले जा रहा है, कुछ तुम भी बोलो।'' जिन्ना ने जैक्सन की ओर आंख दिखाते हुए कहा- ''तुम चुप रहो, लाओ कुछ गोलियां दो ताकि लालजी से गुफ्तगू करने के बाद उसे खाकर फिर से कब्र में आराम से सो जाऊं, लाओ जल्दी लाओ.।''

जैक्सन ने उन्हें बेहोशी की दो बहुत ताक़तवर दवाएँ, प्रोपोफ़ोल और लौरज़ेपाम दी। उल्लेखनीय है कि इसी दवा को खाने के बाद जैक्सन ने अपने लाखों-करोड़ो प्रशंसकों को निराश कर दिया और अपनी जायदाद को लेकर मां- पुतोहू में कुछ दिन के लिए ही सही लेकिन झगड़ा लगा दिया।

जैक्सन की बात मानते हुए आडवाणी की ओर मुखातिब होने से पहले जिन्ना ने एक बार ऊपर देखा और फिर बोले- ''अरे लालजी, आप तो सिंध से हैं न, ऐसा करिए चलिए हमारे साथ और हां वाजपेयी कहां है आजकल । उसे भी कहिए बस, से हमारे साथ चलें। आपकी जरूरत अब इस मुल्क को नहीं है। पाकिस्तान में आपकी काफी मांग है। दरअसल जरदारी आजकल कुछ ज्यादा बकर-बकर करने लगिस है। आप वहां चलिए और राजनीति कीजिए और आज रात (28 अगस्त) जो सब भागवत से मिलकर आपसे मिलने आए थे, उसे भी साथ ले लें, हां जेटली का तो वहां काफी काम है। क्रिकेट-विकेट भी संभाल लेगा। वैसे यब बताइए कि कल वैंकेया, जेटली, अनंत और सुषमा आपसे मिलेन क्यों आई थी....''

जिन्ना के इस सवाल पर लालजी ने चुप्पी साध ली..।

गिटार के साथ धुन तैयार कर रहा अपना जैक्सन इन लोगों की बातचीत से बेहद ट्राबुल में आ गया था। उससे रहा नहीं गया, और बेहद आक्रमक अंदाज में कमर लचकाते हुए दोनों नेताओं से कहा-
''अरे अब चलिए भी, जिसका घर है वह कहीं आ जाएगा तो बात बाहर तक पहुंच जाएगी कि भाझपा जिन्ना के रास्ते पर चलने लगी है। अभी भागवत दि्ल्ली में ही हैं, आडवाणी को नेता ऑपोजिशन से भी हाथ धोना पड़ जाएगा और जिन्ना अंकल आप चुप ही रहिए, देश को तो चला नहीं पाए और अब आडवाणी की टीम को इस्लामाबाद में स्थापित कर कब्र में गालिब को पढ़ना चाहते हैं। ऐसा कीजिए आप सभी मेरे साथ लास एजेंलिस चलिए वहां के फॉरेस्ट लॉन कब्रगाह में एक पार्टी करते हैं, मजा आ जाएगा....''

नोट- (यह गुप्त बैठक शुक्रवार मिडनाइट 12 बजे से 1.30 बजे तक चली। यह ब्रेकिंग न्यूज को ब्रेक नहीं करने के लिए आडवाणी, जिन्ना और जैक्सन ने एक पर्ची कमरे में छोड़ दी थी। इस आग्रह के साथ कि यह दो मुल्कों के सम्मान और एक महान संगीतज्ञ की प्रतिष्ठा का सवाल है। )

Monday, August 24, 2009

बाबुल जिया मोरा घबराए, बिन बोले रहा न जाए

नारी की परतंत्रता से जुड़ी प्रसून जोशी कि कविता-





बाबुल जिया मोरा घबराए, बिन बोले रहा न जाए।
बाबुल मेरी इतनी अरज सुन लीजो, मोहे सुनार के घर मत दीजो।
मोहे जेवर कभी न भाए।

बाबुल मेरी इतनी अरज सुन लीजो, मोहे व्यापारी के घर मत दीजो
मोहे धन दौलत न सुहाए।

बाबुल मेरी इतनी अरज सुन लीजो, मोहे राजा के घर न दीजो।
मोहे राज करना न आए।

बाबुल मेरी इतनी अरज सुन लीजो, मोहे लौहार के घर दे दीजो
जो मेरी जंजीरें पिघलाए। बाबुल जिया मोरा घबराए।

Sunday, August 23, 2009

संडे स्पेशल- कोसी जल प्रबंधन के विफलतम प्रयास की कहानी


आज रविवार को कोसी : जल प्रबंधन के विफलतम प्रयास की कहानी बता रहा हूं। इसे मैंने इंडिया वाटर पोर्टल से उठाया है। इस रपट को मुजफ्फरपुर से कौशल शुक्ला ने तैयार किया है। बांधों को लेकर अध्ययन करने वाले, खासकर कोसी तटबंधों में रूचि रखने वालों के लिए यह रपट उपयोगी साबित हो सकती है।

शुक्रिया

गिरीन्द्र


कोसी जल प्रबंधन को लेकर किये गये विफलतम प्रयासों की यह वह कहानी है, जो इतिहास के पन्नों में दर्ज हो चुकी है। 19वीं सदी के उतरार्द्ध में बाढ़ नियंत्रण की समस्या पर गंभीर चर्चा शुरू हुई। 1893 में बंगाल के तत्कालीन चीफ इंजीनियर डब्लू इंगलिश ने भारत और नेपाल के कोसी क्षेत्र का भ्रमण किया और अपनी राय दी कि कोसी की प्राकृतिक धारा के साथ छेड़छाड़ बिल्कुल नहीं की जाय।


1897 के कोलाकाता की बैठक में अंग्रेजी शासन के सचिवालय के वरिष्ठ अधिकारियों ने कोसी की तबाही पर चिंता जतायी, पर इसकी मूल धारा के साथ छेडख़ानी न करते हुए नियंत्रण बांधों को नीचे के स्तर पर निर्माण का प्रस्ताव दिया। नेपाल सरकार से बात हुई, उसने अनुमति भी दी, पर बांध नहीं बना। इसके 31 वर्षों बाद 1928 में उड़ीसा बाढ़ समिति ने कटक में एक सम्मेलन किया, जिसमें विशेषज्ञ इंजीनियरों ने माना कि बाढ़ सुरक्षा के लिए बनाये जाने वाले बांध स्वयं बाढ़ का कारण बनते हैं।


रेलमार्गों और राजमार्गों को भी इस सम्मेलन में तटबंध की श्रेणी में रखा गया और कहा गया कि ये सभी पानी के सहज प्रवाह में बाधा बनते हैं। इस कारण वर्षा के पानी का निकास नहीं हो पाता और बाढ़ आती है। इस सम्मेलन मेसभी बांधों को यथाशीघ्र तोड़ देने, रेलमार्गों व राजमार्गों में अधिकाधिक पुल व कलवर्ट बनाने की सिफारिश की गयी।


उड़ीसा सम्मेलन की तर्ज पर 1937 में पटना की सिन्हा लाइब्रेरी में बिहार सरकार ने तीन दिवसीय सम्मेलन का आयोजन किया। इसमें तत्कालीन गवर्नर हैलेट, तिरहुत क्षेत्र के जानकार कर्नल टेंपिल, बिहार-बंगाल के भू-भागीय परिस्थितियों के जानकार व तत्कालीन बिहार के मुख्य अभियंता कैप्टन जीएफ हाल ने खुलकर अपने विचार रखे। डा. राजेन्द्र प्रसाद को भी इस सम्मेलन में शामिल होना था, पर वे किसी कारण नहीं आ सके। उनके पत्र को अनुग्रह नारायण सिंह ने पढ़ा।


तीन दिनों की मशक्कत का कुल नतीजा यह था कि बाढ़ें आनी ही चाहिए। भूमि निर्माण का यह प्राकृतिक तरीका है। इसे रोकने की हर प्रक्रिया विफल ही होगी। नदियों के दोनों किनारों पर बने तटबंधों को एक न एक दिन आकार में इतने बड़े करने पड़ेंगे कि इनका रखरखाव असंभव हो जायेगा। वे टूटेंगे और बड़ी तबाही का कारण बनेंगे। इस सम्मेलन में आखिरी तौर पर यह माना गया कि समस्या का समाधान तटबंधों का निर्माण नहीं, बल्कि पानी के मार्ग में आने वाले हर अवरोधों को हटाना है। इसी नीति के पालन से तबाही से मुक्ति मिल सकती है।


इस सम्मेलन के प्रस्तावों को बाद के वर्षों में मजाक बनाया गया। अवरोध हटाने के प्रयासों के बजाय तटबंधों के निर्माण पर ही जोर दिया गया।द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जब पश्चिम का औद्योगिक जगत आर्थिक संकटों में फंसा तो गरीब देशों को मशीन और तकनीकी बेचने की नीति अपनायी गयी। ऐसे में ही भारत में बड़े बांधों की तकनीक परोसी गयी। दामोदर नदी (अब झारखंड में) पर बांध की शुरुआत हुई और कोसी पर वाराह क्षेत्र में बड़े बांध का सुझाव दिया गया।


अमेरिकी विशेषज्ञों की सहायता से 1946 में केन्द्रीय जल, सिंचाई और परिवहन आयोग के तत्कालीन अध्यक्ष रायबहादुर अयोध्या नाथ खोसला ने कोसी पर वाराह क्षेत्र में बड़ा बांध बनाने की संभावना को केन्द्र में रखकर रपट तैयार की। इस रपट की सिफारिशों पर 6 अप्रैल 1947 को निर्मली (सुपौल) में साठ हजार कोसी पीडि़तों का सम्मेलन हुआ। इसमें वाराह परियोजना पर चर्चा और सहमति हुई। पर, सम्मेलन में शामिल तीन अमेरिकी विशेषज्ञों ने साफ-साफ कहा कि कोसी पर बांध बनाकर नियंत्रण के भयंकर परिणाम होंगे। इस सम्मेलन में चीन की पीली नदी का भी हवाला दिया गया। बताया गया कि बांध के कारण ही इस नदी का तल बीस फुट ऊपर हो गया है और यह आबादी के लिए खतरा बन चुकी है।इसके बावजूद 1946-51 तक वाराह परियोजना पर विचार चलता रहा।


परियोजना की लागत 100 से 177 करोड़ हो गयी। 1953 में फिर कोसी प्रोजेक्ट के नाम से तटबंध योजना बनी, जिसके परिणामों से देश रूबरू हो चुका है। 2008 में नदी की भयंकर विनाशलीला ने यह बताया कि वह बांधों से उसे नहीं बांधा जा सकता। नदी ने अपनी अलग धारा बनायी और उन रास्तों पर बढ़ चली, जो उसके लिए तो अनजान थी ही, आबादी के लिए भी पहचान करने में मुश्किल हो गयी। दिक्कत की बात यह है कि नदियों की धाराओं के साथ अब भी छेड़छाड़ जारी है और किसी गंभीरतम प्रयास का सर्वथा अभाव ही दिख रहा है।

Saturday, August 22, 2009

असमानताओं में समानता खोज रहे हैं पिता

असमानताओं में समानता खोज रहे हैं पिता,
समानताओं के लिए वे टीवी देखते हैं, धारावाहिकों में खोते हैं।

वे असमानताओं में भी समानताओं की थोड़ी गुंजाइश खोज रहे हैं,
वे क्लासिक से मॉर्डन बन रहे है।

जिंदगी जब कभी अहसास देती कि सबकुछ बदल रहा है,
वे भी बदलाव के लिए कदम बढ़ाते हैं।

बदलने में अब उन्हें डर नहीं लगता और न ही अहं सामने आता
वे अब असमानता-समानता की खाई पाटना चाहते हैं।

किताबों से पहला प्यार टीवी की सेट और मॉल के एंट्री गेट पर आकर रूक जाता है,
वहीं रिमोट के बटन कलर्स चैनल के धारावाहिकों को खोजने लगते हैं।

महानगर के छोटे घर में भी वे ड्योढ़ी खोजते हैं,
अभी मिले या न मिले पर उन्हें भरोसा है
कि उनकी जीत होगी और नए लोगों के साथ वे भी मार्डन हो जाएंगे।

Friday, August 21, 2009

बिस्मिल्ला की शहनाई है या बसंत की अंगड़ाई है....

शहनाईनवाज़ उस्ताद बिसमिल्लाह खा़न साहब न केवल महान संगीतकार थे बल्कि एक सूफ़ियाना तबियत के इंसान भी थे। उनका फ़क्कड़्पन और सादगी उनके संगीत से कहीं ऊंची थी। आज उनकी पुण्यतिथि है। बनारस में दरगाह फातमान में उस्ताद के साहबजादे जामिन हुसैन बिस्मिल्लाह अपने साथियों के साथ आज शहनाई पर मातमी धुन पेश करेंगे। हम भी उन्हें याद कर रहे हैं। मैं उन्हें नरेश शांडिल्य की इस कृति के जरिए याद कर रहा हूं-

बिस्मिल्ला की शहनाई है
या वसंत की अंगड़ाई है
इक कमसिन के ठुमके जैसी
रुन-झुन हिलते झुमके जैसी

इक पतंग के तुनके जैसी

नखरीली-सी उनके जैसी
कभी बहकती कभी संभलती
छजती चढती गली उतरती
रस-रस भीगे मस्‍त फाग-सी
धीरे-धीरे पींग बढ़ाती
झुकी हुई इक अमराई है
बिस्मिल्ला की शहनाई है

मधुबन में कान्हा की आहट

भीड़ बीच इक तनहाई है
बिस्मिल्ला की शहनाई है।

तस्वीर साभार शिवनाथ झा
(फेसबुक से)

Wednesday, August 19, 2009

ये आग का दरिया है...कमीने बन जाइए

मंगलवार शाम के छह बजे, नोएडा का स्पाइस सिनेमा पांचवी मंजिल और मशीनी सीढ़ियों के सहारे हम विशाल भारद्वाज की कृति देखने पहुंचे। गीतकार गुलजार के जन्मदिन (18 जुलाई) को सेलिब्रेट करने के लिए हमने विशाल की फिल्म को चुनने का पहले ही मन बना लिया था। इससे पहले कई लोगों से फिल्म की बुराई और अच्छाई ढेर सुनने को मिली, लेकिन हम बेपरवाह कमीने में खोना चाहते थे।

सिनेमा हॉल की गद्देदार सीट पर चिपकने के साथ ही पर्दे पर हजार टके का नोट चार्ली के साथ उड़ता दिखा। हर एक के अंदर छुपे पैसों की चाहत को गहरे रंगों और धुएं के इस्तेमाल से पर्दे पर पेश किया गया। हम उन दृश्यों में खुद को खोए महसूस कर रहे थे कि तभी स को फ सुनने में आया, अजीब लगा लेकिन उतना ही प्यारा भी।

विशाल की अन्य फिल्मों की तरह ही संवाद और गीत हमें खींच रहे थे। कहा जा सकता है कि ‘कमीने’ कसी पटकथा और सटीक संवादों से रची फ़िल्म है। हां, इस कहानी में विशाल की एक अन्य फिल्म ‘मक़बूल’ जितने गहरे अर्थ आपको नहीं मिलेंगे लेकिन मैं एक दर्शक के तौर पर यही कहूंगा कि ‘कमीने’ एक रोचक फ़िल्म है। और यह रोचक फ़िल्म अपना आकर्षण बनाये रखने के लिए हमेशा सही रास्ता चुनती है, कोई ‘फॉर्टकट’(शार्टकट) नहीं।

इससे पहले कि आप कहेंगे कि भई, क्या फिल्म में कोई चीज खटकी नहीं तो बता दूं फिल्म के अंत में गैंगवार को दिखाने में विशाल चुक गए। हालांकि वे अपनी कहानी को आगे बढ़ाने में अक्सर ऐसी ही स्थितियों से दर्शक को बांधने का प्रयास करते हैं लेकिन कमीने में उतना मजा नहीं आया। यह कॉमिक्स की तरह ढिंसूम-ढिसूम टाइप लगा। रवीश ठीक ही कहते हैं- पांच टाइप के गैंग एक छोटी सी गली में आ जाते हैं। छत पर खड़ी पुलिस गैंगवार में शामिल है या एनकांउटर करने आयी है, ये फर्क तुरंत ख़त्म हो जाता है। किसी वीडियो गेम की तरह लास्ट सीन लगा। खिलौने वाली बंदूकें कब हंसे कब रोये समझ में ही नहीं आया।

सिनेमाहॉल में हम गुलजार के जन्मदिन पर उनके गीतो में भी खोना चाहते थे, हम कमीनी चीज को खोजना चाहते थे। हां, हमें निराशा हाथ नहीं लगी। हम गुलजार से मोहब्बत करना सीख गए। पहली बार मोहब्बत की और आखिरी बार भी की। बस मेरी आरज़ू कमीनी, जब ये गाना आया तो बहुत निराश हुआ क्योंकि संगीत के भयानक शोर में गुलजार के शब्द खो चुके थे। हमें अहसास हुआ कि शायद इस गीत में संगीत की चासनी विशाल ने आक्रमक तरीके से मिलाया है।

मुझे यह गाना भी खूब पसंद आया-
ये इश्क नहीं आसां,
अजी एड्स का खतरा है
पतावार पहन जाना,ये आग का दरिया है।

यह एक आक्रामक गाना है, जो हम पर हमला करता है। सुखविंदर और कैलाश की आवाज और ‘फटाक’ हमें फटक से खींच लेती है, आखिर यही तो है टिपिकल विशाल का अंदाज़।

खैर, जाते-जाते मैं तो यही कहूंगा कि कमीने देखिए और कुछ हकला, कुछ तोतलाना सीखें।
शुक्रिया।

जानकारी- मोहल्ला लाइव के अब्राहम हिंदी वाले के अनुसार वि‍शाल के दिमाग में कमीने के नाम से फिल्म बनाने की प्रेरणा ऐसे मिली थी कि जब उन्होंने गुलज़ार की फिल्म इजाज़त देखी थी, तो वे इस शब्‍द के इस्‍तेमाल पर चौंके थे। उस फि‍ल्‍म के एक रोमांटि‍क सीन में नसीरूद्दीन शाह अपनी प्रेमि‍का अनुराधा पटेल की ओर देखते हुए धीमे स्‍वर में कहते हैं, तू बहुत कमीनी है। नसीर के इस संवाद पर विशाल चौंके थे। उन्‍हें अच्‍छा भी लगा था। बाद में अपनी दोस्‍तों को वे इस संबोधन से चौंकाते रहे। यह शब्‍द वि‍शाल के साथ चिपक-सा गया।

जब फि‍ल्‍म की योजना बनी, तो वि‍शाल ने सबसे पहले गुलज़ार से पूछा कि‍ फि‍ल्‍म का नाम कमीने कैसा रहगा? गुलज़ार ने बहुत अच्‍छा कहा और कुछ दि‍नों के अंदर गीत भी लि‍ख दि‍या। वि‍शाल और गुलज़ार की क्रि‍एटि‍व संगत का नतीजा हमारे सामने है।

Tuesday, August 18, 2009

कथक को लोकप्रिय बनाने के लिए अब प्रायोजक नहीं मिल रहे हैं..




पद्म विभूषण से सम्मानित जानेमाने कथक गुरु पंडित बिरजू महाराज का कहना है कथक को लोकप्रिय बनाने के लिए अब प्रायोजक नहीं मिलते हैं। कथक को एक मुकाम तक पहुँचाने वाले लखनऊ घराने के इस कलाकार का शुरुआती दौर संघर्ष का रहा है। उन्होंने कहा कि जब इस कला को बढ़ावा देने के लिए प्रायोजक नहीं मिलते हैं तो उन्हें काफी दुख होता है।

महाराज ने कहा, "कथक के लिए प्रायोजक नहीं मिलने से मैं काफी चिंतित और दुखी हूं। दरअसल इस नृत्य को पेश करने वाले कार्यक्रम काफी महंगे होते हैं। अब काफी कम लोग प्रायोजक बनने के लिए सामने आते हैं। "

महाराज ने कहा कि अब फिल्मों में शास्त्रीय नृत्यों को काफी कम शामिल किया जा रहा है। उन्होंने कहा, "इन खबरों से मुझे दुख होता है। अब फिल्मकार भी अपने फिल्मों में कत्थक को शामिल करने से कतराते हैं। यदि मुड़कर देखें तो देवदास जैसी कुछ फिल्मों में ही कत्थक को शामिल किया गया था।"

महाराज ने फिल्मकार संजय लीला भंसाली की फिल्म 'देवदास' के एक गीत 'काहे छेड़े मोहे.' की कोरियोग्राफी की थी और संगीत भी दिया था।

वैसे 71 वर्षीय कथक गुरु इस बात से खुश हैं कि युवा पीढ़ी, खासकर बच्चे कथक नृत्य सीखने के प्रति रूचि दिखा रहे हैं। वह लगभग 250 बच्चों को कत्थक सीखा रहे हैं। उन्होंने कहा, "यह कथक के लिए अच्छा और सकारात्मक संकेत है। "

महाराज क जन्म लखनऊ के एक बड़े कथक घराने में हुआ था। उनके पिता अच्छन महाराज, चाचा शंभू महाराज का ख़ासा नाम था पर जब वह केवल नौ वर्ष के थे तो उनके पिता जी गुज़र गए। पिताजी के गुज़र जाने के बाद वे कर्ज़ में भी रहे और ग़रीबी का दौर भी झेला। उन्होंने एक बार बताय़ा था कि संकट के दिनों में समय उनकी गुरूबहन कपिला वात्स्यायन लखनऊ आईं और वह उन्हें अपने साथ दिल्ली ले आईं।

दिल्ली में शुरुआत के दिन में भी उन्हें काफ़ी संघर्ष करना पड़ा था। उन्होंने 175 रूपए की नौकरी मिली थी। महाराज ने जामा मस्ज़िद से रॉबिन हुड साइकिल खरीदी थी। वह साइकिल आज भी पास आज भी रखी है। एकबार बीबीसी को दिए एक साक्षात्कार में उन्होंने कहा था कि दिल्ली में उन दिनों पाँच और नौ नंबर की बसें चलती थीं, कनॉट प्लेस से दरियागंज के लिए।

महाराज ने कोलकाता से अपने सफलता के सफ़र की शुरुआत की और फिर मुंबई में काफ़ी आगे बढ़े। वह कोलकाता को अपनी माँ और मुंबई को अपना पिता कहते हैं। उन्होंन कहा कि आज जब वह मुड़कर देखते हैं तो उन्हें संतुष्टि मिलती है लेकिन जब कथक को कोई प्रायोजक नहीं मिलता है तो वह दुखी हो जाते हैं।

Monday, August 17, 2009

बाप ने ईँटो को जोड़कर बनाया था मकान, बेटे कर रहे हैं उसे नीलाम

बायीं तरफ तस्वीर में दिख रहे शाहनवाज ने हाल ही में ब्लॉगिंग शुरू की। मुझे शाहनवाज अपनी पहली नौकरी में मिले। इसके बाद हम दोनों में दोस्ती की गांठ पड़ गई। शायरी का शौक रखने वाले शाहनवाज जुर्रत नाम से ब्लॉग का संचालन करते हैं। अभी तक उन्होंने जुर्रत पर कुल तीन पोस्ट की है। आज ही उन्होंने एक कविता पोस्ट की है, जिसका टाइटल उन्होंने कुछ भी नहीं दिया है और शायद इसकी जरूरत भी नहीं है।

पिता को लेकर उनकी यह कविता झकझोर कर रख देने वाली है। कुछ दिनों से मै भी उधेड़बुन में था कि पिता के अरमानों की व्याख्या बेटे कैसे करते हैं। हम सब जो बेटे हैं, वे क्या कर रहे हैं। मैं खुद इन बातों में खो जाता हूं। खासकर पिता शब्द के करोड़ों चरित्रों को डिस्क्राइब करते हुए। यह कविता उसी श्रृखंला का हिस्सा मालूम होती है। लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हर एक के अंदर एक पिता जीवित होता है जो छटपटाता भी रहता है।

अभी पढ़िए शाहनवाज की कविता-


बाप ने जोड़े थे
कई ईंटे
और बनाया था एक मकान
ये उसके ख्वाबों का घर था
जहाँ थे उसके बच्चे
जो उसकी आँखों के सामने
घर के आँगन में खेलते
धीरे धीरे हो रहे थे जवान

बाप मर चुका है
और बच्चे हो चुके है जवान
बाप के ख्वाबों का घर
अब उसके जवान बच्चे
कर रहे हैं नीलाम
क्यूंकि उनकी बीवियों को
यह घर लगता है छोटा

माँ खामोश है
और देख रही है
अपने पति के ख्वाबों का बलात्कार
यह जानते हुए भी
कि उस बड़े मकान में
मिलेगा उसे सिर्फ एक कोना

Friday, August 14, 2009

गांधी को लाठी देने वाला बीड़ी बनाकर जीवन गुजार रहा है...

केंद्र सरकार और बिहार सरकार ने स्वतंत्रता सेनानियों की भलाई के लिए कई घोषणाएं की हैं परंतु बिहार में आज भी एक स्वतंत्रता सेनानी बीड़ी बनाकर जीवन गुजार रहा है।

मुंगेर जिले के बहियारपुर थाना क्षेत्र के गंगा नदी के तट पर बसे गोरघट गांव निवासी गणेश पासवान आज अपने जीवनयापन के लिए बीड़ी बनाने का काम कर रहे हैं। 90 वर्षीय गणेश पासवान की आंखों में आज भी सन् 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन की याद ताजा है।

पासवान ने कहा कि भारत को आजाद कराने के लिए उस समय अन्य युवाओं के साथ वह भी इस लड़ाई में कूद पड़े थे। वह इस दौरान मुंगेर जेल में भी रहे। उन्होंने कहा कि वर्ष 1944 में जब महात्मा गांधी मुंगेर आए तो उन्होंने गोरघट की प्रसिद्ध लाठी गांधीजी को भेंट की थी। उन्होंने बताया कि वही लाठी महात्मा गांधी ने जीवित रखने तक अपने साथ रखी। उल्लेखनीय है कि गोरघट की लाठी बहुत प्रसिद्ध है।

गणेश पासवान के पास स्वतंत्रता सेनानी होने के सभी प्रमाण पत्र हैं परंतु अभी तक उन्हें इसका कोई लाभ नहीं मिला। वह अभी भी स्वतंत्रता सेनानी को मिलने वाले पेंशन की बाट जोह रहे हैं। जीवनयापन के लिए वह बीड़ी बनाने का काम करते हैं। वह प्रतिदिन 500-600 बीड़ी बनाते हैं, इसके एवज में उन्हें बीड़ी के ठेकेदार से 20 से 30 रुपये मिलते हैं।

उन्होंने बताया कि वह पेंशन के लिए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से भी मिले थे। मुख्यमंत्री ने पेंशन आरंभ करने के लिए एक पत्र भी दिया परंतु अब तक उन्हें पेंशन की एक भी किस्त नहीं मिली।
पासवान बताते हैं कि आज भी भारत को सही मायने में स्वतंत्रता नहीं मिली है। पहले अंग्रेज शासन करते थे और अब पूंजीपति शासन करते हैं। देश में कोई बदलाव नहीं हुआ है। पासवान के तीन पुत्र हैं परंतु उन्हें भी कोई रोजगार नहीं मिला है। वे भी मजदूरी कर अपना तथा अपने परिवार के जीवन की गाड़ी को खींच रहे हैं।

जीवन के अंतिम पड़ाव में पासवान में अब जीने की कोई इच्छा नहीं बची है। एक कोठरी में बैठे अपने जीवन का अंतिम दौर गुजार रहे पासवान कहते हैं कि अब ईश्वर उन्हें ले जाएं,यही अच्छा है।

Thursday, August 13, 2009

संसद परिसर पहुंची 'अलवर की राजकुमारियां'

हाल ही संसद भवन परिसर में ऑस्कर विजेता फिल्म स्लमडॉग मिलियनेयर की विशेष स्क्रीनिंग करवाई गई थी, जिसमें गीतकार गुलजार , संगीतकार ए.आर.रहमान और रेसुल पुक्कुटी को सम्मानित किया था। सम्मान समारोह में गीतकार गुलजार ने बेहद सौम्य लहजे में बात पते की कही थी। उन्होंने कहा था- "भले ही आप समुद्र में डुबकी लगा चुके हों लेकिन जो आनंद गांव के तलाब में डुबकी लगाने में आता है, उसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता क्योंकि उसका अलग ही आनंद होता है।"

यहां इस बात को इसी कारण उठाया जा रहा है क्योंकि संसद भवन परिसर में ही एक समारोह में कुछ ऐसी महिलाएं लोकसभा अध्यक्ष के साथ नजर आईं, (आप तस्वीर में नीली साड़ी में जिस महिला को देख रहे हैं) जिन्हें संयुक्त राष्ट्र में सम्मानित किया जा चुका है। शायद उन्हें देश के सर्वोच्च परिसर में कदम रखकर वैसी ही अनुभूति हुई होगी, जैसा गुलजार को हुआ।

सिर पर मैला ढोने के अभिशाप से मुक्त कराई गईं राजस्थान के अलवर और टोंक जिले की महिलाओं के आत्मविश्वास ने लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार को इस कदर प्रभावित किया कि उन्होंने इसे महिला सशक्तिकरण की मिसाल करार दे दिया। मौका था देश के सौ से अधिक पत्रकारों और बुद्धिजीवियों द्वारा इन पुनर्वासित महिलाओं की जिंदगी पर अंग्रेजी और हिंदी में लिखीं पुस्तक के विमोचन का।


गैर सरकारी संगठन सुलभ इंटरनेशनल द्वारा पुनर्वासित इन महिलाओं की जिंदगी की सच्ची कहानी पर अंग्रेजी में लिखित पुस्तक 'न्यू प्रिसेंस ऑफ अलवर' और हिंदी में लिखित पुस्तक 'अलवर की राजकुमारियां' का लोकार्पण करने के बाद मीरा कुमार ने कहा कि नौजवानों और बुद्धिजीवियों को इस कुप्रथा से देश को निजात दिलाने के लिए आगे आना होगा, तभी महात्मा गांधी और अंबेडकर का सपना पूरा होगा। पुस्तक का विमोचन संसद भवन परिसर के बालयोगी सभागार में किया गया। समारोह की अध्यक्षता पूर्व राज्यपाल और पूर्व केंद्रीय मंत्री भीष्म नारायण सिंह ने की।

मीरा कुमार ने कहा कि सुलभ ने इन महिलाओं को नारकीय जिंदगी से निजात दिलाकर सामाजिक बदलाव का अनूठा उदाहरण पेश किया है। उन्होंने कहा कि इन पुनर्वासित महिलाओं का आत्मविश्वास देखकर समाज में बदलाव की उम्मीद बढ़ी है। इस मौके पर भीष्म नारायण सिंह ने कहा कि जिस संवेदना और रचनात्मक ईमानदारी के साथ पुस्तकों में इन महिलाओं की कहानी पेश की गई है, वह प्रशंसनीय है।

इस मौके पर कई महिलाओं ने आपबीती सुनाई। सुलभ के संस्थापक विदेश्वर पाठक ने सुलभ की संस्था 'नई दिशा' द्वारा इन महिलाओं के पुनर्वास की कहानी पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जब तक समाज में ऐसी कुप्रथा है, हमें चैन से नहीं बैठना चाहिए।

पुस्तकों में इन महिलाओं की आपबीती और दर्द भरी कहानियां हैं, जिन्हें दिल्ली के 110 पत्रकारों ने शब्दों में पिरोया है। इन सच्ची कहानियों की पात्र आज समाज में सम्मानित जिंदगी जी रही हैं और इसका श्रेय सुलभ को जाता है जिसने इन्हें सिलाई, कढ़ाई, आदि का हुनर सिखा कर सिर ऊंचा कर चलने के काबिल बनाया।

Tuesday, August 11, 2009

रेणु के गांव आया परदेशी...

बिहार के अररिया जिले में स्थित औराही हिंगना गांव में इन दनों एक विदेशी आया हुआ है। लुंगी और बनियान पहने देखकर आप अंदाजा नहीं लगा पाएंगे कि जनाब अमरेकी शहर टेक्सास के हैं। इस वेश में वह खांटी देहाती दिखते हैं। इनका नाम है इयान वुलफोर्ड। औराही के बारे में आपको विस्तार से बताने की जरूरत नहीं है क्योंकि यह महान आंचलिक उपन्यासकार फणीश्वर नाथ रेणु का गांव में हैं। इस गांव की फिजा में रेणु के पात्र बसे हुए हैं।

अमेरिकी विश्वविद्यालय का शोधार्थी और अब लेक्चरर इयान इन दिनों आंचलिक भाषा और ठेठ बिहारी ग्रामीण जीवनशैली को समझने की कोशिश कर रहा है। उसे आचंलिक गीतों से खास लगाव है। दरअसल वह कुछ गीतों के जरिए रेणु के गांव को खंगालना चाहता है।

टेक्सास विश्वविद्यालय का 30 वर्षीय इयान कई दिनों से औराही में डेरा जमाए हुए है। इससे पहले भी वह देश के कई गांवों को खंगाल चुका है। रेणु के परिजनों के साथ इयान काफी वक्त गुजारता है। इसके अलावा स्थानीय लोगों से लगातार संवाद कायम रखे हुए है। रेणु के घर के बाहर चौकी पर बैठकर वह कहता है- रेणु की लेखनी अद्वितीय है। उन्होंने अपनी लेखनी के जरिए ग्राम्य जीवन पर प्रकाश डाला। साथ ही आंचलिक गीतों को प्रमुखता से स्थापित किया।


टेक्सास विश्वविद्यालय ने हाल ही में इयान को लेक्चरर नियुक्त करने की घोषणा की। इयान ने कहा- मेरी पत्नी ने मुझे इसकी सूचना दी। मैं काफी खुश हूं। उन्होंने कहा कि रेणु के गांव में पहुंचने की उनकी लालसा पांच साल पहले जगी थी, जब उन्होंने रेणु की कुछ उपन्यासों को पढ़ा था। खासकर उनके उपन्यासों में प्रयुक्त लोकगीत उसे अपनी ओर खींचते हैं।


इयान ने कहा कि जब वह औराही पहुंचे तो उनकी जान-पहचान किसी से नहीं थी। लेकिन उन्हें खुशी इस बात की है पहली बार में ही लोग उनके दोस्त बन गए। उन्होंने कहा- रेणु की लेखनी के बारे में अंग्रेजी में काफी कम लिखा गया है। मैं उनकी लेखनी पर शोध कर रहा हूं। मैंने लगभग 60 फीसदी शोध कार्य पूरा कर लिया है।


रेणु से बेहद प्रभावित इयान ने कहा कि वह भविष्य में अमेरिकी विश्वविद्यालय में भारतीय ग्राम्य जीवन पर छात्रों को पढ़ना चाहते हैं औऱ इस विषय को पाठ्यक्रम में भी शामिल कराने के लिए प्रयास कर रहे हैं। लेकिन उन्हें दुख इस बात है कि अभी भी भारतीय गांवों में गरीबी और अशिक्षा एक बड़ी समस्या बनी हुई है।

चलते -चलते बता दूं कि इयान साहेब ब्लॉगर भी हैं और अंग्रेजी के साथ हिंदी में भी ब्लॉगिगं कर रहे हैं। उनतक पहुंचने का पता है-
http://www.indiasammy.blogspot.com/ (अंग्रेजी में)
http://www.hindisammy.blogspot.com/ (हिंदी में )

और अब रेणु के एक गीत का आनंद उठाइए-

भादव मास भयंकर रतिया-या-या,

पिया परदेस गेल धड़के मोर छतिया-या-या,

कैसे धीर धरौं मन धीरा-

आसिन मास नयन ढरै नीरा-आ-आ-आ..।“

Monday, August 10, 2009

इस गली, उस गली /इस नगर उस नगर /जाएं भी तो कहां,..........

वेब की दुनिया सुहानी होती है, पर इसमें बांधने की शक्ति काफी कम होती है। कोई भी किसी वेबसाइट या ब्लॉग पर जाकर कितनी देर ठहर पाएगा, यह कहना कठिन है। यह निर्भर करता है वेबसाइट/ब्लॉग्स के कंटेट्स पर। हम और आप हर रोज औसतन 20-22 वेबसाइटों का चक्कर लगाते हैं पर कितने पर हम ठहर पाते हैं..यह सवाल मुझे हर रोज तंग करता है। खासकर जब आप भी कोई ब्लॉग चलाते हैं या फिर पोर्टल मोडरेट कर रहे हों।

ऐसे सवाल के जवाब के लिए मैं हिंदी और अंग्रेजी के कुछ वेबसाइटों और ब्लॉगों पर नजर दौड़ाता रहता हूं। अभी हाल ही में रूरल रिपोर्टर नामक ब्लॉग पर गया था, यकिन मानिए यह तस्वीरों का ब्लॉग मुझे आधे घंटे तक अपने पेजों में उलझाए रहा। हर तस्वीर ढेर सारे सवाल दागते हैं। इसके अलावा पी. साईंनाथ की कुछ रपटें भी कमाल की है। कुछ ऐसा ही कभी-कभार मोहल्ला लाइव डॉट कॉम भी करता है। पिछले हफ्ते मिहिर पंड्या ने कमीने फिल्म के संगीत की समीक्षा लिखी थी। मैं इसे मोहल्ला लाइव के तमाम रपटों में सबसे बेहतरीन मानता हूं। शनिवार सुबह मैं भी इस वेबसाइट से चिपका रहा। मिहिर ने संगीत की समीक्षा की नई परंपरा की शुरुआत कर दी। इसके अलावा भी यह वेबसाइट कांटेट के मामले में धनी है।

विस्फोट डॉट कॉम भी कंटेट के मामले में एक नए तेवर लिए हुए है लेकिन कभी-कभी लंबे पोस्ट ऊबाने भी लगते हैं। दरअसल वेब की दुनिया में हाथ-पांव मारने वाले हम जैसे लोग लंबे पोस्टों को सहजता से नहीं ले पाते हैं। हम इन वेबसाइटों पर जब जाते हैं तो इच्छा यही रहती है कि कम से कम समय में हम सभी चीजों पर नजर दौड़ा लें क्योंकि हमारे पास कई विकल्प हैं जहां भी हमें चक्कर लगाना होता है। हाशिया ब्लॉग को भी मैं इसी नजर से देखता हूं। इसे कंटेट के मामले में आप सबसे धनी वेबसाइट मान सकते हैं, जहां आपको दिमागी भूख को मिटाने के लिए तमाम तरह के व्यंजन मिल जाएंगे।

हम पोर्टलों / ब्लॉगों के जरिए वेब को खँगालने वाले लोग इन अड्डों पर ठहरना चाहते हैं, ठीक उन कॉफी हाउसों की तरह जहां के टेबल पर लोग घंटो बैठे रह जाते हैं क्योंकि वहां बातों ही बातों में कई बात निकल जाती है। हम हिंदी की तमाम वेबसाइटों और ब्लॉगों से यही अपेक्षा रखते हैं कि साइबर स्‍पेस में कॉफी हाउस वाले दिन लौट आएं। हमे साइबर वर्ल्ड में यह कहने का मौका नहीं मिले-

"इस गली, उस गली

इस नगर उस नगर

जाएं भी तो कहां,.........."

Sunday, August 09, 2009

ख़बरों के कारोबार में टिके रहने के लिए सबसे ज़रूरी चीज़ है साख

बीबीसी संवाददाता राजेश प्रियदर्शी ने खरी-खरी बीबीसी हिंदी ब्लॉग में बैतुल्लाह महसूद के मारे जाने की कथित खबरों के बहाने पत्रकारिता को लेकर एक बहस छेड़ दी है। उन्होंने तीन महत्वपूर्ण बातें कही,
पहला- सीमाओं को याद रखना चाहिए और उनका सम्मान करना चाहिए, ख़ास तौर पर पत्रकारों को
दूसरा- ख़बरों के कारोबार टिके रहने के लिए सबसे ज़रूरी चीज़ है साख.
तीसरा- संयम और सतर्कता हमेशा अच्छा पत्रकार बने रहने का पहला नियम है।

आप भी पढ़िए उनकी पूरी पोस्ट।
गिरीन्द्र

पत्रकारिता की अपनी सीमाएँ हैं.किसकी नहीं हैं? तालेबान कमांडर बैतुल्लाह महसूद ने पहले पाकिस्तानी सेना की सीमाओं का एहसास कराया और अब अनजाने में पत्रकारिता का भी. हमने पहले पाकिस्तानी मंत्रियों के हवाले से बताया कि महसूद 'लगता है कि' मारे गए हैं, अब तालेबान के एक कमांडर कह रहे हैं कि वे ज़िंदा हैं.

दोनों में से एक ही बात सच हो सकती है, हम दोनों कह रहे हैं फिर हम सच कैसे कह रहे हैं?
दुनिया की लगभग हर समाचार संस्था सिर्फ़ सच रिपोर्ट करने का दावा करती है, हम भी करते हैं.
बैतुल्लाह ही नहीं, डूबी हुई नावें, टकराई हुई रेलगाड़ियाँ या फटे हुए बम... अक्सर पत्रकारों के लिए इम्तहान बनकर आते हैं.

पहले पुलिस कमिश्नर कह जाते हैं कि '50 लोग मारे गए', फिर गृह मंत्री बताते हैं कि '45 लोग मारे गए'... तो क्या इसका ये मतलब हुआ कि पाँच लोग मरकर जी उठे? इन पेंचों को पत्रकारिता के उस्ताद ख़ूब समझते हैं. ख़बरों के कारोबार टिके रहने के लिए सबसे ज़रूरी चीज़ है साख. यही वजह है कि हर विश्वसनीय समाचार माध्यम बताता है कि ख़बर किस ज़रिए से आ रही है, यह उसकी अपनी खोज नहीं है.

जब हम महसूद के मारे जाने की ख़बर तैयार कर रहे थे तो हमारे एडिटर ने याद दिलाया- 'ये ज़रूर कहना कि तालेबान ने इसकी तस्दीक नहीं की है, और ऐसे कई दावे पहले ग़लत साबित हो चुके हैं.' हमने एक तरह से मान लिया था कि महसूद मारे गए हैं, हमने ये चर्चा भी कि उनकी जगह कौन लेगा, लेकिन साथ ही हमने लोगों को कई बार याद दिलाया कि पाकिस्तानी मंत्री ऐसा कह रहे हैं तालेबान या महसूद के परिजन नहीं.

सच को ढूँढ निकालने का जोश अच्छा पत्रकार होने की शर्त है, मगर संयम और सतर्कता हमेशा अच्छा पत्रकार बने रहने का पहला नियम. सीमाओं को याद रखना चाहिए और उनका सम्मान करना चाहिए, ख़ास तौर पर पत्रकारों को.

कुछ लोग कहते हैं कि रेस में ध्यान सिर्फ़ तेज़ दौड़ने पर होता है, लेकिन मुझे लगता है कि अपनी लेन में ही दौड़ना चाहिए उसके बाहर नहीं.

Thursday, August 06, 2009

हम लडेंगे साथी


पाश को पढ़ना और फिर-फिर पढ़ना अपने समय के प्यार और अपने समय की नफ़रतों को जानने की तरह है. हम लडेंगे साथी उनकी कुछ उन कविताओं में शामिल हैं, जिन्हें बार-बार पढा़ जाना ज़रूरी हो गया है।


गिरीन्द्र


हम लड़ेंगे साथी, उदास मौसम के लिए


हम लड़ेंगे साथी, गुलाम इच्छाओं के लिए


हम चुनेंगे साथी, जिंदगी के टुकड़े


हथौड़ा अब भी चलता है


उदास निहाई पर हल की लीकें


अब भी बनती हैं, चीखती धरती पर


यह काम हमारा नहीं बनता,


सवाल नाचता है सवाल के कंधों पर चढ़ कर


हम लड़ेंगे साथी.
हम लड़ेंगे तब तक


कि बीरू बकरिहा जब तक


बकरियों का पेशाब पीता है


खिले हुए सरसों के फूलों को बीजने वाले


जब तक खुद नहीं सूंघते


कि सूजी आंखोंवाली गांव की अध्यापिका का पति


जब तक जंग से लौट नहीं आता


जब तक पुलिस के सिपाही


अपने ही भाइयों का गला दबाने के लिए विवश हैं


कि बाबू दफ्तरों के जब तक रक्त से अक्षर लिखते हैं...


हम लड़ेंगे जब तक दुनिया में लड़ने की जरूरत बाकी है...


जब बंदूक न हुई, तब तलवार होगी


जब तलवार न हुई, लड़ने की लगन होगी


लड़ने का ढंग न हुआ, लड़ने की जरूरत होगी


और हम लड़ेंगे साथी...


हम लड़ेंगे कि लड़ने के बगैर कुछ भी नहीं मिलता


हम लड़ेंगे कि अभी तक लड़े क्यों न हम


लड़ेंगे अपनी सजा कबूलने के लिए


लड़ते हुए मर जाने वालों की याद जिंदा रखने के लिए


हम लड़ेंगे साथी...


कत्ल हुए जज्बात की कसम खाकर


बुझी हुई नजरों की कसम खाकर


हाथों पर पड़ी गांठों की कसम खाकर


हम लड़ेंगे साथी

(तस्वीर हाशिया से उधार)

Tuesday, August 04, 2009

चलिए कुछ कदम साथ चलते हैं

चलिए कुछ कदम साथ चलते हैं,
वैसे भी साथ चले कई दिन हो गए।

शाम अभी मुझे ठहरी लगती है,
चलिए कुछ देर और हाथों में हाथ थामते हैं।

दूर सड़क पर लोग नजरें झुकाए चल रहे हैं,
चलिए हम अपनी नजरें उठाकर चलते हैं।

बारिश के बाद सड़कों से यहां सोंधी महक नहीं आती
अब तो गांव में भी मिट्टी कम कंक्रीट ज्यादा दिखती हैं।

चलिए एक बार फिर से आपसे बात करते हैं,
कई दिन हो गए आपकी आवाज सुने हुए।

Sunday, August 02, 2009

कहीं कोसी न बन जाए बागमती

बिहार में पिछले वर्ष कोसी नदी कयामत बन कर उत्तरी इलाकों में टूट पड़ी थी। तबाही का ये मंजर इसलिए भयावह था क्योंकि कोसी नदी ने अपने प्रवाह का रास्ता बदला था। हर वर्ष बाढ़ को भोगने वाली राज्य की जनता इस बार भी खतरे से जूझ रही है। इस बार भय है कि कहीं बागमती नदी कोसी का रूप धरण नहीं कर ले।

बिहार के सीतामढ़ी जिले के रूनीसैदपुर प्रखंड के तिलक ताजपुर गांव के समीप बागमती नदी का तटबंध टूट जाने से लगभग 200 गांवों में बाढ़ का पानी प्रवेश कर गया है और हजारों लोग बेघर हो गए हैं।

एक बाढ़ पीड़ित ग्रामीण ने बताया, "हम भूखे हैं। हमारे बच्चे भोजन और दूध के लिए रो रहे हैं लेकिन सरकार की ओर से हमें कुछ नहीं मिल रहा है। तटबंध को टूटे 24 घंटे से ज्यादा का वक्त गुजर चुका है। "

सीतामढ़ी जिले के एक अधिकारी ने बताया कि एक लाख से अधिक लोग बाढ़ से प्रभावित हो चुके हैं। उन्होंने कहा कि इस बात की आशंका है कि कई और गांव बाढ़ की चपेट में आ जाएंगे। राष्ट्रीय आपदा राहत बल (एनडीआरएफ) का एक दल रविवार सुबह से राहत कार्यो में जुट गया है।

अधिकारी ने कहा कि एनडीआरएफ का दल शनिवार शाम ही यहां पहुंच गया था लेकिन अंधेरे की वजह से राहत कार्य शुरू नहीं हो सका था। बाढ़ की चपेट में आने से लगभग छह लोगों के डूबने की आशंका व्यक्त की जा रही है लेकिन जिला अधिकारी ने केवल एक महिला की मौत की पुष्टि की है।

माना जा रहा है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कुछ ही दिनों में बाढ़ प्रभावित इलाकों का दौरा करेंगे।
नीतीश कुमार ने शनिवार को वहां एक उच्च स्तरीय जांच दल को भेजने का निर्देश दिया था। जांच दल में जल संसाधन विभाग के प्रधान सचिव, आपदा प्रबंधन विभाग के प्रधान सचिव, दोनों विभागों के मंत्री तथा राष्ट्रीय आपदा राहत बल (एनडीआरएफ) के पदाधिकारी शामिल किए गए हैं।

इधर, मुजफ्फरपुर जिले के कटरा प्रखंड में लखनदेई नदी के तटबंध में दरार आ गई है, जिससे मोहनपुर, शहनौली, डुमरी, खंगूरा, धोबौली बकुची आदि गांवों में बाढ़ का पानी फैल गया है। जिलाधिकारी विपिन कुमार ने शनिवार को बताया था कि बकुची कृषि फॉर्म के समीप तटबंध में दरार की मरम्मत कर दी गई है।

उल्लेखनीय है कि गत वर्ष राज्य के आठ जिलों के 417 गांव की करीब 40 लाख आबादी बाढ़ की चपेट में आ गई थी ।वह भी कोई सौ किलोमीटर। पिछले साल नदियों के बहाव का रास्ता बदलना किसी कयामत से कम नहीं था। इसका सीधा-सा मतलब था 100 किलोमीटर के पूरे इलाके का जलमग्न हो जाना, और ऐसा ही कुछ हुआ भी। इस बार हुक्मरानों को फिर से सचेत होने की जरूरत है नहीं तो लोग फिर कहेंगे-

''हम मारे छी मुक्का कपाड़ मे , हमर किस्मत फुटल कोसी धार मे'' । आशंका है कि इस बार कोसी के बदले लोग बागमती कहें।