मुझे आदमी का सड़क पार करना हमेशा अच्छा लगता है क्योंकि इस तरह एक उम्मीद - सी होती है कि दुनिया जो इस तरफ है शायद उससे कुछ बेहतर हो सड़क के उस तरफ। -केदारनाथ सिंह
Thursday, October 30, 2008
रवीश के कस्बे से अनुभव........(.भाया नई सड़क)
गिरीन्द्र
टिप्पणी है-
'' पिता जब जिंदा होते हैं अपने बेटे के लिये दिन रात काम करते है। इस उम्मीद में कि वो उससे बेहतर बने। गुजर जाते हैं तो उनके सपने बेटे की आँखों में तैरने लगते हैं।
ये रिश्ता ऐसा है जो हर दिन मजबूत से मजबूततर होता जाता है। पिता के नहीं रहने के बाद भी।
पिता होना इक एहसास भी है।पिता को सिर्फ महसूस किया जा सकता है। वो एक पेड की तरह हैं। जिसका साया आपको सुकून देता है। ''
टिप्पणी देने वाले का ब्लॉग है- सबकी कहानी
Monday, October 27, 2008
दुखी नहीं करना चाहता......बस कहना चाहता हूं....
अभी भी ९० हजार से अधिक लोग विभिन्न राहत शिविरों में रह रहे हैं ....३,००० से अधिक लोग लापता हैं ....सरकारी आंकड़ो पर ही विश्वास करें तो १९१ लोगों की मौत हो गई.........।
मैं दीपावली के अवसर पर आपको दुखी नहीं करना चाहता हूं.....और सच कहूं तो आंखों में आंसू मैं भी नहीं लाना चाहता। खुश मैं भी रहना चाहता हूं, मां फोन पर कहती है...खुश रहो......।
लेकिन फारबिसगंज के बथनाहा इलाके से मेरे एक किसान दोस्त ने आज फोन किया था और बाढ़ के बाद बिहार पर कई बातें बताई। रौएं खड़े हो गए। फोन रखने से पहले मैथिली में बस उसने यही कहा - हम दिवाली ने मना रहल छी, हमर पड़ोसी क भाए कोसी में दहा गेल रहे, बखारी में किछ ने अछि ....खाए लेल अन्न...बाबू अहीं कहूं केना दीप जरेबे, केना पटाखा फोरबे।
( हम लोग दिपावली नहीं मना रहे हैं। मेर पड़ोसी के भाई को इस वर्ष कोसी लेकर चली गई है। भंडार घर में अन्न नहीं है तो खाएंगे क्या। ऐसे में बस तुम ही कहो कि कैसे दीप जलाउं और कैसे पटाखे में आग लगाउं......)
नेता भी बना रहे हैं संस्थान
चलिए आज कुछ अलग बात करते हैं। एक खबर मिली तो सोचा आप भी इसे पढ़े। दरअसल, जब हर विषय की पढ़ाई के लिए शिक्षण संस्थाएं खोली जा रही है तो भला नेताजी बनने के लिए संस्थाएं क्यों न खोली जाए। तो पढिए और यदि बनना हो नेता तो बेंगलुरू जाइए।
यूं तो अनेक संस्थानों में इतिहास, राजनीति विज्ञान, कानून और गांधीवाद के सिद्धांत आदि पढ़ाए जाते हैं लेकिन एक संस्थान ऐसा भी है जो आपको राजनीति में अपना करियर बनाने में मदद करता है।
इस संस्थान में कक्षाएं सिर्फ रविवार को आयोजित की जाती हैं और तीन महीने के कोर्स का शुल्क 5,000 रुपये निर्धारित किया गया है। यहां अतिथि व्याख्याताओं के रूप में राजनीतिज्ञों को ही आमंत्रित किया जाता है।
वर्तमान में संस्थान में 35 विद्यार्थी हैं जिन्हें नेताओं के कपड़े पहनने उनके बाल संवारने और यहां तक कि दाढ़ी के अद्यतन स्टाइल से भी परिचित कराया जाता है। विद्यार्थियों को सार्वजनिक भाषण देने की कला में भी पारंगत किया जाता है।
संस्थान के प्रवर्तकों में से एक जी. बी. राजू ने कहा, "छात्रों को न केवल इतिहास, कानून और राजनीति विज्ञान पढ़ाया जाएगा बल्कि उन्हें नेताओं के हाव भाव तथा उनके व्यक्तित्व की अन्य बातों से भी अवगत कराया जाएगा।"
राजू ने बताया कि पहले बैच में आईटी क्षेत्र के धुरंधरों, बेरोजगार युवाओं और पहले से राजनीति के अखाड़े में उतर चुके लोगों ने दाखिला लिया है।
संस्थान का पाठ्यक्रम बेंगलुरू विश्वविद्यालय के प्रोफेसरों ने तैयार किया है और अभी तक इसे किसी विश्वविद्यालय की मान्यता प्राप्त नहीं है।
Saturday, October 25, 2008
कंधमाल की यह भी तस्वीर.....
इस बात को शायद कम लोग जानते होंगे कि जो कंधमाल पिछले दो महीने से ईसाई विरोधी हिंसा को लेकर बदनाम है, वह दुनिया की सर्वोत्तम गुणवत्ता वाली जैविक हल्दी भी उपजाता है।
हिंसा के आरोप में गिरफ्तारी के डर से वहां के किसानों के अभी तक जंगलों में छुपे होने के बावजूद इस वर्ष वहां की जलवायु हल्दी के लिए अनुकूल रहने के कारण ज्यादा पैदावार की उम्मीद है।
कंधमाल एपेक्स स्पाइस एसोसिएशन फॉर मार्केटिंग (केएएसएएम) के सचिव प्रमोद पाठक के अनुसार पिछले साल जिले में हल्दी का कुल उत्पादन 9 हजार टन था। इस वर्ष यह आकड़ा 10 हजार टन से भी ऊपर पहुंचने का अनुमान है।
ज्ञात हो कि केएएसएएम राज्य द्वारा संचालित एक ऐसी संस्था है जो परंपरागत तरीके से मसाला उत्पादन करने वाले भारतीय किसानों का उस क्षेत्र में प्रतिनिधित्व करती है। इसमें 61 समूह और 12 हजार सदस्य शामिल हैं।
यहां उपजाई जाने वाली हल्दी कंधमाल हल्दी के नाम से जानी जाती है और इसे जैविक गुणवत्ता के लिए सर्वोत्तम अंतर्राष्ट्रीय प्रमाण पत्र प्राप्त है। जिले का कुल हल्दी व्यापार 30 करोड़ रुपये का है।
भुवनेश्वर से करीब 200 किलोमीटर दूर जंगलों से घिरे इस पहाड़ी जिले की 6 लाख की आबादी का 50 प्रतिशत से अधिक हिस्से की आजीविका हल्दी पर निर्भर हैं।
हल्दी बोने वाले ज्यादातर किसान आदिवासी हैं। हल्दी उपजाना इनका खानदानी पेशा है। लेकिन जब से क्षेत्र में ईसाई विरोधी हिंसा भड़की है, गिरफ्तारी के डर से तमाम किसान जंगलों में छुपे हुए हैं।
Thursday, October 09, 2008
झुमरीतिलैया है या 'झूम री तिलैया'
कई दिनों बाद ब्रजेश भाई को अनुभव पर ला रहा हूं। काफी रोचक पोस्ट है। खासकर रेडयो और फिल्मी गीतों के शौकिनों के लिए।
आनंद लें।
झारखंड के झुमरीतिलैया शहर के किस्से बड़े निराले हैं, खासकर फिल्मी गीतों को लेकर। कहा जाता है कि इस इलाके से केवल फरमाइशी गीतों की लहरें उठती हैं। रेडियो सिलोन (श्रीलंका) हो या फिर विविध भारती, इन रेडियो स्टेशनों से जब भी गीत प्रसारित होते हैं तो यहां के लोग मचल उठते हैं।
तिलैयावासी संजीव बर्नवाल बताते हैं, "आप इस छोटे से शहर में घूमें। तब आपको पता चलेगा कि फिल्मी गीतों के कितने कद्रदान यहां आकर बस गए हैं।" पहाड़ी पर बसे तिलैया शहर ने फरमाईशी गीतों के विविध कार्यक्रमों के बूते अपनी खास पहचान बनाई है। एक समय कहा जाने लगा था कि फरमाईशी गीतों के कार्यक्रमों को तिलैया वालों ने हिट कर दिया है, जिसमें एक महत्वपूर्ण नाम रामेश्वर प्रसाद बर्नवाल का
रामेश्वर बर्नवाल अब नहीं रहे लेकिन रेडियो सिलोन (श्रीलंका)और विविध भारती का पता लिखा पोस्टकार्ड अब भी उनकी आलमारी में पड़ा है। उनकी पत्नी द्रोपदी देवी ने बताया, "मेरे पति गीतों के बड़े शौकीन थे और फिल्मी गीतों को खूब सुनते थे।"
उन्होंने कहा, "साठ और सत्तर के दशक में जिन-जिन रेडियो स्टेशनों से फरमाईशी गीतों के कार्यक्रम प्रसारित होते थे, उन सभी स्टेशनों पर एक-एक पोस्टकार्ड भेजना उनका रोज का काम था।"
रामेश्वर के बेटे संजीव ने बताया, "पिताजी बताते थे कि यह प्रक्रिया खेल-खेल में शुरू हो गई। उन दिनों गीत सुनने की अपेक्षा रेडियो में अपना व अपने शहर का नाम सुनना लोगों को अधिक रोमांचित करता था। धीरे-धीरे फरमाईशी गीतों के कार्यक्रमों को सुनना तिलैयावासियों की आदत हो गई।"
हजारीबाग के निकट बसे इस शहर में सन सत्तर के आसपास 'झुमरीतिलैया रेडियो श्रोता संघ' का गठन किया गया था। गंगा प्रसाद, मनोज बागरिया, राजेश सिंह, अर्जुन साह जैसे लोग इसके सदस्य
बाद के दिनों में फरमाईशी गीतों को सुनने का ऐसा जादू चढ़ा कि लोग टेलीग्राम के माध्यम से भी पसंदीदा गीतों को बजाने की मांग करने लगे। इसकी शुरुआत भी रामेश्वर ने की थी। संजीव ने बताया कि सबसे पहले उन्होंने 'दो हंसों का जोड़ा बिछड़ गया रे'(फिल्म-गंगा यमुना) गीत सुनने के लिए विविध भारती को टेलीग्राम किया था।
एक समय ऐसा भी कहा जाने लगा था कि हिन्दी फिल्मों का चलताऊ संगीतकार भी झुमरीतिलैया के श्रोताओं के बल पर सुख की नींद सोता है। आखिर ऐसा हो भी क्यों न! लोग इस शहर को झुमरीतिलैया की जगह 'झूम-री-तिलैया' जो कहने लगे हैं।