Sunday, May 31, 2009

क्या है सपना..आसमां की सैर या जमीं पे रहना..

दसवीं की पढ़ाई पूरी करने के बाद होस्टल से निकलने की बारी आई तो होस्टल के प्रमुख ने पूछा था- तुम्हारा सपना क्या है..मुझे याद है मैंने तपाक से कहा था गांव में बच्चों को पढ़ाना....। तेजी से बदलती इस दुनिया में मेरे सपने खो गए लेकिन यकीन मानिए मरे नहीं हैं।

यह बात अभी इसी कारण बता रहा हूं क्योंकि कर्नाटक के कूननप्पालू गांव के बच्चे भी हर सप्ताहांत बड़ी बेसब्री से अपने कुछ मेहमान शिक्षकों का इंतजार करते हैं। कमाल की बात यह है कि ये शिक्षक देश में आईटी का प्रमुख केंद्र बन चुके बेंगलुरू से आते हैं और बच्चों को गणित, अंग्रेजी और विज्ञान जैसे प्रमुख विषय पढ़ाते हैं।


कूननप्पालू गांव बेंगलुरू से 120 किलोमीटर की दूरी पर है। इस गांव में एक सरकारी स्कूल है जहां 45 बच्चे पढ़ाई करते हैं। पांचवीं कक्षा तक इस स्कूल में महज एक शिक्षक है। यहां फिर एनजीओ की जरूरत महसूस होती दिखी, (कागजी एनीजओ नहीं बल्कि जमीनी स्तर पर काम करने वाले एनजीओ) 'समायते फाउंडेशन' के संस्थापक सदस्य अरुण मुने गौड़ा के प्रयास से इस गांव के बच्चों को योग्य शिक्षकों से पढ़ने का मौका मिल रहा है।

यह संगठन बेंगलुरू के कुछ नौजवान आईटी पेशेवरों ने बनाया है जिन्होंने इन बच्चों की मदद का बीड़ा उठाया है। ये पेशेवर इन 45 बच्चों के साथ ही बगल के गांव के एक अन्य स्कूल के 40 बच्चों को भी पढ़ा रहे हैं। इसकी नींव हासन स्थित मालनद इंजीनियरिंग कॉलेज के छह छात्रों ने रखी थी। हालांकि बाद में ये सभी पेशेवर बेंगलुरू पहुंच गए। आज इस संगठन के 12 सक्रिय सदस्य हैं।

यहां एनजीओ की वकालत नहीं हो रही है, बल्कि कुछ अलग काम करने की बात हो रही है। जीवन के आपाधापी में, अपनी जरूरतों के लिए रेंगते रहने के बीच कुछ ऐसा तो जरूर करना चाहिए, जिससे सुकून मिले...

भारतीय छात्रों का मेलबर्न में शांति मार्च


Saturday, May 30, 2009

कलम और कागज

सादे कागज पर कुछ लिखने की ख्वाहिश है
कलम को दो ऊंगलियों में फंसाकर लिखने की ख्वाहिश है।

की-बोर्ड के चक्कर में कलम केवल बैग और जेब में रहने लगी
अब फिर से कलम से लिखने की ख्वाहिश है।

बटन पर फेरते ऊंगलियों को
कुछ शरारत करने की ख्वाहिश है
सादे कागज को कलम से रंगने की ख्वाहिश है।

कैमलिन की इंक और कैमलिन की ही कलम से
कुछ लिखने की ख्वाहिश दबाए ऊंगलियां सुगबुगा रही है।

कलम चलती है अब बस चैकबुक पर बांकी जगह तो की-बोर्ड ही काफी है
फिर से सादे कागज को कलम से पाटने की ख्वाहिश है।

Friday, May 29, 2009

नीतीश बाबू थोड़ा दरभंगा के सड़कों पर भी ध्यान दीजिए...

कहीं की भी यात्रा आपको कुछ सबक जरूर सीखाती है। कल ही बिहार के बड़े और समृद्ध शहरों में एक दरभंगा में पांच दिन ठहरने के बाद लौटा हूं। वहां से सबक यह लेकर आया हूं कि दूर के ढोल के आवाज में आकर किसी की तारीफों के पुल को लंबे समय तक मत थामे रहिए।

बिहार के सीएम नीतीश कुमार ने चकाचक सड़क और भय मुक्त बिहार के नाम पर लोकसभा चुनाव में सफलता हासिल की लेकिन कुछ इलाकों में चकाचक सड़क की व्याख्या दुरुस्त नहीं है और दरभंगा इसी कड़ी का हिस्सा है।

शहर दरभंगा के तकरीबन सभी इलाकों का चक्कर लगाया लेकिन कोई भी सड़क ऐसी नहीं मिली जहां सुकून मिले, हर जगह का हाल बेहाल। आठ साल के अंतराल के बाद दरभंगा पहुंचने पर कोई खास अंतर देखने को नहीं मिला।

भले ही नीतीश लहर में राजद नेता फातमी को कीर्ति आजाद ने पराजित कर दिया लेकिन विकास के नाम पर इस समृद्ध शहर की हालत पस्त ही है।

वैसे बड़े-बड़े स्कूलों का व्यवसाय यहां तेजी से फैल रहा है लेकिन सड़क-बिजली का प्रभाव सिकुड़ता ही जा रहा है। बड़े-बड़े पोखरों (तालाब) का शहर दरभंगा गंदगी के अंबार को खुद में समेटता जा रहा है.। वैसे विश्वविद्यालय परिसर का हाल बुरा नहीं है। वहां की सड़के जरूर नीतीश कुमार की घोषणाओं पर अमल कर रही है।

सो, माननीय नीतीश बाबू थोड़ा दरभंगा पर ध्यान दीजिए, एक गो सीट आपके खाते में यहां से भी गया है। रोड़-वोड ठीक करवाइए, काहे हम लोगों को हिचकोला खिलाने पर तुले हैं।

Friday, May 22, 2009

सुनो साथियों....

कृपया इसे ध्यान से पढ़िएगा। पढ़ते वक्त खुद को अंधेरे में मत रखिएगा। यही गुजारिश है। इसे लिखा है संदीप कुमार पांडेय ने। मेरा दोस्त है और संयोग से सहकर्मी भी। उसने १० जनवरी २००९ को यह कविता लिखी और अपने ब्लॉग दिल-ए-नादाँ पर प्रकाशित भी किया लेकिन आज पांच महीने बाद अनायस ही मेरी नजर इस रचना पर गई और मैं इसमें डूब गया। और कुछ नहीं कहूंगा, बस पढ़िए। शुक्रिया

गिरीन्द्र


ये जो आदमी नाम का जीव है न मेरे भाई
सचमुच बड़ा अनोखा है
और चूंकि उसे पहचानना मेरा पेशा है
तो मैंने कोशिश की है और नतीजे आप को सुनाता हूँ..............
तो मुलाहिजा हो साहिबान
यहाँ कुछ लोग दुष्यंत कुमार के चेले हैं,
पूरी जवानी अपनी गुंडई और हरामीपने को
दुष्यंत की कविताओं की आड़ देने वाले ये लोग
साए में धूप को छाती से चिपकाये हुए
सुविधाओं से लैस जीवन के बीच कभी -कभी दौरा पड़ने पे
व्यवस्था के ख़िलाफ़ वमन करते हैं और सो जाते हैं
कुछ extreemist मार्क्स के चेले हैं
उन्होंने खोल रखे हैं एनजीओ
सरकारी दफ्तर में ग्रांट के लिए बाबू को तेल लगाने के बाद जो
उर्जा बच जाती है उसका उपयोग वे रात में बिस्तर पर
स्वयंसेविकाओं के साथ क्रांति करने में करते हैं
ये क्रांतिकारी लिखते हैं प्रेम की कवितायें
जिनमें होता है अफ़सोस अतृप्त कामनाओं पर
उनमें के एक दारु पीकर बड़ी मासूम सी कसम खाता है
कि उसने अपनी प्रेमिका के साथ
(जो अब किसी और की ब्याहता है) कभी सम्भोग नही किया
बगल में रहता है एक समाजवादी
जो साम्यवाद और समाजवाद पर रिसर्च कर रहा है
वो बहुत तार्किक है और चीजों के प्रति निरपेक्ष नजरिया रखता है
उसकी प्रेमिका ने दहेज़ के चलते उसके सबसे करीबी दोस्त के विवाह कर लिया है
इसे वह चयन की स्वतंत्रता का मामला बताता है
और भविष्य को लेकर बहुत आशान्वित है
एक धड़ा कट्टरपंथियों का है जिनको गान्ही (गांधी) से समस्या है
गान्ही बाबा ने उनको पचास साल पीछे धकेल दिया
ऐसा उनका आरोप है
बहरहाल शहर में बाकी सब ठीकठाक है .........

Thursday, May 21, 2009

फोनाचार

बंधु क्या आपने कभी यह शब्द सुना है-फोनाचार। मैं आपको कह दूं कि यह शब्द अनुराग कश्यप के इमोशनल अत्याचार की कड़ी में नहीं आता है। यह शब्द ऑफिस और वहां रखे बेचारे टेलीफून से जुड़ा है। कार्यालय के एक कर्मचारी के हाथों पिटते एक टेलीफून की कथा है। नायक टेलीफून है और खलनायक उसके साथ अत्याचार करने वाला कर्मचारी।

टेलीफून के बटनों (अंकों) के साथ, उसके रिसीवर के साथ बेहाया ढंग से अत्याचार करने वाला कर्मचारी ऑफिस पहुंचते ही उससे लिपट पड़ता है और ठीक उसी समय आकाशवाणी होती है- बेटा टेलीफून तेरे साथ हो रहा है अत्याचार और इसका नाम मैंने रखा है फोनाचार। बेचारा टेलीफून हतप्रभ होकर भविष्यवाणी सुनता है और एक आम नागरिक की तरह सेवा देकर भी अत्याचार सहता रहता है।

टेलीफून हैलो-हैलो सुनते, रिसीवर से दूसरे रिसीवर पर कर्मचारी द्वारा अपने किसी मित्र, या परिजनों से बातचीत को बेमन सुनता रहता है। लेकिन क्या करे कमबख्त बोल नहीं पाता है। कर्मचारी ऑफिस आते ही पहला फोन शायद अपने घर करता है। बीवी को डांटने के अंदाज में कहता है- कहां हो, क्या कर रही हो......अपना टेलीफून यह जानता है कि कर्मचारी की बीवी घर पर ही, वह बेवजह शक कर रहा है लेकिन वह क्या करे। वह तो मात्र माध्यम है, उसकी नियती तो बस फोनाचार सहने की है।

फिर कर्मचारी काम के बीच किसी दूसरे को फोन करता है। अभी वह डांट नहीं रहा है, हंस रहा है। लेकिन हंसना भी उसका दिखावा प्रतीत होता है। टेलीफून जानता है कि जो व्यक्ति उसका प्रयोग कर रहा है उसकी हंसी बनावटी है, ठीक वैसे ही जैसे बड़ी-बड़ी पार्टियों में लोग एक दूसरे से कहते हैं- हॉय राज, कैसे हो........हाहाहाह. वाह मजा आ गया....।

इन सब अत्य़ाचारों को एकतरफा सहता हुआ काले डब्बे का टेलीफून एक दिन एकाकक रूद्र रूप धारण कर लेता है। कहता है, बस अब बहुत हो गया, मैं आज खुद पर होने वाले फोनाचार का जवाब देकर ही रहूंगा। टेलीफून खुद ही डायल करना शुरू करता है, ठीक वैसे ही जैसे अपने ही दिल पर वह छुरी चला रहा हो। पहला फोन कर्माचारी की बीवी को करता है और कहता है कि आपके पतिदेव ऑफिस में काम से अधिक मेरे साथ समय गुजारते हैं। मेरे हाथों (रिसीवर) को हमेशा अपने हाथों में थामे रहते हैं। पत्नी गुस्सा हो जाती है, आखिर पति देव बगल में ही जो बैठे हैं।

फिर टेलीफून कर्मचारी के दोस्त को फोन करता है और कहता है, मुर्ख, तू अपने दोस्त पर विश्वास करता है। वह तुम्हें नहीं हमेशा मुझसे लगा रहता है.......।

इस प्रकार खुद पर होने वाले अत्याचार का आखिर टेलीफून ने बदला ले ही लिया और फोनाचार के लिए अदालती चक्कर लगाने की सोचा भी नहीं। आखिर उसने खुद ही कदम उठाने का फैसला जो लिया था।

चलो गांव को शहर बनाते हैं.......

चलो गांव को शहर बनाते हैं,
शहरी उम्मीदों को साथ लिए
चलो गांव की ओर उसे शहर बनाते हैं।


सपने जगाते शहर से कुछ रोशनी उधार लेकर
जगमगाएंगे गांव को और उसे बनाएंगे एक अलग शहर
आपाधापी लाएंगे, बदलेंगे लोगों की सोच
चलो गांव को शहर बनाते हैं।


कई गांवों को गुड़गांव बनाने
लोगों को तेज चलने और प्रोफेशनल बनाने
चलो गांव को शहर बनाते हैं।


सोने वाले शहर से आगे बढ़कर
नींद में भी जागते नए सहर के लिए
चलो गांव को शहर बनाते हैं।


खोने की जिद में निराश गावों को
यह बताने कि पाना भी होता है
चलो गांव को शहर बनाते हैं।

Monday, May 18, 2009

"भाजपा और राजग ने लोगों का भावनात्मक दोहन करने की नीति अपनाई"

हमारे मित्र और सहकर्मी संदीप कुमार पांडेय ने चुनाव नतीजों को लेकर देश के कुछ वरिष्ठ और युवा साहित्यकारों से बातचीत की। इन सभी का मानना है कि जनता ने सांप्रदायिकता, जाति और क्षेत्रवाद की राजनीति करने वाली ताकतों व आपराधिक छवि वालों को साफ तौर पर खारिज कर दिया है। पूरी रिपोर्ट पढ़िए।

लोकसभा चुनाव में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) को जीत हासिल हुई है और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) तथा वाम दलों को करारी हार का सामना करना पड़ा है। इन चुनाव नतीजों को लेकर देश के कुछ वरिष्ठ और युवा साहित्यकारों का मानना है कि देश की जनता ने सांप्रदायिकता, जाति और क्षेत्रवाद की राजनीति करने वाली ताकतों व आपराधिक छवि वालों को साफ तौर पर खारिज कर दिया है।

वरिष्ठ साहित्यकारों के मुताबिक राजग जहां वास्तविक मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करने की बजाय भावनात्मक उभार पैदा करने की कोशिशों और भविष्य के लिए स्पष्ट नीतियों के अभाव के चलते पराजित हुआ, वहीं संप्रग की जीत उसकी नीतियों और मनमोहन सिंह की ईमानदार छवि का नतीजा है।

क्या इस जनादेश को देश के सामाजिक और सांस्कृतिक परिवेश में किसी परिवर्तन का द्योतक माना जा सकता है, यह पूछे जाने पर वरिष्ठ साहित्यकार राजेंद्र यादव ने कहा कि ये चुनाव इस मायने में खास हैं कि इस बार जनता ने सांप्रदायिक ताकतों को पूरी तरह नकार दिया साथ ही उसने यह भी स्पष्ट किया कि छोटे और क्षेत्रीय दलों से उसका मोहभंग हो रहा है।

उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के पुनरोदय के बारे में उन्होंने कहा कि जनता ने मायावती के भ्रष्ट और आपराधिक शासन के खिलाफ जनादेश दिया है, जबकि देश के अन्य हिस्सों की ही भांति कांग्रेस की युवाओं को आगे लाने की रणनीति भी उत्तर प्रदेश में कारगर साबित हुई।

भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की हार पर उन्होंने कहा कि भविष्य के लिए कोई स्पष्ट योजना न होना उसकी हार का प्रमुख कारण रहा वाम दलों की खराब स्थिति के बारे में उन्होंने कहा कि वास्तविकता को न समझ पाने और आपसी बिखराव की वजह से उनकी यह दुर्दशा हुई।

प्रगतिशील लेखक संघ के राष्ट्रीय महासचिव और वरिष्ठ समालोचक डॉ. कमला प्रसाद कहना है कि इन चुनावों में जनता ने छिपे हुए एजेंडे लेकर चलने वाले दलों को किनारे लगा दिया। इसके अलावा यह जनादेश बाहुबलियों, धनबलियों और राष्ट्रीय जनता दल (राजद) और समाजवादी पार्टी (सपा) जैसे व्यक्ति केंद्रित दलों के भी खिलाफ रहा।

कांग्रेस की स्थिति में सुधार पर उनका स्पष्ट मानना है कि इसमें कांग्रेस की कोई भूमिका नहीं रही बल्कि उसे अन्य दलों के खिलाफ लोगों की नाराजगी का फायदा मिला। उनके मुताबिक उत्तर प्रदेश में मायावती से नाराज सवर्णो, दलितों और मुस्लिम समुदाय के वोट इस बार कांग्रेस को मिले।

वाम दलों की पराजय पर कमला प्रसाद ने कहा कि संप्रग सरकार द्वारा किए गए सभी अच्छे कामों में वाम दल शरीक रहे, लेकिन ऐन चुनाव के पहले सरकार से समर्थन वापस लेने से वह इन कामों का लाभ नहीं उठा सके। इसके अतिरिक्त उन्हें परमाणु करार के मुद्दे पर भाजपा के साथ खड़े होते दिखने का भी नुकसान हुआ।

युवा आलोचक कृष्णमोहन ने उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के उभार पर कहा कि मुलायम शासन से त्रस्त जनता ने मायावती को जनादेश दिया था लेकिन उसका बहुत जल्दी उनसे भी मोहभंग हो गया और राज्य में तीसरे विकल्प के रूप मे कांग्रेस को उभने का मौका मिल गया।

वामदलों की करारी पराजय पर उन्होंने कहा कि नंदीग्राम और सिंगुर जैसे प्रकरणों ने वाम दलों की छवि को भारी क्षति पहुंचाई। इसके अलावा सैद्धांतिक विचलन भी उनकी हार का कारण बना। उन्हें दोहरेपन का खामियाजा भी भुगतना पड़ा। दरअसल वह खुद उन कमियों का शिकार हो गए जिनके लिए वह अन्य दलों की आलोचना किया करते थे।

भाजपा और राजग की हार पर उन्होंने कहा कि उसने वास्तविक मौजूदा मुद्दों की बजाय लोगों का भावनात्मक दोहन करने की नीति अपनाई जो अंतत: उनके लिए नुकसानदेह साबित हुई। उन्होंने कहा कि आतंकवाद एक बड़ा मुद्दा है जिस पर राष्ट्रीय बहस छेड़ी जा सकती थी लेकिन भाजपा अफजल की फांसी और वरुण गांधी के बयानों पर ही उलझी रह गई।

ज्ञानपीठ युवा लेखन पुरस्कार से सम्मानित युवा किस्सागो चंदन पांडेय का कहना है कि इन चुनावों से राष्ट्रीय स्तर पर तो कोई सामाजिक सांस्कृतिक बदलाव परिलक्षित नहीं होते लेकिन फिर भी इस बार लोगों ने जातिवाद, बाहुबल और ब्लैकमेलिंग की राजनीति को खारिज किया है जो अपने आप में एक बड़ा परिवर्तन है।

वाम दलों की स्थिति को चंदन उनकी हार न मानते हुए कहते हैं कि आम तौर पर उनके वोटों का प्रतिशत इसके आसपास ही रहता है लेकिन उनकी सीटों में जो कमी आई वह स्थानीय मुद्दों पर विफलता के कारण आई।

राजग की हार पर उन्होंने कहा कि उनके पास वास्तव में मुद्दों का अभाव था क्योंकि उन्हें अच्छी तरह पता था कि बेरोजगारी के वैश्विक कारण है और यह स्थानीय मुद्दा नहीं बन सकता। इसके अलावा ठोस आर्थिक नीतियों के अभाव में उन्हें पता था कि वह महंगाई और मंदी को मुद्दा नहीं बना सकते क्योंकि उनके पास खुद इससे निपटने की कोई योजना नहीं थी।

चंदन ने देश के मीडिया जगत को दक्षिणपंथी रुझान वाला करार देते हुए कहा कि यह मीडिया ही था जो राजग को लगातार मुकाबले में बता रहा था।

युवा कथा लेखिका वंदना राग का मानना है कि इन चुनावों में भाषाई विद्रूपता को अपनाने वाले लोगों की पराजय हुई है और जनता ऐसी छोटी बातों से ऊपर उठी है। उन्होंने कहा कि बुढ़िया और गुड़िया जैसे निचले स्तर के संबोधनों के प्रयोग ने लोगों को यह जता दिया कि देश के बड़े नेता बुजुर्गो और महिलाओं को कितना सम्मान देते हैं।

वाम दलों की हार पर उन्होंने कहा कि नंदीग्राम व सिंगुर जैसे मुद्दों ने उसे नुकसान तो पहुंचाया ही साथ ही जनता ने भी सरकार का साथ छोड़ने के बाद उसे विकास विरोधी मान लिया।

Sunday, May 17, 2009

नीतीश माने तीस

बिहार का नया समीकरण-
नीतीश माने तीस (नीतीश= 30)

( कल एनडीटीवी इंडिया के एक कार्यक्रम में रवीश कुमार ने कहा था)

Friday, May 15, 2009

शहर के मूल में हो रहे बदलावों का लेखा-जोखा

ब्लॉग पर पोस्ट करने के बाद जब हम प्रतिक्रियाओं पर नजर डालते हैं तो कई नयी बातें तो कई बड़े सवाल हमारे सामने खड़े हो जाते हैं। हाल ही में जब एक शहर जहां से हम आए थे... लिखा तो कुछ प्रतिक्रियाएं आईं। जहां संदीप ने लिखा-

गांव/शहर की याद आनी चाहिए फॉर अ चेंज जाइए, घूम-घाम आइए किसी माल से बियर-शियर पीके तरोताजा होइए। क्या गांव-तांव का रोना लेकर बैठ गए आप, साला आफिस के एसी में भी पसीना छूट गया.....


वही सुशांत ने एक सवाल दाग दिया, जिसे मैंन पोस्ट के अंत में छेडा था। उन्होंने पूछा- बदलावों के बारे में विस्तार से लिखिए...क्या-क्या हो रहा है...

मैं यही आकर रूक गया। शहर को देखने का नजरिया हर किसी का अलग होता है लेकिन शहर के मूल में हो रहे बदलाव समान हैं। वह चाहे मेरा शहर पूर्णिया हो या फिर दरभंगा, कानपुर या इलाहाबाद। बदलाव हर जगह हुए और भी हो रहे हैं।

जैसा कि मैंने पहले भी कहा कि बदलाव बेहद जरूरी है लेकिन इन बदलावों के बीच शहर अपनी पहचान को नहीं खो दे, नहीं तो मुश्किल का अहसास होता है। मैंने पूर्णिया में हुए बदलावों को नजदीक से देखा है। साल दर साल यह शहर बदलता जा रहा। हर बार जब इस शहर से अपने शहर जाता हूं तो कुछ ऐसा जरूर देखने को मिलता है जिसे मैंने पहले नहीं देखा था। सच कहूं कुछ बदलावों को देखकर मन खुश भी होता है। लेकिन जब बदलाव के नाम पर शहर की पुरानी आदत मिटते देखता हूं तो दुख होता है।

सकारात्मक बदलाव के संबंध में मेरा फोकस बाजार पर है। मुझे बाजार में हुए बदलाव सबसे रोचक लगते हैं। आप किसी भी शहर के मुख्य बाजार में शाम में घूम आइए, शहर अपनी छाप आप पर जरूर छोड़ेगा। एक वर्ष में यह छाप एक अलग अंदाज में आपको नजर आएगा। दुकानों के साइनबोर्ड से लेकर सब्जी बाजार की आवाज सब कुछ बदल जाते हैं। यहां आप भाषाई बदलाव से रूबरू हो सकेंगे। मछली बेचने से लेकर सब्जी बेचने के अंदाज में दिल्ली और लुधियाना के बाजारों का स्पष्ट आभाश मिलेगा।

सबसे मजा मुझे अपने शहर के बाजार में रविवार दोपहर को आता है। कपड़े के बड़े दुकानों के बाहर फेरी लगाकर कपड़े बेचते ठेले वाले को देखकर जनपथ की तस्वीर साफ हो जाती है। दरअसल रविवार को ये ब़डे दुकान बंद रहते हैं। ये सारे नए ढंग बाजार में गत चार-पांच वर्षों में आए हैं। समय देकर इस पर अध्ययन करने में काफी मजा आ सकता है, और साथ में ऑडियो और वीडियो विजुअल्स का सहारा लें तो मजा दोगुना हो सकता है।

रही बात उन परिवर्तनों की, जिससे दुख होता है। उसमें शहर की बोली और लोकसंस्कृति शामिल है। लोककला तो जैसे तस्वीर से गायब ही हो चली है। शहर का विस्तार जरूर हुआ लेकिन इससे शहर के नक्शे से वे बस्ती गायब हो गए जहां पहले वे लोग रहा करते थे, जिनके पास विदापत नाच से लेकर लोकगीतों का खजाना था, अब वहां इमारतें बन गई। धरती -जमीन कहलाने लगी। दरअसल आप जबतक धरती कहेंगे तबतक उसे बेच नहीं पाएंगे लेकिन जमीन शब्द जेहन और बोली में आते ही धन हम पर हावी हो जाता है।

रेणु ने अपनी कृतियों में कभी जमीन नहीं कहा, वे हमेशा भूमि, धरती कहा करते थे....लेकिन अब उनकी भूमि-जमीन कहलाने लगी है, जिसके बारे में वे कहा करते थे-इसमें फूल भी है शूल भी, धूल भी है, गुलाल भी, कीचड़ भी है चंदन भी, सुंदरता भी है कुरुपता भी। दरअसल यही है बदलाव, मूल में बदलाव।

Wednesday, May 13, 2009

एक शहर जहां से हम आए थे...

हर शहर कुछ कहता है और फिर पूछ ही लेता है- यहां कौन रहता है। मैं यहां अपने शहर में डूबे इंसान की बात कर रहा हूं। हम जब दूर होते हैं अपने शहर से तो उसकी सबसे अधिक याद आती है। तब हम यह नहीं सोचते कि आखिर हम क्यों निकले थे अपने शहर से। यदि खुद में डूब कर देखें तो पता चलता है कि अपने शहर से निकलने के बाद एक नया शहर आप में समां जाता है और हम-आप उसी के हो जाते हैं।

मिट्टी ग्लोबल होती जा रही है। ऐसी बात नहीं कि अपना शहर उस शहर से अलग है जहां अभी हम ठिकाना बनाए हुए हैं। लोग-बाग अब वहां भी वैसे नहीं रहे, जैसा आपने शहर को छोड़ते वक्त महसूस किया था। बदला है तो केवल बाजार। यह सच है और अच्छा भी की जो चीजें, जो सुविधाएं महानगरों में आपको मिल रही है वह आपको अपने शहर में आसानी से मिल जाती है।

बडे-बड़े बोर्डों से पटा शहर, घरों के ऊपर मोबाइल कंपनियों के लहरहाते टॉवर आपको एक बाजारू शहर से मिलाता है। हमें इससे कोई दिक्कत नहीं है कि अपना शहर अब सो कॉल्ड बड़े शहरों से कदम ताल मिला रहा है लेकिन इसमें उसकी पहचान गुम होकर रह जाए तो फिर मुश्किल का अहसास होता है।

मैं थोड़ा लोकल हो रहा हूं, मुझे अपने शहर की याद आ रही है। लंबे समय से दूर रहने के बाद मेरे साथ अक्सर ऐसा होता है। पता नहीं सभी के साथ ऐसा होता है कि नहीं। अनुराग कश्यप की बोली में कहूं तो इमोशनल अत्याचार कर रहा हूं (भले ही इसका कोई मतलब न हो), पर अपना शहर अपना होता है। जहां तक पहचान गुम होने वाली बात है तो वह किसी शहर के मूल में हो रहे बदलाव पर निर्भर करता है।

मैं यहां अपने शहर पूर्णिया के मूल में हुए बदलावों का जिक्र कर सकता हूं। इसे आप आम बदलाव कह सकते हैं जो हर जगह हुआ। कुछ चीजें साफ बदल जाती है। मसलन मेरे शहर के जलेबी और कचौरी पर भी बर्गर-सेंडवीच का जादू चल गया है। बोली-बानगी में बांग्ला-मैथिली की चहक गायब होती जा रही है और चौक की शाम बदल गई है। हम-आप बस इन बदलावों के गवाह बनते जा रहे हैं।

Sunday, May 10, 2009

लबों पर उसके कभी बददुआ नहीं होती, बस एक माँ है जो कभी खफ़ा नहीं होती।

साल के ३६५ दिनों में एक दिन किसी ने कभी मां के लिए रखा होगा, शायद इसलिए १० मई को लोग मदर्स डे मनाते हैं। मां शब्द से हर एक को प्यार होता है। मुन्नवर राना साब ने इस पर जो लिखा है, बस आप उसे ही पढ़िए। याद आता है कुछ वर्ष पहले वे दिल्ली आए थे। उन्हें सुना तो पता चला कि उनकी आवाज उनके शब्द कितने अनमोल हैं। उन्होंने एक किताब लिखी है- मां। इस किताब के शुरुआत में राना साब कहते हैं–

“मैं दुनिया के सबसे मुकद्दस और अज़ीम रिश्ते का प्रचार सिर्फ इसलिए करता हूँ कि अगर मेरे शेर पढ़ कर कोई भी बेटा माँ की खिदमत और ख्याल करने लगे, रिश्तों का एहतराम करने लगे तो शायद इसके बदले में मेरे कुछ गुनाहों का बोझ हल्का हो जाए। ये किताब भी आपकी ख़िदमत तक सिर्फ इसलिए पहुँचाना चाहता हूँ कि आप मेरी इस छोटी सी कोशिश के गवाह बन सकें और मुझे भी अपनी दुआओं में शामिल करते रहें। “
उन्होंने लिखा है-
लबों पर उसके कभी बददुआ नहीं होती,
बस एक माँ है जो कभी खफ़ा नहीं होती।


गिरीन्द्र


हँसते हुए माँ बाप की गाली नहीं खाते
बच्चे हैं तो क्यों शौक़ से मिट्टी नहीं खाते

हो चाहे जिस इलाक़े की ज़बाँ बच्चे समझते हैं
सगी है या कि सौतेली है माँ बच्चे समझते हैं

हवा दुखों की जब आई कभी ख़िज़ाँ की तरह
मुझे छुपा लिया मिट्टी ने मेरी माँ की तरह

सिसकियाँ उसकी न देखी गईं मुझसे ‘राना’
रो पड़ा मैं भी उसे पहली कमाई देते

सर फिरे लोग हमें दुश्मन-ए-जाँ कहते हैं
हम जो इस मुल्क की मिट्टी को भी माँ कहते हैं

मुझे बस इसलिए अच्छी बहार लगती है
कि ये भी माँ की तरह ख़ुशगवार लगती है

मैंने रोते हुए पोंछे थे किसी दिन आँसू
मुद्दतों माँ ने नहीं धोया दुपट्टा अपना

भेजे गए फ़रिश्ते हमारे बचाव को
जब हादसात माँ की दुआ से उलझ पड़े

लबों पे उसके कभी बद्दुआ नहीं होती
बस एक माँ है जो मुझसे ख़फ़ा नहीं होती

तार पर बैठी हुई चिड़ियों को सोता देख कर
फ़र्श पर सोता हुआ बेटा बहुत अच्छा लगा ।

आप इसे यहां भी पढ़ सकते हैं।

Thursday, May 07, 2009

इक जरा छींक ही दो तुम, तो यकीं आए कि सब देख रहे हो

गुलजार साब भगवान से भी बात करते हैं और उनसे सवाल भी पूछते हैं। पढिए कैसे कृष्ण से गुलजार बात करते हैं-


चिपचिपे दूध से नहलाते हैं


आंगन में खड़ा कर के तुम्हें ।


शहद भी, तेल भी, हल्दी भी, ना जाने क्या क्या


घोल के सर पे लुंढाते हैं गिलसियां भर के


औरतें गाती हैं जब तीव्र सुरों में


मिल कर पांव पर पांव लगाये खड़े रहते हो


इक पथरायी सी मुस्कान लिये


बुत नहीं हो तो परेशानी तो होती होगी ।


जब धुआं देता, लगातार पुजारी


घी जलाता है कई तरह के छौंके देकर


इक जरा छींक ही दो तुम,


तो यकीं आए कि सब देख रहे हो ।

Monday, May 04, 2009

मुल्क़ सारा ये टशन में थ्रिल में है


रे बिस्मिल काश आते आज तुम हिन्दोस्ताँ

देखते कि मुल्क़ सारा ये टशन में थ्रिल में है


आज का लौंडा ये कहता हम तो बिस्मिल थक गये

अपनी आज़ादी तो भइया लौंडिया के तिल में है


आज के जलसों में बिस्मिल एक गूँगा गा रहा

और बहरों का वो रेला नाचता महफ़िल में है


हाथ की खादी बनाने का ज़माना लद गया

आज तो चड्ढी भी सिलती इंगलिसों की मिल में है

Saturday, May 02, 2009

बाहुबलियों की नहीं संगीत और साहित्य की भूमि है पूर्णिया

समय की तेज रफ्तार में बिहार के पूर्णिया जिले की तस्वीर भी बदलती जा रही है। महान उपन्यासकार फणीश्वरनाथ रेणु की भूमि के लिए प्रसिद्ध पूर्णिया को लोग पप्पू यादव और न जाने कैसे-कैसे बाहुबलियों के लिए भी याद करते हैं लेकिन क्या आपको मालूम है कि रेणु की प्रसिद्धि देश-विदेश तक फैलने से पहले शास्त्रीय संगीत के लिए इस जिले को पहचाना जाता था..।

कभी यहां देश के दिग्गज संगीतकारों को जमावड़ा होता था और फिजा में ख्याल से लेकर ठुमरी घुली रहती थी। शास्त्रीय संगीत की नामचीन हस्तियां पूर्णिया शहर से कुछ ही दूरी पर स्थित चंपानगर के एक रजवाड़े में इकट्ठा होते थे। ताज्जुब की बात यह है कि रजवाड़े का ही एक सदस्य शास्त्रीय संगीत में ही रमा रहता था। वह शख्स थे राजकुमार श्यामानंद सिंह। शिकार, बिलियर्डस के शौकीन कुमार साहब हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में समान पकड़ रखते थे। कृष्ण से जुडे गीतों को उन्होंने एक अलग अंदाज प्रस्तुत किया, जो अब काफी कम ही सुनने को मिलता है।

कुमार साहब के संगीत के बारे में यदि जानना है तो पंडित जसराज से पूछिए। एकबार उनके द्वारा गाए बंदिश को सुनने के बाद पंडित जसराज रो पड़े थे। जसराज ने कहा था- आह, मेरे पास भी ऐसा जादू होता। उन्हें अभी भी संगीत साधक द्वारिकानाथ शरण में तेरी..के लिए याद करते हैं। हाल ही में दिल्ली में भी उनके एक दीवाने से मुलाकात हुई थी। करीब 23 साल के इस युवा को मैंने खुद कुमार साहब की बंदिशों में डूबे देखा है।

कुमार साहब से जुड़ी एक कहानी है। जब जाकिर हुसैन बिहार के राज्यपाल थे तो उन्होंने उनकी आवाज सुनी तो उन्होंने कहा कि कुमार साहब की आवाज में ईश्वर विराजते हैं। संगीत के प्रमुख घरानों में एक आगरा घराना से ताल्लुक रखने वाले कुमार साहब ने संगीत की विधिवत शिक्षा उस्ताद भीष्मदेव चटोपाद्याय से ली थी।

कुमार साहब ने सावर्जनिक स्थलों पर काफी कम कार्यक्रम पेश किया। जिसकारण उनके संगीत के बारे में लोगों को काफी कम जानाकरी है। ऑल इंडिया रेडियो के आर्काइव में उनके गाए गीत हैं लेकिन वो भी आसानी से उपलब्ध नहीं हो पा रहे हैं।

संगीत के इस महान अराधक के बारे में कई कहानियां आज भी सुनी जा सकती है। निजी जीवन में बेहद सख्त माने जाने वाले कुमार साहब संगीत के मामले उतने ही नरम थे।

अब बात पते की, पूर्णिया को पप्पू यादव के नाम से पहचाने वाले लोग इस जिले की नब्ज को पहचाने में भूल करते हैं। इसमें कहीं न कहीं पूर्णिया की भी कुछ गलतियां हैं, मसलन घर की मुर्गी दाल बराबर वाली कहावत। मीडिया भी इस इलाके को ठीक ढंग से पेश नहीं कर पाया है।

ऐसी बात नहीं है कि यहां केवल बंदूक की राजनीति ही हावी है। आज भी यहां कलात्मक कार्यों का बोलबाला है। शास्त्रीय संगीत, लोकसंगीत, मिथिला पेंटिंग, बांस और बेंत की सुंदर वस्तुएं जैसी तमाम कलाएं यहां अपने बल पर जीवित है लेकिन ये सभी चीजें लंबी और चमकदार लाल बत्तियों वाली गाड़ियों के काफिले में कहीं छूट सी जाती है।

शहर में शास्त्रीय संगीत की धमक का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि बच्चों की एक बड़ी टोली यहां लगन से शास्त्रीय संगीत सीख रही है।

अंकुर इसका उदाहरण है। यहां आपको अंकुर जैसे कई बच्चे शास्त्रीय संगीत में रमे मिल जाएंगे लेकिन क्या ऐसे बच्चे राष्ट्रीय मंच तक पहुंच पाएंगे..संगीत घरानाओं के बड़े नामों और उनके शिष्यों के बीच क्या पूर्णिया के संगीत साधक अपनी जगह बना पाएंगे॥? इसके लिए संचार से लेकर अन्य सभी माध्यमों को आगे आने की जरूरत है। मैं इसे नैनो की तरह लखटकिया सवाल मानता हूं।